Friday, May 16, 2014

मेरे हीरो – मेरे दादू

तेरी लाठी बना ले मुझे
किस्सों की तरह यादों में बसा ले मुझे
सदा चलूँ तेरे साथ मैं
अपने पैरों की खड़ाऊँ बना ले मुझे  

घुटने छूने को बेकरार ये कंधे
तेरे बहुत ऊँचे कद को बताते हैं
तेरे कांधों पर बैठकर देखे वो मेले
मुझे आज़ भी बहुत याद आते हैं

हरपल कँपकँपाते तेरे हाथ
दुनियादारी की कैसी अजीब गणित सीखाते हैं
तुझ संग मैं बुरा करूँ या भला
तेरे हाथ सदा मुझे दुआएँ दिए जाते हैं

झुर्रियों से सनी चमड़ी
आज भी एक नई चमक से चमचमाती है
यह तो मुझे मोटे चश्में में छुपे मेरे हीरों की  
जवानी की याद दिलाती है

दादी की यादों में मेरे दादा
अक्सर खुली आँखों में खो जाते हैं
तस्वीरों की धूल के साथ
अब उनके सपने भी धुंधलाएँ जाते हैं।

तब और अब का फर्क


सदा हमें संभालने वाले दादू
आज तुम क्यों लड़खड़ा गए?
जिंदगी की कटु सच्चाई देख
क्या तुम भी घबरा गए?

तेरे पैर का हर एक छाला
मेरे दिल को छलनी कर जाता है
तेरी हर तकलीफ का दर्द दादू,  
अक्सर मेरे चेहरे पर पढ़ा जाता है।

मुझसे बगैर कुछ कहे
कहीं गुम न हो जाना
मुझे साथ लिए बगैर दादू
तुम चमकता सितारा न बन जाना

प्रीत की इस डोर को
और भी लंबी बनाएँ रखना
अपनी पोती की इस मनुहार पर
हमेशा की तरह अब भी ‘ना’ न कहना।   


-          - गायत्री 

4 comments:

जनमेजय said...

मर्मस्पर्शी... सभी के लिए नॉस्टेल्जिक

गायत्री शर्मा said...

मेरी कविता पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए शुक्रिया जनमेजय जी।

sanjay parsai said...

veri nice

गायत्री शर्मा said...

धन्यवाद परसाई जी।