Wednesday, May 28, 2014

उलझे रिश्तों का मांझा सुलझातें स्वानंद

वो बहती हवा सा है, जो अपने संग मुस्कुराहटों की शीतल फुहारों को लिए बहता है। वह उस उड़ती पतंग सा है, जिसकी कल्पनाओं की ऊँची उड़ान ज़मी से ऊँचे उठकर आसमां की बुलंदियों को छूने को ललायित है। जी हाँ, मैं बात कर रही हूँ मनमौजी, मिलनसार, ऊर्जावान, हरफनमौला कलाकार स्वानंद की, जो अपनी बहुमुखी प्रतिभा के बूते पर बॉलीवुड में इंदौर का नाम रोशन कर रहे हैं। गायन, लेखन, अभिनय और फिल्म निर्देशन से जुड़ा कला का यह साधक अपनी कलम से कल्पनाओं की ऊँची उड़ानें तो भरता है पर इन उड़ानों में भी उसका जुड़ाव ज़मी से जरूर रहता है। उनके शब्द भावों से अठखेलियाँ करते हुए कभी अपने बाबरें मन की कल्पनाओं से उलझे रिश्तों का मांझा सुलझाते हैं तो कभी रात को चाँद की सहेली बनाकर उससे अपना हाल-ए-दिल बँया करते नज़र आते है। शब्दों का बेहतर तालमेल और हर शब्द की लहज़े के साथ अदायगी तथा शब्दों के अर्थ की सार्थकता का खयाल रखना ही स्वानंद की खूबी है। तभी तो मुन्नी बदनाम, बद्तमीज़ दिल, शील की जवानी, अनारकली डिस्को चली, फेविकॉल से ... जैसे गीतों के बीच भी स्वानंद के गीत सामाजिक मर्यादाओं की दीवार के भीतर रहकर प्रेमियों के प्रेमिल भावों को शालीन व सारगर्भित अभिव्यक्ति दे रहे हैं। यह वहीं स्वानंद है, जो ‘बंदे में था दम, वन्दे मातरम् ...’ कहकर बापू के प्रति अपनी अगाध श्रृद्धा को व्यक्त करते हैं तो कभी ‘ओ री चिरैया ...’ के रूप में  बिटियाँ बचाने के लिए सार्वजनिक मंच से अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं। अपनी माटी की महक से अपनत्व भाव रखने वाले स्वानंद जब इंदौर आएँ, तब 25 व 26 मई 2014 को उनके साथ हुई मुलाकात में स्वानंद ने अपने ठेठ इंदौरी अंदाज में शेयर किए मुझसे अपने जीवन के अनुभव व इंदौर से जुड़ी यादें। चलिए जानते हैं मेरी नजरों के आईनें से मेरे दोस्त स्वानंद के जीवन की कुछ खूबसूरत बातें -   

जियो और खुश रहो :
दिल की नजर से दुनिया को देखों, दुनिया बड़ी ही हँसी है ... कुछ इसी गीत की तरह अपने दिल की नज़रों से दुनिया को देखने वाले, फिक्र को धुएँ में उड़ाने वाले स्वानंद हमेशा दिल की कहते हैं और दिल ही की सुनते हैं। तभी तो उनका बावरा मन कभी नैन झरोखें से निकलकर सपना देखने के ‍लिए चल पड़ता है तो कभी खोए-खोए चाँद की तरह कल्पनाओं के अनंत आकाश में खोया-खोया सा रहता है।‘जियो और खुश रहो’ में यकीन करते वाले स्वानंद जीवन के हर क्षण को पूरी ऊर्जा व उत्साह से जीते है। मानों वह उनके जीवन का एक आखरी क्षण हो। रामबाग की तंग गलियों में अपने अतीत की बिखरी यादों में खोना, बाल विनय मं‍दिर में दोस्तों के साथ की गई शरारतों को याद कर ठहाके लगाना ही स्वानंद के पक्के इंदौरी होने की पहचान है। मुबंई की घनी बसाहट में भी स्वानंद इंदौर में बिताएँ अपने जीवन के सुकून भरे लम्हों को और यहाँ के मालवी मट्ठों को याद करना नहीं भूलते हैं। इंदौर के पौहे-जलेबी और कचौरी के स्वाद को आज भी वह भूलाएँ नहीं भूलते है। तभी तो वह जब भी इंदौर आते हैं। तब स्वाद की तृप्ति के लिए वह अपने अज़ीज़ मित्रों के साथ नाश्ता के अपने ठेठ ठिकानों की ओर निकल पड़ते हैं और बगैर किसी परहेज़ के भरपेट खाते हैं, ठहाकें लगाते हैं और दोस्तों की फरमाइश पर गीत भी गुनगुनाते हैं।

एनएसडी की यादें :
एनएसडी की अपनी यादों के बारे में स्वानंद यहीं कहते हैं कि एनएसडी जाने का मेरा पहले से कोई ईरादा न था। एक वर्कशॉप में एनएसडी के बारे में सुना तो दिल किया मुझे भी वहाँ जाना चाहिए। अपने दिल की आवाज़ पर मैंने एनएसडी ज्वाइन किया। उस वक्त मैं इंदौर से एनएसडी में प्रवेश पाने वाला संभवत: पहला खुशनसीब व्यक्ति था। एनएसडी के मेरे अनुभव बहुत अच्छे थे। मेरे पास मौजूद रॉ मटेरियल को एनएसडी ने ही पॉलिश किया और विश्व की हर तरह की चीज़ों से मुझे एक्सपोज़ कराया। एनएसडी में मैंने यह सीखा कि सभी लोग एक ही बात को अलग-अलग तरीकों से कैसे कहते हैं। थिएटर में मेरी रूचि के कारण ही मैंने अभिनय की ओर अपना अगला कदम बढ़ाया है। नसीरूद्दीन शाह, बलराज साहनी, नवाजुद्दीन और ओमपुरी की डॉयलॉग डिलेवरी के कायल स्वानंद ने हाल ही में दो-तीन फिल्मों में अभिनय भी किया है। जल्द ही आप स्वानंद को बिग बी यानि की अमिताभ बच्चन और मिस्टर परफेक्शनिस्ट यानि कि आमिर खान के साथ अभिनय करते देख पाएँगे।

संगीत और लेखन में गहन रूचि :
संगीत की यदि हम बात करें तो संगीत स्वानंद की आत्मा में बसता है। वह जहाँ भी होते हैं वहाँ वह कुछ न कुछ गुनगुनाते हुए ही पाए जाते हैं। संगीत की तरह ही लेखन में भी स्वानंद की गहन रूचि उनके साहित्य प्रेम व मोबाईल प्रेम से प्रकट होती है। फुरसत के लम्हों में मोबाईल पर अपनी कल्पनाओं के शब्दों को अभिव्यक्ति देने वाले स्वानंद अक्सर खुद में ही खोए नज़र आते हैं।


गुल़जार में है खास बात :
गाना उनका शौक है, लिखना उनकी कला है और अभिनय उनका अंदाज-ए-बयाँ है। गुलज़ार के अल्फाज़ों के कायल स्वानंद गुलज़ार साहब को अपना आदर्श मानते हैं। स्वानंद की मानें तो जिस तरह से गुलज़ार साहब लिखते हैं उसे देखकर लगता है मानों वह लेखन के माध्यम से जिंदगी को जी रहे हो। गुलज़ार के संवादों व गीतों की तरह उनकी डायरेक्टर की हुई फिल्में भी उम्दा है। ज्योतिेष में उनकी रूचि, उनका टेनिस प्रेम ... यह सब देखते हुए अक्सर मुझे आश्चर्य होता है और ऐसा लगता हैं जैसे कोई एक श़क्स कितनी सारी खूबियों को अपने में सहेज सकता है। यदि हम चाहें तो हर वो काम कर सकते हैं, जिसमें हमारी रूचि है।

जि़ंदगी की राह पर चल पड़ा हूँ मैं :

कुछ इसी तरह गुलज़ार के प्रशंसक स्वानंद अपने करियर में विविधताओं के प्रश्न पर भी स्वानंद मुस्कुराकर बस यही कहते हैं कि मुझसे जि़ंदगी जो-जो करवाएगी। मैं वह काम करूँगा। फिर चाहे वह अभिनय हो या डायरेक्शन, लेखन हो या गायन। यहीं संदेश वह अपने शहर के युवाओं को भी देते हैं कि आपको जो भी करना है, सीखकर करें और पूरी लगन से करें। यदि आप खुद की नज़र में बड़े बन गए तो दुनिया की नज़र में आप खुद-ब-खुद बड़े हो जाओगे।

- गायत्री  

Wednesday, May 21, 2014

मैं कहती, तू कर देता

तेरा कहना और मेरा सुनना कभी एक सा नहीं होता
गर होता एक सा, तो न मैं हँसती, न तू रोता

पढ़ पाते मन के भाव जब
तो इधर-उधर की बातों का बहाना न होता

'कहने को करना' सच बना पाता तू
तो न तू बेवफा कहाता, न मैं पत्थरदिल होती

दिल में खिल जाते प्रेम के मोगरे जब
तब इत्र से बदन महकाने का कोई मतलब न होता

मेरे इंतजार से पहले ही आ जाता गर तू
तो मेरी खुशी का कोई ठिकाना न रहता

तेरा कहना और मेरा सुनना कभी एक सा नहीं होता
गर होता एक सा, तो न मैं हँसती, न तू रोता
- गायत्री

