Saturday, April 21, 2018

आज हम हैवानियत के किस स्तर पर खड़े है, वह कल्पनातीत है. इंदौर शहर के मुख्य बाजार राजबाड़ा में 4 माह की दुधमुँही मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म रौंगटे खड़े कर देने वाली घटना है. आए दिन इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति और पुलिस तथा कानून व्यवस्था का लचर होना मेरे मन में कई प्रश्नों को जन्म देता है.मुझे तो यह समझ नहीं आता कि आखिर वो कौन की जिस्मानी भूख है, जो इन दरिंदों को हैवानियत के उस स्तर तक ले जाती है, जिसमें उन्हें बच्चों और बड़ों में कोई फर्क नहीं आता. इस घटना के बारे में विश्लेषण करने पर तो मुझे यही समझ आता है कि ये घटना बदले या खीझ के परिणामस्वरूप घटित हुई है क्योंकि किसी दुधमुँही बच्ची से दुष्कर्म करने का परिणाम आरोपी स्वयं ही जानता होगा. उस बच्ची को तो अपने शरीर के उन अंगों का भी बोध नहीं होगा, जो उसे लड़की या लड़का बनाते है. उसे प्यार व पशुता के बीच क्या भेद होता है, इसका भी ज्ञान नहीं था.
कई दिनों से मेरे मन में यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या अब इस देश में बेटी के रूप में पैदा होना ही गुनाह है या फिर दो माओ जितनी सुरक्षा और प्यार देने का दावा करने वाले मामा के राज्य में बेटियाँ महफूज़ नहीं है? सोचिए दरिंदगी की हदों को लांघने वाले उन शैतानों के बारे में जो जो अपनी वासना का शिकार उन मासूमों को बनाते है, जिनमें उनकी पशुता का विरोध करने की ताकत ही नहीं होती.
मेरे परिवार में और मेरे कई मित्रों के परिवार में अपनी मधुर मुस्कान बिखेरती नन्हीं बेटियाँ है. आज़ सच में मुझे फ़िक्र होती है उन बेटियों की, जो खेलकूद और सैर- सपाटा कर अपने बचपन का भरपूर आनंद ले रही है. उन्हें पड़ोसी, मामा, नाना, दादा, दूध वाले, घर के नौकर, स्कूल के टीचर आदि किसी के पास जाने में डर नहीं लगता और ना उनके माँ- बाप उन्हें किसी के पास भेजने से डरते है क्योंकि हम अपने स्वाभाववश किसी पर भी भरोसा कर लेते है. लेकिन मेरे मित्रों अब सतर्क हो जाइए उस अनजान आहट से, जो तेज़ी से हमारी बेटियों की और बढ़ रही है. याद रखिए जो कठुआ, सूरत, शिवपुरी और इंदौर में हुआ.वो कही भी किसी के भी साथ हो सकता है.इससे पहले की देर हो जाए आप भी विरोध कीजिए मानवता को शर्मसार करने वाली इन घटनाओं की और अपनी बेटियों के साथ देश की सभी बेटियों की सुरक्षा का संकल्प लीजिए.
- डॉ.गायत्री

Saturday, April 14, 2018

जम्मू- कश्मीर के ￰कठुआ में 8 वर्षीय आसिफा के साथ हवस के भूखे जानवरों ने जो दरिंदगी की, उसे बयां करने के लिए मेरे पास उच्चस्तरीय गंदे, अश्लील और घटिया शब्द नहीं है. माफ़ कीजिएगा पर इन बलात्कारियों को मैं तो जानवर कहकर ही सम्बोधित करुँगी. सच कहा जाए तो देवस्थान जैसी पवित्र जगह को अपनी हवस का अड्डा बनाने वाले बलात्कारियों को हिंदू या मुस्लिम तो दूर इंसान कहलाने का भी अधिकार नहीं है. ये लोग किसी भी धर्म विशेष के साथ ही मानवता को भी शर्मसार करने वाले दरिंदे है.
        महज 8 साल की नन्ही मासूम बच्ची को अगुवा कर उसे नशीली दवा पिलाकर उसके जिस्म को नोचना, लगातार 4-5  दिन तक कई दरिंदों द्वारा भूख से व्याकुल और दर्द से सिहरती बच्ची के जिस्म का बर्बरतापूर्वक भक्षण करना और फिर उसके गले में दुपट्टा कसकर उसकी सांसे उखाड़ देना ....इतना ही नहीं इसके बाद सिर पर पत्थर पटक- पटककर उसकी लाश के साथ भी अमानवीयतापूर्ण कृत्य करना....सच कहू तो ये सब सोचकर ही मेरा मन सिहर उठता है.... आखिर ये कैसी भूख है, जो एक वयस्क और बच्ची में विभेद नहीं करती? क्या जिस्म की ये भूख इंसानी दरिंदों को इतना कामुक कर देती है कि वो उस बच्ची की जगह अपनी बच्ची या बहन के होने की कल्पना कर अपने आपको नहीं रोक पाते? आज क्या गुजर रही होगी उस बच्ची के माँ-बाप पर, जो गरीब, बेबस, लाचार और शोषण का शिकार है...यह सब हमारी कल्पनाओं से परे है.
               आज मेरा मन बड़ा व्याकुल है. चाहती हूँ कि कुछ ऐसा लिख दू जिसके लिए मुझ पर शब्दों की सामाजिक मर्यादा का बंधन ना हो. लेकिन चाहकर भी मैं किसी सार्वजानिक मंच पर अपने शब्दों को बेलगाम नहीं छोड़ सकती. मेरा आप सभी से अनुरोध है कि अपनी बेटियों और बहनों के साथ ही समूची नारी शक्ति की सुरक्षा के लिए कुछ करो, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए. आओ हम सब मिलकर इस घटना का विरोध करें.
      मन तो करता है कि इंसान की खाल ओढ़े इन दरिंदों को सामूहिक रूप से नग्न कर पेड़ों से बांधकर इतने पत्थर मारे कि कई दिनों तक तड़फते हुए ये स्वतः ही अपनी मौत की दुआ मांगने लगे. लेकिन यहाँ हमारा कानून अपनी लाचारी पर रोता है. कानून मौन है लेकिन हम तो मुखर हो सकते है. आइए और दिखा दीजिए अपनी आवाज़ और एकता का दम और कीजिए इस मंच से नारी शोषण के विरुद्ध नव क्रांति का आगाज़.
                           -  डॉ.गायत्री
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Monday, April 9, 2018

रतलाम में हल्ला गुल्ला साहित्य मंच हे मालवी बोली व जल संरक्षण विषय पर संगोष्ठी दि सफायर स्कूल परिसर में राखी. अणी आयोजन में गीनिया-चुनिया पण हउ-हउ कवि, विचारक और मालवीप्रेमी लोक्का भेरा विया. कार्यक्रम संचालन रो काम संजय जोशी जी ए मने दिदो थो. अणी वस्ते मैं म्हारे नीचे बई गी ने एक-एक करी ने सबने बुलायो. सबसे पेला मैं बुलायो अपणा मंच रा कुमार विश्वास अलक्षेन्द्र व्यास जी ने. व्यास जी ए पेला तो सरस्वती माताजी पे अपणी कविता 'शत-शत वंदन, माँ अभिनंदन हुनई'. विका बाद वरिष्ठ कवि आज़ाद भारती जी ए मालवी में अपणी बढ़िया दो- तीन कविता हुनई. वणा ए 'कहाँ खो गया गांव ये मेरा, उसको ढूँढू गली-गली' हुनई. गहन-गंभीर आज़ाद जी रा दमदार परिचय रा बाद में आई गी बारी आई जे.सी.गौर साहब री. हसमुख स्वभावी गौर सा ए 'ओ पनिहारिन देखो, पनघट सगळा सुखी गया है' कविता हुनई ने पानी री कमी रा हंडे -हंडे विलुप्त होती मालवी बोली पर भी अपणा विचार राखिया.
  अब बारी आई तृप्ति सिंह बेन री. आज री अणि कार्यक्रम री मेज़बानी करवा वारी तृप्ति जी हे घणा कम पण सारगर्भित शब्दा में पाणी वचावा री वात कई दी. 'वर्षा का जल रोककर भर लीजो भंडार, कूप और नलकूप फिर कभी न हो बेकार' यो कई ने तृप्ति जी ए आज अणी कार्यक्रम में अपणी उपस्तिथि दर्ज करइ दी. घणो कम बोलवा वारी शांत स्वभावी मृदुभाषी तृप्ति बेन रा बाद साहित्य लेखन और काव्य पाठन में सक्रिय डॉक्टर शोभना तिवारी जी ए मालवी में अपणी सुंदर रचना रो काव्यपाठ कियो. 'जग, जीवन में राखो पानी, जल बिन जीवन सून है' अणि कविता से जल संवर्धन और मालवी बोली पे शोभना जी ए अपनी वात रखी. अब बारी आई वणी कवि री जो व्यवहार में भी सरल है ने उनको नाम भी संजय परसाई 'सरल' है. हमेशा री तरह वनाए 'चालो,चालो, चालो सगळा तिरबेनी रा मेला में' का हुनई ने मजो लाई दिदो. उका बाद वनाए अपणी एक और हउ कविता 'परिंदे' से खूब तालियां ने तारीफ बटोरी. 
           डॉक्टर कविता सूर्यवंशी री जद बारी आई. अणि बेन ए भी मोको देखी ने चोक्को मारियो ने अपणी दो सुंदर कविता 'जल है तो जीवन है' ने 'मीठी-मीठी लागे कतरी मालवा री बोली' हुनई. अपणा संजय जोशी जी कई वात करुँ. याकि तो मुस्कराहट ही सब बोली जावे. शर्मिला स्वभाव वाला संजय जी ए तो वना लाग लपेट के अपणी वात कई दी. ' जल से ही है हरियाली, बिन जल होगी बदहाली' यो कई ने अपणी ऊर्जा वचावा रा साथ ही याए जल संकट पे अपना विचार भी रखी दिया. अपणा युवा गीतकार अलक्षेन्द्र व्यास जी किसी परिचय रा मोहताज नी है. उनका गीत ही उनकी पहचान है. अपना चित परिचित गीत का साथ ही आज वनाए माँ पे बड़ो ही प्यारो मार्मिक गीत हुनायो. वणी गीत ने सुनी ने बिन बोे ही उनकी माँ की बीमारी को दद उनका आँसू में झलकी पड़ियो. हाची केउ तो व्यास जी रो किता हुनावा रो अंदाज़ तो लाजवाब है.
      आखिर में बारी अपणी भी आई. व्यास जी ए माँ पे वात ख़तम की थी तो मैं भी माँ पे लिखी अपणी कविता ' माँ से रंगीन है हर नज़ारा, माँ के बगैर अधूरा संसार है हमारा' से शुरुआत की. उका बाद मैं अपनो पुरानो व्यंग्य लेख 'पाणी बाबा आई जा नी तो भाटा से दई पाडूंगा थने'. इका बाद मैं अपणी मालवी कविता 'काल जो अपणी थी, आज वा पराई क्यों? अपणा गाम री बोली री, या जगहसाई क्यों?' और अपणी हिंदी कविता 'कल आई थी बूँदे' सुनाई.
  मोटा तौर पे का तो आज रा कार्यक्रम री सार्थकता अणि वस्ते सिद्ध वई गी क्योंकि आज अणि मंच से संगोष्ठी रा विषय मालवी बोली और जल है तो कल है विषय पे हउ विचार रखिया गया. ईका साथ ही आज इस मंच पे दो नई प्रतिभाएँ सामने आई. एक तृप्ति सिंह जी ने दूसरी डॉक्टर शोभना तिवारी. आप दोइ ए आज इ कार्यक्रम री शोभा बढ़ाई. इका साथ ही धन्यवाद संजय जोशी जी ने, जिनकी मेहनत और लगन से आज भी हल्ला-गुल्ला पे हसी का ठहाका ने साहित्यिक विचार गोष्ठिया जारी है.
                                - डॉ. गायत्री
दैनिक भास्कर समाचार-पत्र के रतलाम संस्करण में दिनांक 9 अप्रैल 2018 के अंक में प्रकाशित इस कार्यक्रम की न्यूज़.

