Tuesday, July 13, 2010

बरखा का श्रंगार

बरखा की बूँदों ने
किया श्रंगार।
सूरज ने लुटाया
मुझ पर अपना प्यार।

कल तक था मैं गुमनाम
जलता था तपिश में मैं।
बरखा रानी चुपके से आई
धीरे से कानों में फुसफुसाई।

बूँदे बोली मुझसे
क्यों है तू उदास?
चल मेरे साथ कर ले
मौज-मस्ती और उल्लास।

खुशबू अपनी तू लुटा
झुम-झुम के तू गा।
मस्त पवन के झोको संग
तू मंद-मंद मुस्का।

पवन लेकर चली पाती प्रेम की
बूँदों ने मधुर गान गाया।
बरखा के मौसम में फूल
खुलकर मुस्कुराया।

-गायत्री

(यह कविता मेरे व्यक्तिगत ब्लॉग aparajita.mywebdunia.com पर 26 मई 2008 को पोस्ट की गई थी।)

मेरी यह कविता आपको कैसी लगी, आपके विचारों से मुझे अवश्य अवगत कराएँ।

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