Tuesday, May 20, 2014

संसद में नतमस्तक हुए मोदी

कार्य जब पूजा बन जाएँ तो कार्यस्थल स्वत: ही मंदिर बन जाता है। लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाले संसद भवन में नरेंद्र मोदी का नतमस्तक होना विनम्रता के साथ ही कार्य के प्रति उनके समर्पण को भी व्यक्त करता है। यह वहीं संसद है, जिसकी गरिमा कभी जूतों से उछाली जाती हैं तो कभी कागज़ के टुकड़ों में जलाई जाती है। फिर भी लोकतंत्र का यह मंदिर अडिग खड़ा रहता है उस पुजारी की तलाश में, जो इसकी गरिमा का आदर करें और इसे सब्जीमंडी या कुश्ती का अखाड़ा बनाने से रौके।
यह वहीं संसद है जहाँ मानवता, शिष्टता और विनम्रता का आए दिन मखौल उड़ाया जाता है। उसी संसद की सीढि़यों पर मोदी नतमस्तक हुआ जाता है। वाह रे मोदी! आपका साहस, सर्मपण और सेवा भाव वाकई में काबिलेतारीफ है।
- गायत्री 

Monday, May 19, 2014

मेरे दिवा स्वप्न

नैन झरोखें में बसे, मेरे दिवा स्वप्न
कर ले आलिंगन मेरा, फिर मना जश्न
अश्रुधार में भीगते- भागते, मेरे दिवा स्वप्न
प्रेम नगर में ले चल मुझे, फिर मना जश्न
नैन झरोखें में बसे मेरे दिवा स्वप्न

पल-पल रूठते, मेरे दिवा स्वप्न
नैनों से दिल में जा बस, फिर मना जश्न
नैन झरोखें में बसे, मेरे दिवा स्वप्न
स्वप्नदृष्टा बनाते मुझे, मेरे दिवा स्वप्न
प्रेमस्वरूपा बना मुझे, फिर मना जश्न
नैन झरोखें में बसे, मेरे दिवा स्वप्न

- गायत्री 

Sunday, May 18, 2014

तेरे साथ हर क्षण है सुखद

तेरा आना भी सुखद,
तेरा जाना भी सुखद

तेरा जीतना भी सुखद,
तुझसे हारना और सुखद

खुशी का हो या ग़म का,
हर क्षण जिसमें तू साथ है

वह क्षण है,
सुखद, सुखद और भी सुखद ।

- गायत्री 

Friday, May 16, 2014

मेरे अंर्तमन की कलह

मेरे अंर्तमन की कलह
दिल और दिमाग के बीच
चलती सतत जिरह
नतीजों पर आकर
फिर से भटक जाती है
संघर्षों की मझधार में
फँसी यह नाव
हर बार गफलत के भँवर में
जाकर उलझ जाती है।
क्या बेऩतीज़ा रह जाएगी जिंदगी
या प्रश्न सुलझ जाएँगे
जीवन रहस्यों के?
परत-दर-परत
सुलझती जाएँगी
उलझनें जीवन की
मिल जाएँगे वफादार साथी
जीवन पथ के
किसी का मिलना और खोना
अब कोई चलन न बन जाएँ
जो आएँ जीवन में
बस यहीं आकर ठहर जाएँ।
-          
- - गायत्री  

    

मेरे हीरो – मेरे दादू

तेरी लाठी बना ले मुझे
किस्सों की तरह यादों में बसा ले मुझे
सदा चलूँ तेरे साथ मैं
अपने पैरों की खड़ाऊँ बना ले मुझे  

घुटने छूने को बेकरार ये कंधे
तेरे बहुत ऊँचे कद को बताते हैं
तेरे कांधों पर बैठकर देखे वो मेले
मुझे आज़ भी बहुत याद आते हैं

हरपल कँपकँपाते तेरे हाथ
दुनियादारी की कैसी अजीब गणित सीखाते हैं
तुझ संग मैं बुरा करूँ या भला
तेरे हाथ सदा मुझे दुआएँ दिए जाते हैं

झुर्रियों से सनी चमड़ी
आज भी एक नई चमक से चमचमाती है
यह तो मुझे मोटे चश्में में छुपे मेरे हीरों की  
जवानी की याद दिलाती है

दादी की यादों में मेरे दादा
अक्सर खुली आँखों में खो जाते हैं
तस्वीरों की धूल के साथ
अब उनके सपने भी धुंधलाएँ जाते हैं।

तब और अब का फर्क


सदा हमें संभालने वाले दादू
आज तुम क्यों लड़खड़ा गए?
जिंदगी की कटु सच्चाई देख
क्या तुम भी घबरा गए?

तेरे पैर का हर एक छाला
मेरे दिल को छलनी कर जाता है
तेरी हर तकलीफ का दर्द दादू,  
अक्सर मेरे चेहरे पर पढ़ा जाता है।

मुझसे बगैर कुछ कहे
कहीं गुम न हो जाना
मुझे साथ लिए बगैर दादू
तुम चमकता सितारा न बन जाना

प्रीत की इस डोर को
और भी लंबी बनाएँ रखना
अपनी पोती की इस मनुहार पर
हमेशा की तरह अब भी ‘ना’ न कहना।   


-          - गायत्री