Tuesday, November 19, 2013

म.प्र. विधानसभा चुनाव 2013 – मुद्दे, वादें और हकीकत (भाग – 1)

वादा तेरा वादा ...

भारत के हृदय प्रदेश कहे जाने वाले मध्यप्रदेश में 25 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होने के साथ ही छोटे-बड़े राजनेताओं की प्रदेश में चहलकदमी की हलचलें भी तेज होने लगी है। भाजपाशासित इस प्रदेश में शिवराज के कार्यकाल में प्रदेश के विकास की बात छेड़कर जहाँ भाजपा आमजन को ‘फिर शिवराज’ का नारा देकर प्रलोभित कर रही है। वहीं दूसरी ओर भाजपा की वादाखिलाफी का राग अलापते हुए कांग्रेस भी तख्तापलट की आशा में ‘सत्ता परिवर्तन रैली’ निकालकर जनता को सत्ता परिवर्तन हेतु उकसा रही है। यह तो हुई प्रदेश में सत्ता की कुर्सी के दो बड़े दावेदार दलों की बात। कमल के फूल व पंजे की इस लड़ाई के बीच अन्य दलों के नेता व निर्दलीय उम्मीद्वार भी विकास की बयार लाने के वादों के साथ अपना एक अलग राग अलाप रहे हैं। इस प्रकार चुनावी दंगल में अपनी किस्मत आजमाने वाले सभी उम्मीदार नए वादों व पुराने मुद्दों के साथ प्रदेश के वोटरों का दिल जीतने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। यही वजह है कि कभी-कभार जनता के बीच नजर आने वाले नेताजी अब वोट की जुगाड़ में जनता के पैर पकड़ते व उन्हें प्रणाम करते नजर आ रहे हैं। सत्ता की मीठी रबड़ी का लालच राजधानी में बैठे मामा (शिवराज सिंह चौहान) को भी हर आमसभा में लाडलियों का बखान करने को विवश कर रहा है। पक्ष-विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप के बीच चुनावी राजनीति के अखाड़े में हर कोई राजनेता अपनी व अपने दल की उपलब्धियाँ गिनाते नहीं थक रहा है।

प्रदेश में सीटों का गणित :
मध्यप्रदेश में कुल 230 विधानसभा सीटें है। जिनमें से लगभग 33 सीटे एससी व लगभग 41 सीटे एसटी हेतु आरक्षित है। पिछले चुनाव के रूझान की बात करें तो जहाँ वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में 143 सीटों पर कमल खिला था। वहीं इस बार भी प्रदेश की सत्ता में भाजपा का भगवा रंग ही काबिज रहने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि इस बार भाजपा को सड़क, बेरोजगारी और पिछड़ेपन जैसे मुद्दों के नाम पर अपनी 10-15 सीटे खोनी भी पड़ सकती है क्योंकि जनता से की गई वादाखिलाफी अब सीटों के नुकसान के रूप में शिवराज पर महँगी पड़ सकती है। स्पष्ट तौर पर कहे तो इस बार प्रदेश की जनता प्रदेश के राजकुमार यानि ज्योतिरादित्य पर कुछ हद तक विश्वास जता सकती है। लेकिन इसका अर्थ नहीं है कि मध्यप्रदेश से भाजपा का सुपड़ा साफ हो जाएगा। भाजपाशासित इस प्रदेश में शिवराज का जादू तो इस बात भी चलेगा।
यदि प्रदेश विधानसभा चुनाव पर हुए ताजा सर्वे की बात की जाएँ तो सर्वे का रूझान भी ‘एक बार फिर शिवराज’ की ओर ही है। ‘समय हब पल्स सर्वे 2013’ के अनुसार इस बार भाजपा प्रदेश में 124 सीटों पर कमल खिलाएँगी। जबकि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 143 सीटों पर जनता का विश्वास जीता था। यानि कि 19 सीटों के नुकसान का पूर्वानुमान। ‘इंडिया टीवी ओपिनियन पोल सर्वे’ की मानें तो इस बार प्रदेश में 133 सीटों पर कमल खिल सकता है। वहीं ‘सीएनएन-आईबीएन सर्वे’ कमल क्रांति की ओर ईशारा करते हुए 148 सीटों की बढ़त के अनुमान की बात कर रहा है। यह तो हुई सर्वे की बात पर चुनाव की इस पूरी गणित को पलटने का चमत्कार करना या न करना तो पूरी तरह से प्रदेश की जनता के हाथ में है। अब देखना यह है कि यहाँ मामा का जादू काम करता है या राजकुमार का।

