Thursday, November 28, 2013

राइट टू प्राइवेसी या राइट टू इस्केप

देश के सभी नागरिकों के लिए समान कहे जाने वाले कानून का हाई प्रोफाइल और लो प्रोफाइल लोगों के बीच आखिर भेदभावपूर्ण रवैया क्यों? ‘राइट टू प्राइवेसी’ की दुहाई देकर किसी मामले को जाँच हेतु सार्वजनिक होने से रोकने का अधिकार क्या केवल हाईप्रोफाइल लोगों को ही प्राप्त है? यदि हाँ, तो इस अधिकार का प्रयोग कर किसी मामले को जाँच प्रक्रिया से पहले ही दबा देने वाले कानून से क्या सही व निष्पक्ष न्याय की उम्मीद की जा सकती है?  

यदि हम कुछ चर्चित मामलों की बात करें तो अब तक कई नेता फोन टेपिंग व विवादित सीडी मामलों में फँस चुके हैं परंतु सही समय पर ‘राइट टू प्राइवेसी’ के अधिकार को अपनी सुरक्षा का हथियार बनाकर वे इन मामलों से सुरक्षित बच भी निकले है। अमर सिंह, अभिषेक मनु सिंघवी, नीरा राडिया व रतन टाटा आदि ने समय-समय पर अपने इस अधिकार का प्रयोग कर कानून के शिंकजे में फँसने से स्वयं को बचा लिया था। उन्हीं की तरह अब बारी है नरेन्द्र मोदी की, जो एक लड़की के फोन टेपिंग मामले में बुरी तरह फँसते नजर आ रहे हैं। लेकिन मुझे लगता है कि यह मामला चुनावी दंगल तक ही सुर्खियों में रहेगा। वक्त बीतने के साथ-साथ यह मामला भी अन्य पुराने मामलों की तरह आया-गया हो जाएगा। वाह रे मेरे देश की न्याय व्यवस्था। आखिर कब तुम पूर्णत: निष्पक्ष हो पाओगी?  
- गायत्री 

Tuesday, November 26, 2013

आरूषि ने किया साढ़े पाँच साल इतंजार


माँ-बाप की लाडली लाडो
जब मौत की नींद सोई
तब न बाप ने सुनी उनकी चीखे
और न माँ की छाती फूट-फूट कर रोई

हत्यारे दंपत्ति को हँसते देख मानवता भी
सिसकियाँ भर-भर रोई
जब माँ-बाप ही बन गए कसाई
तो बलि की बेदी पर नन्हीं आरूषि भी
चूजा बन खुशी-खुशी सोई

शक से हुआ संबंधों का अंत
और मच गया रिश्तों में महासंग्राम
जो रिश्ते कल हो गए थे लाश में तब्दील
अब वही करने लगे न्याय की गुहार

सर्जिकल ब्लेड की तीक्ष्ण धार
और गोल्फ स्टिक के जानलेवा वार
न काट पाएँ और दबा पाएँ  
आरूषि हेमराज की साँसो के तार

दफन होकर भी साढ़े पाँच साल तक
करती रही वो कानून से न्याय की गुहार
लेकिन आज कोर्ट में मिली सजा भी
न दिला पाई इस बेटी को पूरा इंसाफ ।

- गायत्री 

Monday, November 25, 2013

प्रेम में सर्मपण ...

करते हो कभी मेरी कामयाबी की दुआ
और हो जाते हो कभी कामयाबी से ही खफा

कहते हो कामयाबी की उड़ान इतनी दूर ले जाती है
जहाँ मीलों तक अपनों की आवाज नहीं आती है

डरते हो कामयाबी से, पर चाहते भी हो कामयाबी को
अपने लिए नहीं ... बस मेरे लिए ... बस मेरे लिए

डर है मन में, पर साथ है फिक्र भी
दुआओं के साथ-साथ वियोग की हल्की सिसकियाँ भी

प्रेम में सर्मपण का तीक्ष्ण दर्द तेरी आँखों में साफ नजर आता है
पर फिर भी कामयाबी के खातिर तू खुशी-खुशी मुझसे दूर चला जाता है    

- गायत्री 

Sunday, November 24, 2013

है जिंदगी इस पल में ...

कब, कैसे और कहाँ
शायद ये न तुम्हें पता है और न मुझे

पर आज, अभी और इस पल में ही
हम सब कुछ पाकर जिंदगी को पूर्ण मान रहे हैं।

सपनों से शुरू हुई यह हकीकत
ईश्वर की इबादत का परिणाम है या कर्मों का

जो भी है यह तो साफ है कि

इस पल में ही जिंदगी है।
- गायत्री  

शब्द सम्हारे बोलिएँ, शब्द के हाथ न पाँव



शब्द सम्हारे बोलिएँ, शब्द के हाथ न पाँव 
एक शब्द औषध करे, एक शब्द करे घाव 

कहते हैं कि एक बार मुँह से निकलने के बाद शब्द, शब्द नहीं रहते। वह हमारे व्यक्तित्व और सोच का परिचायक बन जाते हैं। कटु शब्दों के तीर जहाँ दिलों को छलनी कर रिश्तों को तार-तार कर देते हैं। वहीं मीठे शब्दों का शहद गहरे से गहरे कटुता के घाव को भी भर देता है। तभी तो कहते हैं कि शब्द सम्हल सम्हल कर बोलना चाहिए। शब्द ब्रह्म है। शब्द ही मेरी और आपकी पहचान है।
    जब बात चली है शब्द सम्हलकर बोलने की, तो क्यों न इस चुनावी माहौल में उन महान हस्तियों की चर्चा कर ली जाएँ। जिनके शब्द उनकी जीभ से फिसलकर बेकाबू हो जाते हैं और इधर-उधर घुम-फिरकर लोगों का मनोरंजन करते हैं। चलिए मिलते हैं उन लोगों से, जो शब्दों के मामले में बच्चों की तरह थोड़े कच्चे है।  

कुमार विश्वास : मशहूर कवि व आम आदमी पार्टी (आप) के नेता कुमार विश्वास के आक्रामक तेवर उनके काव्य पाठ के ढंग से ही नजर आ जाते हैं। युवाओं के बीच मशहूर यह कलम का कलाकार कवि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में जब अन्ना के साथ खड़ा हुआ। तब से कवि के साथ-साथ कुशल वक्ता के रूप में इनकी पूछ-परख पहले से बहुत अधिक बढ़ गई। एक कवि का राजनीति में आगमन कोई नया तो नहीं है परंतु नेता बनने के लिए शब्दों पर नियंत्रण होना बेहद जरूरी है। कवि सम्मेलन के मंच पर इस तरह की मर्यादा नहीं होती। पर राजनीति के मंच पर शब्द बहुत माइने रखते हैं।
      स्टिंग ऑपरेशन के बाद क्रोध से तिलमिलाएँ ‘आम आदमी पार्टी’ के नेता कुमार विश्वास ने ‘आप’ के जंतर-मंतर पर हुए म्यूजिक कंर्सट में कहा कि इस स्टिंग के पीछे कौन है। यह वक्त आने पर पता लग जाएगा। हमें पुरस्कारों के लिए चापलूसी करने की जरूरत नहीं है। साहित्य अकादमी और पद्म पुरस्कारों को हम अपने जूते की नोक पर रखते हैं। हम अहिंसक जरूर है, लेकिन नपुंसक नहीं। हमें अन्ना ने टोपी पहना दी, अरविंद ने ईमानदारी से काम करने की जिम्मेदारी दे दी वरना सह़क के दूसरी तरफ हम देख लेते कि तुममे कितना दम है।

