Thursday, December 18, 2014

रक्तरंजित हुआ शिक्षा का मंदिर

खिलौना बन गए खिलौनों से खेलने वाले

-          - गायत्री शर्मा
यह ‘तालिबानी आतंक’ की पाठशाला ही है, जिसमें निर्ममतापूर्ण तरीके से जिहाद के चाकू से इंसानों की खालें उधेड़ी जाती है, मानवीय संवेदनाओं को कट्टरता की आग में पकाया जाता है, इंसानों को इंसानों का खून पिलाया जाता है और इस तरह कई अग्निपरिक्षाओं के बाद तैयार होता है इंसान के भेष में आतंक का वह ‘खुँखार जानवर’, जो दुनियाभर में विंध्वस का कारक बनता है। खूँखार आतंकियों द्वारा जानवरों की तरह स्कूली बच्चों के सिर काटने व उन्हें गोलियों से भूनने की पेशावर के आर्मी स्कूल की नृशंस घटना इंसानियत के चिथड़े उड़ाती हैवानियत का वह अति क्रूरतम रूप है, जिसकी जितनी आलोचना की जाएं वह कम है। यह घटना कट्टर आतंक के अट्टाहस के रूप में दुनिया के सभी देशों के लिए एक चेतावनी भी लेकर आई है कि यदि आप आंतक के खिलाफ आज न जागे तो हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिए जाओगे।

आतंक की यह कैसी भाषा है, जिसमें जिंदगी बचाने वाले को ‘हैवान’ और जिंदगी छीनने वाले को ‘खुदा’ माना जाता है? बच्चों को स्कूल भेजने की वकालत करने वाली पाकिस्तान की मलाला के अपने ही देश के स्कूलों में आतंक का यह तांडव क्या मलाला के हौंसलों की अग्नि परीक्षा ले रहा है या पाकिस्तान की आस्तीन के ही साँप तालिबानी कोबरा का क्रूरतम रूप दिखा रहा है? इसके पीछे कारण कुछ भी हो लेकिन आतंक का यह खौफनाक खेल अब बर्दाश्त की सारी हदे लाँघ गया है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बारूद हमेशा विनाश करती है। यदि आप दूसरों पर हमला करने के लिए अपने घर में बारूद जमा कर रहे हैं तो कहीं ऐसा न हो कि वह बारूद आप ही के विनाश का कारण बन जाए। पेशावर की घटना का ईशारा भी इसी ओर ही है। पाकिस्तान के पेशावर के आर्मी स्कूल में तालिबानी आतंकियों के तांडव का अति भयावह दृश्य, जिसकी कल्पना मात्र ही हमारे रौंगटे खड़े कर देती है, सोचिएं वह मंजर असल में कितना खौफनाक होगा। खिलौनों से खेलने वाले बच्चे भी आतंक के इस कहर के सामने खिलौना बन गए, जिन्हें कतार में खड़े कर आतंकियों ने उनके साथ निशानेबाजी का खेल खेला। पलक झपकते ही सैकड़ों बच्चों समेत 141 लोगों को प्राण लेने वाली यह घटना पाकिस्तान को दुश्मनों से महफूज़ रखने वाले सेना के जवानों के मुँह पर मारा गया वह करारा तमाचा है, जो उन्हें अपने आकाओं की जी-हुजूरी के बदले रसीद किया गया है। 


ताबूतों में सजी लाशों की कतारों से भरे पेशावर के आर्मी स्कूल के भीतर झाँकने पर कठोर से कठोर इंसान का भी कलेजा मुँह तक आ जाएगा पर उन आतंकियों का क्या, जिनके कान सिले हैं, आँखे बंद है और दिमाग दूसरों के काबू में है। शिक्षा का मंदिर कहाने वाले इस स्कूल का रक्तरंजित फर्श आज आतंकियों के खूनी खेल की गवाही दे रहा है। यहाँ पग-पग पर लाशें बिछी है और खून के फव्वारें फूट रहे हैं। कल तक बच्चों की शरारतों और किलकारियों से गूँजनें वाला स्कूल अब रूदन की करूण चीखों से गूँजायमान हो रहा है। माँ-बाप की एक पुकार पर दौड़कर आने वाले बच्चे आज माँ-बाप की चीखें सुनकर भी खामोश है। स्कूल से निकलते से बच्चों के बैग उठाने वाले पालक आज स्कूल से उनकी लाशें लिए निकल रहे हैं। आज समूची दुनिया देख रही है उस पाकिस्तान में पसरे सन्नाटें को, जो अब तक आंतक के खिलाफ जंग छेड़ने से खिलाफत करता रहा है। 