प्रचार के लिए बुलवाएँ पामणे :
लोकसभा चुनाव में हार-जीत की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि तैयार करते इस चुनाव में केंद्रीय मंत्रियों के साथ ही कई बड़े स्टार प्रचारक भी अपने दल के नेताओं के लिए वोट माँग रहे हैं। नेताजी से लेकर मीडियाकर्मी और सेलिब्रिटी तक सब मजे में है। चुनाव के इस समर में तो खबरों, मुद्दों और नोटों की भरमार के कारण इन सभी की चाँदी हो रही है। सबको प्रचार, प्रसार और वाहवाही जितने का भरपूर मौका मिल रहा है। जहाँ प्रदेश के दिग्गज राजनेता अपनी कामयाबी को गिनाने के लिए और जनता के वोट जुगाड़ने के लिए अपने दलगत स्कूल के मास्टर यानि कि पार्टी अध्यक्ष व कई बड़े केंद्रीय नेताओं को मंच पर ला रहे हैं। वहीं अभिनय से रिटायर्ड हो चुके सितारे भी चुनाव में दलों के स्टार प्रचारक बन अपनी कमाई का एक नया जरिया तलाश रहे हैं। आखिर हो भी क्यों न नोट के बदले वोट की राजनीति अब इस देश में आम बात हो चुकी है।

क्या हुआ तेरा वादा :
प्रदेश में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कई ऐसे मुद्दे है। जिन पर जमकर राजनीति की जा सकती है। आखिर हो भी क्यों न, जब तक मुद्दों पर बहस व सत्तासीन व विपक्षी दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप नहीं होंगे। तब तक जनता हकीकत से परे ही रहेगी। पोल खोल के कार्यक्रम का मजा तो चुनावों में ही आता है। इसी से तो जनता के आँखों पर पड़ी विश्वास की पट्टी खुलती है और उसे हकीकत नजर आती है। यदि हम प्रदेश की तीन बड़ी समस्याओं की बात करें, जिनके सहारे चुनावी गणित कभी भी बदल सकता है तो मेरी राय में वे तीन मुद्दे सड़क, उद्योग व शिक्षा के होंगे। इन तीनों ही मामलों में यह प्रदेश पिछड़ेपन का शिकार है। प्रदेश में इन मुद्दों को लेकर हर चुनाव में केवल वादें होते हैं काम नहीं। उद्योगों व एमएनसी के नाम पर भूमिपूजन होता है, इन्वेस्टर समिट होती है ... और उसके बाद सालों तक भूमिपूजन हुई जमीन पर गाजर घास व मवेशियों के अलावा कोई नजर नहीं आता। यहीं हाल प्रदेश की सड़कों का भी है। प्रदेश में सड़कों की दुर्दशा के बारे में तो यहीं कहना उचित होगा कि यहाँ सड़कों में गड्ढ़ों की बजाय गड्ढ़ों में सड़कों के अवशेष नजर आते हैं। पुराने सड़क निर्माण कार्य के तो हाल बेहाल है लेकिन प्रदेश में बनी नई फोरलेन सड़कों का निर्माण भी प्रदेश की बदहाल स्थिति को ही बँया करता नजर आता है। नई सड़कों पर गड्ढ़ों की खानापूर्ति हेतु किया जाने वाला पेचवर्क इन सड़कों के घटिया निर्माण की ओर ही ईशारा करता है।
अब यदि हम बात करे तो बेरोजगारी की, तो शिक्षित बेरोजगारों की बढ़ती संख्या प्रदेश के युवाओं को रोजगार की तलाश में दूसरे प्रदेशों में पलायन करने को विवश कर रही है। प्रदेश के लगभग 80 प्रतिशत इंजीनियरिंग व आईटी के छात्र नौकरी व अच्छे पैकेज की तलाश में पूणे, बंगलौर, नोएडा, गुणगाँव, मुबंई आदि महानगरों का रूख कर रहे हैं। सच कहें तो प्रदेश का आईटी हब बनना तो अब केवल कल्पनाओं में ही नजर आता है। यहीं हाल मेडिकल स्टूडेंट्स का भी है। उच्च शिक्षा का गिरता स्तर व नौकरी की तलाश कहीं न कहीं युवाओं को प्रदेश से पलायन करने को विवश कर रही है। जब शिक्षित युवा ही प्रदेश से पलायन करेगा तो विकास कहा से प्रदेश की ओर रूख करेगा?
अब बात आती है उद्योगों की। उद्योगों की कमी व बंद पड़े उद्योगों की अनदेखी प्रदेश के विकास में सबसे बड़ा अवरोध बन रही है। बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर होते हुए भी गड्ढ़ों से छलनी हुई सड़के परिवहन हेतु बड़ी परेशानी बन नए उद्योगों को प्रदेश में आने से रोक रही है। प्रदेश का विकास बेरोजगारी, बदहाल सड़कों व उद्योगों की अनदेखी के कारण अवरूद्ध पड़ा है, जो कि इस विधानसभा चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया है।    

इन मुद्दों के अलावा गौण मुद्दों में महिला सुरक्षा, शिक्षा, बिजली-पानी की समस्या, भ्रष्टाचार आदि कई ऐसे मुद्दे हैं जो या तो शिवराज सरकार को आफत में डाल सकते हैं या फिर प्रदेश के जागरूक मतदाताओं को ‘इनमें से कोई नहीं’ विकल्प का चयन करने पर मजबूर कर सकते हैं। अब देखना यह है कि लाडलियों का दिल जीतने वाले उनके मामा क्या अब प्रदेश की जनता का बहुमत हासिल कर पाएँगे या नहीं?   
- गायत्री 

2 comments:

संजय जोशी "सजग " said...

बहुत सुंदर आलेख .......सामयिक .....

Gayatri Sharma said...

धन्यवाद संजय जी ...