नरेन्द्र मोदी : गुजरात के विकास का रोल मॉडल प्रस्तुत कर प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी मजबूत करने वाले नरेन्द्र मोदी भी बयानबाजियों व हाजिरजवाबी के मामले में किसी भी तरह से कम नहीं है। भाजपा के सर्मथन में मध्यप्रदेश का दौरा करने वाले मोदी ने मंदसौर की चुनावी सभा में कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जैसे हम शेर को देखने जू जाते हैं। उसी तरह कांग्रेसी नेता चुनाव में मीडिया को लेकर गरीब की झोपड़ी में जाते हैं। मजाक उड़ाते हैं। घाव पर नमक छिड़कते हैं। ये लोग गरीब पैरों पर खड़ा हो, ये कभी नहीं चाहेंगे।

सोनिया गाँधी : र्स्वगीय राजीव गाँधी की पत्नी व कांग्रेस की आलाकमान सोनिया जी से अपनी हिंदी स्क्रिप्ट को बोलने में कई बार ऐसी गलतियाँ हो जाती है। जिसे सुनकर हमें कहना पड़ता है कि मैडम, आप तो अंग्रेजी में ही बोल दीजिए क्योंकि आपकी अंग्रेजी व हिंदी दोनों ही देश के ठेठ ग्रामीण लोगों के पल्ले नहीं पड़ने वाली। अपने तीखे तेवर व भाजपा पर किए जाने वाले कटाक्षों के कारण राजनीति के क्षेत्र में सोनिया जी की अपनी एक अलग ही पहचान है। हाल ही में सोनिया जी ने भाजपा को जहरीले लोगों की पार्टी कहकर फिर से नए विवाद को जन्म दे दिया है।
  
राजीव शुक्ला : मोदी पर कटाक्ष करते हुए केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला ने कहा कि मोदी की भाषा पान की दुकान पर खड़े होने वाले मसखरों के समान है। भाजपा ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार तो बना दिया है। लेकिन उनके भाषण का स्तर अभी भी वार्ड स्तर के नेता और पार्षदों के समान है।

राज बब्बर :  कांग्रेस सासंद राज बब्बर अपने अभिनय का कमाल चुनावी मैदान के सार्वजनिक मंचों पर भी दिखा रहे हैं। म.प्र. विधानसभा चुनाव के पूर्व कांग्रेस की ओर से चुनाव प्रचार हेतु मंदसौर में पधारे राज बब्बर साहब ने उदाहरणों व उलाहनाओं का सहारा लेकर शिवराज को बहुत कोसा। उन्होंने कहा कि शिवराज बार-बार मंदसौर क्यों आते हैं? कूदते-गिरते उन्हें यहीं देखा। अब मालूम हुआ। दरअसल जो घोषणाएँ कीं, वे साकार नहीं हो पाईं और सालों से जनता को छलावे में रखा। सत्ता जाने के डर से यहाँ बार-बार आना पड़ा। इस मदारी को पाँव की जमीन खिसकती नजर आई तो माहौल बनाने गुजरात को विकास का मॉडल बताने वाले जमूरे को भी बुला लिया।


शिवराज सिंह चौहान : कांग्रेस के निशाने पर और खासकर दिग्विजय सिंह के निशाने पर रहने वाले शिवराज सिंह चौहान ने भी इस बार चुनावी प्रचार में कांग्रेस के आरोपों का जवाब नेहले पर देहले की तरह दिया और यह सिद्ध कर दिया कि बयानबाजी के मामले में वे नरेन्द्र मोदी के ही शिष्य है। शिवराज ने अपनी चुनावी सभा में कहा कि केंद्र में भ्रष्ट और चोरों की सरकार बैठी है। जो जनता को छलने-ठगने का काम करती है।   
- गायत्री  

तरूण तेजपाल के ‘तहलका’ में मचा तहलका

उप शीर्षक : न उठाओं ऊँगली किसी पर ....

‘कहते हैं जब हम किसी की ओर एक ऊँगली उठाते हैं तो तीन ऊँगलियाँ हमारी ओर भी उठती है।‘ लगातार कई बड़े सनसनीखेज खुलासों से पत्रकारिता जगत में तहलका मचाने वाली ‘तहलका’ मैंग्जीन की संपादकीय टीम में भी अब तहलका मच गया है। स्टिंग ऑपरेशन के जरिए सुर्खियों में छाने वाले ‘तहलका’ के पत्रकार अब स्वयं सुर्खियाँ बन चुके हैं।
        12, लिंक रोड पर अब सन्नाटा पसरा है। पिछले कुछ दिनों से इस घर के अंदर-बाहर पुलिस के आला अफसरों व पत्रकारों की चहलकदमी जल्द ही इस सन्नाटे को चीरकर कोई बड़ा खुलासा होने की ओर ईशारा कर रही है। देश का एक महान खोजी पत्रकार विरूद्ध तहलका की एक पत्रकार, आरोप- यौन शोषण का गंभीर आरोप, सबूत-होटल का सीसीटीवी फुटेज और तेजपाल का मेल के माध्यम से अपना जुर्म कबूलना। इस मामले पर महिला पत्रकार के गंभीर आरोप, हर तरफ से महिला के सर्मथन में उठते तेज स्वर और पुलिस का सख्त रवैया क्या तरूण तेजपाल के करियर के चमकते सितारों के अस्ताचल की ओर बढ़ने का संकेत है या फिर कोई तयशुदा साजिश?     
       देश में खोजी पत्रकारिता को नया आयाम, नई पहचान प्रदान करने वाले ‘तहलका’ के मशहूर पत्रकार तरूण तेजपाल ने कई बड़े घोटालों और मामलों को उजगार कर पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना एक आदर्श स्थापित किया। नवोदित पत्रकारों के लिए खोजी पत्रकारिता के गुरू कहलाने वाले तरूण तेजपाल के चमकते करियर में अचानक ऐसा क्या हुआ कि पत्रकारिता जगत में शान से सबके सामने आने वाला यह चमचमाता चेहरा आज अपना चेहरा छुपाते फिर रहा है? आखिर कैसे घोटालों के दामन से दागदार नेताओं के खुलासे करने वाले इस पत्रकार का दामन ही ‘यौन उत्पीड़न’ की कालिमा से रंग गया? देश के प्रबुद्ध जन की ओर से लगातार उठते ये प्रश्न आज कई अटकलों और बयानबाजियों को हवाएँ दे रहे हैं। तेजपाल पर उठते सवाल दर सवालों का यह दौर तब तक बदस्तूर जारी रहेगा। जब तक कि तेजपाल स्वयं जनता के सामने आकर अपना पक्ष प्रस्तुत न करे।