Friday, July 14, 2017

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                आप कैसे है? आज से ठीक एक साल पहले आप मुझे छोड़कर बहुत दूर चले गए और अपने पीछे जिंदगी की अमर खुशियों की सौगात छोड़ गए. 09 जुलाई 2016 का वो दिन अच्छे से याद है मुझे, जब सुबह-सुबह रतलाम से इंदौर जाते समय मैंने आपको खर्राटे भरते हुए चैन की नींद सोते हुए देखा था. कितनी खुश थी मैं उस दिन. अगले दिन ही मैंने आपके लिए इंदौर से गरम कपड़े खरीदे थे ताकि ठंडी हवा के थपेडो में भी आपका बदन ना कपकपाए, लेकिन मुझे क्या पता था कि आपकी जिद मेरी उम्मीदों को एक झटके में तोड़ देगी और मुझे अपने खरीदे उन कपड़ों को एक ऐसे बूत को पहनना पड़ेगा, जो जमीन पर लेटा तो है पर हिलता-डुलता नहीं, जिसके चेहरे पर आज भी वही तेज और मुस्कुराहट है, लेकिन वो बोलता नहीं.आखिर मुझसे ऐसी क्या भूल हुई, जो आपने मुझसे हमेशा की चुप्पी कर ली? दादू , प्लीज़ वापस आ जाओ ना. 
     ऐ दादू, सुनो ना, आज आपके इकलौते बेटे नाना यानि कि मेरे पापा का बर्थडे है.मुझे पता है अपने बेटे को आशीर्वाद देने के लिए आज आप जरूर आओगे.आज आपका कोई बहाना नहीं चलेगा वर्ना पापा का गुस्सा तो आप जानते ही हो ना. देखो, आज मैंने आपकी पसंद की कड़क जलेबी और काले गुलाबजामुन लिए है. मैं जानती हूँ कि ये दोनों चीजें आपकी कमजोरी है और आप इनकी खुशबू से ही नींद से जाग जाते थे. चाहे आप कितने भी बीमार क्यों न हो, गुलाबजामुन का नाम सुनते ही आपका मुँह बड़ा सा खुल जाता था. चलो, उठो दादू. .... अब उठ भी जाओ. दादू.....,आज आप क्यों नहीं जाग रहे हो? उठो ना दादू, अब रूठना छोड़ दो ना. 
पता है दादू, आपके जाने के 5 महीने बाद आपके घर प्यारा सा पड़पोता आया है बिल्कुल आप जैसा. उसकी आदतें आपसे इतनी मिलती है कि मुझे लगता है कि आप ही रूप बदलकर अब इस नए किरदार में आ गए है. मानसिक संतुलन बिगड़ने के कारण आप बचपन की अवस्था में पहुंचकर जैसी शरारतें करते थे, वैसी ही शरारतें आपका पड़पोता भी करता है. एकदम सेम टू सेम. बहुत प्यारा है वो. बिल्कुल आपकी परछाई .काश उसे भी हमारी तरह आपके कपकपाते हाथों से आशीर्वाद, आपकी जेब से निकला वो 10 रूपए का नोट, जो आप आपके पैर छूने वाले को देते थे और इसी के साथ ही सदा खुश रहने की दुआ मिल पाती. लेकिन आपको भी जाने की इतनी जल्दी थी कि उसे देखे बगैर और मुझसे मिले बगैर ही आप चले गए. 
दादू, आप जरा भी चिंता मत करना, आपके आशीर्वाद से हम सब यहाँ ठीक है. आप भी वहां अपना ध्यान रखना और हां एक और बात मेरे सपनों में आना मत भूलना , नहीं तो मैं आपसे नाराज हो जाउंगी..

आपकी यादों में .....
आपकी पोती 
गायत्री


Friday, March 10, 2017

लो आ गयी शरारतों वाली होली

लो आ गयी शरारतों वाली होली 
पिचकारियों के छिटो संग 
दोस्तों संग मौज-मस्ती और हँसी-ठिठौली
लो आ गयी ...
किसी ने गालों पर मल दिया गुलाल 
मित्रता के चटक रंग से, मस्ती की भंग से 
तन-मन हुआ, हरा-पीला, गुलाबी-लाल 
निकली आज तंग गलियों में वही पुरानी टोली 
लो आ गयी ...
यादों के झरोखों से मस्ती के पलों को चुराया जाए 
हुड़दंगी दोस्तों की महफ़िल को फिर से सजाया जाए 
तराने दोस्ती के आज फिर गुनगुना लो यारों
मस्ती के इस समां को रंगीन बना लो यारों 
लो आ गयी ... 
भागों,पकड़ो की गूंज मची है चारों ओर
हर तरफ है आज हँसी-ठहाकों औऱ गुब्बारों की पचाक का शोर 
बच ना जाए आज कोई, लगा लो पूरा जोर 
होली की हुड़दंग में हर दिल कहे वन्स मोर, वन्स मोर 
लो आ गयी ...
                                           - गायत्री 
चित्र साभार - गूगल 

Monday, January 5, 2015

हर रंग है कविता के इस मंच पर ....

-          गायत्री शर्मा  

अक्सर आयोजन लोगों को मिलाते हैं लेकिन कई बार अच्छे लोगों के मिल जाने से ही बेहतर आयोजन हो जाया करते हैं। जब अच्छे लोग मिलते हैं तो जाहिर तौर पर बातें भी अच्छी ही होती है। हमारे इस मंच की खासियत ही अच्छे लोगों को मिलाना होती है। दिनांक 4 जनवरी 2015, रविवार को ‘हल्ला-गुल्ला साहित्यिक मंच’ के बैनर तले एक ऐसा ही अच्छा आयोजन हुआ। इस आयोजन का मुख्य आकर्षण थाइलैंड से हमारे बीच पधारी मालवी कोकिला ‘श्रीमती माया मालवेन्द्र बदेका’ जी थी, जिन्हें इस कार्यक्रम में ‘विशिष्ठ साहित्य सम्मान’ से सम्मानित कर हल्ला-गुल्ला साहित्य मंच ने स्वयं को गौरवान्वित महसूस किया। हमेशा की तरह मंच के संस्थापक सदस्य संजय जोशी संजग, जुझार सिंह भाटी व अलक्षेन्द्र व्यास की जुगलबंदी ने इस आम आयोजन को भी खास लोगों की उपस्थिति के कारण ‘खास’ बना दिया। चलिए, अब मैं आपको बता ही देती हूँ कि आखिर क्यों यह आयोजन ‘आम’ से ‘खास’ था?

सबसे पहले मैं यहाँ जिक्र करूँगी माया दीदी का। बड़ी ही सहज, सरल, हँसमुख व मिलनसार माया दीदी अमूमन कम बोलती है पर जब बोलती है, बात पते की बोलती है। अक्सर आपने यह सुना होगा कि दूरिया दिलों को पाटती है पर माया दीदी से मिलकर मेरा यह भ्रम टूट गया और दीदी की लेखनी पर चढ़ा ठेठ मालवी रंग देखकर लगा कि दूरिया दिलों को पाटती नहीं बल्कि और अधिक मजबूती से जोड़ती है। अपनी मालवी कविता में माया दीदी ने बड़ी ही मार्मिक बात कहते हुए दिवंगत दादा को मिली श्राद्ध की साग-पुड़ी पर उनके काल्पनिक आत्म संतोष व अन्य दिवंगत बुर्जुगों के उनके दादा के साथ हुए संवाद को बखूबी शाब्दिक अभिव्यक्ति दी। उनकी इस कविता का सार कहीं न कहीं ‘बुर्जुगों की सेवा में ही परिवार की खुशहाली का मेवा मिलता है’ में था। अपने परिवार, संस्कृति व मालवा माटी से गहरा जुड़ाव रखने वाली माया दीदी के बारे में यह कहा जाए कि आज इस कार्यक्रम में उनके भाव ही उनकी अभिव्यक्ति से बड़े हो गए थे और उनका स्नेह अधरों से खुशियों की मुस्कुराहट व शुभाशीष के रूप में हर किसी पर छलक रहा था, तो मेरा यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा। सोशल नेटवर्किंग पर बड़ी दूर से मालवी में बतियाने वाली इस प्यारी सी माँ स्वरूपा दीदी से मिलकर आज मन को बड़ा सुकून मिला और एक पल के लिए तो यूँ लगा कि जैसे दीदी की बात मानकर उनके अपनत्व भरे अनुरोध पर मैं भी उनके देश थाइलैंड हो आऊँ।         