आतंकी विनाश का वह मंजर जिसे कल आपने सिडनी में, परसों अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेंड सेंटर पर, ईरान के सिनेमा हॉल में और 1999 में मुबंई में बड़े करीब से देखा और महसूस किया था। आज पेशावर में आतंक के उसी खौफनाक मंजर के क्रूरतम रूप ने हमें रूह को थराथराने वाला कंपन महसूस करा दिया है। आंतकी कहर से आज ताबूतों की जो कतारें पाकिस्तान में लगी है वह किसी भी मुल्क में लग सकती है। हम सभी की संवेदनाएं आज उन पाकिस्तानियों के साथ है, जिनके घर की रौनक आज मातम के सन्नाटे में गुम हो गई है। लेकिन संवेदनाओं के साथ ही आज जरूरत है आतंक के खिलाफ सख्त कदम उठाने की, जिसके लिए भी मुश्किल की इस घड़ी में हम पाकिस्तान के साथ खड़े है। आतंकी हमलों की घटना कभी भी और कही भी घट सकती है। इससे पहले कि हमारे मुल्क में भी कुछ ऐसा हो। सम्हल जाइएं और खिलाफत कीजिए धार्मिक कट्टरता की उन दुकानों की, जहाँ धर्म और मज़हब के नाम पर भाई-भाई को लड़ाया जाता है। अब वक्त आ गया है धर्म और मजहब की कट्टरता को सदा के लिए भुलाकर मानवता का धर्म अपनाने का। अपनी एकता और ताकत से आतंक को मुंहतोड़ जवाब देने का। तो चलिए आप और हम भी अपने मन, वचन और कर्म से आतंक के खातमे के लिए कृत संकल्पित होकर आवाज उठाएं।

प्रतिष्ठित अखबारों व पोर्टलों में इस लेख का प्रकाशन -

देश के 3 राज्यों के 9 स्थानों (भोपाल, सागर, इंदौर, उज्जैन, जबलपुर, ग्वालियर, रतलाम, रायपुर तथा मुंबई) से एक साथ प्रकाशित ‘दैनिक दबंग दुनिया’ के 18 दिसंबर 2014, गुरूवार के अंक में ‘एक्सक्लूसिव खबर’ कॉलम में प्रकाशित मेरा लेख – ‘रक्तरंजित हुआ शिक्षा का मंदिर, खिलौना बन गए खिलौनों से खेलने वाले’

मथुरा, लखनऊ, आगरा, औरैया और फिरोजाबाद से एक साथ प्रकाशित उत्तर प्रदेश के प्रमुख दैनिक ‘कल्पतरू एक्सप्रेस’ के 18 दिसंबर 2014, गुरूवार के अंक में संपादकीय पृष्ठ के ‘नजरिया’ कॉलम में ‘रक्तरंजित हुआ शिक्षा का मंदिर’ शीर्षक से प्रकाशित मेरा लेख। कृपया इस लेख पर मुझे अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत कराएं।

गुड़गांव से प्रकाशित प्रमुख दैनिक ‘गुड़गांव टुडे’ के 18 दिसंबर 2014, गुरूवार के संपादकीय पृष्ठ पर पेशावर के आर्मी स्कूल में हुए आतंकी हमले पर केंद्रित मेरे लेख को ‘रक्तरंजित हुआ शिक्षा का मंदिर’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया।   

Wednesday, December 17, 2014

पेशावर में पाक रोया ....

-          गायत्री शर्मा

हर आँख नम है,
हर सीना छलनी है
मासूमों पर कहर बन बरपी
यह कैसी दहशतगर्दी है?

जिहाद की आग आज
मासूमों को जला गई
बुढ़ापें की लाठी अचानक
बूढ़े अब्बू के कंधों पर ताबूत चढ़ा गई

रक्तरंजित हुई मानवता
हैवानियत दहशत बरपा गई
नन्हों की किलकारियाँ आज
मातम का सन्नाटा फैला गई

कोसती है माँ, क्यों भेजा उसे स्कूल?
भेज दिया तो ये आफत आ गई
जिसके लिए की थी दुआएं पीर-फकीरों से
आज मौत उन दुआओं को पीछे छोड़ आगे आ गई  

माँ-बेटे का संवाद

अम्मी-अब्बू बुलाते हैं बेटा तुम्हें
चल उठ, हम तेरी जिद पूरी कराते हैं
जिस खिलौने के लिए रोता था तू रोज़
तुझे आज अब्बू वो खिलौना दिलाते हैं

पर ये क्या, मेरा नन्हा तो खुद ही
खूबसूरत खिलौना बन गया है?
सुनो, खामोश है क्यों लब इसके,  
क्या ये फटी आँखों से कुछ बोल रहा है?   

आज न जाने क्यों भारी है छाती मेरी
ममता के दूध अचानक आँचल भिगो रहा है
आ बेटा, कुछ देर गोद में आकर सो जा
मीठी थपकियों वाला पालना तेरी बाट जोह रहा है  

बच्चे की लाशें देखने पर

दहशतगर्दों ने ये क्या कर डाला?
मेरे नन्हें को जिहादी मुस्लिम बना डाला?  
जो नहीं जानता था फिरकापरस्ती
उसे जिहादी जंग के रक्त से क्यों रंग डाला?

