Tuesday, June 24, 2014

तू ही है ...

न चाहते हुए तेरे आकर्षण की तीव्रता
नाकाम कर देती है मेरे प्रतिकर्षण को
चाहता हूँ कर दूँ तुझे
दिलवालों की फेहरिस्त से अलग
पर तू है कि बार-बार सबको पछाड़कर
अव्वल नंबर पर आ जाती है
मन में जलती क्रोध की आग
तेरे दीदार मात्र से शांत हो जाती है
तुझे 'खड़ूस' कहूँ या कहूँ
मल्लिका-ए-हुस्न
सौंदर्य की हर उपमाओं में मुझे
तू ही तू नज़र आती है
प्रेम में राधा का
रौद्र में काली का
और वात्सल्य में तू
यशोदा का रूप धर आती है
मेरे ख्वाबों की परी
सपनों में रोज तू आती है
पर आँख खुलते ही क्यों ओझल हो जाती है?
चाहता हूँ कर लूँ कैद तुझे
प्रेमाकर्षण की मुट्ठियों में
बना दूँ एक आशियाना मोहब्बत का
दिल में प्रेमनगरी के अंदर
करूँगा हरक्षण तेरी पूजा
तेरे सिवा कोई न होगा
मन मंदिर में दूजा
तेरे सिवा कोई न होगा
मन मंदिर में दूजा ....।  
- गायत्री 

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