Thursday, July 14, 2011

फिर दहल गई मुंबई

26/11 की तरह 13 जुलाई को भी जिंदादिल लोगों की मुंबई एक बार फिर धमाकों के कंपन से दहल व सहम गई है। शाम ढलते ही मुंबई की वह चहल-पहल रौंगटे खड़े कर देने वाले सन्नाटे में तब्दील हो गई है। चीख, चीत्कार और न्याय की गुहार बस मुंबई में तो अब यही सुनाई दे रहा है। अजमल कसाब अब तक जिंदा है और हर बार मर रहा है कोई बेकसूर आम आदमी। क्या हम पाकिस्तान की तरह अपने देश में भी आतंकियों व दगाबाज लोगों का शासन लाना चाहते हैं। यदि नहीं तो फिर क्यों नहीं हम एक इंसान की जान की कद्र समझते है?
              मेरा प्रश्न आप सभी से है कि हर बार धमाके का शिकार आम आदमी ही क्यों बनता है, कभी कोई राजनेता क्यों नहीं? ऐसा इसलिए कि कही न कही देश की गुप्त सूचनाएँ हमारे ही वफादार राजनेता व उच्च पद पर आसीन लोगों के माध्यम से आतंकियों तक पहुँचती है। हम माने या न माने पर आज हमें सबसे बड़ा खतरा हमारे देश के भीतर बैठे गद्दार व दगाबाज लोगों से हैं। आतंकियों को भारत की जेलों में शरण देना तो हमारी फितरत ही है। यदि आप साँप को प्यार से अपने पास बैठाकर पुचकारोगे तो इसका यह अर्थ नहीं कि साँप अपने जहरीले दंश को भूल आपको प्यार का जवाब प्यार से देगा। वह किसी दिन आप ही को डस लेगा।
         फाँसी की सजा देने के बाद भी हम अपराधी व आतंकी को जेल में सुरक्षित रखते हैं ताकि उसे छुड़ाने के लिए चार ओर आतंकी आकर देश में तबाही मचाएँ। वाह रे मेरे देश के कानून, आखिर कब तक तुम आतंकियों को जेल में सड़ाते रहोगे? अब वक्त आ गया है अन्ना की तरह विरोध के स्वर मुखरित करने का। जिससे यह बेहरी सरकार जागे और हरकत में आए। जागो भारतवासी अब तो जागो।

Wednesday, July 13, 2011

मर्डर 2 की बदबूदार कहानी

दोस्तों, आज दुर्भाग्यवश मैंने 'मर्डर 2' फिल्म देखी। इस फिल्म को देखकर मुझे इस कड़वे सच का आभास हुआ कि भारतीय संस्कृति व संस्कारों को भूल अब हमारा युवा एक अंधेरी राह की ओर बढ रहा है। बहुत से लोगों को यह फिल्म अच्छी लगी और उन्ही लोगों की वजह से बॉक्स ऑफिस पर भी यह फिल्म हाल की हिट फिल्मों में अपना नाम दर्ज कराने में काबिज रही होगी। पर मेरा व्यक्तिगत मत यही है कि यह फिल्म एक घटिया स्तर की फिल्म है।
     यदि हम बात करे तो आज से 10-20 साल पहले की तो उस वक्त तक फिल्मों के हिट होने का पैमाना उनका सशक्त कथानक, कथावस्तु, पात्र और फिल्म में निहित संदेश हुआ करते थे। जो समाज को सही राह दिखाकर रिश्तों में प्रेम को काबिज रखते थे। उन फिल्मों में भी डरावने विलेन होते थे पर ऐसे नहीं, जैसे कि मर्डर 2 या दुश्मन फिल्म में दिखाया गए है। इस फिल्म को देखकर तो जहाँ एक ओर बॉलीवुड के किसिंग किंग ईमरान हाशमी के किस की बरसात हमें बारिश के मौसम में शर्म से पानी-पानी करके भिगों देती है। वहीं इस फिल्म के विलेन का लड़कियों को काटकर उन्हें कुँए में फेक देने की आदत हमारे मन में घृणा पैदा कर देती है।
        मुझे तो उस व्यक्ति की सोच पर बड़ा अचरज होता है। जिसने इस फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी होगी या फिर जिसने इस फिल्म का निर्माण किया होगा। क्या वाकई में उन लोगों की सोच वैसी ही है। जैसी की फिल्म के रूप में उन्होंने दर्शकों तक पहुँचाई है या फिर वे समाज को इतनी गंदी सोच देकर उन्हें अमानवीय बनाना चाहते हैं। सच कहूँ तो कम उम्र की लड़कियों का इस कदर शोषण दिखाया जाना किसी भी दृष्टि में मुझे उचित नहीं लगता। किस तरह से फिल्म निर्माण करने वाले कथित बुद्धिजीवी कहलाने वाले वे लोग जिस्म के आदतन भक्षक बन चुके फिल्म के अभिनेता को बेदाग बनाकर बेडरूम से पुलिस थाने में इस काम के लिए बुलाते हैं कि वह लड़कियों को गायब करने वाले उस व्यक्ति को ढूँढे, जो कॉलगर्ल को एक रात के लिए बुक कर उन्हें गायब करा देता है।
     फिल्म में वही व्यक्ति उन लड़कियों की जान बचाने को आगे आता है, जो हर रोज जिस्म की भूख का प्यासा बन खूबसूरती के पीछे भटकता है। यह तो सौ-सौ चूँहे खाकर बिल्ली हज को चली वाला हिसाब होता है। यदि बगैर किसी लाग लपेट के कहूँ तो इस फिल्म में अश्लीलता व विभत्स दृश्यों की भरमार है। जिसमें कहानी के माध्यम से समाज को संदेश देने की बजाय समाज में अश्लीलता व फूहड़ता के एक सड़े-गले तथा गंदे ट्रेंड को शुरू करने का प्रयास किया जा रहा है।