यहाँ एक बात मैं आपसे शेयर करना चाहूँगी कि इस साहित्यिक मंच के हर कार्यक्रम में मुझे कोई नवोदित कवि देखने को मिलता है। इस बार मेरे लिए वह नवोदित कवि थी – उज्जैन की मालवी कवि ‘संगीता नाग सुमन’, जिन्हें इस मंच ने 'युवा रचनाकार' सम्मान से सम्मानित किया। संगीता जी के चेहरे की मधुर मुस्कान और मालवी कविता पढ़ने का अंदाज़ वाकई में लाजवाब था। शहरी जीवन जीने वाली इस कवियित्री की आत्मा में अब भी मालवांचल का ठेठ देहाती जीवन बसता था। मालवी गीतों व मार्मिक मालवी संवादों के माध्यम से कम शब्दों में भी संगीता जी बड़ी गहरी बात कह जाती थी। अपनी प्यारी दिवंगत गाय ‘सामा’ से मार्मिक संवाद करते हुए वह कुवता के माध्यम से स्वयं से ही गौरक्षा का वादा लेती है। कभी वह अपनी कविता में मालवा की पमणाई की बात करती है तो कभी मशहूर मालवी भोज दाल-बाटी की। संगीता जी की कविता सुनकर आज मैं यह बात दावे से कह सकती हूँ कि संगीता जी को आप जल्द ही बड़े मंचों से काव्य पाठ करते हुए सुनेंगे।   

संजय जोशी जी के जिक्र के बगैर शायद मेरी इस आयोजन की चर्चा अधूरी ही रहेगी। संजय जी के स्वभाव के बारे में मैं जहाँ तक जानती हूँ। मेरा अनुभव यह कहता है कि कुछ लोग दर्द बाँटते हैं और खुशियाँ उधार लेते हैं। लेकिन मेरा यह मित्र लोगों को मुस्कुराहट देकर खुशियाँ बाँटता है और दर्द को अपने भीतर निगल लेता है। तनाव के बीच भी सदा मुस्कुराते हुए बड़े ही सहज संजय जी इस मंच की वह कड़ी है, जिनकी मिलनसारिता व मित्रता अधिक से अधिक लोगों को इस साहित्यिक मंच से जोड़े रखती है। संजय जी के व्यंग्य के चर्चे तो हर अखबार में है परंतु मंच पर चुप्पी साधने वाले इस संजय का आज एक नया रूप हमें देखने को मिला। हाँलाकि मुझे पूर्ण विश्वास है कि उनके इस नए रूप को सामने लाने में भी जरूर उस महिला का हाथ होगा, जिनकी मेहनत की बदौलत हमारे संजय भाई अखबारों में स्थान पाते हैं। संजय जी व भाभीजी दोनों के साझा प्रयासों से ही संजय जी की लेखनी की चमक तेज और धारदार बनती है। भाभीजी के प्रोत्साहन के कारण ही शायद आज संजय जी ने मंच पर अपनी उपस्थिति को छोटे-छोटे हसगुल्लों की सहायता से प्रभावी किया।

अब बात करते हैं हमारे इस मंच के कुमार विश्वास की। जी हाँ, आपने बिल्कुल सही पहचाना। हमारे यह कुमार विश्वास है – अलक्षेन्द्र व्यास। युवा जोश और ऊर्जा से लबरेज अलक्षेन्द्र जी जब-जब मंच पर आते हैं तब गंभीर से गंभीर आयोजनों का माहौल भी खुशनुमा व प्रेम के रंगों से रंगीन बन जाता है। कुशल मंच संचालक अलक्षेन्द्र जी ने अपनी वीर व श्रृंगार रस से भरपूर कविताओं को सुनाकर इस आयोजन में भी दर्शकों से खूब दाद बटोरी। उनके हर शब्द में प्रेम है और हर पंक्ति में प्रेम की धुन। तभी तो जब वह कविताएँ सुनाते हैं तो हम आँख मूँद प्रेम के सागर में डूबकियाँ लगाने लगते हैं। व्यास जी का कविता सुनाने का अंदाज ही उनकी खूबी है, जो भीड़ में उनकी एक अलग पहचान बनाती है।
कहते हैं सस्पेंस खत्म होने के बाद ही फिल्म का हीरों सामने आता है। मालवा में काव्य जगत के सशक्त हस्ताक्षर जुझार सिंह भाटी जी वो हीरों है, जो किसी भी आयोजन में चाहे सूत्रधार की भूमिका में हो या कवि की भूमिका में। उनका साइड रोल भी उन्हें लीड रोल का हीरो बना देता है। इस मंच से जुड़े वरिष्ठ व गंभीर कवि कहाने वाले भाटी जी जब मंच पर कविता सुनाना शुरू करते हैं, तब वह हर किसी को अपने रंग में रंग लेते हैं। उस वक्त मंच उनका होता है और माहौल भी वह अपने मनमाफिक बना देते हैं। काव्य मंचों का उनका अनुभव व शब्दों के प्रति गहरी पकड़ उनकी कविताओं में स्पष्ट तौर पर झलकती है। भाटी जी की अमिताभ पर लिखी गई मालवी कविता के साथ ही कन्या भ्रूण हत्या पर लिखी कविता भी बेहतरीन थी, जिसका वाचन उन्होंने इस आयोजन में किया था। अपनी जीवनसंगिनी के साथ आयोजन में पधारकर भाटी ने कहीं न ‍कहीं यह जता ही दिया कि उनकी जीवन नैय्या का खैवय्या हमारी भाभी ही है, जिनकी प्यार भरी उलाहना व प्रोत्साहन उन्हें काव्य लेखन को प्रोत्साहित करता है।

चलते-चलते मैं यहाँ बात करूँगी उन खास लोगों की, जिनके बगैर इस आयोजन की चर्चा अधूरी रहेगी। उन खास लोगों में सबसे पहले नाम आता है संजय जोशी जी के अनन्य मित्र व ‘मालवी मिठास’ समूह में ठेठ मालवी बोली की मिठास घोलने वाले मुकेश ठन्ना जी। मुकेश भैय्या साहित्य से प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं जुड़े हैं पर उनकी सा‍हित्यिक रचनाएँ उन्हें दिग्गज कवियों के समकक्ष लाकर खड़ा कर देती है। श्रृंगार में भंगार वाली मुकेश जी की कविता ने इस कार्यक्रम में खूब दादा बटोरी। मुकेश जी के बाद अब जिस कवि का मैं जिक्र करूँगी, उनकी मैं स्वयं ही बड़ी प्रशंसक हूँ। पेशे से पत्रकार व कल्पनाओं से कवि, संजय परसाई जी की कविता में ठेठ मालवी परिवेश के साथ ही सधी हुई लेखनी व गहरे अनुभव की छाप देखने को मिलती है। अपनी बेटी प्रतीक्षा पर लिखी कविता के साथ ही जब संजय जी ने अपनी मालवी कविता ‘चालो, चालो, चालो, सगला तिरबेनी का मेला में ...’ सुनाई। तब अचानक महफिल में मस्ती का रंग चढ़ गया और हर कोई इनके साथ इस कविता के बोल गुनगुनाने लगा। संजय जी की कविता सुनकर यूँ लगा कि हमारे बीच गुमसुम से बैठे रहने वाले इस कवि में जो बात है, वह बात किसी ओर में नहीं।

मैनेजमेंट फंडे के माध्यम से जीवन की गहरी बातों को भी बड़ी आसानी से कहने वाले इप्का लैबोरेटरीज में कार्यरत डी.पी. आंजना जी किसी परिचय के मोहताज नहीं है। महाभारत, हिंदुओं के विविध संस्कार आदि पर आधारित उनके ट्रेनिंग प्रोग्राम इस तरह से डिजाइन कर बनाए गए है कि वह प्रोग्राम लोगों की जीवनशैली व विचारधारा में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने की ताकत रखते हैं। इस मंच से आंजना जी ने अपने अनुभव तो शेयर किए ही सही, साथ ही अपने साथी युवाओं को सफलता के गुर भी सिखाए। इप्का लैबोरेटरीज में कार्यरत अंकुर गुप्ता जी व मनीष वैष्णव जी की उपस्थिति भी इस आयोजन में महत्वपूर्ण थी। यहाँ मौजूद हर पुरूष की उपस्थिति उनकी जीवनसंगिनी के साथ के कारण ‘खास’ बन गई थी। पर मुझे एक बात खटक रही थी कि घर में मैनेजमेंट संभालने वाली ये बातूनी महिलाएँ इन आयोजनों में खामोश क्यों रहती है? यदि उनकी सहभागिता भी इन आयोजनों में रहे तो मज़ा दोगुना हो जाएं। आशा है हल्ला-गुल्ला के आगामी आयोजनों में मेरी प्यारी भाभियाँ इस कमी को जरूर दूर करेंगी और आशा है इसकी शुरूआत व्यास जी के घर से होगी।  


हल्ला-गुल्ला साहित्यिक मंच से जुड़ी होने के कारण यह मेरा सौभाग्य था कि मुझे भी इन विदुषीजनों के साथ कुछ वक्त बिताने का व इनके अनुभवों व मार्गदर्शन से ज्ञानार्जन के साथ ही अपनी लेखनी को एक नई दिशा देने के गुर मिले। मैंने भी अपनी दो कविताओं ‘उड़ने दो मुझे ...’ व ‘पेशावर में पाक रोया ...’ का वाचन इस मंच से किया। इस सफल आयोजन में सांझ के ढ़लने के साथ ही माहौल में मस्ती का रंग और भी तेजी से चढ़ने लगा। पता ही नहीं चला कि वक्त कैसे सरपट गुजर रहा है। 

कार्यक्रम के अंत में डीआरएम ऑफिस में कार्यर‍त इस मंच से जुड़े हमारे साथी अनिल जैन ने आभार प्रदर्शन कर कार्यक्रम के औपचारिक समापन की घोषणा की। लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि मालवा में पमणाई में टेम नी देख्यो जाए। अठे तो छोरी ने विदा करे, तो भी गाड़ी रा पछाड़ी-पछाड़ी लोग आधा किलोमीटर तक रोता-रोता पगे चाली जाए। पण यूँ कोनी के, कि अबे हमी हमारा घरे जावा ने थे थाणा घरे जाओ। अणी कारिक्रम में भी लोग तीन मंजिल तक उतरता-उतरता भी एक-दूजा से मलता गिया ने रही सही कसर पूरी करवा वस्ते वाटे खड़ा वई ने फेर मुंडे-मुंडे वाता-चिता करवा लाग्या। कई करा, यो अपणो मालवो है ज असो कि कदी कणी ने दूर जावा रो नी के। हरेक कणी ने यूँ के कि थे अबार मति जाओ। अठे ज रूकी जाओ ...। चलिए जी, आयोजन की इन्हीं मीठी यादों के साथ अब मैं अपनी लेखनी को यही विराम देती हूँ व साथ ही लेखन में हुई किसी भी त्रुटि के लिए अपने साथियों से क्षमा माँगती हूँ। चलते-चलते आप सभी को इस ‘चरकली’ का प्यारभरा  नमस्कार। 

Thursday, December 18, 2014

रक्तरंजित हुआ शिक्षा का मंदिर

खिलौना बन गए खिलौनों से खेलने वाले

-          - गायत्री शर्मा
यह ‘तालिबानी आतंक’ की पाठशाला ही है, जिसमें निर्ममतापूर्ण तरीके से जिहाद के चाकू से इंसानों की खालें उधेड़ी जाती है, मानवीय संवेदनाओं को कट्टरता की आग में पकाया जाता है, इंसानों को इंसानों का खून पिलाया जाता है और इस तरह कई अग्निपरिक्षाओं के बाद तैयार होता है इंसान के भेष में आतंक का वह ‘खुँखार जानवर’, जो दुनियाभर में विंध्वस का कारक बनता है। खूँखार आतंकियों द्वारा जानवरों की तरह स्कूली बच्चों के सिर काटने व उन्हें गोलियों से भूनने की पेशावर के आर्मी स्कूल की नृशंस घटना इंसानियत के चिथड़े उड़ाती हैवानियत का वह अति क्रूरतम रूप है, जिसकी जितनी आलोचना की जाएं वह कम है। यह घटना कट्टर आतंक के अट्टाहस के रूप में दुनिया के सभी देशों के लिए एक चेतावनी भी लेकर आई है कि यदि आप आंतक के खिलाफ आज न जागे तो हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिए जाओगे।

आतंक की यह कैसी भाषा है, जिसमें जिंदगी बचाने वाले को ‘हैवान’ और जिंदगी छीनने वाले को ‘खुदा’ माना जाता है? बच्चों को स्कूल भेजने की वकालत करने वाली पाकिस्तान की मलाला के अपने ही देश के स्कूलों में आतंक का यह तांडव क्या मलाला के हौंसलों की अग्नि परीक्षा ले रहा है या पाकिस्तान की आस्तीन के ही साँप तालिबानी कोबरा का क्रूरतम रूप दिखा रहा है? इसके पीछे कारण कुछ भी हो लेकिन आतंक का यह खौफनाक खेल अब बर्दाश्त की सारी हदे लाँघ गया है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बारूद हमेशा विनाश करती है। यदि आप दूसरों पर हमला करने के लिए अपने घर में बारूद जमा कर रहे हैं तो कहीं ऐसा न हो कि वह बारूद आप ही के विनाश का कारण बन जाए। पेशावर की घटना का ईशारा भी इसी ओर ही है। पाकिस्तान के पेशावर के आर्मी स्कूल में तालिबानी आतंकियों के तांडव का अति भयावह दृश्य, जिसकी कल्पना मात्र ही हमारे रौंगटे खड़े कर देती है, सोचिएं वह मंजर असल में कितना खौफनाक होगा। खिलौनों से खेलने वाले बच्चे भी आतंक के इस कहर के सामने खिलौना बन गए, जिन्हें कतार में खड़े कर आतंकियों ने उनके साथ निशानेबाजी का खेल खेला। पलक झपकते ही सैकड़ों बच्चों समेत 141 लोगों को प्राण लेने वाली यह घटना पाकिस्तान को दुश्मनों से महफूज़ रखने वाले सेना के जवानों के मुँह पर मारा गया वह करारा तमाचा है, जो उन्हें अपने आकाओं की जी-हुजूरी के बदले रसीद किया गया है। 


ताबूतों में सजी लाशों की कतारों से भरे पेशावर के आर्मी स्कूल के भीतर झाँकने पर कठोर से कठोर इंसान का भी कलेजा मुँह तक आ जाएगा पर उन आतंकियों का क्या, जिनके कान सिले हैं, आँखे बंद है और दिमाग दूसरों के काबू में है। शिक्षा का मंदिर कहाने वाले इस स्कूल का रक्तरंजित फर्श आज आतंकियों के खूनी खेल की गवाही दे रहा है। यहाँ पग-पग पर लाशें बिछी है और खून के फव्वारें फूट रहे हैं। कल तक बच्चों की शरारतों और किलकारियों से गूँजनें वाला स्कूल अब रूदन की करूण चीखों से गूँजायमान हो रहा है। माँ-बाप की एक पुकार पर दौड़कर आने वाले बच्चे आज माँ-बाप की चीखें सुनकर भी खामोश है। स्कूल से निकलते से बच्चों के बैग उठाने वाले पालक आज स्कूल से उनकी लाशें लिए निकल रहे हैं। आज समूची दुनिया देख रही है उस पाकिस्तान में पसरे सन्नाटें को, जो अब तक आंतक के खिलाफ जंग छेड़ने से खिलाफत करता रहा है। 

आतंकी विनाश का वह मंजर जिसे कल आपने सिडनी में, परसों अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेंड सेंटर पर, ईरान के सिनेमा हॉल में और 1999 में मुबंई में बड़े करीब से देखा और महसूस किया था। आज पेशावर में आतंक के उसी खौफनाक मंजर के क्रूरतम रूप ने हमें रूह को थराथराने वाला कंपन महसूस करा दिया है। आंतकी कहर से आज ताबूतों की जो कतारें पाकिस्तान में लगी है वह किसी भी मुल्क में लग सकती है। हम सभी की संवेदनाएं आज उन पाकिस्तानियों के साथ है, जिनके घर की रौनक आज मातम के सन्नाटे में गुम हो गई है। लेकिन संवेदनाओं के साथ ही आज जरूरत है आतंक के खिलाफ सख्त कदम उठाने की, जिसके लिए भी मुश्किल की इस घड़ी में हम पाकिस्तान के साथ खड़े है। आतंकी हमलों की घटना कभी भी और कही भी घट सकती है। इससे पहले कि हमारे मुल्क में भी कुछ ऐसा हो। सम्हल जाइएं और खिलाफत कीजिए धार्मिक कट्टरता की उन दुकानों की, जहाँ धर्म और मज़हब के नाम पर भाई-भाई को लड़ाया जाता है। अब वक्त आ गया है धर्म और मजहब की कट्टरता को सदा के लिए भुलाकर मानवता का धर्म अपनाने का। अपनी एकता और ताकत से आतंक को मुंहतोड़ जवाब देने का। तो चलिए आप और हम भी अपने मन, वचन और कर्म से आतंक के खातमे के लिए कृत संकल्पित होकर आवाज उठाएं।

प्रतिष्ठित अखबारों व पोर्टलों में इस लेख का प्रकाशन -

देश के 3 राज्यों के 9 स्थानों (भोपाल, सागर, इंदौर, उज्जैन, जबलपुर, ग्वालियर, रतलाम, रायपुर तथा मुंबई) से एक साथ प्रकाशित ‘दैनिक दबंग दुनिया’ के 18 दिसंबर 2014, गुरूवार के अंक में ‘एक्सक्लूसिव खबर’ कॉलम में प्रकाशित मेरा लेख – ‘रक्तरंजित हुआ शिक्षा का मंदिर, खिलौना बन गए खिलौनों से खेलने वाले’

मथुरा, लखनऊ, आगरा, औरैया और फिरोजाबाद से एक साथ प्रकाशित उत्तर प्रदेश के प्रमुख दैनिक ‘कल्पतरू एक्सप्रेस’ के 18 दिसंबर 2014, गुरूवार के अंक में संपादकीय पृष्ठ के ‘नजरिया’ कॉलम में ‘रक्तरंजित हुआ शिक्षा का मंदिर’ शीर्षक से प्रकाशित मेरा लेख। कृपया इस लेख पर मुझे अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत कराएं।

गुड़गांव से प्रकाशित प्रमुख दैनिक ‘गुड़गांव टुडे’ के 18 दिसंबर 2014, गुरूवार के संपादकीय पृष्ठ पर पेशावर के आर्मी स्कूल में हुए आतंकी हमले पर केंद्रित मेरे लेख को ‘रक्तरंजित हुआ शिक्षा का मंदिर’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया।   

Wednesday, December 17, 2014

पेशावर में पाक रोया ....

-          गायत्री शर्मा

हर आँख नम है,
हर सीना छलनी है
मासूमों पर कहर बन बरपी
यह कैसी दहशतगर्दी है?

जिहाद की आग आज
मासूमों को जला गई
बुढ़ापें की लाठी अचानक
बूढ़े अब्बू के कंधों पर ताबूत चढ़ा गई

रक्तरंजित हुई मानवता
हैवानियत दहशत बरपा गई
नन्हों की किलकारियाँ आज
मातम का सन्नाटा फैला गई

कोसती है माँ, क्यों भेजा उसे स्कूल?
भेज दिया तो ये आफत आ गई
जिसके लिए की थी दुआएं पीर-फकीरों से
आज मौत उन दुआओं को पीछे छोड़ आगे आ गई  

माँ-बेटे का संवाद

अम्मी-अब्बू बुलाते हैं बेटा तुम्हें
चल उठ, हम तेरी जिद पूरी कराते हैं
जिस खिलौने के लिए रोता था तू रोज़
तुझे आज अब्बू वो खिलौना दिलाते हैं

पर ये क्या, मेरा नन्हा तो खुद ही
खूबसूरत खिलौना बन गया है?
सुनो, खामोश है क्यों लब इसके,  
क्या ये फटी आँखों से कुछ बोल रहा है?   

आज न जाने क्यों भारी है छाती मेरी
ममता के दूध अचानक आँचल भिगो रहा है
आ बेटा, कुछ देर गोद में आकर सो जा
मीठी थपकियों वाला पालना तेरी बाट जोह रहा है  

बच्चे की लाशें देखने पर

दहशतगर्दों ने ये क्या कर डाला?
मेरे नन्हें को जिहादी मुस्लिम बना डाला?  
जो नहीं जानता था फिरकापरस्ती
उसे जिहादी जंग के रक्त से क्यों रंग डाला?

इस खौफनाक मंजर को देख
सहम गई होगी कुछ अम्मियाँ भी
जिनकी औलादें ये कहर बरपा रही थी
वो अम्मियाँ आज औलाद के होने पर आंसू बहा रही थी

बहुत हो चुका दहशतगर्दी का खेल
और इंसानी खून की होलियां
जहाँ हर आंख नम है वहाँ
कोई न बोलेगा अब जिहाद की बोलियां

बस करो अब जिहाद की इस जंग से
पकड़ लो तुम भी शांति की राह
गर अब न सुधर पाएं आतंकियों तुम तो

कर देंगे खत्म हम तुम्हारे नामो- निशा। 

चित्रों हेतु साभार - गूगल 

Wednesday, December 10, 2014

जागिएं और आवाज़ उठाइएं

-          गायत्री शर्मा 

जहाँ मौजूदा माहौल से छटपटाहट होती है वहीं परिवर्तन के कयास लगाए जाते हैं। मौन धारण करने से या हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से हमें कुछ हासिल नहीं होने वाला। जब तक हमें अपने अधिकारों की जानकारी, कर्तव्यों का भान और न्याय पाने की छटपटाहट नहीं होगी। तब तक इस देश की तस्वीर नहीं बदलेगी। आज ‘मानव अधिकार दिवस’ है। कानून द्वारा प्रदत्त मानव अधिकारों के प्रति जागरूक होने का दिन। आइएं आप और हम आज मिलकर शुरूआत करते हैं अपने अधिकारों को जानने की और ज़मीनी हकीकत में घटित हो रही मानव अधिकारों के हनन की कुछ घटनाओं से सबक लेने की।   

आज हम अपने सफर की शुरूआत करते हैं सरकारी योजनाओं, धार्मिक चैनलों में चमकने वाले बाबाओं और कुछ भ्रष्ट बाबूओं से। यह मेरे देश की तस्वीर ही है जहाँ नक्सलवाद नौनिहालों के हाथों में किताबों की जगह बंदूके थमा रहा है, जहाँ नवजात शिशु कटीली झाडि़यों में मौत के तांडव का रूदन गीत गा रहा है, जहाँ सरकारी शिविरों में नसंबदी ऑपरेशन महिलाओं की जिंदगी की नस काट रहा है और मोतियाबिंद का ऑपरेशन आँखों की रोशनी उम्मीदें छीन रहा है, जहाँ बाबाओं के आश्रम में सरेआम महिलाओं व बच्चों के साथ शोषण, बलात्कार व हत्या के अपराध हो रहे हैं। ऐसे देश में हर कदम पर मानव अधिकारों का मखौल उड़ रहा है। अरे आप रूक क्यों गए। मेरे देश की इस सच्ची कहानी में आम आदमी के अधिकारों की धज्जियां उड़ने का यह दृश्य आगे चलकर तब और भी घिनौना हो जाता है जब मध्याह्न भोजन में दाल में छिपकली और चावल में कीड़े बच्चों के मुख का ग्रास बनते हैं, जहाँ बच्चों को दलित रसोइएं की बनाई रोटी खाने से अभिभावक मना करते है, जहाँ सरकारी नौकरियों हेतु योग्यताएं भ्रष्ट बाबू लिफाफे में वज़न देखकर सिद्ध करते हैं और जहाँ सर्व शिक्षा अभियान केवल कागज़ों पर सजते हैं, ऐसे देश में आज भी मुझे मानव अधिकार मुंगेरीलाल के हसीन सपने की तरह दिखता है।

डूबते के लिए एक बुलबुला भी जिंदगी की उम्मीद को जिंदा रखता है लेकिन हम तो पूरी तरह से अज्ञान के तालाब में डूबे हुए है। तभी तो न हमें अपने अधिकारों का भान है और न कर्तव्यों का। यदि इस देश का हर आदमी अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो जाएँ तो कभी किसी के अधिकारों का हनन नहीं होगा। याद रखिएं आवाज़ उठाना आपका काम है, जब आप ही स्वयं के साथ हो रहे भेदभाव, अत्याचार, शोषण या दुर्वव्यवहार के खिलाफ आवाज़ नहीं उठा सकते तो आपकी इस कुंभकर्णी निद्रा को मानव अधिकार आयोग की जागरूकता का ढ़ोल भी भंग नहीं कर सकता है। आज बहाना है मानव अधिकार दिवस का, आज ही से आप भी एक नई शुरूआत कीजिएं इस कानून के बारे में जानने, पढ़ने व आवाज़ उठाने की। यदि आप साहस करके एक कदम आगे बढ़ेगे तो दूसरे कदम पर कानून भी आपका साथ देगा। इससे पहले कि और देर हो जाएँ, आप भी गौर कीजिए अपने मानव अधिकारों पर और स्वयं जागरूक होने के साथ ही लोगों में इस संबंध में जागरूकता फैलाइएं। उसके बाद देखिएं इस देश की तस्वीर कैसे बदलती है।
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Sunday, October 12, 2014

‘मलाला’ है तो मुमकिन है ...

-          गायत्री शर्मा
नन्हीं आँखों से झाँकते बड़े-बड़े सपनें। ये सपनें है हिजाब में कैद रहने वाली पाकिस्तानी लड़कियों की शिक्षा के। ये सपनें हैं उन नन्हीं परियों की कट्टर कबिलाई कानून से आज़ादी के, जिनके सपनों में भी कभी आज़ादी की दुनिया नसीब न थी। तालिबानी आतंकियों के खौफ के बीच स्वात की मलाला ही वह मसीहा थी, जिसने डर के आगे जीत की नई परिभाषा गढ़ी। महात्मा गाँधी की तरह मलाला ने ‍भी हिंसा का जबाब अहिंसा से देकर दुनिया को यह दिखा दिया कि जब उम्मीदें हार मान जाती है। तब भी हौंसले जिंदा रहते हैं। यह मलाला के बुलंद हौंसले ही थे, जिसके चलते पाकिस्तानी लड़कियाँ अब लड़कों की तरह शिक्षा हासिल कर रही है। आज हम सभी के लिए यह सम्मान की बात है कि अशांति में शांति का संदेश फैलाने वाली मलाला को शांति के सर्वोच्च पुरस्कार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना गया है।
         
      कहते हैं नदी जब उफान पर होती हैं तब वह विशालकाय चट्टानों को भी फोड़ अपना रास्ता बना लेती है। जब मलाला के स्वर भी तीव्र वेग से बुलंद ईरादों के साथ प्रस्फुटित हुए, तब कट्टर तालिबानी फरमानों की धज्जियाँ उड़ गई और समूची दुनिया साक्षी बनी नन्हीं लड़की की आज़ादी की जिजिविषा की। अपने बुलंद हौंसलों की ऊँची उड़ान से मलाला ने नामुमकिन को मुमकिन बनाते हुए आतंक के साये में डरी-सहमी रहने वाली पाकिस्तानी लड़कियों के लिए शिक्षा के रूप में आज़ादी का मार्ग भी प्रशस्त किया। दुनिया के लिए मलाला मैजिकल इसलिए है क्योंकि मलाला ने उस देश में आज़ादी की एक नई इबारत लिखी, जिस देश में लड़कियों की आज़ादी कट्टर कानूनों के कायदों में जकड़ी होती है व उनका सुंदरता तथा माँसलता हिज़ाबों के पर्दों में ढँकी होती है। यहाँ औरतें बच्चे पैदा करने का एक जरिया होती है, जिनका जीवन पुरूषों की गुलामी व सपनें कायदे-कानूनों का अनुसरण करने में ही दम तोड़ देते हैं। मलाला जिस स्वात घाटी से आती है, वहाँ की तस्वीर तो उस वक्त बहुत ही भयावह थी, जब वर्ष 2009 में वहाँ तालिबानी आतंकियों का खौफ रहता था। मलाला ने उन दिनों आतंक के साये में लड़कियों की दम तोड़ती जिंदगीयों के दर्द को अपनी डायरी में हूबहूँ बँया किया।      
        

डायरी लेखन के साथ ही सोशल नेटवर्किंग साइट्स और सार्वजनिक मंचों से भी मलाला ने तालिबानी आतंकियों की कट्टरता, कबिलाई कायदें-कानून व खौफ का खुलासा किया। यह मलाला की आतंकियों से खिलाफत का ही नतीज़ा था कि लड़कियों की शिक्षा की वकालत करने वाली मलाला को 9 अक्टूबर 2012 को तालिबानी आतंकियों ने गोलियों का शिकार बनाया। उस वक्त हमले में गंभीर रूप से घायल मलाला की जिंदगी बचने की सारी उम्मीदें जब हार मान चुकी थी तब भी मलाला के बुलंद हौंसलों ने कौमा के रूप में नाउम्मीदी के कयासो के बीच भी उसे जिंदा रखा। आतंकियों के इस हमले ने मलाला के हौंसले को तोड़ने के बजाय उसे अपनी लड़ाई को दोगुनी तेजी से लड़ने की ऊर्जा दी। यह वहीं दिन था जिसके बाद न तो मलाला ने कभी पीछे मुड़कर देखा और न ही आतंकियों ने कभी मलाला को पीछे मुड़कर देखा।        
                 
पने शब्दों के मैजिक से पाकिस्तान में लड़कियों की आज़ादी के स्वप्न को हकीकत बनाने वाली मैजिकल मलाला के सराहनीय कार्यों की बदौलत ही उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार, पाकिस्तान का राष्ट्रीय युवा शांति पुरस्कार, वर्ष 2013 में संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार सम्मान, मैक्सिको का समानता पुरस्कार, साख़ारफ़ पुरस्कार आदि पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। मलाला की पाकिस्तानी लड़कियों की आज़ादी व शिक्षा के लिए चलाई जाने वाली मुहिम आज भी जारी है। यह मलाला मैजिक ही है, जिसके बूते आज पाकिस्तानी लड़कियाँ न केवल बुनियादी शिक्षा हासिल कर रही है बल्कि अपनी जि़दगी अपने तरीके से जीने के लिए भी स्वयं को आज़ाद महसूस कर रही है। नोबेल पुरस्कार के लिए चयनित मलाला के इस जोश व जुनून को मेरा सलाम है, जिसने लड़कियों की आज़ादी पर सख्ती के अवरोध खड़े करने वाले पाकिस्तान को भी आज यह कहने पर मजबूर कर दिया कि मलाला हमारे देश की शान है।
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 सूचना : कृपया इस ब्लॉग से किसी भी सामग्री का प्रयोग करते समय सूचनार्थ मेल प्रेषित करना व साभार देना न भूलें। 

Thursday, October 9, 2014

रहे सलामत मेरा सजना ...

- गायत्री शर्मा

प्रकृति ने विवाहिता के भावों को कुछ ऐसा बनाया है कि उसके हृदय के हर स्पंदन के साथ ‘अमर सुहाग’ की दुआएँ सुनाई पड़ती है। अपने लिए वह किसी से कुछ नहीं माँगती पर ‘उनके’ लिए वह सबसे सबकुछ माँग लेती है। धरती के पेड़-पौधे, देवी-देवताओं के साथ ही ‘करवाचौथ’ के दिन तो हजारों मील दूर आसमान में बैठे चाँद से भी वह अपने दांपत्य के चाँद के दीर्घायु होने की दुआएँ माँग लेती है। करवाचौथ वह शुभ दिन है, जब चाँद से दुआएँ माँगती तो पत्नी है पर उन दुआओं का फल मिलता पति को है। सुहाग की चीजों से सजती तो ‘सजनी’ है पर दमकता उसके ‘साजन’ का मुखड़ा है। 
      जिस स्त्री को पुरातन काल से हमारे समाज में नवरात्रि में ‘बेटी’ के रूप में, विवाह के समय ‘कन्या रत्न’ के रूप में, शुभ कार्यों में ‘शुभंकर’ के रूप में और तीज-त्योहारों पर ‘सुहागन’ के रूप में पूजा जाता रहा है। वहीं ‘देवी’ रूपी स्त्री अपने सुहाग के सुखमय जीवन को ‘सदा सुहागन रहने के’ शुभाशीष से भरने के लिए देवी-देवताओं को पूजने लगती है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि प्रेम व रिश्तों को निभाने के मामले में महिलाएँ पुरूषों से कहीं अधिक विश्वसनीय और ईमानदार होती है। यहीं वजह है कि गृहस्थी के रूप में परिवार की बागडोर संभालने से लेकर अपने जीवनसाथी की सुरक्षा को पुख्ता करने का जिम्मा भी व्रत-त्योंहारों के रूप में समाज ने स्त्री को ही दिया है।
       
हमारी सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका उसी ‘शक्ति’ की तरह है, जो सदा अपने प्रियजनों व परिवार की रक्षा के लिए तत्पर रहती है। हाँ, यह बात अलग है कि महिलाओं का पुरूषों की रक्षा करने का अंदाज कुछ अलहदा होता है। कहने को सप्तपदी के सात वचन वर-वधू दोनों एक साथ लेते हैं पर इन वचनों को निभाने की शिद्दत स्त्रियों में पुरूषों से अधिक होती है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्त्री जब कुछ करने की ठान लेती है तो उसकी जिद को नकारना ईश्वर के भी बूते की बात नहीं होती है। जप, तप, संयम, श्रृद्धा और विश्वास के तेज से सुशोभित स्त्री जब ‘करवाचौथ’ के दिन चाँद से अखण्ड सौभाग्य की कामना करती है तो आसमान का चाँद भी स्त्री के तप के आगे नतमस्तक हो ‘तथास्तु’ कहकर उसकी हर मुराद को पूरी कर देता है।
       विवाह के पश्चात पत्नी के रूप में जब कोई स्त्री पुरूष के जीवन में प्रवेश करती है। तो लक्ष्मी स्वरूपा उस स्त्री के कदम पड़ते ही खुशियाँ भी अर्धांगिनी की अनुगामिनी बन पुरूष के जीवन में प्रवेश करने लगती है। यह वहीं भारतीय स्त्री है, जो विवाहिता के रूप में सुहाग की चीजों से न केवल स्वयं को सजाती है बल्कि पति के प्रति सर्मपण के भावों से अपनी गृहस्थी को भी श्रृंगारित करती है। भारतीय सुहागन के ललाट की ‘बिंदियाँ’ उसके स्वाभिमान का, माँग का ‘सिंदूर’ पति की मौजूदगी का, पैरों की ‘बिछियाँ’ रिश्तों के प्रेमिल बँधन में खुशी-खुशी बँधने का व ‘मंगलसूत्र’ विवाहिता बनने के गौरव का प्रतीक होता है। सुहाग के इन प्रतीकों से स्वयं को सजाना विवाहिता की विवशता या शौक नहीं बल्कि उससे कही अधिक उसके लिए सम्मान का प्रतीक होता है। करवाचौथ के दिन शादी का जोड़ा पहनकर फिर से सजनी अपने सजना के लिए दुल्हन सी सजती है। आज शादी के जोड़े में सजे विवाहित जोड़े के साथ ही यादें ताजा हो जाती है, जीवन के उस यादगार दिन की, जब गठबंधन की गाँठों ने दो शरीर के साथ ही दो आत्माओं को भी एक कर दिया था।
     
करवाचौथ के बहाने ही सही ‍पति-पत्नी के प्रेमिल यादों की पोटली फिर से खुल जाती है और उस पोटली से निकलती है कुछ शरारतें, प्यार भरी तकरार और ढ़ेर सारा प्यार। प्रेम के प्रतीक उस चाँद को साक्षी मान दंपत्ति आज फिर से एक नई ऊर्जा के साथ अपने दापंत्य जीवन की शुरूआत करते हैं। आज करवे के जल में चीनी की मिठास घोल पत्नी अपने दांपत्य जीवन में प्रेम की मिठास की कामना करती है और चाँद के बाद अपने पति को निहारते हुए वह जीवन में सुख-दुख की छलनी में से सुखों को पति की ओर छनकर जाने का तथा दुखों को अपने हिस्से में बचा लेने का संकेत देती है। अन्य व्रतों की तरह यह व्रत भी सुहागन स्त्रियाँ ‘सर्वमंगल’ की कामना के साथ करती है। तभी तो एक-दूसरे की माँग भरने व बड़ों से आशीष लेने के बहाने वह अपने साथ ही अपनी साथी सुहागनों के भी अमर सुहाग की दुआ करती है।
     पति चाहे कैसा भी हो पर पत्नी उसके लिए दुआएँ माँगना नहीं छोड़ती। जब पत्नी पति के लिए खुशी-खुशी सर्वस्व समर्पित करती है तो क्या यह पति की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह भी अपनी पत्नी के लिए भी कुछ ऐसा करें, जो उसके लिए इस करवाचौथ के व्रत को यादगार बना दें? कितना अच्छा हो गर पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे के लिए ‘करवाचौथ’ का व्रत रखें। जब जीवनसाथी के रूप में जीने-मरने की कसमें व सुख-दुख में साथ निभानें की कसमें दोनों एकसाथ खाते हैं तो फिर चौथ का व्रत करने के लिए दंपत्ति एक-दूसरे का साथ क्यों नहीं निभातें? आप भी मेरी इस बात पर गौर कीजिएगा। यदि आप ऐसी पहल करते हैं तो निश्चित रूप से आपके दांपत्य जीवन में खुशियों की खनक पहले से कहीं अधिक बढ़ जाएगी। इसी के साथ ही आप सभी को करवाचौथ की शुभकामनाएँ।  


Thursday, October 2, 2014

कर्फ्यू के सन्नाटें में पुलिस का गरबा

- गायत्री शर्मा
सांप्रदायिकता की दीवारों ने हमारे दिलों में ऐसी दरारे डाल दी है कि जब किसी हिंदू पर आक्रमण होता है तो बगैर सोचे-समझे हम मुस्लिमों पर ऊँगली उठाने लगते हैं और जब किसी मुस्लिम को कोई गोली मार देता है तो हम हिंदूओं पर लाठियाँ लेकर बरस पड़ते हैं। क्या आज धर्म की कट्टरता की हैवानियत हमारी इंसानियत पर इतनी हावी हो गई है कि हर दिन एक साथ रहने और घूमने वाले राम-रहीम दंगों और कर्फ्यू के समय एक-दूसरे को ही मारने पर उतारू हो जाते है? पिछले दिनों मध्यप्रदेश के रतलाम शहर में हुई गोलीबारी की घटना में भी कुछ ऐसा ही हुआ। मुस्लिम और हिंदू नेताओं पर एक ही दिन में दो अलग-अलग स्थानों पर हुए जानलेवा हमला के बाद हमेशा की तरह राजनीति के कीचड़ में पत्थर फेंककर तमाशा देखने वाले छुटपुट नेताओं की राजनीति दम पकड़ने लगी। जिसके चलते भाजपा ने कांग्रेस को आरोपों के कटघरे में खड़ा किया और कांग्रेस भाजपा को। ऐसे में मरण हुआ बेचारे आम-आदमी का, जो दंगा, कर्फ्यू और मारपीट की घटनाओं के कारण अपना रोजगार छोड़ घर की चारदीवारी में कैद होकर रह गया।
       क्या होता है कानून की उन धाराओं की पेचीदगी से, जो आम आदमी से उसका रोजगार व दो वक्त की रोटी ही छीन ले? मुझे आज नरेंद्र मोदी की मैडिसन स्केवयर पर कही वह बात याद आती है, जिसमें प्रधानंमत्री ने यह कहा कि लोग कानून बनाने की बात करते हैं और मैं कानून को खत्म करने की ताकि आम आदमी कानून की पेचीगदियों से बाहर निकल सके। यह सही भी है क्योंकि कानून की उलझनों में हर बार बेचारा आम आदमी ही दम तोड़ता है कोई राजनेता या व्यवसायी नहीं। बड़ी घटनाओं में मारा कोई मंत्री जाता है पर धारा 144 की उलझनों में आम आदमी फँस जाता है। जिसकी वजह से शहरों में दंगे भड़कते हैं और कर्फ्यू के हालात बनते है, उन नेताओं की गाड़ी पर लगी बत्ती तो उन्हें दंगों और कर्फ्यू से भी राहत दिला देती है। पर हमारे पास तो न कोई लाल, पीली, नीली बत्ती है और न कोई प्रेस का कार्ड। हमारे पास है तो बस भारत के नागरिक होने का पहचान पत्र, जो न तो कभी दंगों में काम आता है और न किसी कर्फ्यू में राहत दिलाता है। कितनी हास्यास्पद बात है यह कि आम आदमी को नेता के रूप में ‘खास’ बनाने वाले आम आदमी का वजूद भी देश में कितना आम हो गया है।            
रतलाम में मुस्लिम महिला पार्षद को अज्ञात हमलावरों द्वारा गोली मारने की घटना के कुछ ही घंटों के भीतर शहर के बंजरग दल के नेताओं पर जानलेवा हमला हो जाता है। हो सकता है इन घटनाओं के पीछे कोई सोची-समझी साजिश हो या यह भी हो सकता है कि ये दोनों घटनाएँ एक-दूसरे की प्रतिक्रियास्वरूप न होकर कुछ अलग ही मामले हो। लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि जब हिंदू-मुस्लिम के साथ एक ही दिन में एक सी घटना घटित होती है तो दोनों कौमों का एक-दूसरे के विरोध में खड़ा होना और दंगों का भड़कना स्वभाविक ही होता है। फिर चाहें ऐसी घटना मध्यप्रदेश में हो या उत्तर प्रदेश में हो या फिर भारत के किसी ओर राज्य में। सच कहा जाएं तो हमारे विश्वास की डोर इतनी कमजोर है कि देश में हिंदू-मुस्लिम दंगे मात्र अफवाहों की आँधी से भी भड़क जाते हैं।
        सोने की चमक से चमकने वाला चाँदनीचौक, सेव की महक से महकने वाला स्टेशन रोड और साडि़यों के ग्राहकों से सजने वाला माणकचौक चार दिनों तक कर्फ्यू से उपजे सन्नाटे व दंगों के खौफ के साये में खामोश रहा। सड़के सूनी रही और व्यापार-व्यवसाय ठप्प। ऐसे में आम आदमी के कानों में हर दस मिनिट सुनाई देने वाली पुलिस की गाडि़यों के साइरन की आवाजे ही गूँज रही थी। खाकी वर्दी वालों के खौफ के माहौल में शहर में दिनभर में क्या, कब, कैसे और क्यों हुआ, इसकी खबर आम आदमी को उड़ती-उड़ती अफवाहों से मिलने लगी। क्या आप जानते हैं कि कर्फ्यू के चलते बोझा ढ़ोकर रोजी-रोटी कमाने वाला मजदूर परिवार चार दिन तक भूखा सोया, दूध की आस में कई नन्हीं आँखों ने टकटकी लगाई और दवाई की आस में कई बूढ़े गले खासने लगे? इधर डेंगू और मलेरिया से मरीज घरों में कराह रहे थे और उधर घर से बाहर निकलने वालों पर पुलिस वाले डंडे बरसा रहे थे। पिछले दो ‍दिनों से कर्फ्यू से मिली कुछ घंटों की राहत में राशन की दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ से मेले लगने लगे। ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की तर्ज पर महिलाएँ छूट में मिली चुटकी भर राहत में परिवार के राशन का इंतजाम करने नंगे पैर घरों से निकली। कर्फ्यू में राहत की संक्षिप्त समय सीमा के चलते राशन की कतार में अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को अक्सर खाली हाथ लौटना पड़ा क्योंकि उसका नंबर आने से पहले ही राशन वाला स्टॉक न होने के कारण भीड़ के हाथ जोड़ लिए। नवरात्रि के दिन है पर गरबा पांडाल सूने पड़े हैं ऐसा लग रहा है इस नवरात्रि में शहर में बालिकाएँ नहीं बल्कि खाकी वर्दी वाले अपनी गाडि़यों के सायरन की आवाजों और डंडों की ठक-ठक के साथ शहरभर में गरबा नृत्य कर रहे हैं। इस कर्फ्यू में बस एक चीज पुलिस की सख्ती से नहीं रूकी और वह थी बादलों से बरसने वाली बरसात। जिस पर न पुलिस के डंडों का जोर चला और न ही कर्फ्यू का खौफ।
       मेरा आप सभी से प्रश्न है कि आखिर क्या होगा इस कर्फ्यू से, भागने वाला आरोपी तो गोली मारकर कब से भाग चुका होगा और पुलिस हर बार की तरह आम आदमी के साथ ही सख्ती दिखाएगी। आखिर क्यों नहीं हम सभी मिल-जुलकर शांतिपूर्ण तरीके से इन घटनाओं का विरोध प्रदर्शन करते हैं, जिससे कि शहरवासियों को कर्फ्यू की मार न झेलना पड़े? ऐसी घटनाओं की निंदा करना लाजिमी है पर दलगत राजनीति से परे भी विरोध का एक सही व शांतिपूर्ण तरीका हो सकता है। यह वहीं भारत है, जहाँ हम सभी हिंदू-मुस्लिम एक साथ रहते हैं, एक सा पानी पीते हैं, एक ही प्रकार की वायु में साँस लेते हैं लेकिन न जाने क्यों धर्म की कट्टरता के नाम पर हम जेहाद की नंगी तलवारे लिए एक-दूसरे पर बरस पड़ते है? पुलिस की छावनी में किसी भी शहर की तब्दीली से हिंदू या मुस्लिम किसी का कुछ भला नहीं होने वाला है। इससे तो उल्टा हमारा ही नुकसान होगा क्योंकि हममें से जब कोई घर से बाहर निकलकर जाने की कोशिश करेगा तो पुलिस की लाठियों की मार पड़ने से दंगे की आग थमने की बजाय और तेजी से भभक उठेगी। मेरी आप सभी से विनती है कि कृपया शांतिपूर्ण माहौल बनाएं, जिससे कर्फ्यू खुलने की उम्मीद जागें और हमारे शहर के बाजार फिर से नमकीन की तीखी महक, सोने की पीली चमक व साडि़यों के चटख रंगों की खूबसूरती की रौनक से गुलजार हो जाएं।
 
नोट : कर्फ्यू में आमजन की जिंदगी किस तरह बद से बदतर हो जाती है और 'करे कोई, भरे कोई' की तर्ज पर उसकी रोजी रोटी पर लात पड़ जाती है। इस पर मेरी कलम ने कुछ लिखने का प्रयास किया है। 1 अक्टूबर 2014, बुधवार को रतलाम के प्रमुख सांध्य दैनिक 'रतलाम दर्शन' व 2 अक्टूबर 2014, गुरूवार के अंक में रतलाम के अन्य प्रमुख सांध्य दैनिक 'सिंघम टाइम्स' में प्रकाशित मेरा लेख 'कर्फ्यू के सन्नाटे में पुलिस का गरबा'। मेरे इस लेख के माध्यम से आप भी लीजिए रतलाम में कर्फ्यू के हालात का जायज़ा। 
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Monday, September 29, 2014

जय हो 'मोदी'

- गायत्री 
कल संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुनना और आज न्यूयार्क के मैडिसन स्केवयर गार्डन पर नरेंद्र मोदी का परिवार के किसी सदस्य की तरह अमेरिका के प्रवासी भारतीयों से मुखातिब होना दोनों ही आयोजन मोदी की मौजूदगी व उनके वक्तव्य की सकारात्मक ऊर्जा के कारण सदा-सदा के लिए यादगार बन गए। इन दोनों ही आयोजनों में मोदी का वक्तव्य मौके की नब्ज़ को भाँपकर चौका मारने के बेमिसाल उदाहरण थे। कल मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय से विश्व की सबसे बड़ी समस्या ‘आतंकवाद’ को खत्म करने हेतु दुनिया के सभी देशों के सम्मिलित सहयोग की बात कह जहाँ सभी देशों को एकजुट होने का संदेश दिया वहीं अपने वक्तव्य में मोदी ने बाहरी आक्रमणों के समय सैन्य शक्ति व बलिदान देने वाले छोटे-छोटे देशों की निर्णय में भूमिका को बढ़ावा देने की महत्वपूर्ण बात भी कही। भारतीयों की क्षमता व कौशल को विश्व के विकास में महत्वपूर्ण बताकर मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच से भारत की शक्ति का जयघोष दुनियाभर में कर दिया। कल के धमाकेदार भाषण के बाद आज मैडिसन स्केवयर गार्डन से प्रवासी भारतीयों को वीजा के मामले में होने वाली फजीहत से मोदी ने ‘आजीवन वीजा’ की सुविधा के रूप में जो सहूलियत भरी राहत दी है वह प्रवासी भारतीयों के लिए भारत के प्रधानमंत्री का उनको दिया गया सबसे बड़ा तोहफा है। जिसके कारण देश का यह प्रधानमंत्री वर्षों तक प्रवासी भारतीयों का चहेता नेता बना रहेगा। इसमें कोई शक नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का व्यक्त्वि बेहद ही जादुई व आकर्षक है। उनकी वाणी में मुझे दूसरा युवा अटल बिहारी वाजपेयी नजर आता है, जिसकी आवाज की ताकत पूरे माहौल को अपने सर्मथन में करने की जादुई ताकत रखती है।
मोदी ‘झूठ’ पर नहीं, ‘सच’ पर यकीन करते हैं। वह ‘कोरे दावों’ की नहीं बल्कि ‘किए गए कार्यों’ की बात करते हैं। मोदी ‘भविष्य के स्वप्नों’ की बजाय ‘वर्तमान को सँवारने’ की वकालत करते हैं। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री विश्व मंच पर भ्रष्टाचार, महँगाई और गरीबी के बदनुमा दाग से मैली हुई भारत की तस्वीर को उजला करने की न केवल बात करते हैं बल्कि उन्होंने ऐसा कर दिखाने के लिए यथोचित कदम भी उठाएं है। यह मोदी की खूबी ही है कि वह ‘खास’ होकर भी ‘आम’ बनकर लोगों से मुखातिब होते हैं। प्रधानमंत्री के भारी भरकम चोले की बजाय उन्हें ‘चाय वाला’ आम आदमी कहाना अधिक पसंद है। यह मोदी का बड़ा दिल ही है कि वह स्वयं को ‘चाय वाला’ कहने में शर्म नहीं बल्कि गर्व का अनुभव होता है क्योंकि मोदी मानते हैं कि छोटे-छोटे काम करने से ही व्यक्ति ‘बड़ा’ होता है। हमारे यहाँ ऐसा कहा भी जाता है
‘बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर’
जिसका अभिप्राय यह है कि यदि व्यक्ति बहुत बड़ा भी बन जाएं पर किसी के काम न आएं तो उसके बड़ा होने का क्या फायदा? ‘बड़ा’ होकर देश की छोटी-छोटी समस्याओं को तवज्जू देते हुए मोदी ने महात्मा गाँधी के ‘स्वच्छता अभियान’ को जन अभियान का व्यापक रूप देकर ‘स्वच्छ भारत’ बनाने की एक अनूठी पहल की है, जिससे कि भारत के पर्यटन का बंद पड़ा द्वार फिर से विदेशी सैनानियों के लिए खुले और हमारा देश ‘गंदगी’ के कारण नहीं बल्कि ‘स्वच्छता’ व ‘अतिथि देवो भव’ के भाव के कारण विश्वभर में अपनी पहचान बनाएं। अब तक दुनिया कहती थी कि भारत तकनीक के मामले में बहुत पीछे हैं लेकिन सीमित संसाधनों व कम खर्च में मंगल तक भारत की यात्रा का गुणगान करते हुए मोदी कहते हैं कि एक ओर हम धरती पर अमेरिका से हाथ मिला रहे हैं तो दूजी ओर हम मार्स पर भी अमेरिका से हाथ मिला रहे हैं। तकनीक के मामले में भारत को बेहतर देश मानने वाले मोदी आध्यात्म व पर्यटन की दृष्टि से भी भारत को प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। गंगा का स्वच्छता अभियान, प्रधानमंत्री जनधन योजना और स्वच्छ भारत अभियान उनके द्वारा भारत के कायाकल्प की दिशा में उठाए गए कुछ ऐसे ही सराहनीय कदम है। विश्व मंच पर मोदी ने आज भारत की जो तस्वीर बनाई है, उसका शत प्रतिशत परिणाम ‍हमें दुनिया के देशों की भारत में व्यापार-व्यवसाय करने में देखी जाने वाली उत्सुकता से पता लग रहा है। मेरे देश के इस ‘सुपरहीरो’ को मेरा सलाम है और साथ ही ढ़ेर सारी अग्रिम शुभकामनाएँ भी है इस देश की तस्वीर में विकास के नए रंग से सजाने की ओर कदम बढ़ाने के लिए।