इस खौफनाक मंजर को देख
सहम गई होगी कुछ अम्मियाँ भी
जिनकी औलादें ये कहर बरपा रही थी
वो अम्मियाँ आज औलाद के होने पर आंसू बहा रही थी

बहुत हो चुका दहशतगर्दी का खेल
और इंसानी खून की होलियां
जहाँ हर आंख नम है वहाँ
कोई न बोलेगा अब जिहाद की बोलियां

बस करो अब जिहाद की इस जंग से
पकड़ लो तुम भी शांति की राह
गर अब न सुधर पाएं आतंकियों तुम तो

कर देंगे खत्म हम तुम्हारे नामो- निशा। 

चित्रों हेतु साभार - गूगल 

Wednesday, December 10, 2014

जागिएं और आवाज़ उठाइएं

-          गायत्री शर्मा 

जहाँ मौजूदा माहौल से छटपटाहट होती है वहीं परिवर्तन के कयास लगाए जाते हैं। मौन धारण करने से या हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से हमें कुछ हासिल नहीं होने वाला। जब तक हमें अपने अधिकारों की जानकारी, कर्तव्यों का भान और न्याय पाने की छटपटाहट नहीं होगी। तब तक इस देश की तस्वीर नहीं बदलेगी। आज ‘मानव अधिकार दिवस’ है। कानून द्वारा प्रदत्त मानव अधिकारों के प्रति जागरूक होने का दिन। आइएं आप और हम आज मिलकर शुरूआत करते हैं अपने अधिकारों को जानने की और ज़मीनी हकीकत में घटित हो रही मानव अधिकारों के हनन की कुछ घटनाओं से सबक लेने की।   

आज हम अपने सफर की शुरूआत करते हैं सरकारी योजनाओं, धार्मिक चैनलों में चमकने वाले बाबाओं और कुछ भ्रष्ट बाबूओं से। यह मेरे देश की तस्वीर ही है जहाँ नक्सलवाद नौनिहालों के हाथों में किताबों की जगह बंदूके थमा रहा है, जहाँ नवजात शिशु कटीली झाडि़यों में मौत के तांडव का रूदन गीत गा रहा है, जहाँ सरकारी शिविरों में नसंबदी ऑपरेशन महिलाओं की जिंदगी की नस काट रहा है और मोतियाबिंद का ऑपरेशन आँखों की रोशनी उम्मीदें छीन रहा है, जहाँ बाबाओं के आश्रम में सरेआम महिलाओं व बच्चों के साथ शोषण, बलात्कार व हत्या के अपराध हो रहे हैं। ऐसे देश में हर कदम पर मानव अधिकारों का मखौल उड़ रहा है। अरे आप रूक क्यों गए। मेरे देश की इस सच्ची कहानी में आम आदमी के अधिकारों की धज्जियां उड़ने का यह दृश्य आगे चलकर तब और भी घिनौना हो जाता है जब मध्याह्न भोजन में दाल में छिपकली और चावल में कीड़े बच्चों के मुख का ग्रास बनते हैं, जहाँ बच्चों को दलित रसोइएं की बनाई रोटी खाने से अभिभावक मना करते है, जहाँ सरकारी नौकरियों हेतु योग्यताएं भ्रष्ट बाबू लिफाफे में वज़न देखकर सिद्ध करते हैं और जहाँ सर्व शिक्षा अभियान केवल कागज़ों पर सजते हैं, ऐसे देश में आज भी मुझे मानव अधिकार मुंगेरीलाल के हसीन सपने की तरह दिखता है।

डूबते के लिए एक बुलबुला भी जिंदगी की उम्मीद को जिंदा रखता है लेकिन हम तो पूरी तरह से अज्ञान के तालाब में डूबे हुए है। तभी तो न हमें अपने अधिकारों का भान है और न कर्तव्यों का। यदि इस देश का हर आदमी अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो जाएँ तो कभी किसी के अधिकारों का हनन नहीं होगा। याद रखिएं आवाज़ उठाना आपका काम है, जब आप ही स्वयं के साथ हो रहे भेदभाव, अत्याचार, शोषण या दुर्वव्यवहार के खिलाफ आवाज़ नहीं उठा सकते तो आपकी इस कुंभकर्णी निद्रा को मानव अधिकार आयोग की जागरूकता का ढ़ोल भी भंग नहीं कर सकता है। आज बहाना है मानव अधिकार दिवस का, आज ही से आप भी एक नई शुरूआत कीजिएं इस कानून के बारे में जानने, पढ़ने व आवाज़ उठाने की। यदि आप साहस करके एक कदम आगे बढ़ेगे तो दूसरे कदम पर कानून भी आपका साथ देगा। इससे पहले कि और देर हो जाएँ, आप भी गौर कीजिए अपने मानव अधिकारों पर और स्वयं जागरूक होने के साथ ही लोगों में इस संबंध में जागरूकता फैलाइएं। उसके बाद देखिएं इस देश की तस्वीर कैसे बदलती है।
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