Tuesday, September 21, 2010

जब होने लगे मंदिरों में अजान

कैसा लगे जब हिंदु करे अजान
और मुस्लिम गाए आरती
जब हम सभी रहे मिलजुलकर
और प्रेम बने जीवनरथ का सारथी

जब एक सी ऑक्सीजन
हम सभी के दिल को है धड़काती
तब जाति-धर्म के नाम पर
हमारी सांसे क्यों है घुट जाती?
क्यों नहीं मक्का शरीफ को
गंगा जल की धार है पावन बनाती ?

अल्लाह नहीं कहता हमें
मस्जिद से बाहर जाने को
पर इंसान बन अल्लाह
कह जाता है हिंदू को मुस्लिम बन जाने को

मंदिरों की घंटियाँ मुस्लिम की इबादत
पर भी सुनाई आती है
पर पुजारी की पूजा की आरती
कभी मस्जिद में क्यों नहीं जाती है?

बहुत से प्रश्न अब तक है अनुत्तरित
जिन्हें अब सुलझना चाहिए
मुस्लिम के मुँह से गीता
और हिंदु के मुँह से 'अल्लाह हो अकबर'
अब तो निकलना चाहिए

'मौन'या 'हिंसा'नहीं है किसी समस्या का हल
प्रेम और भाईचारा ही है अब सुलह का एक विकल्प
आओं करे एक ऐसे देश की कल्पना
जहाँ हर घर में मस्जिद,मस्जिद, गुरूद्वारा हो
ईद की मीठी सेवईयाँ के दूध में
गणेश चतुर्थी के मोतीचूर के लड्डू का मसाला हो


- गायत्री शर्मा

No comments: