Sunday, December 29, 2013

चोरी-चोरी कोई आएँ, चुपके-चुपके ...

‘उमराव जान’ का नवाब सुल्तान, ‘साथ-साथ’ का अविनाश और ‘चश्मेबद्दूर’ का सिद्धार्थ ... आप सभी को याद होगा। इन किरदारों पर गौर फरमाने पर आपके जेहन में एक मुस्कुराता चेहरा आएगा। कशीदाकारी से सजी शेरवानी और नवाबी टोपी के साथ ही गोल-मटोल गालो पर आड़ करते लंबे बालों का उनका वो लाजवाब लुक भूलाएँ नहीं भूलता। अब कुछ याद आया आपको? जी हाँ, मैं बात कर रही हूँ गुजराती बटेका (आलू) से दिखने वाले गोल-मोल फारूख शेख की, जो कि फिल्म इंडस्ट्री में एक जाना-पहचाना नाम है। फारूख का नाम आते ही हम सबकी ज़ुबा पर दिप्ती नवल का नाम जरूर आता है आखिर हो भी क्यों न, 7 फिल्मों में कमाल-धमाल करने वाली दिप्ती और फारूख की जोड़ी अपने समय की हिट जोडि़यों में शुमार थी। आज भी ताज़ा-तरीन लगने वाले ‘ये तेरा घर, ये मेरा घर ...’, ‘चोरी-चोरी कोई आए, चुपके, चुपके ... ’, ‘नूरी,नूरी ...’ जैसे कई सदाबहार नग़में फारूख पर फिल्माएँ गए थे। बड़े पर्दे के कलाकार फारूख की लाजवाब शक्सियत के जादू से छोटा पर्दा भी अछूता नहीं था। फिल्मों में दिप्ती नवल के साथ प्रेम की मीठी नोंक-झोक कर दर्शकों को गुदगुदाने वाले फारूख छोटे पर्दे पर ‘जीना इसी का नाम है’ शो के जरिए अपनी एक अलग छाप छोड़ गए।  

एक बेहतर कार्यक्रम प्रस्तोता के रूप में फारूख ने ‘जीना इसी का नाम है’ शो में दर्शकों की खूब दाद बटोरी। इस शो में वे मशहूर बॉलीवुड सेलिब्रिटीज से गुफ्तगू करते व उनके जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों से दर्शकों का मनोरंजन करते नजर आते थे। छोटे पर्दे पर फारूख चमत्कार, जी मंत्री जी, श्रीकांत जैसे सीरियलों में भी नजर आएँ। रंगमंच पर भी फारूख ने अपनी बेहतरीन अदाकारी के कारण दर्शकों की खूब वाहवाही लूटी। फिल्मों व टीवी सीरियलों के साथ ही रंगमंच पर ‘आपकी अमृता’ और ‘आपकी सोनिया’ जैसे कई नाटकों में फारूख एक महत्वपूर्ण कलाकार के रूप में नज़र आएँ। सत्यजीत रे, ऋषिकेश मुखर्जी, केतन मेहता, मुजफ्फर अली जैसे नामचीन डायरेक्टर की फिल्मों जैसे गर्म हवा, शतरंज के खिलाड़ी, चश्मेबद्दूर, नूरी, लाहौर, किसी से न कहना में फारूख ने अपनी लाजवाब अदाकारी का कमाल दिखाया। 


फिल्म लाहौर के लिए फारूख को वर्ष 2010 में बेस्ट सर्पोटिंग एक्टर के नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया। पिछले कुछ वर्षों में फारूख को टेल मी ओ खुदा (2011), शंघाई (2012), ये जवानी है दिवानी (2013), क्लब 60 (2013) जैसी कई फिल्मों में देखा गया। हालांकि फारूख ने 65 वर्षों की अपनी जिंदगी में कम फिल्मों में काम किया लेकिन उनकी झोली में आई कुछ फिल्में भी चुनिंदा थी, जिसमें उनकी उम्दा अदाकारी ने उन्हें बड़े पर्दे पर सदा के लिए अमर बना दिया।

फारूख की तारीफ में यदि कुछ कहा जाएँ तो मैं यही कहूँगी कि फारूख वह इत्र थे, जिसकी भीनी महक आज भी बड़े पर्दे पर काबिज है। अपने लाजवाब फिल्मी करियर में छोटी-छोटी उड़ाने भरते और हर फिल्म में अपनी एक अलग छाप छोड़ते फारूख शेख 27 दिसम्बर 2013 को दुबई में हमसे सदा के लिए अलविदा कहकर चले गए।

-         गायत्री 

‍न फनकार तुझसा तेरे बाद आया, मोहम्मद रफी तू बहुत याद आया ...

संगीत सम्राट मोहम्मद रफी की तारीफ में कुछ कहना सूरज को रोशनी दिखाने के समान है। गायन के क्षेत्र में रफी का जो कद है, उसे छू पाना भी आज के दौर के किसी गायक के बस की बात नहीं है। रफी अपने गीतों में जो सालों पहले गुनगुना कर कह गए, वह आज भी ताज़ा तरीन सा लगता है। दिल की गहराईयों से सुने तो रफी के गीतों में पिरोये अल्फाज़ आपकी और हमारी जिंदगी की ही कहानी है, जिसमें प्रेम की मिठास है, मिलन की पुरवाई है, दर्द की कसक है, और प्रेम में ठोकर खाने पर ज़माने से मिली रूसवाई है। प्रेम के युगल गीतों के साथ ही दर्द भरे नगमों में भी दूर-दूर तक रफी का कोई सानी नहीं है। आज भी तन्हाई में रफी के दर्द भरे नग़में विरह की कसक बन हमारी आँखों से आँसू बन छलकते है और हमराज बन हमारे दिल के दर्द को बँया करते हैं। क्या बात हो, जब रात हो, तन्हाई हो और रफी की रूहानी आवाज़ हो। तब रात गुनगुनाते हुए कब बीत जाएगी, आपको पता ही नहीं चलेगा।
24 दिसम्बर 1924 को एक आम इंसान के रूप में जन्म लेने वाला यह फरिश्ता सुरों के मामले में खुदा की विशेष नैमतों से नवाज़ा गया था। रफी के इस जन्मजात हूनर को तराशना व उनके गीतों को सुरों के कड़े कायदों में बाँधना एक अहम काम था। रफी को भारतीय शास्त्रीय संगीत की तालीम देकर उनके सुरों को परिष्कृत करने का बेहद महत्वपूर्ण कार्य किया रफी के संगीत शिक्षक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ साहब और उस्ताद वाहिद अली खान साहब ने। संगीत की तालीम लेने के बाद नौशाद साहब के मार्गदर्शन ने रफी के लिए कामयाबी का एक नया मार्ग प्रशस्त किया। रफी से पहले नौशाद साहब के पसंदीदा गायक तलत मेहमूद थे लेकिन एक दिन स्टूडियों में सिगरेट पीते देख नौशाद साहब ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया और उसी दिन से रफी को नौशाद की टीम में बतौर गायक इंट्री मिल गई। संगीत की साधना 35 वर्षों के सफर में रफी साहब ने लगभग 700 फिल्मों में 4,956 से अधिक गीत गाएँ। न केवल दर्द भरे बल्कि प्रेम गीत, गज़ल और भक्ति संगीत को भी रफी ने अपने सुरों में बखूबी पिरोया।

प्रेम के वैविध्यपूर्ण रंगों और भावों से सजे रफी के नग़मों को सुनकर ऐसा लगता है मानों रफी के सुर उत्प्रेरक बन हमारे दिल के किसी कोने में धूल खा रही खट्टी-मीठी यादों की प्रेमिल पलों की पोटली खोल हमारे ‍मिलन की मिठास और विरह के दर्द को ताजा कर रहे हैं। उत्कृष्ट गायन के लिए 5 राष्ट्रीय पुरस्कारों के साथ ही 6 फिल्म फेयर पुरस्कार से नवाजे जाने वाले सुरों के सम्राट रफी को वर्ष 1967 में भारत सरकार ने ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया। रफी ने अपने दौर के हर बड़े अभिनेता के लिए गीत गाएँ। दिलीप कुमार, शम्मी कपूर, गुरूदत्त, राजेश खन्ना, संजीव कुमार जैसे कई बड़े अभिनेता की सफलता में रफी की सुरमयी आवाज का भी एक बड़ा हाथ था। फिल्मों ने जहाँ रफी ने दिलीप कुमार की उदासी को अपनी दर्द भरी आवाज से सजाया, वहीं देवानंद के प्यार के इजहार में रफी की मधुर आवाज ने मदहोश कर देने वाला समा बाँधा। गायक और अभिनेता किशोर कुमार के लिए भी रफी ने गीत गाएँ। फिल्म इंडस्ट्री में पिच बदल-बदल कर गायन की कला की शुरूआत करने का श्रेय मोहम्मद रफी को ही जाता है। रफी ने ज़ीनत बेगम, नूरजहाँ, लता, आशा आदि के साथ युगल गीत गाएँ। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, ओपी नैय्यर, शंकर जयकिशन, रवि और नौशाद जैसे म्यूजिक डायरेक्टर के साथ रफी ने काम कर फिल्मों में अच्छे गीत-संगीत के उच्च मानक स्थापित किए। गायन के क्षेत्र में सफलता के ऊँचे मुकाम पर पहुँचने वाले रफी स्वभाव से बहुत शर्मीले थे। यही वजह थी कि उनके लिए प्रेस को इंटरव्यू देने का काम उन्होंने अपने बड़े भाई को सौंप रखा था।

1974 में रफी के सितारे बुलंदी के शीर्ष पर थे। इसी वर्ष रफी को फिल्म वर्ल्ड मैग्जीन ने ‘हवस’ फिल्म के ‘तेरी गलियों में न रखेंगे कदम ....’ गीत के लिए बेस्ट सिंगर के अवार्ड से सम्मानित किया गया। 1977 में रफी को फिल्म ‘हम किसी से कम नहीं’ के गीत ‘क्या हुआ तेरा वादा ...’ गीत के लिए फिल्म फेयर और नेशनल अवार्ड के लिए नवाज़ा गया। रफी ने कभी पुरस्कार पाने के लिए नहीं गाया। बल्कि उन्होंने संगीत को साधना मानकर उसके माध्यम से अल्लाह की इबादत की। यही वजह है कि कामयाबी के शीर्ष मुकाम पर पहुँचने के बाद भी रफी अहंकार से कोसो दूर थे। गायन के क्षेत्र में जितनी ऊँचाई पर वह थे, व्यवहारिकता के मामले में वे अपने दिल में उतनी गहराई व नम्रता को समेटे थे। सुरों के इस नायाब कलाकार को श्रृद्धांजलि देने के साथ ही आप और हम एक नज़र डालते हैं रफी के सुरों में पिरोये खूबसूरत नग़मों पर –

1.       बहारों फूल बरसाओ, मेरा मेहबूब आया है ...
2.       मैंने पूछा चाँद से ....
3.       आज मौसम बड़ा बेईमान है ...
4.       पत्थर के सनम तुझे हमने ...
5.       दिल पुकारे आ रे आ रे आ रे ...
6.       मेरे मेहबूब तुझे मेरी मोहब्बत की कसम ...
7.       तेरे मेरे सपने अब एक रंग है ...
8.       बाबुल की दुआएँ लेती जा ...
9.       ईशारों ईशारों में दिल लेने वाले ...
10.   आजा आजा मैं हूँ प्यार तेरा .... 
11.   दिल की महफि, सजी है चले आइएँ ...
12.   ये चाँद सा रोशन चेहरा ...
13.   खिलौना जानकर तुम तो ....
14.   अहसान तेरा होगा मुझ पर ...
15.   दिल के झरोखे में तुझको ...
- गायत्री

Saturday, December 21, 2013

अपीयरेंस और अदाकारी में लाजवाब टुन टुन

नौशाद साहब के दरवाजे पर गायिका बनने की गुजारिश के साथ अचानक से दस्तक देने वाली 13 वर्षीय उमा के लिए संगीत की दुनिया के इस अज़ीज फ़नकार के रहमो-करम की इनायत मिलाना खुदा की किसी नैमत से कम नहीं था। बड़ी उम्मीदों के साथ कुछ कर दिखाने का ज़ज्बा लिए उत्तर प्रदेश से मुबंई आई उमा देवी अपनी जिद की बड़ी पक्की थी। तभी तो पहली ही मुलाकात में इस भारी-भरकम जिद्दी लड़की ने नौशाद साहब को ही कह दिया कि यदि उन्होंने उसे गाने का मौका नहीं दिया तो वह समन्दर में कूदकर अपनी जान दे देगी। भविष्य में उसी जिद ने उन्हें बॉलीवुड की चोटी की गायिका और हास्य अभिनेत्री बना दिया। जी हाँ, मैं बात कर रही हूँ लड्डू से गोल-मटोल चेहरे व हाथी से भारी-भरकम शरीर वाली अभिनेत्री उमा देवी उर्फ टुन टुन की।

‘अफसाना लिख रही हूँ दिले बेकरार का, आँखों में रंग भरके तेरे इंतजार का ...’ फिल्म ‘दर्द’ के इस सदाबहार गीत को अपनी सुरीली आवाज दी थी उमा देवी ने। इसे हम वक्त का फेर ही कहें कि आज भी यह गीत तो हमें यदा-कदा सुनाई दे जाता है लेकिन सीता देवी का जिक्र हमें कभी सुनाई नहीं देता। आखिर क्यों यह बेहतरीन गायिका गायकी छोड़ सदा के लिए गुमनामी के अंधेरों में खो गई ... यह सोचने की बात है? हममें से बहुत कम लोग ही यह जानते होंगे कि सीता देवी उर्फ टुन टुन न केवल हास्य कलाकार थी बल्कि हास्य कलाकार बनने से पहले वह एक सुरीली गायिका थी, जिसने उस जमाने की कई मशहूर अभिनेत्रीयों के लिए गीत गाएँ। आज मची है धूम, झूम खुशी से झूम ..., ये कौन चला मेरी आँखों में समाकर ..., काहे जिया डोले ..., दिल को लगाके हमनें कुछ भी न पाया ..., चाँदनी रात है ..., दिलवाले जल-जलकर ही मर जाना ... जैसे कई मशहूर गीतों को टुन टुन ने ही अपनी सुरीली रेशमी आवाज से ‍सजाया था। आप मानें या न मानें परंतु उस दौर का यह एक कड़वा सच है कि लता और आशा ने उस जमाने में किसी गायिका को अपने से बेहतर कहाने व आगे आने का मौका ‍नहीं दिया। यही कुछ वजह है कि उस दौर की बहुत सी गायिका या तो कुछ गाने गाकर सदा के लिए गुमनामी के अंधेरों में खो गई या फिर गायकी छोड़ किसी ओर काम में लग गई। हम इसे बदकिस्मती कहें या प्रतिस्पर्धा, जिसके चलते रेशमी आवाज की धनी टुन टुन ने गायकी ‍छोड़ अभिनय की ओर अपना ध्यान केंद्रित करना शुरू किया।

जॉनी वॉकर, केस्तो मुखर्जी, भगवान दादा जैसे स्थापित हास्य कलाकारों के दौर में टुन टुन ने हास्य-व्यंग्य के अपने अलहदा अंदाज से फिल्म इंडस्टी में अपनी एक खास जगह बनाई थी। नौशाद साहब की सिफारिश पर मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार ने अपनी फिल्म बाबुल (1950) के लिए टुनटुन को एक कॉमिक रोल ऑफर किया था। इस फिल्म के बाद टुनटुन ने आर-पार (1954), मिस्टर एण्ड मिसेस 55 (1955), प्यासा (1957) जैसी कई फिल्मों में अपने हास्य किरदार से दर्शकों को खूब गुदगुदाया। फिल्म इंडस्ट्री में महिला हास्य कलाकार की टुन टुन की खाली जगह को आज तक कोई हास्य कलाकार नहीं भर पाया है। सच कहें तो फिल्मों में टुन टुन के अंदाज के साथ ही उनका अपीयरेंस भी लाजवाब था। हाथी जैसा भारी-भरकम शरीर और उस पर मासूम सा गोल-मटोल चेहरे को देखते ही दर्शकों के चेहरे पर हँसी आना लाजिमी ही था। उसके बाद जब टुन टुन के मुँह से एक के बाद एक डायलॉग फूटते थे, तब हँसी के ठहाकों से दर्शक लोट-पोट हो जाते थे।

फिल्मों में कभी टुनटुन दर्जनभर शैतान बच्चों की माँ बनी तो कभी मरीजों के देखरेख करने वाली नर्स बनी ...  फिल्म की मांग के मुताबिक हर किरदार को टुनटुन ने अपनी तीखी मोटी आवाज और लाजवाब अदाकारी के जादू से हास्यास्पद बना दिया। दिल ने पुकारा, अफसाना, मोम की गुडिया, कन्यादान, शराफत, तुलसी विवाह, बम्बई का बाबू, दिल अपना और प्रीत पराई, कोहिनूर जैसी अनगिनत फिल्मों में टुन टुन ने हास्य किरदार निभाया। 100 से अधिक फिल्मों में दर्शकों को गुदगुदाने वाली टुनटुन को आखरी बार सक्रिय हास्य अभिनेत्री के तौर पर 1990 में बनी फिल्म ‘कसम धंधे की’ में देखा गया था। टुन टुन के कॉमिक डायलॉग आज भी हमारे कानों में गूँजते हैं और हमें याद दिलाते हैं लाजवाब अदाकारी के उस दौर की, जब फिल्मों में हास्य पैदा करने के लिए किसी अतिरिक्त वस्तु या व्यक्ति की जरूरत नहीं होती थी बल्कि डायलॉग की अदायगी का बेहतरीन अंदाज ही दर्शकों को गुदगुदाने के लिए काफी था। चलते-चलते हास्य-व्यंग्य की इस लाजवाब अदाकारा को विनम्र श्रृद्धांजलि और प्यार भरा सलाम।  
- गायत्री  

Friday, December 20, 2013

लाजवाब हुस्न की मलिका - मीना कुमारी

तुम क्या करोगे सुनकर मुझसे मेरी कहानी,
बेलुत्फ जिंदगी के किस्से है फीके-फीके

महज़बीन बानो यानि कि मीना कुमारी का यह श़ेर उनकी जिंदगी की विरानियों का दर्द बँया करता है। फिल्म इंडस्ट्री में ‘ट्रेजेडी क्वीन’ के रूप में अपनी पहचान बनाने वाली मीना कुमारी बेहतरीन अदाकारा के साथ एक उम्दा उर्दू शायरा भी थी। आईने सा उजला लंबा चेहरा और गालों पर अठखेलियाँ करते घुँघराले बाल, शाम के ज़ाम के नशे सी नशीली आँखे और बड़े होठों से आँचल दबाने का वो कातिलाना अंदाज .... कोई इस रूप-लावण्य को कैसे भूल सकता है जनाब? लाजवाब माँसल सौंदर्य से परिपूर्ण ‘पाकीज़ा’ की मीना की संगमरमरी काया ने अपने हुस्न से जलवों से फिल्म के रूपहले पर्दे पर धूम मचा दी थी। जी हाँ, मैं बात कर रही हूँ 50 व 60 के दशक की उस लाजवाब नायिका की, जिसने ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में छोटी बहू के किरदार को अपने उम्दा अभिनय से अमरता प्रदान की थी। मीना कुमारी को फिल्म परिणीता में ललिता, काजल में माधवी, बेजू बावरा में गौरी और साहिब बीवी और गुलाम में छोटी बहू के किरदार के लिए बेहतरीन अभिनेत्री के फिल्म फेयर पुरस्कार से भी नवाजा गया।
   
यह नरगीस और मधुबाला जैसी मँजी हुई अदाकाराओं का वह दौर था, जिसमें अपनी जगह बनाना किसी भी अभिनेत्री के लिए बहुत ही मुश्किल था। लेकिन वह मीना ही थी, जिसकी चमक ने आज़ाद, सहारा, चिराग कहाँ रोशनी कहाँ, पाकीज़ा, आरती, मैं चुप रहूँगी, दिल एक मंदिर, फूल और पत्थर आदि फिल्मों में अपने बेमिसाल अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया। मीना के अभिनय के कमाल से जितना आबाद फिल्म इंडस्ट्री का मंच था उससे कहीं गुना ज्यादा वीरान मीना का व्यक्तिगत जीवन था। फिल्म डायरेक्ट कमाल अमरोही के प्रेम में दीवानी होकर मीना ने अपने से उम्र में काफी बड़े कमाल के साथ निकाह कर उनकी दूसरी बीवी के तौर पर खुशी-खुशी वैवाहिक जीवन की शुरूआत की। न केवल मीना ने कमाल को अपनाया बल्कि उनकी पहली पत्नी के बेटे को भी छोटी अम्मीजान के रूप में मीना का भरपूर स्नेह मिला। निकाह के कुछ सालों बाद मीना और कमाल के बीच वैचारिक मतभेद के चलते 1964 में तलाक लेकर इन दोनों ने अपने जीवन के रास्ते एक-दूसरे से अलग कर लिए। हकीकत तो यह कहती है कि तलाक के बाद धीरे-धीरे मीना का जीवन तन्हाईयों में सिसकियाँ बन रह-रहकर अतीत की मीठी यादों के नाम हो गया। शराब के जाम में अपने दुख को भुलाने की नाकाम कोशिशों ने मीना के शरीर को इतना अधिक लाचार बना दिया कि शराब के अतिरेक से लिवर साइरोसिस के कारण 1972 में मीना कुमारी अपने सभी दीवानों को अलविदा कहकर सदा के लिए मौत की गुमनाम दुनिया में खो गई।
    ‘मौसम है आशिकाना, ऐ दिल कहीं से ऐसे में उनको भी साथ लाना ...’ वाकई में यह हमें गीत मीना की कभी न खत्म होने वाली उन यादों के सफर पर ले जाता है। जहाँ चारों ओर बस मीना कुमारी की सफलता की ही गूँज सुनाई देती है।

मीना कुमारी की अदाकारी से सजी फिल्में :
पाकीज़ा (1972), मेरे अपने (1971), सात फेरे (1970), अभिलाषा (1968), मँझली दीदी(1967), चाँद का पालना (1967), फूल और पत्थर (1966), साँझ और सवेरा (1964), दिल एक मंदिर (1963), आरती (1962), बहू बेगम (1967), परीणिता (1953), दो बीघा जमीन (1953), बेजू बावरा (1952) .... आदि।

मीना कुमारी पर फिल्माएँ सदाबहार गीत :
आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे ...
चलते-चलते यूँही कोई मिल गया था .....
पिया ऐसो जिया में समाए मयो रे ....
न जाओ सैय्या छुड़ा के ...
नदिया के पानी ...
दिया बुझा-बुझा ...
तुम्हें जिंदगी के उजाले मुबारक ...
प्यार का सागर देखा है ...
दिया ना बुझे मेरे घर का ...
शराबी-शराबी मेरा नाम हो गया ...
मेरी याद में तुम न आँसू बहाना ...
मौसम है आशिकाना ...
ज्योति कलश छलके ....

-          - गायत्री       

Thursday, December 19, 2013

चाँद मेरा दिल, चाँदनी हो तुम ...

चाँद, आसमान में चमकता वो श्वेज ज्योतिपुंज है, जिसके रूप-सौंदर्य के आगे सब कुछ फीका है। कहने को तो नासा के वैज्ञानिक चाँद की उबड़-खाबड़ सतह पर गड्ढ़ों का दावा करते है परंतु इसी गड्ढ़ों वाले चाँद पर प्रेमियों के प्रेम की गाड़ी बेरोकटोक सरपट दौड़ती है। चाँद में कितने भी ऐब हो परंतु प्रेमियों के लिए वह अपने खूबसूरत और वफादार साथी की तरह बेऐब है क्योंकि जहाँ प्यार होता है, वहाँ पसंद होती है और जहाँ प्यार और पसंद दोनों होती है वहाँ प्रेम की प्रगाढ़ता के आगे हर ऐब गौण हो जाता है।

जिस चाँद से प्रेमी हर रोज घंटों बतियाते हैं, उस पर जब घर बसाने की बात हो तो प्रेमी भला कैसे पीछे रह सकते हैं? नासा की चाँद पर घर बसाने की संभावनाओं ने तो प्रेमियों को असल में चाँद पर जाने की नई उम्मीदें दी है। जब ऐसा होगा तो वाकई में प्रेमी का दिल गा उठेगा ... ‘चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो’।यह आसमान में चमकने वाला चाँद ही है, जिसकी सुनहरी चाँदनी में नहाकर प्रेमी प्रेम की अगाध गहराईयों में खो जाते हैं। घंटों तक प्रेमिका का हाथ थामे अपलक चाँद को निहारना, प्रेमिका के लिए चाँद तोड़कर ज़मी पर लाना, चाँद की दुहाई देकर जीने-मरने की कसमें खाना, पूर्णिमा के चाँद को प्रेमिका का सुंदर हुस्न बताना तो कभी चाँद में अपने प्रेमी की तस्वीर नजर आना ... वाकई में कभी तो यकीन ही नहीं होता कि हमसे करोड़ों मील की दूरी पर बसने वाला चाँद कल्पनाओं में हमारे कितने करीब है।   
जिस तरह प्रेमियों के लिए चाँद खास है उसी तरह चाँद के लिए भी प्रेमी जोड़े खास होते हैं। चाँद की चाँदनी भी प्रेमियों के प्रेम की उष्णता पर अपनी मखमली ठंडक बिखेरती है। कभी चुपके से झरोखे से झाँकता यह चाँद अमर प्रेम का साक्षी बन प्रेमियों को अपना आशीष देता है तो कभी चाँद की अलग-अलग मुद्राएँ प्रेमियों के मन में प्रेम की नई कल्पनाओं व उपमाओं को जन्म देती है। अमावस से लेकर पूर्णिमा तक चाँद की यात्रा के साथ प्रेमी भी उसके सहगामी बन अपने प्रेम को अलग-अलग तरीकों से अभिव्यक्त करते हैं। दूज, तीज, चौथ से लेकर पूर्णमासी तक कभी करवा चौथ, तीज और ईद का चाँद मन्नतों के रूप में मन में उम्मीदों को जगाता है।
सदियों से कवियों की कविताओं, शायरों की गज़लों, प्रेमियों की उपमाओं और रोमांस के गीतों में चाँद का जिक्र आता रहा है। न जाने चाँद और हमारा रिश्ता कितना पुराना और अटूट है। बदस्तूर यह चाँद प्रेमियों पर अपने रहमों-करम बरसाकर उनके प्रेम को दीर्घायु होने की एक उम्मीद देता रहे। इसी आशा के साथ एक नजर डालते हैं चाँद पर फिल्माएँ कुछ गीतों पर। 

चाँद सी मेहबूबा हो मेरी... , फिल्म – हिमालय की गोद में
 तू चँदा, मैं चाँदनी ... , फिल्म – रेशमा और शेरा
 चंदा रे, चंदा रे, कभी तो ज़मी पर आ ... , फिल्म –सपने
चाँद सिफारिश जो करता तुम्हारी ... , फिल्म – फ़ना
आओ तुम्हें चाँद पर ले जाएँ ... , फिल्म – जख्मी
चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो .... , फिल्म पाकीज़ा
चाँद जैसे मुखड़े पर बिंदियाँ सितारा ... , फिल्म – सावन को आने दो
चाँद मेरा दिल, चाँदनी हो तुम ... , फिल्म – हम किसी से कम नहीं
चाँद से परदा कीजिए ... , फिल्म – आओ प्यार करे   
चाँद, तारें तोड़ लाऊँ ... , फिल्म – यस बॉस
चौंदवी का चाँद हो या आफताब हो ... , फिल्म – चौंदवी का चाँद
खोया-खोया चाँद ... , फिल्म – खोया-खोया चाँद
ये चाँद सा रोशन चेहरा ... , फिल्म – काश्मीर की कली
 - गायत्री 



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Wednesday, December 18, 2013

60 के दशक का चॉकलेटी ब्वॉय : जॉय

वो 60 का दशक था, जब मासूम चेहरे पर मंद-मंद मोहक मुस्कुराहट और दिल में प्यार की कशिश लिए फिल्मों के रूपहले पर्दे एक चॉकलेटी ब्वॉय की धीमी दस्तक हुई। उनके चेहरे की मासूमियत, गोरे चिकटे चेहरे पर हिरण सी बड़ी-बड़ी आँखे, लाजवाब केश सज्जा और कातिल मुस्कुराहट ने जैसे दर्शकों को उनके आकर्षण जाल में मजबूती से बाँध दिया। जॉय को देख बस घंटों तक उन्हें निहारने को ही मन करता था। उनकी प्रशंसक लड़कियाँ तो टेलविजन पर अपने इस हीरों को अपलक निहारती ही रहती थी। वाकई में एक अजीब सा जादू था मासूमियत से भरपूर उस चेहरे में, जिसे देख लड़कियों का मोहित होना लाजिमी ही था। जॉय की बेहतरीन अदाकारी के कारण उनकी फिल्मों से ..., तो कई बार जॉय की खूबसूरती के कारण उनसे और परोक्ष रूप से उनकी फिल्मों से दर्शकों को प्यार होने लगा। साधना, वहिदा रहमान, वैजंती माला जैसी मशहूर कमसीन अभिनेत्रियों के साथ फिल्मों प्रेम के गीत गाने वाले इस रोमांटिक हीरों के खाते में लव इन टोकियों, शार्गिद, जिद्दी, फिर वहीं दिल लाया हूँ, आओ प्यार करें, ईशारा और एक मुसाफिर एक हसीना जैसी कई फिल्में थी।
   

बॉलीवुड का छैला कहलाने वाले जॉय मुखर्जी का हॉलीवुड हीरों सी हेयर स्टाइल और तीखे-तीखे नैन नक्श जैसे आज तक दर्शकों की नजरों में स्थायी रूप से रच-बस से गए है। यहीं वजह है कि आज भी जॉय का जिक्र आते ही उनकी मासूमियत से भरपूर तस्वीर हमारी आँखों के सामने आ जाती है और हमारे होठों पर मुस्कुराहट। 24 फरवरी 1939 को सती देवी की गोद में अपनी खिलखिलाहट बिखेरने वाले जॉय ने अपनी उसी मोहक मुस्कुराहट के साथ 9 मार्च 2012 को इस दुनिया को सदा के लिए सायोनारा कह दिया।
   

जॉय के फिल्मी सफर में उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि की भूमिका महत्वपूर्ण थी। जॉय के पिता शशाधर मुखर्जी एक सफल प्रोड्यूसर व फिल्मालय स्टूडियों के संस्थापक थे। फिल्म ‘लव इन शिमला’ में जॉय को पहली बार उनके पिता ने ही बतौर अभिनेता लॉंच किया था। इस फिल्म में जॉय का साथ निभाया अभिनेत्री साधना ने, जिनकी इंट्री इस फिल्म में एक नई अभिनेत्री के तौर पर हुई। संभवत: यह फिल्म अभिनेत्री के तौर पर साधना की भी पहली फिल्म थी। इस फिल्म के बाद जॉय और आशा की रोमांटिक जोड़ी को फिल्म ‘लव इन टोकियो’, ‘जिद्दी’ और ‘फिर वहीं दिल लाया हूँ’ में दर्शकों ने खूब सराहा। बतौर अभिनेता जॉय की फिल्मों में ‘फिर वहीं दिल लाया हूँ’, ‘जिद्दी’, ‘एक मुसाफिर एक हसीना’ और ‘शार्गिद’ फिल्म का संगीत उस दौर का सुपर-डुपर हिट संगीत था।
   

जॉय पर फिल्माई गई फिल्मों के गीत आज भी हमें हमें 60 के दौर की फिल्मों के कलरफुल प्राकृतिक दृश्यों व मधुर संगीत की याद दिलाते हैं। गुलाब से हिरोइन के गुलाबी गालों को सहलाना, पैदल चलते-चलते संग जीने-मरने की कसमें खाना, स्लो बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ गुनगुनाएँ जाने वाले प्यार के तरानें, हिरोईन की कमर और हीरों के कंधे पर हाथ रखकर हौले-हौले किया गया युगल नृत्य, ... वाकई में उस दौर में प्रेम की अभिव्यक्ति के बेहतरीन तरीकों से भरपूर गीतों की बात ही कुछ ओर थी। 60 और 70 का वह दौर बॉलीवुड के लिए सदाबहार फिल्मों व गीतों का दौर था।
   

चॉकलेटी ब्वॉय जॉय का फिल्मी सफर हाँलाकि बहुत लंबा नहीं रहा परंतु बहुत ही कम समय में जॉय की रोमांटिक छवि ने फिल्मी जगत में उन्हें खूब वाहवाही दिलाई। चलते-चलते जॉय पर फिल्माएँ सदाबहार गीतों को याद करने के साथ ह‍ी बॉलीवुड के इस चॉकलेटी ब्वॉय को मेरा प्यार भरा सलाम।

जॉय पर फिल्माएँ गए गीत :

1.       बड़े मियाँ दीवाने, ऐसे ना बनो ...
2.       बहुत शुक्रिया, बड़ी मेहरबानी ....
3.       दुनिया पागल है या फिर मैं दीवाना ...
4.       ले गई दिल गुडिया जापान की ...
5.       फिर वहीं दिल लाया हूँ ...
6.       आप यूँ ही अगर मुझसे मिलते रहे ...
7.       हमें तुम मिल गए हमदम ...
8.       सायोनारा, सायोनारा ...

- गायत्री  

Monday, December 16, 2013

चल, उठ, दहाड़ निर्भया ...

16 दिसंबर 2012, इतिहास के पन्नों पर बदनामी की कालिख पोतने वाला वह दिन, जिसने वैश्विक पटल पर शर्मिन्दगी व आलोचना से भारत के दामन को दागदार कर दिया। ऐसा पहली बार हुआ, जब दिल्ली की निर्भया की दर्द भरी चीत्कारों ने पूरे देश को भावुक कर दिया। उस लड़की की सिसकीयों भरी आह की कल्पनामात्र से ही कठोर से कठोर माँ का कलेजा भी मुँह को आ जाता था। अपनी लाडली से प्रेम करने वाला हर बाप कठोरता के आवरण में भावुकता से भरे भारी मन से निर्भया में अपनी बेटी की झलक पा रहा था। 16 दिसंबर की काली रात को कभी न सोने वाली दिल्ली की खचपच सड़कों पर अतृप्त वासनाओं की दरिंदगी का खेल सरेआम खेला गया और इस खेल में लात-घूस के साथ लौहे की सख्त रॉड से कुचली गई एक मासूम बेटी निर्भया। जब तक इस निर्भया के धड़कते दिल और उम्मीद की सिसकियों का तालमेल चलता रहा। तब तक न्याय की उम्मीद भी रह-रहकर इस लाडली में दम भरती रही। उसके बाद तो सासों के तार टूटने के साथ ही जिंदगी जीने का निर्भया का सुखद स्वप्न भी सदा के लिए उसकी मूँदती आँखों में कैद हो गया और सदा के लिए फिजाओं में शेष रह गई यह गूँज ‘माँ, मैं जीना चाहती हूँ’
   
इंसानियत पर हावी होती क्रूरतापूर्ण हैवानियत की अतृप्त भूख का वो विभत्स व हृदय विदारक दृश्य, जिसे सुनते ही हर बाप का सख्त दिल भी पसीजने लगता है और हर माँ की छाती फूट-फूटकर जानवर बने उन दरिंदों को मौत की हाय देती है। रौंगटे खड़े कर देने वाली खौंफ की उस सर्द रात का विभत्स मंजर आज भी हमारी आँखों की पुतलियों में तैर रहा है। जिसे भूला पाना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है।
    लड़कियों की आज़ादी पर समाज की संकुचित विचारधारा व बिगड़ते माहौल का अंकुश लगा देने वाली इस घटना पर जहाँ ‍खुलकर विरोध के स्वर मुखरित हुए, वहीं दूसरी ओर देश की करोड़ों बेटियों के माँ-बाप के दिलों में रह-रहकर उनकी लाडलियों की सुरक्षा की चिंता भी सताने लगी। उस घटना के बाद सूरज की रोशनी को अलविदा कहती हर सांझ के साथ ही घरों के किवाड़ (दरवाजे) बंद होने लगे और उदाहरण के रूप में निर्भया गैंग रेप को याद किया जाने लगा।
    मानवता के चिथड़े-चिथड़े उधेड़ने वाली इस घटना ने एक ही रात में सत्ता के रसूकदारों को सख्त कानून बनाने व महिला सुरक्षा के मुद्दे को गंभीरता से लेने को मजबूर कर दिया। हर बार की तरह देश की इस बहादुर बेटी के बलिदान को लेकर भी खूब राजनीति हुई, चौराहों पर उसकी याद में लाखों मोमबत्तियाँ जलाई गई और निर्भया के सर्मथन में करोड़ों हाथ उठे लेकिन क्या आपको लगता है निर्भया के इंसाफ की जंग अब पूरी हो चुकी है? क्या आपको लगता है कि नाबालिग कहकर दंड से बचने की दलील देने वाले लड़के की मानसिक स्थिति किसी बालिग लड़के के समान परिपक्व थी? क्या गैंगरेप की इस हृदय विदारक घटना पर पीडि़ता के परिवार को त्वरित न्याय मिलना चाहिए था और यह न्याय निर्भया की अपराधियों को फाँसी पर लटकाने की अंतिम इच्छा को पूरा करने वाला होना चाहिए?   
   
मानवता को रक्तरंजित करने वाले इस हादसे की कल्पना मात्र ही मेरे जेहन में कई अनुत्तरित सवालों की लंबी फेहरिस्त ला देती है। मैं इन प्रश्नों का जवाब चाहती हूँ हर उस पिता से, जो आज आँखे मूँदे अपनी बेटी के सुखद भविष्य के स्वप्नों में खोया है, हर उस माँ से, जो ईश्वर से प्रतिपल घर के बाहर गई अपनी लाडली की सुरक्षा की दुआ करती है। हर उस भाई से, जो रक्षाबंधन पर अपनी बहन की सुरक्षा हेतु उसे आश्वस्त करता है और हर उस मित्र से, जो दोस्ती में जान देने की बात करता है। खामोशी को चीरता जो वह सच, जो इस वक्त आपके भीतर सोया बैठा है, वहीं सच मेरे इस प्रश्न का उत्तर है।
    मेरी मानिए तो आप भी झूठे दिलासों का झीना आवरण अब छाँट दो और हकीकत को पहचान इंसाफ के लिए हुंकार भरों। अपने घर में किलकारियाँ भरती और बाबुल के आँगन को अपनी रौनक से रोशन करने वाली लाखों-करोड़ों निर्भया के हक के लिए निर्भयता से सामने आएँ क्योंकि हम अब नहीं जागे तो शायद हर साल सैकड़ों निर्भया जिस्मानी भूख के भेडि़यों की बदस्तूर भेंट चढ़ती रहेगी। अपनी डबडबाती आँखों में आँसू के साथ न्याय के मजबूत ईरादों की बुलंदी को भी कायम रखें और प्रश्न करें उन लोगों से, जिन्होंने कहने को तो करोड़ों के ‘निर्भया फंड’ की घोषणा कर दी पर अब तक 1 रूपया भी किसी निर्भया के लिए खर्च नहीं किया गया। यही नहीं देश उसी दिल्ली में निर्भया की इस पहली बरसी तक कई निर्भया लड़कियों के जिस्म पर अपनी जीभ लपलपाने वाले भूखे दरिंदों की हवस का शिकार हुई है। क्या आज भी महिला सुरक्षा देश के लिए एक बड़ा मुद्दा है? क्या निर्भया का मामला भी झूठें वादों, दावों और श्रृंद्धांजलियों के रूप में सहानुभूति की राजनीति का शिकार होकर रह गया है? क्या असल में जनता जर्नादन की हुंकार ही इस मामले को जिंदा रखे हुए है? ..... इन्हीं प्रश्नों के साथ आपको छोड़कर अंत में चलते-चलते मैं बस यही कहूँगी कि हालांकि देश की हर बेटी को खुलकर जीने की आजादी दिलाने की इस लड़ाई में निर्भया बलि की बेदी पर चढ़ गई और हमें दे गई एक अनुत्तरित प्रश्न कि क्या वाकई में आज भी इस देश में बेटियाँ सुरक्षित है?
- गायत्री 

Sunday, December 15, 2013

तुम पुकार लो, तुम्हारा इंतजार है ...

कुछ गीत ऐसे होते हैं, जिन्हें हम कभी भी, कही भी, किसी के भी साथ गुनगुनाने लगते हैं लेकिन इसके उलट कुछ गीत ऐसे होते हैं, जिन्हें गुनगुनाने के लिए हम और हमारी तन्हाई का साथ ही काफी होता है। लफ्ज़ों के अधरों से फिसलकर दिल में प्रेमिल भावनाओं की जलतरंग छेड़ने वाला संगीत हेमन्त कुमार का हैं, जिनके मधुर संगीत से सजे गीतों के अल्फाज़ कानों में पड़ते ही बसबस हमारे होंठ इन गीतों को गुनगुनाने लगते हैं, हम अपनी मस्ती में झूमने लगते है और खो जाते हैं अपने प्रियतम की यादों में। आनंदमठ, अनुपमा, साहिब, बीबी और गुलाम जैसी कई फिल्मों को अपने संगीत से सजाने वाले हेमन्त दा संगीतकार के साथ ही एक बेहतरीन गायक भी थे।
हम बात कर रहे हैं हेमन्त कुमार यानि कि हेमन्त कुमार मुखोपाध्याय की। 16 जून 1920 से शुरू हुआ     मौसिकी के इस बादशाह का सफर 26 सितंबर 1989 को खत्म हो गया। जीवन के इन 69 वर्षों में हेमन्त कुमार ने अपने रूहानी संगीत व गीतों के सुरूर से प्रेमियों को सरोबार कर दिया। हेमन्त दा की गायकी में जहाँ प्रेम की मिठास का जादू देखने को मिलता है, वहीं उनके दर्द भरे गीतों में विरह की तीखी चुभन का भी अहसास होता है। उनकी खनकती आवाज से सजे गीतों को सुनकर ऐसा लगता है मानों वे आपके और हमारे हाल-ए-दिल का अंदाज-ए-बँया कर रहे है। हेमन्त कुमार की मखमली आवाज का जादू, मधुर संगीत के तान, लफ्जों का रूहानी अंदाज हमें मस्ती में झूमने पर और तन्हाई में गुनगुनाने पर मजबूर कर देता है।
    बंगाली गायक, कम्पोजर व प्रोड्यूसर के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले हेमन्त कुमार का जीवन भी संगीत व लेखन के इर्द-गिर्द ही घुमता रहा। उनके बारे में यह कहना गलत नहीं होगा कि उनका यौवन संगीत के माहौल से सजकर ही सुंदर रूप में उभरा था। तभी तो इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़कर वह अपनी ही दुनिया यानि कि संगीत की दुनिया में रम गए। सन् 1933 में हेमन्त दा ने ऑल अंडिया रेडियों के लिए अपना पहला गीत गाकर गीत-संगीत की दुनिया में कदम रखा। यदि हम हेमन्त दा के परिवार की बात करें तो सुकोमल भावनाओं वाले कवि हृदय हेमन्त कुमार के बड़े भाई तारा ज्योति लघु कथा लेखक और छोटे भाई अमल मुखोपाध्याय म्यूजिक कंपोजर थे। हेमंत दा की पत्नी बेला मुखर्जी बंगाली गायिका थी। हेमन्त दा की दो संताने जयंत और रानू थी। जयंत का विवाह 70 के दशक की अभिनेत्री मौसमी चटर्जी के साथ हुआ था।
    हेमन्त दा का जिक्र उनके सुरों व संगीत से सजे गीतों के बगैर अधूरा है। आज के दौर के प्रेमियों को भी अपनी प्रेम ताल में नचाने वाले, उनमें रोमांस का सुरूर पैदा करने वाले, प्रेमियों की प्रेमिल भावनाओं को मधुर साज व गीत के ताने बाने से गूँथकर प्रेम राग को पवित्र बनाने वाले हेमन्त दा की गायकी का कोई सानी नहीं है। तो क्यों न सुरों के इस अज़ीज़ फनकार के उन गीतों पर एक नज़र डालें, जिन्हें हेमन्त दा ने अपनी मौसिकी के जादू से श्रृंगारित कर नव सुंदरता प्रदान की थी –

तुम पुकार लो, तुम्हारा इंतजार है ...
ना तुम हमें जानो, ना हम तुम्हे जाने ...
न जाओ सैया, छुड़ा के बैंया, कसम तुम्हारी मैं रो पडूँगी ...
जरा नज़रों से कह दो जी ...
न तुम हमें जानो, न हम तुम जाने ...  
है अपना दिल तो आवारा, ना जाने किसपे आएगा ...
ये नयन डरे-डरे ....
जाने वो कैसे लोग थे ...
कहीं दीप जले कहीं दिल ...
- गायत्री  

Saturday, December 14, 2013

मेरी हठ और तेरा इंकार

मेरी हठ और तेरा इन्कार 
कब तक चलेगा मेरे यार ?
दोस्ती में हक की दरकार 
और हक जताने पर तकरार 
कब तक चलेगा मेरे यार ? 
सोच में परिपक्व होने पर भी 
बच्चों सी हठ और मनुहार 
कब तक चलेगा मेरे यार? 
समझते हो तुम भी और मैं भी 
फिर भी झूठ-मूठ का इन्कार 
कब तक चलेगा मेरे यार? 
- गायत्री 

Friday, December 13, 2013

समलैंगिक संबंधों की खिलाफत क्यों?

कहते हैं जहाँ बंदिशे अधिक होती है। वहाँ बँधनों को तोड़ने की दरकार भी उतनी ही तीव्र होती है। बात ठीक वैसे ही है, जैसे कि प्रेम संबंधों व प्रेम विवाह की खिलाफत करने वाले समुदायों में सबसे अधिक प्रेम संबंध व ऑनर किलिंग के मामले देखने को मिलते हैं। ऐसे ही समुदायों में सामाजिक रिश्तों के प्रति विरोध सबसे अधिक देखा जाता है। समलैंगिक संबंधों को ‘अप्राकृतिक हरकत’ करार देकर उसे गैरकानूनी बताने वाले देश की सर्वोच्च अदालत के समलैंगिक संबंधों के मामले में लिए गए फैसले का भविष्य भी कुछ इसी ओर ईशारा कर रहा है।
वर्ष 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) खत्म कर मर्जी (आपसी सहमति) से समलैंगिक संबंध बनाने को अपराध मानने से इन्कार कर दिया था। लेकिन अभी कुछ दिनों पहले आए देश की सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को एक सिरे से खारिज कर दिया। जिसके अनुसार धारा 377 संवैधानिक है और समलैंगिक संबंध दण्डनीय अपराध की श्रेणी में आते हैं। हालांकि कोर्ट का यह फैसला शायद समाज की उस सकुंचित मानसिकता का परिचायक कहा जा सकता है। जिसमें किसी भी परिवर्तन या नई चीज का सामना करने से पहले से ही उससे किनारा कर लिया जाता है। जिसका दूरगामी परिणाम सदैव बुरा ही देखने को मिला है। सच कहा जाएँ तो आज भी हमारे समाज में संबंधों को लेकर वैचारिक खुलेपन का अभाव देखने को मिलता है। जिसके दूरगामी परिणाम तलाक, बलात्कार, यौन शोषण आदि के रूप में बड़े ही खतरनाक होते हैं परंतु हमें क्या है। हम तो अतीत और वर्तमान में जीने वाले लोग है, जो भविष्य की चिंता से दूर ही रहना पसंद करते हैं।   
समलैंगिक संबंधों के बारे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ऐतिहासिक व अच्छा बताने वाले लोग इसे विवाह की सामाजिक व्यवस्था के हित में किया गया फैसला मानते हुए अपने तर्क दे रहे हैं। लेकिन मेरा यह मानना है कि इन संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखने से ये संबंध नहीं बनाएँ जाएँगे। ऐसा सोचना हमारा भ्रम है बल्कि मुझे तो लगता है कि वास्तविकता इससे ठीक उलट ही सामने आएगी। अपराध के दायरे में आने से ये प्राथमिक तौर पर इन संबंधों में खुलापन उजागर नहीं होंगा पर चोरी-चुपके सब कुछ बदस्तूर जारी रहेगा। जिसके परिणामस्वरूप विवाह की सामाजिक व्यवस्था का हर दिन तिल-तिल कर मखौल उड़ेगा, जिस व्यवस्था को बचाने का तर्क देकर हम इन संबंधों को अनैतिक करार दे रहे हैं। क्या ऐसे में परिवारों में बिखराव व संबंधों में असंतुष्टि का भाव पैदा नहीं होगा? ... शायद जरूर होगा। ऐसा होने से तलाक के मामलों में पहले से अधिक बढ़ोत्तरी देखने को मिलेगी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में ‘सहमति’ को प्रमुख घटक माना था परंतु सुप्रीम कोर्ट ने इस घटक को दरकिनार कर फैसले को ही पूरा उलट दिया।
मुझे लगता है कि लकीर के फकीर बनने वाले धर्मावलंबी सुप्रीम कोर्ट के मुँह से अपना मनमाफिक फैसला उगलवाने के चक्कर में सामाजिक व्यवस्था को ओर अधिक छिन्न-भिन्न कर रहे हैं। जिसका उदाहरण इस फैसले के विरोध से ही लगाया जा सकता है। कपिल सिब्बल, राहुल गाँधी आदि कई राजनेताओं ने खुले तौर पर जहाँ इस फैसले का विरोध किया। वहीं भाजपा ने संसद के सदन में उठाएँ जाने पर प्रतिक्रिया देने की बात कहकर इस संवेदनशील मुद्दे से किनारा कर लिया। इस फैसले के विरोध से यह बात तो स्पष्ट है कि संसद में जल्द ही यह मुद्दा उठने वाला है और सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय फिर से सवालों के घेरे में आने वाला है क्योंकि कहीं न कहीं न्यायपालिका स्वतंत्र होकर भी विधायिका के नियंत्रण में है। बेहतर है कि इस मुद्दे पर समाज में खुली बहस की जाएँ और उसके पश्चात ही कोई निर्णय लिया जाएँ। जिससे दुनिया को पता लग सके कि फैसलों के मामले में यह तालिबान नहीं है बल्कि हिंदुस्तान है।
- गायत्री 

Monday, December 9, 2013

जय हो झाडू माता की ...

बच्चों के पसंदीदा हैरी पॉर्टर की तरह केजरीवाल ने भी अपनी झाड़ू का जादू दिखाकर सबको चौंका दिया है। इस बार दिल्ली की सड़कों पर उनकी झाड़ू ऐसी चली कि कमल के साथ-साथ पंजा भी उनके डस्टबिन में चला गया। किस्मत के धनी केजरीवाल पहली बार में ही शीला के सुहाने सपनों को तोड़कर और हर्षवर्धन को मायूस छोड़कर ‘आप’ के साथ बस अपनी ही बल्ले-बल्ले कर रहे हैं। सच कहें तो यह झाड़ू का कमाल है। जिसकी झाड़-फूँक ने राजनीति के सालों पुराने धुंरधरों को भी हकीकत का आईना दिखा दिया। जय हो झाडू माता की ...।  

जिस तरह खेल-खेल में कुछ जिद्दी बच्चे यह कहते हैं कि मुझे भी खिला लो, नहीं तो मैं तुम्हारा खेल बिगाड़ दूँगा। दिल्ली की राजनीति के खेल में बच्चों सी वहीं जिद व अडि़यलपना केजरीवाल ने भी दिखाया और उसी जिद के बूते पर आज वह कांग्रेस को पछाड़ते हुए 28 सीटों पर पैर पसारकर बैठ गए है। सच कहे तो मोदी की तरह केजरीवाल की भी किस्मत लाजवाब है। जिसने हर किसी को उनकी ही लहर में झूमने पर मजबूर कर दिया है। दिल्ली में ‘आप(आम आदमी पार्टी)’ को स्पष्ट जनादेश न मिलने के बावजूद भी उनके साथ सीटों का गणित इतना लाजवाब बैठा कि कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा भी उम्मीद भरी नज़रों से ‘आप’ की ओर निहार रही है और ‘आप’ है कि मन ही मन भाव खाए जा रही है।    

कहते हैं जब आपकी किस्मत के सितारे बुलंद हो। तब गधा भी आपको सलाम ठोकता है। ठीक उसी तरह अच्छे वक्त और बेहतर मुद्दों के साथ परिवर्तन के विश्वास के साथ केजरीवाल ने दिल्ली में धमाकेदार प्रदर्शन किया और शीला के साथ-साथ हर्षवर्धन को भी परेशानी में डाल दिया। कभी जन लोकपाल बिल के लिए अण्णा के साथ खड़े केजरीवाल को दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम के रूप में अचानक कामयाबी का ऐसा स्वाद चखने को मिला कि अपने बयानों में राजनेताओं की खिचाई करने वाले गाँधीवादी अण्णा के ये सर्मथक अण्णा से किनारा कर आज खुद ही राजनेता बन गए है। राजनेता क्या बने, ‘आप’ के केजरीवाल तो कहने को विपक्ष में बैठने का और मन ही मन दिल्ली की कुर्सी पर राज करने का ख्वाब भी संजोने लगे है।  

‘जनता जनार्दन है। उसका फैसला एक ही रात में शहनशाहों के तख्ते पलटकर रखने की ताकत रखता है।‘ इस बार के विधानसभा चुनावों के परिणामों में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की हैट्रिक, राजस्थान में खिलखिलाता कमल बस इसी ओर ईशारा करता है कि वक्त आ गया है बदलाव का। परिवर्तन के इस दौर में न घिसे-पिटे वादें चलेंगे और न परिवारवाद की राजनीति। यहाँ तो हकीकत की बातें होगी और उन्हीं मुद्दों पर चुनाव में हार-जीत का फैसला भी होगा।‘

-          गायत्री 

Saturday, December 7, 2013

खिलने लगा है कमल ...

मध्यप्रदेश में पूरी तरह खिला कमल
राजस्थान में सर आँखों पर बैठाया जाएगा  
धान के कटोरे (छत्तीसगढ़) में जब जा बैठेगा यह कमल 
तो यह दिलवालों की दिल्ली में जाकर 'आम' के साथ भी इठलाएगा।
- गायत्री
(विधानसभा चुनाव 2013-14 के संदर्भ में)   

'संजय' से सहानुभूति क्यों ???

कहा जाता हैं कि इस देश का कानून सबके लिए समान है फिर चाहे वह वीआईपी हो या आम आदमी। यदि हम कानून की विशेषता की बात करें तो भारतीय कानून कठोरता के साथ लचीलेपन के गुण को भी लिए हुए है। यानि जहाँ कानून को सख्त होना चाहिए। वहाँ उसे सभी के साथ सख्त होना चाहिए और जहाँ कानून को लचीला होना चाहिए वहाँ सभी के लिए होना चाहिए फिर चाहे कोई वीआईपी हो या आम आदमी। लेकिन अपराधी अभिनेता संजय दत्त के मामले में कानून का भेदभावपूर्ण रवैया तो ‍कानून के औचित्य पर ही सवालिया निशान लगा रहा है। 1993 में मुंबई सिरियल ब्लॉस्ट के दोषी संजय दत्त को कम समय अंतराल में दूसरी दफा पैरोल पर छोड़ा जाना कितना उचित है जबकि इसी मामले में सजा काट रही जेबुन्निसा की पैरोल की अर्जी को एक सिरे से खारीज कर दिया गया? क्या जेल में भी संजय दत्त को सेलिब्रिटी होने का अच्छा-खासा फायदा मिल रहा है?
        अपराध अगर आम आदमी करे तो वह अपराधी और अगर कोई खास आदमी (वीआईपी या सेलिब्रिटी) करे तो वह अपराधी नहीं, यह बात सुनने में बड़ी ही अटपटी लगे परंतु यहीं सच है। आज कई आम आदमी जेल में कैदी के रूप में अपने द्वारा किए गए अपराधों की सजा काट रहे हैं वहीं दूसरी ओर कई छोटे-बड़े अपराधों को अंजाम दे चुके अपराधी नेताजी बन जनता के बीच वाहवाही बटोर रहे हैं या फिल्मों में अभिनय करते नजर आ रहे हैं। आखिरकर कई सालों से देश पर दो ही कौम का तो राज चलता आ रहा है एक तो राजनेता और दूसरे बॉलीवुड के सितारे। इन पर जब भी कानून का शिंकजा कसने वाला होता है तब मामला उठने के बाद कुछ ही दिनों में वह आई गई हो जाती है। आखिर हो भी क्यों न, असल में तो नेता और अभिनेता तो एक ही थाली के चट्टे-बट्टे है। यहीं वजह है कि बापू की गाँधीगिरी के इस देश में हकीकत में तो नेतागिरी और फिल्मगिरी ही चल रही है। बापू और बापू के सिद्धांत तो फिल्मों की स्क्रिप्ट या किताबों के पन्नों में ही कैद होकर रह गए है।  
     

संजय दत्त, जो कि आरोपी है 1993 के मुंबई ब्लॉस्ट के दौरान घातक आयुधों को रखने के। कई बेगनाह लोगों को अपना ग्रास बनाने वाले इन धमाकों की गूँज और वो मंजर अब तक हमारी स्मृति में कैद है, जो वाकई में चीखों-चीत्कारों और दर्दनाक सिसकियों से भरा था। संजय का अपराध इतना गंभीर और सजा मात्र 5 साल। इन पाँच साल में हर एक-दो माह में संजय का बीमारी के बहाने अपने परिवार के साथ वक्त बिताना और लंबित फिल्मों की शूटिंग की प्लॉनिंग करना। एक बार संजय को पैरोल मिली उनकी बिमारी के ग्राउंड पर। अब संजय को पैरोल मिली उनकी बीवी यानि कि मान्यता की बिमारी के ग्राउंड पर। चूँकि ईश्वर की दया से संजय का परिवार बहुत बड़ा और भरापूरा है। इसलिए यदि आगामी माह में संजय को अपने किसी ओर रिश्तेदार के कुशलक्षेम जानने व उनके साथ वक्त बिताने के लिए पैरोल मिले तो इसमें हमें कोई अचरज नहीं होना चाहिए। लेकिन यहाँ सवाल यह उठता है कि जब 53 वर्षीय संजय को पैरोल तो उसी मामले में अपराधी ठहराई गई 70 वर्षीय बुर्जुग जेबुन्निसा को पैरोल क्यों नहीं? जबकि स्वास्थ्यगत दृष्टि से जेबुन्निसा को पैरोल पर जाने की इजाजत मिलनी चाहिए थी न कि संजय को।
       
संजय ने पैरोल की अर्जी में उनकी पत्नी मान्यता की बीमारी का कारण बताया है। सुनने में आया है कि मान्यता को लीवर में 6 से 7 सेमी का ट्यूमर है। इसी के साथ ही उन्हें ‍हार्ट प्रॉबलम भी है। लेकिन मान्यता अपनी बीमारी के इलाज के रूप में कोई सर्जरी करवा रही है या नहीं। यह बात अब तक स्पष्ट नहीं है। केवल उनके बीमार होने की खबर से ही संजय को पुणे की यरवदा जेल से 30 दिन की छुट्टी मिल गई है। यानि मान्यता की सर्जरी होने पर संजय की पैरोल अवधि का बढ़ना तय ही माना जाएँ। यदि संजय की पत्नी की हालत वाकई में इतनी खराब है तो पिछले सप्ताह ही दो बड़े आयोजनों (फिल्म ‘आर ...राजकुमार’ की विशेष स्क्रिनिंग और सेलिब्रिटी की बर्थडे पार्टी) में मान्यता की सक्रिय मौजूदगी किस ओर ईशारा कर रही है? क्या मान्यता की बीमारी संजय को जेल से बाहर लाने का बहाना था या वाकई में इस बात में सच्चाई है। यह बात तो कुछ दिनों बाद ही स्पष्ट हो पाएँगी।
        जनता के तीखे सवाल और जेबुन्निसा के परिजनों के विरोध के चलते इस मामले में गड़बड़झाले की आशंका को लेकर उठते सवालों ने आखिरकार महाराष्ट्र के गृहमंत्री आरआर पाटिल को भी यह कहने पर मजबूर कर दिया है कि हम इस मामले की जाँच करा रहे हैं और हमने इस संबंध में समस्त दस्तावेज मंगवाएँ है। इस मामले की जाँच होना भी चाहिए क्योंकि अभिनय के साथ-साथ संजय दत्त की पारिवारिक पृष्ठभूमि कहीं न कहीं राजनीति से भी जुड़ी रही है। जिसका फायदा लगातार संजय दत्त को मिलता रहा है।
        इस पूरे मामले को देखते हुए मेरा यह कहना लाजिमी ही होगा कि कहीं न कहीं बॉलीवुड, अंडरवर्ड और राजनीति त्रिभुज के वो तीन सिरे है, जो एक-दूसरे के आमने-सामने होते हुए भी किसी न किसी बिंदु पर जाकर एक-दूसरे से मिल रहे हैं। मैं मानती हूँ भले ही संजय दत्त सेलिब्रिटी हो, लेकिन कानून की नजरों में वह अपराधी है और ऐसी दृष्टि में उसके साथ भी वहीं बर्ताव किया जाना चाहिए, जो उस मामले में जेल की सजा काट रहे अन्य कैदियों के साथ किया जा रहा है।

-         -  गायत्री      

Wednesday, December 4, 2013

भर दें फिर हुंकार, मचा दे हाहाकार

जब कोई बेजुबान पक्षी किसी गिद्ध का शिकार बन जाता है तो वह उस पक्षी को तब तक अपनी नुकीली चोच से नोंचता है, जब तक कि उसके प्राण जिंदा रहने की अंतिम कोशिश से भी हार न मान ले। अब लाश में तब्दील हुए पक्षी को चीरने-फाड़ने की कार्यवाही की जाती है। जिसके लिए उस विशेष समुदाय के पक्षियों का दल मिलजुलकर अपनी चोच से लाश के रूप में माँस के उस लौंदे को नोंच-नोंचकर छलनी सा पारदर्शी बना देते है। लेकिन इतने पर भी उन भूखे जानवरों की भूख नहीं मिटती। वह सब अपने-अपने तरीके से लाश के माँस को नोंचते हुए चटखारे लेकर उसका भक्षण करते हैं। आप इसे क्या कहेंगे भूख की तृप्ति, हवस या और कुछ? यह तो बात हुई जानवरों की, जिनका स्वभाव ही कमजोर को डराकर उस पर शासन करना या उसे मारकर उसका भक्षण करना होता है। चलिए इस विभत्स दृश्य की कल्पना करने के बाद हम बात करते हैं आपके और मेरे मतलब की, यानि कि इंसानों की।

पिछले कई महिनों से कभी किसी भगवावस्त्रधारी तो कभी किसी श्वेत वस्त्रधारी पर नाबालिग लड़कियों व महिलाओं के साथ ज्यादती करने के मामले उजागर होते जा रहे हैं। यह सब देखकर ऐसा लगता है कि जैसे आरूषि के बाद खामोश हो चुकी लड़कियों की दर्द भरी चिखे दिल्ली गैंगरेप की शिकार निर्भया के बाद फिर से इन फिजाओं में गूँजने लगी है। सालों से सीने में दफन औरत की आबरू के लुटेरों की करतूतों से दबी-सहमी डर भरी सिसकियाँ अब आसाराम और नारायण के मामलों में एक बार फिर से तेज सुर में सुनाई दे रही है। आज के इस माहौल में हर तरफ वात्सल्य, करूणा और प्रेम की देवी कही जाने वाली औरत अपनी झोली फैलाएँ इंसाफ की गुहार कर रही है। न केवल समाज की बेटियाँ बल्कि घर की बेटियाँ भी अपने पिता, पति, भाई और मित्र से नारी जाति के प्रति न्याय की माँग रही है।

हालांकि यह बड़े दु:ख की बात है कि न केवल महानगरों में बल्कि छोटे शहरों, गाँवों व कस्बों में, जंगलों में और बाबाओं के आश्रमों में बलात्कार व यौन शोषण के काले कारनामों को अंजाम दिया जा रहा है। चौंकाने वाली बात तो यह है कि जनता के साथ इंसाफ करने वाले जज, निष्पक्ष रूप से सच-झूठ को उजागर कर लोकतंत्र का चर्तुथ स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकार, आम जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता और अपराधियों को पकड़ने वाले पुलिसकर्मी भी आज यौन शोषण के आरोपों से अछूते नहीं है।