तरूण तेजपाल का परिचय :
19 मार्च 1963 में जन्में तरूण तेजपाल पेशे से एक पत्रकार है। इंडिया टूडे, इंडियन एक्सप्रेस, आउटलुक आदि प्रतिष्ठित संस्थानों में पत्रकारिता के धमाकेदार कीर्तिमान स्थापित करने के बाद ‘तहलका’ से तरूण तेजपाल ने अपनी एक अलग पहचान बनाई। वर्ष 2001 में तेजपाल पहली बार तब सुर्खियों में आएँ। जब उन्होंने सेना के अफसरों और नेताओं के बीच हथियारों की खरीद-फरोख्त में घूस लेने संबंधी वीडियों टेप जारी किए। उसके बाद गुजरात दंगों में किए गए तेजपाल के स्टिंग ऑपरेशन ने पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्हें निर्भीक पत्रकार के रूप में एक सम्माननीय मुकाम पर पहुँचाया। स्टिंग ऑपरेशन व सनसनीखेज खुलासों के कारण नेताओं और अफसरों की नींद उड़ाने वाले इस पत्रकार को ‘एशियावीक’ ने विश्व के श्रेष्ठ 50 कम्यूनिकेटरों में शामिल किया। वर्ष 2009 में ‘बिजनेसवीक’ ने तेजपाल को भारत के 50 शक्तिशाली लोगों की सूची में शामिल किया।

यौन शोषण में फँसे तेजपाल :
‘पहले मजा फिर सजा’ की तर्ज पर तेजपाल का लड़की को देख बहकना, फिसलना और देख मचलना उनके लिए मुसीबत का सबब बन जीवनभर की सजा बन गया है। 7 और 8 नवंबर 2013 को तहलका के ‘थिंक फेस्ट’ के दौरान गोवा के फाइव स्टार रिसोर्ट ‘ग्रांड हयात’ में अपनी सहकर्मी पत्रकार के साथ किया गया ‘यौन उत्पीड़न’ तेजपाल के उजले दामन को सदा के लिए बदनामी की कालिमा से दागदार कर गया। एक प्रतिष्ठित पत्रकार पर ‘यौन उत्पीड़न’ का गंभीर आरोप लगना, इस घटना के तुरंत बाद ई मेल के माध्यम से तेजपाल का माफी माँगना और अपनी सजा स्वयं तय करते हुए 6 माह के लिए ‘तहलका’ के ‘एडिटर इन चीफ’ के पद से इस्तीफा देकर अज्ञातवास में चले जाना कई अनुत्तरित सवालों और अफवाहों को जन्म दे रहा है।
इस पूरे मामले के तूल पकड़ने के बाद भी ‘तहलका’ की मैनेजिंग डायरेक्टर (जो कल तक बेबाक रूप से सार्वजनिक मंचों पर महिलाओं की सुरक्षा के पक्ष में अपनी आवाज उठाती आई है) उस शोमा चौधरी का चुप्पी साधे बैठे रहना, फिर कार्यवाही के नाम पर यह कहना कि तेजपाल का तत्काल प्रभाव से अपने पद से इस्तीफा देना ही उस महिला पत्रकार को मिलने वाली तुरंत राहत है। परोक्ष रूप से तेजपाल के बचाव में शोमा का सामने आकर मामले को दबाने की कोशिश करना इस मामले को एक प्री प्लान्ड फिल्मी ड्रामा बनाता है। जिसकी स्क्रिप्ट पहले से तय है और लगता है कि कुछ समय बाद इस स्क्रिप्ट का अंत भी उस महिला के ‘यौन उत्पीड़न’ के प्रकरण को वापस लेने, मामले को आपस में सुलझाने व तेजपाल की रिहाई से होगा।

मामले पर प्रतिक्रियाएँ :
इस पूरे मामले पर राजनीतिक दबाव आने से पुलिस भी सक्रिय हो चुकी है और वह जल्द से जल्द इस मामले की पूरी तफ्तीश करने में लगी हुई है। ‘तहलका’ के कागजी रिकार्डों के साथ ही इस दफ्तर के कम्प्यूटरों, लैपटॉप व ई मेल पर भी क्राइम ब्रांच अपनी पैनी निगाह लगाएँ बैठी है ताकि मामले से संबंधी कोई अहम अहम सबूत मिल सके। अपनी मैग्जीन के पत्रकार तरूण तेजपाल के यौन उत्पीड़न के मामले में फँसने के बाद महिला शोषण के मामलों पर कड़े शब्द बोलने वाली शोमा चौधरी के सुर अचानक नर्म पड़ गए है। यहीं वजह है कि किरण बेदी ने शोमा की भूमिका पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए ईशारे-ईशारे में यह कह दिया कि इस मामले पर कड़ा एक्शन न लेना शोमा को यह शोभा नहीं देता। उन्हें इस मामले पर कार्यवाही करने के लिए आगे आना चाहिए।
      वहीं राजनीतिज्ञ शरद यादव ने तेजपाल के अपराध को आसाराम के गुनाह के समान घृणित कृत्य मानते हुए उन्हें जेल में डालने की बात कहीं है। न केवल शरद यादव बल्कि भाजपा नेत्री स्मृति ईरानी व महिला आयोग भी इस पूरे मामले की निष्पक्षता से जाँच करने की व पीडि़ता को न्याय दिलाने की माँग का सर्मथन कर रहे हैं। सीपीएम नेता वृंदा करात के अनुसार यदि अपराध करने वाले स्वयं अपनी सजा तय करने लगेंगे तो हमारे देश के कानून का क्या होगा? अरूण जेटली की मानें तो सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के अनुसार पुलिस की तफ्तीश के साथ ही ‘तहलका’ को भी कमीटी बनाकर इस पूरे मामले की इन हाउस जाँच करानी चाहिए और ये दोनों कार्यवाहियाँ एक साथ चलनी चाहिए।         
     इस प्रकरण में अगला मोड़ क्या आएगा। यह कहना मुश्किल है क्योंकि दूर जाकर ही सही पर कहीं न कहीं पत्रकारिता व राजनीति का छोर एक-दूसरे से जुड़ा है। अत: दबाव के चलते या तो यह मामला धीरे-धीरे तफ्तीश के नाम पर गुमनामी के ठंडे बस्ते में गुम होता जाएगा या फिर दोषी को सजा मिलने तक पीडि़ता के बुलंद स्वर न्याय की आस में मुखरित होते रहेंगे। खैर जो भी हो, इस मामले की गहनता से पूरी तफ्तीश होनी चाहिए ताकि सच सबके सामने आ सके और पत्रकारिता व देश के कानून का दामन सदा के लिए दागदार होने से बच जाएँ।

