Wednesday, December 10, 2014

जागिएं और आवाज़ उठाइएं

-          गायत्री शर्मा 

जहाँ मौजूदा माहौल से छटपटाहट होती है वहीं परिवर्तन के कयास लगाए जाते हैं। मौन धारण करने से या हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से हमें कुछ हासिल नहीं होने वाला। जब तक हमें अपने अधिकारों की जानकारी, कर्तव्यों का भान और न्याय पाने की छटपटाहट नहीं होगी। तब तक इस देश की तस्वीर नहीं बदलेगी। आज ‘मानव अधिकार दिवस’ है। कानून द्वारा प्रदत्त मानव अधिकारों के प्रति जागरूक होने का दिन। आइएं आप और हम आज मिलकर शुरूआत करते हैं अपने अधिकारों को जानने की और ज़मीनी हकीकत में घटित हो रही मानव अधिकारों के हनन की कुछ घटनाओं से सबक लेने की।   

आज हम अपने सफर की शुरूआत करते हैं सरकारी योजनाओं, धार्मिक चैनलों में चमकने वाले बाबाओं और कुछ भ्रष्ट बाबूओं से। यह मेरे देश की तस्वीर ही है जहाँ नक्सलवाद नौनिहालों के हाथों में किताबों की जगह बंदूके थमा रहा है, जहाँ नवजात शिशु कटीली झाडि़यों में मौत के तांडव का रूदन गीत गा रहा है, जहाँ सरकारी शिविरों में नसंबदी ऑपरेशन महिलाओं की जिंदगी की नस काट रहा है और मोतियाबिंद का ऑपरेशन आँखों की रोशनी उम्मीदें छीन रहा है, जहाँ बाबाओं के आश्रम में सरेआम महिलाओं व बच्चों के साथ शोषण, बलात्कार व हत्या के अपराध हो रहे हैं। ऐसे देश में हर कदम पर मानव अधिकारों का मखौल उड़ रहा है। अरे आप रूक क्यों गए। मेरे देश की इस सच्ची कहानी में आम आदमी के अधिकारों की धज्जियां उड़ने का यह दृश्य आगे चलकर तब और भी घिनौना हो जाता है जब मध्याह्न भोजन में दाल में छिपकली और चावल में कीड़े बच्चों के मुख का ग्रास बनते हैं, जहाँ बच्चों को दलित रसोइएं की बनाई रोटी खाने से अभिभावक मना करते है, जहाँ सरकारी नौकरियों हेतु योग्यताएं भ्रष्ट बाबू लिफाफे में वज़न देखकर सिद्ध करते हैं और जहाँ सर्व शिक्षा अभियान केवल कागज़ों पर सजते हैं, ऐसे देश में आज भी मुझे मानव अधिकार मुंगेरीलाल के हसीन सपने की तरह दिखता है।

डूबते के लिए एक बुलबुला भी जिंदगी की उम्मीद को जिंदा रखता है लेकिन हम तो पूरी तरह से अज्ञान के तालाब में डूबे हुए है। तभी तो न हमें अपने अधिकारों का भान है और न कर्तव्यों का। यदि इस देश का हर आदमी अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो जाएँ तो कभी किसी के अधिकारों का हनन नहीं होगा। याद रखिएं आवाज़ उठाना आपका काम है, जब आप ही स्वयं के साथ हो रहे भेदभाव, अत्याचार, शोषण या दुर्वव्यवहार के खिलाफ आवाज़ नहीं उठा सकते तो आपकी इस कुंभकर्णी निद्रा को मानव अधिकार आयोग की जागरूकता का ढ़ोल भी भंग नहीं कर सकता है। आज बहाना है मानव अधिकार दिवस का, आज ही से आप भी एक नई शुरूआत कीजिएं इस कानून के बारे में जानने, पढ़ने व आवाज़ उठाने की। यदि आप साहस करके एक कदम आगे बढ़ेगे तो दूसरे कदम पर कानून भी आपका साथ देगा। इससे पहले कि और देर हो जाएँ, आप भी गौर कीजिए अपने मानव अधिकारों पर और स्वयं जागरूक होने के साथ ही लोगों में इस संबंध में जागरूकता फैलाइएं। उसके बाद देखिएं इस देश की तस्वीर कैसे बदलती है।
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