Thursday, September 18, 2014

‘संजा’ के रूप में सजते हैं सपने

कुँवारी लड़कियों की सखी ‘संजा’
-          गायत्री शर्मा
संजा
 
 श्राद्ध पक्ष में शाम होते ही गाँवों की गलियों में गूँजने लगते हैं संजा के गीत। कुँवारी कन्याओं की प्यारी सखी ‘संजा’, जब श्राद्ध पक्ष में उनके घर पधारती है तो कुँवारियों के चेहरे की रंगत और हँसी-ठिठौली का अंदाज ही बदल जाता है। सोलह दिन की संजा की सोलह आकृतियों में मानों कुँवारी लड़कियों के सपने भी दीवारों पर गोबर के चाँद-सूरज, फूल, बेल, सातिये, बंदनवार आदि अलग-अलग आकृतियों में सजने लगते हैं और अपने प्रियतम को पाने की ललक उनके गीतों के समधुर बोलों में तीव्र हो उठती है।
 
मालवाचंल की संजा
यह स्त्रियों के एक-दूसरे से सुख-दुख को साझा करने की प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा ही है, जिसे कुँवारियाँ संजा बाई की उनकी सासु-ननद से हुई तीखी नोंकझोक के गीतों के माध्यम से एक-दूसरे से साझा करती है। इसे हम ग्रामीण संस्कृति में घुली मधुर संबंधों के प्रेम की मिठास ही कहेंगे, जिसके चलते दीवारों पर उकेरी जाने वाली संजा के प्रति भी युवतियों में सखी सा अपनत्व भाव दिखाई देता है और कुवारियाँ अपनी प्यारी संजा को अपने घर जाने की हिदायत कुछ इस अंदाज में देती है – ‘संजा, तू थारा घरे जा, नी तो थारी बाई मारेगा कि कूटेगा कि डेली में डचोकेगा।’ संजा गीतों में कभी गाड़ी में बैठी संजा बाई के सौंदर्य का चित्रण ‘छोटी सी गाड़ी लुढ़कती जाय, लुढ़कती जाय, जामे बैठी संजा बाई। घाघरो घमकाती जाय, चूड़लों चमकाती जाय, बाईजी की नथनी झोला खाय, झोला खाय‘ गाकर किया जाता है तो कभी संजा को ‘बड़े बाप की बेटी’ होने का ताना देकर उसके अच्छे पहनावे व लज़ीज खान-पान पर अस अंदाज में कटाक्ष किया जाता है – ‘संजा, तू तो बड़ा बाप री बेटी, तू तो खाये खाजा-रोटी। तू पेरे मनका-मोती। गुजराती बोली बोले, पठानी चाल चाले .... ।‘
    भ्राद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर अश्विन मास की अमावस्या तक मनाया जाने वाला संजा पर्व राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात आदि राज्यों में मनाया जाता है। मालवा-निमाड़ अंचल में ‘संजा’ के रूप में पूजी जाने वाली ‘संजा बाई’ को देश के अलग-अलग राज्यों में संझया, गुलाबाई, सांझी, सांझी-धूंधा आदि नामों से जाना जाता है। ‘संजा’ के सोलह दिनों में क्रमश: पूनम का पाटला, एकम की छाबड़ी, बीज का बिजौरा, तीज का घेवर, चौथ का चाँद, पंचमी का पाँच कटोरा, छट की छ: पंखुड़ी का फूल, सप्तमी का सातिया, अष्टमी का बंदनवार, नवमी का नगाड़ा, दसमी का दीया, ग्यारह का गलीचा, बारस का पंखा और तेरस से सोलहवें दिन तक किला-कोट आदि की आकृतियाँ बनाई जाती है। संजा एक ऐसा पर्व है, जिसमें भित्ति-चित्रण की विविध आकृतियों के रूप में ग्राम्य सभ्यता के चित्रण के साथ ही संजा के लोकगीतों के माध्यम से लड़कियों को विवाह हेतु गंभीर होने की हिदायत भी दी जा‍ती है। गोबर की संजा मांडने से लेकर संजा का प्रसाद बनाने व आरती करने की सभी जिम्मेदारियाँ लड़कियों की ही होती है। इन छोटे-छोटे कार्यों के बहाने ग्रामीण संस्कृति में लड़कियों को पारिवारिक जिम्मेदारियों के प्रति गंभीर होने का व वैवाहिक जीवन में सफलता का फलसफा सिखाया जाता है।

     
संजा की आकृति
यह पर्व, देश की उस समृद्ध ग्राम्य संस्कृति व लोकगीत परंपरा का परिचायक है, जिसमें पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, चाँद-सूरज, देवी-देवता आदि को विविध अवसरों पर पूजा जाता रहा है। संजा पर्व है उल्लास का, उत्साह का व सबसे अधिक कुँवारी लड़कियों के कोमल स्वप्नों की ऊँची उड़ान का। वह उड़ान, जिसमें सूरज की गर्माहट में उनके प्रेम को पाने की तीव्रता का अहसास छुपा है और चाँद की शीतलता में सफल होने के लिए संयम रखने का सबक भी। संजा के बहाने कुँवारी लड़कियों का मेल-मिलाप होता है और प्रसाद पहचानने के बहाने होती है उनके सपनों के राजकुमार की खूबियों को पहचानने की बात। संजा के ये सोलह दिन कुँवारियों के लिए उनकी जिंदगी के वे खास दिन होते हैं, जब वह अपनी सखी संजा से अपने दिल की बात करती है और संजा के ससुराल के लिए विदा लेने पर उससे गुणवान और रूपवान पति पाने का आशीष माँगती है। संजा के बहाने कुँवारियों के सपने सोलह दिन तक गोबर की सुंदर आकृतियों में उकेरे जाते हैं, उम्मीदों की चमक से चमकाएं जाते है, गीतों की शिद्दत से पुख्ता किए जाते हैं, धूप की अग्नि से महकाएं जाते है और इन सभी के माध्यम से आशा की जाती है सुयोग्य वर व अखण्ड सौभाग्य की। मुझे उम्मीद है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण के इस दौर में भी संजा के रूप में हमारी माटी की महक सदैव हमें अपनी समृद्ध लोक संस्कृति से जोड़े रखेगी और इस समृद्ध परंपरा के साक्षी बनेंगे, संजा के सुमधुर गीत। 

नोट : कृपया इस ब्लॉग से किसी भी सामग्री का प्रयोग करते समय साभार अवश्य देंवे व मुझे सामग्री के प्रयोग का सूचनार्थ मेल भी भेंजे। 
मेरे इस लेख का प्रकाशन 'वृग्राम' पोर्टल, दैनिक दबंग दुनिया, दैनिक सिंघम टाइम्स आदि में हो चुका है, जिस पर जाने के लिए कृपया निम्न यूआरएल पर क्लिक करें - 

‘वृद्धग्राम’ पोर्टल पर 16 सितंबर 2014, मंगलवार की पोस्ट में शामिल मेरा लेख ‘संजा के रूप में सजते हैं सपने’। मेरे इसी लेख का प्रकाशन रतलाम से प्रकाशित दैनिक ‘सिंघम टाइम्स’ के 16 सितंबर 2014 के अंक में हुआ है।
http://vradhgram18.blogspot.in/2014/09/sanja-parv.html#.VBhuYpSSxeA
देश के तीन राज्यों से प्रकाशित 9 संस्करणों (इंदौर, भोपाल, उज्जैन, सागर, रतलाम, जबलपुर, ग्वालियर, रायपुर और मुंबई) से एक साथ प्रकाशित दैनिक ‘दबंग दुनिया’ के ‘दि वूमेन’ पृष्ठों के 17 सितंबर के 17 नंबर पृष्ठ पर प्रकाशित मेरा लेख - ‘कुंवारी लड़कियों की सखी संझा’।