-          गायत्री 

Friday, November 22, 2013

म.प्र. विधानसभा सचनाव 2013 – मुद्दे, वादें और हकीकत भाग -3

उपशीर्षक : चेतना से पूर्ण चेतन्य की चर्चा     

धक-धक, धक-धक, धक-धक .... 2013 के विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने वाले उम्मीद्वारों के साथ ही शहर के आमजन के दिलों की धड़कने भी अब तेज होने लगी है। जहाँ चुनावी मैदान में उतरे उम्मीद्वार अपनी जीत की जुगाड़ में लगे हुए है तो वहीं हम अपने व अपने शहर के भविष्य का अहम फैसला लेने के लिए सोच-विचार में लगे हैं। हर कोई अपने-अपने काम में व्यस्त है। नेताजी अपने वादों से जनता को लुभाने में और जनता कभी सामने न आने वाले नेताजी पर भाव खाने में लगी है। सच कहें तो पिछले कई दिनों से शहर के हर गली-मुहल्ले में लगातार सुनाई देने वाले चुनावी प्रचार के गीतों को सुनकर हमारे कान और चुनाव की खबरें पढ़कर हमारी आँखे ऊब चुकी है। बस अब हम सभी को बेसब्री से इंतजार है 25 नवंबर का। जब हम अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। 
   
      मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में चुनाव प्रचार समाप्ति की घोषणा होने में अब कुछ ही घंटे शेष है ये कुछ घंटे ही प्रत्यक्ष रूप से हमारे शहर के विकास व परोक्ष रूप से हमारे देश के भविष्य को निर्धारित करने में अपनी एक अहम भूमिका निभाएँगे। तो क्यों न अपने बहुमल्य मत का प्रयोग करने से पहले हम अपने शहर के विधायक पद के उम्मीद्वारों की प्रोफाइल पर एक नजर डाल ले ताकि हमारे सामने उनकी कर्मठता और अनुभवों की पूरी पिक्चर क्लीयर हो सके।
       
 रतलाम ‍शहर में विधानसभा चुनाव में भाजपा से चेतन्य काश्यप, कांग्रेस से अदिति दवेसर और निर्दलीय उम्मीद्वार पारस सकलेचा ‘दादा’ के रूप में तगड़ा त्रिकोणीय मुकाबला है। इन तीनों के अलावा अन्य दलों के व निर्दलीय के रूप में बहुत उम्मीद्वार भी इस चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। पर सही माइनों में रतलाम शहर में काँटे की टक्कर कमल, पँजे और टेलीफोन के बीच में ही है। जब इस चुनावी कुश्ती के मुख्य खिलाड़ी तीन ही है तो क्यों न रतलाम की गलियों में गूँजने वाली कमल की काबीलियत, पँजे की ताकत व टेलीफोन की ट्रिंग ट्रिंग की गड़गड़ाहट की असल हकीकत से रूबरू हुआ जाएँ और यह जाना जाएँ कि आखिर इनमें से किसमें कितना दम है। किसके पास उपलब्धियाँ, अनुभव और शहर के विकास का सपना सच करने का दम-खम है और किसके पास केवल ब्रांड नेम का टैग।

नेताओं से परिचय की इस कड़ी की हम शुरूआत करते हैं भाजपा से विधायक पद के उम्मीद्वार चेतन्य काश्यप से और जानते हैं उनके बारे में कुछ महत्वपूर्ण बाते –


नाम : चैतन्य कुमार काश्यप

प्रचलित नाम : भैया जी

पिता : श्री अशोक कुमार जी काश्यप

जन्मतिथि : 16 जनवरी 1959

शिक्षा : बीकॉम सैकंड ईयर

Ø महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ :

Ø राजनीति के क्षेत्र में -  
·        वर्ष 2004 में भाजपा की सदस्यता ग्रहण की। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह से भाजपा के रचनात्मक कार्य एवं स्वयंसेवी संगठन प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय संयोजक का दायित्व ग्रहण किया।
·        वर्ष 2006 में लालकृष्ण आडवानी की ‘भारत सुरक्षा यात्रा’ और ‘जन चेतना यात्रा’ में मीडिया सलाहकार।
·        वर्ष 2008 में म.प्र. विधानसभा चुनाव में प्रवास प्रभारी।
·        वर्तमान में म.प्र. भाजपा के कोषाध्यक्ष।

Ø व्यक्तिगत व सामाजिक उल्लेखनीय उपलब्धियाँ –
·        1988 में म.प्र. के धार जिले के बदनावर में सॉर्बिटाल का उत्पादन करने वाले उद्योग काश्यप स्वीटनर्स लिमिटेड स्थापना की।
·        1991 से काश्यप रोटरी नेत्र बैंक के माध्यम से कई अँधेरी आँखों में रोशनी की नई उम्मीद जगाई।
·        1992 से ‘चेतना हिन्दी दैनिक’ का निरन्तर प्रकाशन।
·        इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी (आईएनएस) और इंडियन लैंग्वेज न्यूजपेपर एसोसिएशन (इलना) में सक्रिय।
·        1995 में ‘चेतना खेल मेला’ की शुरूआत कर अंतरविद्यालयीन खेल र्स्पधाओं को नई पहचान दी। प्रतिवर्ष रतलाम, मंदसौर और नीमच जिलों के 15 से अधिक स्थानों पर चेतना खेल मेले का आयोजन किया जाता है।  
·        वर्ष 2005 में ‘अंहिसा ग्राम’ की स्थापना कर 100 गरीब परिवारों को रहने के लिए घर व आजीविका हेतु रोजगार के उन्नत साधन उपलब्ध कराएँ।
·        बदनावर में सीबीएससी से संबद्धता प्राप्त ‘काश्यप विद्यापीठ’ स्कूल की स्थापना।
·        ‘अखिल भारतीय त्रिस्तुतिक जैन श्वेताम्बर श्री संघ’ के राष्ट्रीय परामर्शदाता।

Ø चैतन्य जी ही क्यों? :
कहते हैं कि कुछ लोगों के नाम बोलते हैं और कुछ के काम। यहाँ तो नाम और काम दोनों ही इनकी पहचान है। पत्रकारिता व समाजसेवा के माध्यम से जन-जन से सरोकार रखने वाले चैतन्य काश्यप का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। भाजपा के प्रदेश कोषाध्यक्ष का जिम्मेदारीपूर्ण पद, जन्मस्थली व कर्मक्षेत्र के रूप में रतलाम से काश्यप जी का लगाव व समाजसेवा व मीडिया से उनका जुड़ाव ही जनता के वोट को उनकी झोली में डालने के लिए काफी है।

Ø फैसला हमें लेना है :
यह तो हुई रतलाम शहरी क्षेत्र से विधायक पद के उम्मीद्वार चैतन्य काश्यप की उपलब्धियों की कहानी। हमें किस उम्मीद्वार को और क्यों चुनना है। शायद इसका फैसला हम पहले ही कर चुके हैं। बस अब इंतजार है तो अपने फैसले पर ईवीएम के माध्यम से मुहर लगाने का।

हमें किसे चुनना है और क्यों? हमारा यह फैसला बदल भी सकता है। बशर्ते हम मत देने से पहले सच्चाई से अवगत हो और सोच-समझकर अपने मताधिकार का प्रयोग करे। 

याद रखें कि हमारे मत न देने से उम्मीद्वारों का बुरा-भला नहीं होगा बल्कि इसका खामियाजा पिछड़ापन, बेरोजगारी और मँहगाई आदि के रूप में कहीं न कहीं हमें ही भुगतना पड़ेगा। इसलिए मेरी बात पर गौर करे और सब काम छोड़कर मतदान करने जाएँ।

जल्द ही मैं आपको रतलाम शहर से विधायक पद के अन्य उम्मीद्वारों की प्रोफाइल से भी अवगत कराऊँगी। लेकिन उससे पहले कृपया अपनी प्रतिक्रियाएँ देकर मुझे अनुगृहित करे।


-         - गायत्री 

Thursday, November 21, 2013

म.प्र. विधानसभा चुनाव 2013 – मुद्दे, वादें और हकीकत (भाग – 2)

उपशीर्षक : रतलाम शहरी क्षेत्र त्रिकोणीय मुकाबला

इस बार मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनावों के चुनावी दंगल में कई खिलाड़ी अपना भाग्य आजमा रहे हैं। प्रदेश की 230 सीटों के लिए लगभग 2,383 नए-पुराने उम्मीद्वार अपने किस्मत के सितारे के चमकने की आस लगाएँ चुनावी मैदान में उतरे हैं। इनमें से कई खिलाड़ी तो अगूँठाछाप होते हुए भी राजनीति में अनुभवियों की गिनती में आते हैं। वहीं कई नए उच्च शिक्षित चेहरे भी युवाओं को लुभाने के लिए परिवर्तन के नारे के साथ जनता की सहानुभूति और वोट दोनों की जुगाड़ करने में लगे है।

‘वोट की राजनीति’ और ‘वोट पर राजनीति’ सालों से इस देश में होती आई रही है और आगे भी बदस्तूर जारी रहेगी। वोट पाने के लिए हमारे नेताजी कई बार तो ऐसे काम भी कर लेते हैं। जिनकी अपेक्षा करना उनसे नामुमकिन होता है। खैर छोडि़ए इन बातों को और जानिए अपने क्षेत्र के नेताजी के बारे में कुछ जरूरी बातें –
हम बात करते हैं रतलाम विधानसभा क्षेत्र की, जिसके अंर्तगत रतलाम ग्रामीण, रतलाम शहरी, सैलाना, जावरा व आलोट क्षेत्र आते हैं। जिनमें लगभग 43 उम्मीद्वार विधायक की कुर्सी पाने के लिए मैदान में उतरे हैं। रतलाम के अंर्तगत आने वाली रतलाम ग्रामीण व सैलाना सीट एसटी तथा सैलाना सीट एससी के लिए आरक्षित है।

रतलाम शहरी क्षेत्र में त्रिकोणीय मुकाबला :
यदि हम रतलाम शहरी क्षेत्र की बात करे तो यहाँ भाजपा से चेतन्य कुमार काश्यप पहली बार चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। मीडिया व राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय उद्योगपति चेतन्य काश्यप रतलाम शहर के लिए एक जाना-पहचाना नाम है। वहीं कांग्रेस ने भाजपा को टक्कर देने के लिए अदिति दवेसर को एक नया युवा चेहरे के रूप में अपना उम्मीद्वार बनाया है। अदिति का न तो लंबा राजनीतिक अनुभव है और न ही कोई खासी उपलब्धियाँ। 
       वहीं रतलाम शहर में ‍इस त्रिकोणीय मुकाबले में भाजपा और कांग्रेस को कड़ी टक्कर देने के लिए मैदान में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में निर्दलीय विधायक पारस सकलेचा ‘दादा’ मैदान में उतरे हैं। शहर के शिक्षित युवाओं का जनसर्मथन हासिल करने वाले ‘दादा’ की खासियत ही उनके पास पाए जाने वाले अपनी उपलब्धियों के व अपने प्रतिद्वंदियों की खामियों के रिकार्ड है। जिनके बूते पर दादा दम खम से आम सभाएँ कर रतलाम की जनता को अपने पक्ष में वोट देने हेतु प्रलोभित कर रहे हैं। यही नहीं सोशल मीडिया में दादा की अच्छी पूछ-परख भी शिक्षित वर्ग के वोट जुगाड़ने में उनके लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।

अब बात करते हैं रतलाम शहरी क्षेत्र से अपनी किस्मत आजमाने वाले अन्य उम्मीद्वारों की। इन उम्मीद्वारों में ‍शेर मोहम्मद, फारूख खान, मोहम्मद साजिद कुरैशी, विनय कुमार पण्डया, मोहम्मद इमरान, सैय्यद अनवर अली, सोनलाल व्यास आदि निर्दलीय उम्मीद्वार के रूप में विधायक पद हेतु अपनी दावेदारी मजबूत कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर सपा से राधेश्याम पँवार, एनसीपी से शंकरलाल और बसपा से विनोद कटारिया भी इस चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।

राजेश के स्थान पर अदिति ने बिगाड़ी गणित :
आयुर्वेदिक, हौम्योपथी, नर्सिंग आदि कॉलेजों की स्थापना के साथ ही चिकित्सा के क्षेत्र में अपनी एक मजबूत पहचान बनाने वाले डॉ. राजेश शर्मा का नाम एक उभरते युवा नेता के रूप में शहर में अपनी पहचान बना चुका था। शहर कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपनी सक्रिय सेवाएँ देने तथा कांग्रेस के दिग्गजों से नजदीकी के कारण विधानसभा चुनाव में डॉ. राजेश शर्मा का टिकिट फाईनल होने की अटकते काफी पहले से लगाई जा रही थी।
जब विधायक की दौड़ के लिए कांग्रेस की ओर से डॉ. शर्मा के टिकिट की औपचारिक घोषणा हुई। तब शहरवासियों को लगा कि कांग्रेस के इस युवा चेहरे में एक नई ऊर्जा व उत्साह है, जिसके बूते पर इनसे शहर के विकास की उम्मीदें करना ला‍जमी होगा परंतु ऐन वक्त पर कांग्रेस ने डॉ. राजेश के रूप में फेंके अपने पाँसे को वापस लिया। उसके बाद नई चाल चलते हुए ऐन वक्त पर कांग्रेस ने बीजेपी को कड़ी टक्कर देने वाले इस उम्मीद्वार का नाम वापस लेकर ऐक ऐसा नाम घोषित किया। जिनसे शहर की जनता लगभग अपरिचित ही थी और है भी। डॉ. राजेश की जगह अदिति का नाम सामने आने पर न केवल शहर के आमजन में बल्कि कांग्रेस के अपने खेमे में भीतरी तौर पर सन्नाटा, खामोशी व असंतोष फैल गया। डॉ. राजेश के विकल्प के रूप में जब कांग्रेस के पास अन्य बेहतरीन विकल्प थे तब अदिति ही क्यों? इस प्रश्न का कोई पुख्ता जवाब शायद कांग्रेस के पास ही नहीं है। अब देखना यह है कि क्या अदिति ‘कमल’ की सुरक्षित सीट कहे जाने वाले रतलाम शहरी क्षेत्र में अपने ‘पंजे’ की छाप लगा पाएगी या नहीं।   

ऐन वक्त पर दल-बदल, आखिर क्यों ? :
पेशे से नाक, कान, गला रोग विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ. अरूण पुरोहित भी पिछले दो-तीन वर्षों से चिकित्सा के साथ ही समाजसेवा के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाने में जुटे थे। हालांकि अपने पेशे की अनदेखी और समाजसेवा की पूछ परख एक चिकित्सक क्यों कर रहा था? आखिर क्यों वह ब्राह्मण वोटरों के बीच अपनी पहचान बनाने में, समाजसेवा के कार्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में व सुर्खियाँ बटोरने में लगे हुए थे? इन सब सवालों के जवाब विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में डॉ. पुरोहित की उम्मीद्वारी के रूप में सामने आए। पर ऐन वक्त पर इस कहानी में भी एक मजेदार ट्विस्ट आया। सिलिंग फेन के चुनावी चिन्ह के साथ निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में अपना नामांकन भरने वाले 51 वर्षीय डॉ. पुरोहित ने मतदान से पाँच दिन पहले अचानक अपना फैसला बदल लिया और 20 नवंबर, बुधवार को हुई मुख्यमंत्री की आम सभा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। भाजपा की सभा में उनकी उपस्थिति के साथ ही उनके भाजपा में शामिल होने की औपचारिक घोषणा भी हो गई। वाह रे टिकट की माया और उस पर ब्रांड का साया। जिसके प्रलोभन से कोई भी न बच पाया।    

कानाफूसी कॉर्नर :
रतलाम शहरी क्षेत्र के हाल का जायजा लेने के बाद मैं आपको लिए चलती हूँ कानाफूसी कॉर्नर पर। जहाँ से खबर है कि इस बार शहर की जनता पर निर्दलीय प्रत्याशी दादा का जादू चलता थोड़ा कम ही नजर आता है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में दादा ने जनता का विश्वास जीतकर और हिम्मत सेठ के वोट काटकर अपने तिकड़मी दिमाग का कमाल तो दिखाया था परंतु शिक्षित व समझदार होने के बावजूद भी विधायक के रूप में शहर के विकास के लिए दादा की कोई उल्लेखनीय उपलब्धियाँ नहीं रही। जिसके कारण इस बार जनता उन्हें दगा दे सकती है। लेकिन प्रचार के नए व अजीबो गरीब तरीके तथा सोशल मीडिया में दादा की उपस्थिति इस चुनावी समीकरण को पलट भी सकती है।   
वहीं यदि हम भाजपा प्रत्याशी काश्यप जी बात करें तो दादा से नाराज मुस्लिम वोटर इस बार काश्यप जी का साथ दे सकते हैं। चेतना खेल मेला, माहे रमज़ान, अहिंसा ग्राम आदि के साथ ही मीडिया व राजनीति के क्षेत्र में काश्यप जी की उच्च स्तर पर पैठ इस चुनाव में उन्हें जीत का सेहरा पहना सकती है। वहीं दूसरी ओर खामियों के रूप में रतलाम से दूर मुंबई व दिल्ली की दौड़ काश्यप जी की अनदेखी का कारण भी बन सकती है। इसी के साथ ही हिम्मत सेठ के विकल्प व नए नाम के रूप में सामने आए काश्यप जी के साथ रतलाम के जैन समुदाय के ‘सेठ’ सर्मथक खेमे से वोट के मामले में दगा करने के आसारों से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है।
पहले तकरार, फिर इन्कार, फिर अनमने मन से शहर में एक ही मंच पर शिवराज, काश्यप व सेठ का लोगों को एकबारगी तो कानाफूसी करने पर मजबूर कर ही देता है। पर फिर भी खामियाँ कम, खूबियाँ अधिक और बदलाव की उम्मीद के साथ शहर के वोटर इस बार काश्यप जी का साथ दे सकते हैं।

यहाँ हम केवल इस चुनावी महासंग्राम में हार-जीत की संभावनाओं पर अटकले लगा सकते हैं परंतु असली फैसला तो जनता को ही करना है। जो आगामी 25 नवंबर को अपना कीमती वोट देकर इन नेताओं की किस्मत का सितारा उदय या अस्त कर सकती है। कृपया अपना कीमती वोट जरूर दे और सोच-समझकर अपने नेता का चयन करे।   
- गायत्री 

Wednesday, November 20, 2013

जागो रे, जागो रे, जागो रे ...

कितनी अजीब बात है न कि जब हम नया टीवी, मोबाईल या रेफ्रिजरेटर खरीदते है तो हम कई बार उनके फीचर्स, ग्यारन्टी, वारन्टी आदि के बारे में बारीकी से जाँच पड़ताल करते हैं, वह भी केवल इसलिए कि हमारे धन का सदुपयोग हो और जिस चीज को हम चुने, वह अच्छी हो। कुछ यही बात शादी-ब्याह के रिश्तों के समय भी लागू होती है। उस समय भी हम अपने स्तर पर सारी जानकारियाँ निकालकर सोच-समझकर हाँ या ना के निर्णय पर अपनी मुहर लगाते हैं। लेकिन वोट डालकर अपने नेता को चुनते समय सब कुछ जानते हुए भी हम न जाने क्यों अपनी आँखे मूँद लेते हैं? आँखे क्या हम तो अपना कान और मुँह भी बंद करके भेड़चाल में मतदान करने चले जाते हैं। 
           कुछ समझदार लोग तो ऐसे भी होते है, जो मतदान वाले दिन वोट न डालकर अपने परिवार के साथ सैर-सपाटे पर निकल जाते हैं। आखिर हम क्यों भूल जाते हैं कि वोट डालना न केवल हमारा अधिकार है बल्कि भारत का नागरिक होने के नाते हमारी एक अहम जिम्मेदारी भी है पर हम है कि अपनी इस जिम्मेदारी को औपचारिकता समझकर बिना सोचे-समझे अनमने मन से वोट डालकर अपनी जिम्मेदारी से इति श्री कर लेते हैं।
          कहते हैं कि शिक्षा हमें किताबी ज्ञान के साथ ही नैतिक व व्यवहारिक ज्ञान का सबक भी सिखाती है परंतु वोट डालने के मामले में शिक्षित लोग भी अगूँठाछाप लोगों की भीड़ में शामिल हो जाते हैं। सब कुछ जानते और देखते हुए भी भेड़चाल चलकर हम बार-बार वहीं गलती करते हैं, जो हमें नहीं करनी चाहिए। हमारा एक वोट भी अमूल्य है, जो सत्ता का तख्ता पलटने के लिए और भ्रष्ट नेताओं को सबक सिखाने के लिए पर्याप्त है। जिस तरह बूँद-बूँद से घड़ा भरता है। ठीक उसी तरह एक-एक वोट करके चुनाव में वोटों की संख्या के आधार पर नेताओं की हार-जीत का फैसला भी होता है।
अपने नेता की प्रोफाईल व राजनीतिक अनुभवों पर गौर किए बगैर ही उनके नाम की हवा, दल का ब्रांड नेम और अफवाहों के आधार पर ही हम सबसे अधिक सुर्खियों व खबरों में रहने वाले नेता के नाम पर अपने अमूल्य वोट की मुहर लगा देते हैं, जो कि गलत है। यदि हम अपने नेताजी के चरित्र, अनुभव, कार्यक्षेत्र में उपलब्धियाँ व थाने में उनके नाम दर्ज प्रकरणों पर गौर करेंगे तो शायद हमारी आँखे फटी की फटी और कान सुन्न रह जाएँगे। ऐसा करने पर हम पाऐँगे कि हर बार हम किसी अपराधी या दागी व्यक्ति को ही अपना नेता चुनते आ रहे हैं।

