Wednesday, May 21, 2014

मैं कहती, तू कर देता

तेरा कहना और मेरा सुनना कभी एक सा नहीं होता
गर होता एक सा, तो न मैं हँसती, न तू रोता

पढ़ पाते मन के भाव जब
तो इधर-उधर की बातों का बहाना न होता

'कहने को करना' सच बना पाता तू
तो न तू बेवफा कहाता, न मैं पत्थरदिल होती

दिल में खिल जाते प्रेम के मोगरे जब
तब इत्र से बदन महकाने का कोई मतलब न होता

मेरे इंतजार से पहले ही आ जाता गर तू
तो मेरी खुशी का कोई ठिकाना न रहता

तेरा कहना और मेरा सुनना कभी एक सा नहीं होता
गर होता एक सा, तो न मैं हँसती, न तू रोता
- गायत्री

2 comments:

vijay kumar sappatti said...

नमस्कार गायत्री जी
आपको मेरा ब्लॉग - कविताओ के मन से तो याद होंगा . अब मैंने फिर ब्लॉग्गिंग पर ध्यान दिया है . और सृजन कर रहा हूँ . आप कैसी है . अब भी इंदौर में ही है क्या .

आपका ये नज़्म अच्छी लगी .

अब फिर से निरंतरता रहेंगी . हो सके तो कॉल करे

विजय कुमार
हैदराबाद
09849746500

गायत्री शर्मा said...

नमस्कार विजय जी, सबसे पहले आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया। अक्सर मुझे आपके ब्लॉग पर प्रकाशित कविताओं के अपडेट्स ई मेल पर प्राप्त हो जाते हैं। आपकी कल्पनाशीलता व शब्दों का चयन उम्दा है। मैंने आपकी कुछ कविताएँ पढ़ी है। जो बहुत अच्छी है।