Sunday, December 1, 2013

खामोशी में है कुछ बात ...

कभी-कभी खामोश रहकर भी कुछ कहा करो
मौन की उस सरसराहट को समझा करो
इधर-उधर घुमाकर कब तक करते रहोगे बाते
आँखों के इशारे से भी तो कभी कुछ कहा करो।

सच है आँखों में, पर डर है अल्फाजों में
सिल-सिलकर बाते मत किया करो
सुलझी गुत्थी को बार-बार उलझाकर
जग की छोटी सोच के चक्रव्यूह में मत फसा करो

बोलते-बोलते लब को भी कभी सिला करो
और धड़कन की खामोश सरगम सुना करो
आँखों में बसे उस जाने-पहचाने चेहरे को
कभी सामने आने पर तवज्जू भी दिया करो।
- गायत्री

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