          जागो, जागो, जागो रे ... अब तो जागो क्योंकि हम अब नहीं जागे तो शायद पाँच सालो के लिए हमें सोना ही पड़ेगा और अपराध, भ्रष्टाचार और महँगाई का कड़वा घुँट पीना पड़ेगा। अब मेरी बातों पर गौर कर खुले दिमाग से सोचिए कि जब हमारा एक अमूल्य वोट किसी नेता की किस्मत के साथ ही हमारी और देश की किस्मत को भी बदल सकता है तो क्यों न हम जागरूक मतदाता होने का परिचय दे व वोट माँगने वाले नेताओं से उनके वादों, दावों व स्थानीय मुद्दों पर खुली बहस करे। नेताओं को अपनी समस्याएँ व उनके द्वारा किए गए जनकल्याण के कार्यों की असल हकीकत से अवगत कराएँ। 
नेताओं के झूठे वादों व आश्वासनों पर यकीन करने की बजाय अपना बहुमूल्य वोट देने से पहले ही अपनी आँख, मुँह व कान खुले रखें व उसी नेता को चुने, जो वाकई में हमारे लिए, हमारे क्षेत्र के विकास के लिए काम करने का माद्दा रखता है। यदि हमारी इस कसौटी पर कोई नेता खरा नहीं उतरता है तो शान से मुस्कुराकर ‘इनमें से कोई नहीं' विकल्प का चयन करे व अपने एक वोट की कीमत नेताओं को बताएँ। 
- गायत्री 

Tuesday, November 19, 2013

म.प्र. विधानसभा चुनाव 2013 – मुद्दे, वादें और हकीकत (भाग – 1)

वादा तेरा वादा ...

भारत के हृदय प्रदेश कहे जाने वाले मध्यप्रदेश में 25 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होने के साथ ही छोटे-बड़े राजनेताओं की प्रदेश में चहलकदमी की हलचलें भी तेज होने लगी है। भाजपाशासित इस प्रदेश में शिवराज के कार्यकाल में प्रदेश के विकास की बात छेड़कर जहाँ भाजपा आमजन को ‘फिर शिवराज’ का नारा देकर प्रलोभित कर रही है। वहीं दूसरी ओर भाजपा की वादाखिलाफी का राग अलापते हुए कांग्रेस भी तख्तापलट की आशा में ‘सत्ता परिवर्तन रैली’ निकालकर जनता को सत्ता परिवर्तन हेतु उकसा रही है। यह तो हुई प्रदेश में सत्ता की कुर्सी के दो बड़े दावेदार दलों की बात। कमल के फूल व पंजे की इस लड़ाई के बीच अन्य दलों के नेता व निर्दलीय उम्मीद्वार भी विकास की बयार लाने के वादों के साथ अपना एक अलग राग अलाप रहे हैं। इस प्रकार चुनावी दंगल में अपनी किस्मत आजमाने वाले सभी उम्मीदार नए वादों व पुराने मुद्दों के साथ प्रदेश के वोटरों का दिल जीतने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। यही वजह है कि कभी-कभार जनता के बीच नजर आने वाले नेताजी अब वोट की जुगाड़ में जनता के पैर पकड़ते व उन्हें प्रणाम करते नजर आ रहे हैं। सत्ता की मीठी रबड़ी का लालच राजधानी में बैठे मामा (शिवराज सिंह चौहान) को भी हर आमसभा में लाडलियों का बखान करने को विवश कर रहा है। पक्ष-विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप के बीच चुनावी राजनीति के अखाड़े में हर कोई राजनेता अपनी व अपने दल की उपलब्धियाँ गिनाते नहीं थक रहा है।

प्रदेश में सीटों का गणित :
मध्यप्रदेश में कुल 230 विधानसभा सीटें है। जिनमें से लगभग 33 सीटे एससी व लगभग 41 सीटे एसटी हेतु आरक्षित है। पिछले चुनाव के रूझान की बात करें तो जहाँ वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में 143 सीटों पर कमल खिला था। वहीं इस बार भी प्रदेश की सत्ता में भाजपा का भगवा रंग ही काबिज रहने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि इस बार भाजपा को सड़क, बेरोजगारी और पिछड़ेपन जैसे मुद्दों के नाम पर अपनी 10-15 सीटे खोनी भी पड़ सकती है क्योंकि जनता से की गई वादाखिलाफी अब सीटों के नुकसान के रूप में शिवराज पर महँगी पड़ सकती है। स्पष्ट तौर पर कहे तो इस बार प्रदेश की जनता प्रदेश के राजकुमार यानि ज्योतिरादित्य पर कुछ हद तक विश्वास जता सकती है। लेकिन इसका अर्थ नहीं है कि मध्यप्रदेश से भाजपा का सुपड़ा साफ हो जाएगा। भाजपाशासित इस प्रदेश में शिवराज का जादू तो इस बात भी चलेगा।
यदि प्रदेश विधानसभा चुनाव पर हुए ताजा सर्वे की बात की जाएँ तो सर्वे का रूझान भी ‘एक बार फिर शिवराज’ की ओर ही है। ‘समय हब पल्स सर्वे 2013’ के अनुसार इस बार भाजपा प्रदेश में 124 सीटों पर कमल खिलाएँगी। जबकि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 143 सीटों पर जनता का विश्वास जीता था। यानि कि 19 सीटों के नुकसान का पूर्वानुमान। ‘इंडिया टीवी ओपिनियन पोल सर्वे’ की मानें तो इस बार प्रदेश में 133 सीटों पर कमल खिल सकता है। वहीं ‘सीएनएन-आईबीएन सर्वे’ कमल क्रांति की ओर ईशारा करते हुए 148 सीटों की बढ़त के अनुमान की बात कर रहा है। यह तो हुई सर्वे की बात पर चुनाव की इस पूरी गणित को पलटने का चमत्कार करना या न करना तो पूरी तरह से प्रदेश की जनता के हाथ में है। अब देखना यह है कि यहाँ मामा का जादू काम करता है या राजकुमार का।

प्रचार के लिए बुलवाएँ पामणे :
लोकसभा चुनाव में हार-जीत की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि तैयार करते इस चुनाव में केंद्रीय मंत्रियों के साथ ही कई बड़े स्टार प्रचारक भी अपने दल के नेताओं के लिए वोट माँग रहे हैं। नेताजी से लेकर मीडियाकर्मी और सेलिब्रिटी तक सब मजे में है। चुनाव के इस समर में तो खबरों, मुद्दों और नोटों की भरमार के कारण इन सभी की चाँदी हो रही है। सबको प्रचार, प्रसार और वाहवाही जितने का भरपूर मौका मिल रहा है। जहाँ प्रदेश के दिग्गज राजनेता अपनी कामयाबी को गिनाने के लिए और जनता के वोट जुगाड़ने के लिए अपने दलगत स्कूल के मास्टर यानि कि पार्टी अध्यक्ष व कई बड़े केंद्रीय नेताओं को मंच पर ला रहे हैं। वहीं अभिनय से रिटायर्ड हो चुके सितारे भी चुनाव में दलों के स्टार प्रचारक बन अपनी कमाई का एक नया जरिया तलाश रहे हैं। आखिर हो भी क्यों न नोट के बदले वोट की राजनीति अब इस देश में आम बात हो चुकी है।