Tuesday, July 12, 2011

दादी की जंग जिंदगी और मौत से

व्यक्ति की पल-पल अपनी गिरफ्त में लेती मौत और मौत की सुस्त चाल पर अट्टाहस करते कैंसर के बीच वार्तालाप का दृश्य बड़ा ही खौफनाक होता है। जीवन और मौत के बीच लड़ाई कुछ घंटों की हो तो ठीक है। पर जब यह लड़ाई घंटों को दिनों में तब्दील कर देती है और आवाज को मौन के सन्नाटे में। तब मौत और जीवन की जंग बड़ी कठिन हो जाती है। हम सभी जानते हैं कि अंतत: जीत मौत की ही होनी है पर फिर भी न जाने क्यों हम जिंदगी को जिताने में कोई कसर शेष नहीं रखते। इन दिनों जीवन-मृत्यु के बीच साँसों के तार की लड़ाई मेरी 75 वर्षीय दादी कमलाबाई लड़ रही है।
               पिछले शुक्रवार तक तो सबकुछ थोड़ा ठीक था। शनिवार को चलते-चलते गिर पड़ने के कारण अचानक उनके सीधे हाथ की कलाई की हड्डी टूटती है और रविवार को उस हाँथ में प्लास्टर लगाया जाता है। जिस दौरान वह बार-बार कभी अस्पताल की टेबल पर तो कभी कार में बैठे-बैठे मुझसे सोने की जिद करती है, हाथ पकड़कर चलने से इंकार कर गोद में उठाने की जिद करती है और मैं बार-बार उन्हें यही कहती हूँ कि प्लीज दादी, अब तो अपने पैरों पर चलो। क्यों बच्चों की तरह नाटक करते हो? मेरी इस बात पर झल्लाकर वह अपनी ही भाषा में मुझे कहती है 'रहने दे थारी वाता, मूँ अटे मरी री हूँ और तू मने चलवा रो कई री है।' यहाँ तक कि इंजेक्शन व जीवन में पहली बार प्लास्टर चढने के डर के कारण वह डॉक्टर से भी कहती है कि डॉक्टर साहब, थे तो मने कोई दवा ने हाथ पे मसरवा रो टूब दई दो। मने कई नी वियो है। पापा, भैया और मेरे द्वारा दादी को बहुत समझा-बुझाकर और मान-मनुहार कर रविवार को प्लास्टर चढवाने के लिए राजी किया जाता है।उन्हें रविवार को रतलाम में प्लास्टर चढवाने के बाद मैं सोमवार को अपने काम पर अर्थात इंदौर लौट आती हूँ।
               मेरे इंदौर आने के बाद मंगलवार से दादी की तबीयत बिगड़ना शुरू होती है और मंगलवार से रविवार तक वह इस स्थिति में पहुँच जाती है कि उनका खाना-पीना, उठना, चलना, बोलना सब बंद हो चुका होता है। मैं 10 जुलाई 2011, रविवार को ही उनसे मिलकर आई हूँ पर उनका सूजन से फूला चेहरा, चिपकी हुई आँखे व बिस्तर से चिपके हाथ-पैर देखकर मैं दंग रह गई और अपने आँसू रोक नहीं पाई। हालाँकि अभ‍ी भी उनके पास उनके स्नेहीजनों का हुजूम जमा है पर आज की स्थिति में लगातार तीन-चार दिनों से आँखे बंद होने के कारण ना तो वह उन्हें देख पा रही है और मुँह बंद होने की वजह से ना ही वो उन्हें कुछ कह पा रही है। यहाँ तक कि अब उनके शरीर ने धीरे-धीरे बदबू मारना व गलना भी शुरू कर दिया है। शायद इसे ही कहते कैंसर का विकराल व विभत्स रूप। जिसने 8 साल बाद एक बार फिर से उन पर अपना रंग जमाना शुरू कर दिया है।
                भीतर ही भीतर उनका शरीर किस कदर दर्द से कराह रहा होगा। उसे शब्दों में बँया कर पाना भी मेरे लिए बड़ा मुश्किल है। आज मुझे धार्मिक आस्था रखने वाले अपने बड़े-बुर्जुगों क‍ी वह बात याद आती है कि इंसान को अपने कर्मों का फल इसी धरती पर भुगतना होता है। कर्मों का फल भुगते बगैर उसकी मौत नहीं होती है।              
                ब्रेस्ट से आरंभ होकर फेफड़े, हड्डियों और अब दादी की किडनी को अपनी गिरफ्त में ले चुका कैंसर उन्हें जिंदगी की बजाय मौत से प्रेम करना सीखा रहा है। पर ऐसी स्थिति में भी मौत और जिंदगी दोनों में से कोई भी हार मानने को तैयार नहीं है। यही वजह है कि उनकी साँसों की रिदम रूक-रूककर भ‍ी चल रही है। दोस्तों, सच कहूँ तो दादी की स्थिति देखकर मैं कभी अपने किसी दुश्मन को भी कैंसर होने की बददुआ नहीं दूँगी। यह बीमारी जिंदगी को या तो निगल जाती है या फिर इंसान को तिल-तिल मरने को छोड़कर जिंदगी को मौत से भी बदतर कर देती है।            

30 जून 2011 को 'युवा' में प्रकाशित कवर स्टोरी