क्या हुआ तेरा वादा :
प्रदेश में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कई ऐसे मुद्दे है। जिन पर जमकर राजनीति की जा सकती है। आखिर हो भी क्यों न, जब तक मुद्दों पर बहस व सत्तासीन व विपक्षी दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप नहीं होंगे। तब तक जनता हकीकत से परे ही रहेगी। पोल खोल के कार्यक्रम का मजा तो चुनावों में ही आता है। इसी से तो जनता के आँखों पर पड़ी विश्वास की पट्टी खुलती है और उसे हकीकत नजर आती है। यदि हम प्रदेश की तीन बड़ी समस्याओं की बात करें, जिनके सहारे चुनावी गणित कभी भी बदल सकता है तो मेरी राय में वे तीन मुद्दे सड़क, उद्योग व शिक्षा के होंगे। इन तीनों ही मामलों में यह प्रदेश पिछड़ेपन का शिकार है। प्रदेश में इन मुद्दों को लेकर हर चुनाव में केवल वादें होते हैं काम नहीं। उद्योगों व एमएनसी के नाम पर भूमिपूजन होता है, इन्वेस्टर समिट होती है ... और उसके बाद सालों तक भूमिपूजन हुई जमीन पर गाजर घास व मवेशियों के अलावा कोई नजर नहीं आता। यहीं हाल प्रदेश की सड़कों का भी है। प्रदेश में सड़कों की दुर्दशा के बारे में तो यहीं कहना उचित होगा कि यहाँ सड़कों में गड्ढ़ों की बजाय गड्ढ़ों में सड़कों के अवशेष नजर आते हैं। पुराने सड़क निर्माण कार्य के तो हाल बेहाल है लेकिन प्रदेश में बनी नई फोरलेन सड़कों का निर्माण भी प्रदेश की बदहाल स्थिति को ही बँया करता नजर आता है। नई सड़कों पर गड्ढ़ों की खानापूर्ति हेतु किया जाने वाला पेचवर्क इन सड़कों के घटिया निर्माण की ओर ही ईशारा करता है।
अब यदि हम बात करे तो बेरोजगारी की, तो शिक्षित बेरोजगारों की बढ़ती संख्या प्रदेश के युवाओं को रोजगार की तलाश में दूसरे प्रदेशों में पलायन करने को विवश कर रही है। प्रदेश के लगभग 80 प्रतिशत इंजीनियरिंग व आईटी के छात्र नौकरी व अच्छे पैकेज की तलाश में पूणे, बंगलौर, नोएडा, गुणगाँव, मुबंई आदि महानगरों का रूख कर रहे हैं। सच कहें तो प्रदेश का आईटी हब बनना तो अब केवल कल्पनाओं में ही नजर आता है। यहीं हाल मेडिकल स्टूडेंट्स का भी है। उच्च शिक्षा का गिरता स्तर व नौकरी की तलाश कहीं न कहीं युवाओं को प्रदेश से पलायन करने को विवश कर रही है। जब शिक्षित युवा ही प्रदेश से पलायन करेगा तो विकास कहा से प्रदेश की ओर रूख करेगा?
अब बात आती है उद्योगों की। उद्योगों की कमी व बंद पड़े उद्योगों की अनदेखी प्रदेश के विकास में सबसे बड़ा अवरोध बन रही है। बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर होते हुए भी गड्ढ़ों से छलनी हुई सड़के परिवहन हेतु बड़ी परेशानी बन नए उद्योगों को प्रदेश में आने से रोक रही है। प्रदेश का विकास बेरोजगारी, बदहाल सड़कों व उद्योगों की अनदेखी के कारण अवरूद्ध पड़ा है, जो कि इस विधानसभा चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया है।    

इन मुद्दों के अलावा गौण मुद्दों में महिला सुरक्षा, शिक्षा, बिजली-पानी की समस्या, भ्रष्टाचार आदि कई ऐसे मुद्दे हैं जो या तो शिवराज सरकार को आफत में डाल सकते हैं या फिर प्रदेश के जागरूक मतदाताओं को ‘इनमें से कोई नहीं’ विकल्प का चयन करने पर मजबूर कर सकते हैं। अब देखना यह है कि लाडलियों का दिल जीतने वाले उनके मामा क्या अब प्रदेश की जनता का बहुमत हासिल कर पाएँगे या नहीं?   
- गायत्री 

Saturday, November 2, 2013

दिपावली की फीकी है रौनक  

इस बार दीपावली महँगाई की चमक से दमक रही है। बाजार एक बार फिर से गुलजार है परंतु कहीं न कहीं बाजार को भी खरीदारों का इतंजार है। दीपावली पर घी के दिए जलाना जैसे अतीत की बात हो गई है। वर्तमान में तो सस्ते तेल और इलेक्ट्रिक दियों से ही दिपावली की रातें रोशन हो रही है। महँगाई का मार, चुनाव का इतंजार और सख्ताहाल सड़कों की तरह गठबंधन के दम पर चलती सरकार के बीच आम आदमी तो जैसे गन्ने की तरह पीस सा गया है। तभी तो हममें से कोई ज्योतिष में अपना भविष्य खोज रहा है तो कोई शेयर में। सच कहूँ तो हमारे यहाँ किस्मत, खुशियों और जिंदगी तीनों की खुलेआम बाजी लग रही है।
अब बात करते दीपावली पर पूजनीय हम सबकी आराध्य देवी लक्ष्मी की। जो अबक‍ी बार लक्ष्मी हमारे घरों के साथ-साथ जैसे इस देश से भी रूठ सी गई है तभी तो किले और खंडहर खोदकर रूठी लक्ष्मी के ठिकाने को खोजा जा रहा है। लेकिन लक्ष्मी है कि दीपावली के दिन भी स्विस बैंक के एसी में बैठ अपनी चमकती किस्मत पर इठला रही है वह तो वहाँ डॉलर और यूरो से गप्पे लड़ा रही है। वाह रे लक्ष्मी माता, तू हमें कैसे-कैसे नाच नचा रही हैं? मेरी मानें तो असल में लक्ष्मी की यह नाराजगी जायज भी है। आज जब हमारी श्रृद्धा बिजली के दियों में और भावनाएँ प्लास्टिक के पुष्पों में समाती जा रही है तो लक्ष्मी भी घर की बजाय तस्वीरों में ही नकली रूप में मुस्कुरा रही है।
मेरे इस व्यंग्य के साथ आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ ....।

'                            शुभ दीपावली


                                                                                                                            - गायत्री