यहाँ हम बात कर रहे हैं देश में महिला यौन शोषण व बलात्कार के बढ़ते मामलों की। क्या कोई यकीन कर सकता है कि किस तरह से लड़कों की शक्ल पाए जानवरों ने एक लड़की को चलती बस में अपनी हवस का शिकार बनाया और ऐसी बदहवास हालत में उसे सड़क पर छोड़ दिया कि वह अपनी आपबीती भी किसी को बँया न कर सके। यहाँ हथौड़ा, लौहे की रॉड या हॉकी के दमदार वार किसी पत्थर पर नहीं बल्कि एक अधमरी लड़की पर पड़े। निर्भया के साथ जैसी घृणित घटना हुई वैसी ही घृणित घटना मध्यप्रदेश के बेटमा में भी घटित हुई थी। बेटमा गैंगरेप की घटना भी इसी तरह दिल दहला देने वाली और डर के मारे सिहरकर रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना थी। जिसमें गाँव के छोरों के साथ मंत्री-संत्री के बिगड़े लाडले भी शामिल थे। इन दोनों मामलों में अंतर है तो बस इतना कि निर्भया मरकर भी दुनिया को अपनी दहाड़ सुना गई और बेटमा की बेटी जितेजी इंसाफ की इस जंग को अंतिम पड़ाव तक पहुँचाने का दम भर रही है लेकिन कब तक? कभी न कभी तो समाज, राजनीति या पेपरबाजी के चलते बदनामी के डर से यह आवाज भी खामोश हो जाएगी। कानून को न्याय देने में सालों लग जाएँगे।
    
इन सब मामलों में दोषी लोग कुछ वर्षों की सजा काटने के बाद फिर जहरीले जानवरों की तरह इस समाज में अपनी गंदी सोच की गंदगी फैलाने के लिए आपके और हमारे बीच मौजूद होंगे। उनके जहरीले डंक फिर किसी मासूम बेटी या बहू को अपना शिकार बनाएँगे और हम मौन रहेंगे। क्या करें न चाहकर भी परिस्थितियाँ और सामाजिक बँधनों की दरकार बलात्कार व यौन शोषण की शिकार लड़कियों के लब सिल देती है।

हैवानियत की बुरी नजर का शिकार हुई लड़कियों की सिसकियों भरी आवाज जब-जब न्याय के लिए उठती है तो उनकी रूदन भरी आवाज पर भूखे भेडि़यों की बुरी नजर घात लगाएँ बैठी होती है। तभी तो भगवान के दूतों से अपने पर हुए अत्याचार का जिक्र करने वाली महिलाएँ कभी ढ़ोंगी बाबाओं की और कानून से न्याय की गुहार लगाने वाली लड़कियाँ कभी वकीलों व जजों का शिकार बनती है। राजनेता जो ऐसे मामलों को संसद तक ले जाते हैं। उन्हीं के भाई-बंधु किसी की मासूम बेटी की लाचारी को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं। उसके बाद बारी आती है तो इन सभी लोगों की खिचाई करने वाले पत्रकारों की, जिनके यहाँ खामोशी से महिलाओं का यौन शोषण होता है और गाजे-बाजे के साथ कलम और ब्रेक्रिंग न्यूज के हथियारों के साथ समाज में हो रहे यौन शोषण का विरोध। दोमुँही तलवार की तरह कलम भी कभी-कभी दगा दे जाती है।  

कहने को तो हममें से दोषी कोई नहीं है और मानने को दोषी हर कोई है। बुरे को देखकर आँख मूँद लेना समझदारी नहीं है बल्कि बुरे का विरोध कर उसके खिलाफ आवाज उठाना ही असली बुद्धिमत्ता का परिचायक है। मैं यह नहीं कहती कि महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ पुरूष आवाज नहीं उठाते। यदि लोग यह सोचते हैं तो माफ कीजिएगा पर मैं ऐसे लोगों की सोच से इत्तेफाक नहीं रखती। मेरी राय इससे ठीक उलट है। मुझे लगता है कि महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ जितनी आवाज महिला समाज नहीं उठाता। उससे कई गुना अधिक स्वर उन पुरूषों के बुलंद होते हैं, जो महिलाओं को आज भी अपनी बहन, बेटी, बहू व माँ के रूप में सम्मानजनक दृष्टि से देखते हैं। कहा जाता है कि ‘नजरे बदलने से नजारें बदल जाते हैं।‘ तो यह बिल्कुल सही है। यदि हम अपनी नजरों की खोट को कम कर देंगे और नारी की सुंदरता को हम एक सही नजरिए व सही दृष्टिकोण से देखेंगे तो शायद हमारा समाज व देश दोनों ही अपराधमुक्त हो जाएँगे।
‘जहाँ बल है, वहाँ छल है। बेटी है तो कल है।‘

-          गायत्री 

Tuesday, December 3, 2013

काश-काश में ही लगा ली झूठी आस


आईने में अपनी ढ़लती उम्र को देख-देख रोना, सफेदी को डाई की कालिमा से भिगोना, तंग कपड़ों से तौबा करना और न चाहते हुए भी समय से पूर्व भगवान की भक्ति में खोना ... भला कौन चाहेगा? लेकिन ढ़लती उम्र के इस कड़वे सच को नकारना भी तो इतना आसान नहीं है। तभी तो न चाहते हुए भी हमारे मुँह से अनायास निकल ही जाता है कि काश मेरी उम्र 5-6 साल कम हो जाएँ।

अतीत की मीठी यादों में खोएँ रहना, शाहरूख खान और कैटरीना को जीवनसाथी बनाने के सपने संजोना हम सभी को अच्छा लगता है। जिसका एकमात्र कारण वास्तविकता से परे काल्पनिक जगत में हिलोरे लेती हमारे सपनों की नैया है। जो आज वाकई में राम के भरोसे ही चल रही है।

हमेशा जँवा दिखने की चाह और सब कुछ पा लेने की चाह कई बार हमसे वो काम भी करवा लेती है, जिसे करने में शायद हम ना नुकूर करते परंतु प्रेम की प्यास और जँवा दिखने की आस के आगे तो हम ‘मंजूर है मंजूर है ...’ की रट लगाकर हर काम करने को तैयार हो जाते हैं।

मिला दें तो ‘प्रभु’ ना मिले तो ‘पत्थर’ :
देखों जी, भगवान से हमारी डिमांड भी समय और वक्त देखकर बदलती रहती है। कँवारेपन में अच्छे खूबसूरत जीवनसाथी की चाह और विवाहित होने पर कँवारे प्रेमी या प्रेमिका को पाने की कामना तो हम सभी करते हैं। तभी तो इन दोनों ही स्थितियों में भगवान को अपनी पसंद बताकर सिफारिश के रूप में लगे हाथ दान-दक्षिणा के साथ उनके दर पर अपनी माँग पूरी करने की अर्जी भी हम लगा ही आते हैं। लेकिन रूठी प्रेमिका की तरह प्रभु को मनाना भी इतना आसान नहीं होता है। ‘नो हनी, विदाउट मनी’ की तर्ज पर पूजा-पाठ के साथ भगवान को रिझाने के लिए कभी लड्डू तो कभी नारियल भी चढ़ाना ही पड़ता हैं क्योंकि बगैर रिश्वत दिए तो धरती पर ही हमारे प्रयोजनों की दाल नहीं गलती तो ऊपर आसमान में विराजने वाले भगवान के लिए भी रिश्वत का होना लाजिमी ही है। यहाँ तक तो ठीक है लेकिन हमारे आदेश देने पर भी जब भगवान हमारा काम नहीं करते। तब उन्हें खरी-खोटी सुनाने और अपने लड्डूओं और नारियल की कीमत गिनाने में भी हम पीछे नहीं हटते। खैर, हो भी क्यों न इस व्यस्ततम जिंदगी में हमने अपने धन के साथ-साथ अपना कीमती वक्त जो भगवान को दिया होता है।

तुम मुझे पहले मिली होती :
यह तो हुई भगवान की बात। अब हम बात करते है इंसान की। किसी के जिंदगी में देरी से मिलने पर भी हम अपनी किस्मत और भगवान के साथ-साथ उस बेचारे इंसान को भी यह कहकर कोसना शुरू कर देते हैं – ‘काश कि तुम मुझे 5-6 साल पहले मिली होती तो आज तुम मेरी होती।‘ यह बात हम केवल छोकरी के संबंध में ही नहीं कहते बल्कि नौकरी और करियर के बारे में भी अक्सर हम यहीं डायलॉग मारते हैं कि ‘काश, मेरे माँ-बाप मुझे बाहर जाने को हाँ कह देते या काश उस वक्त मैं फला इंसान की बात मान लेता तो आज वह नौकरी मेरी होती।‘

हे भगवान, आखिर कब तक आज इसको तो कल किसी ओर को कोसने यह सिलसिला चलता रहेगा? जीवन में संतोष की तलाश कब जारी रहेगी? शायद तब तक जब तक हम स्वयं अपनी काबिलियत को नहीं पहचानेंगे और वर्तमान में जो कुछ हमारे पास है। उसमें खुश रहना नहीं सीखेंगे। यदि हमनें वास्तविकता को अपना लिया तो शायद हमारा कल्याण हो जाएगा। जो सच है उसे स्वीकारो मेरे दोस्त क्योंकि शुर्तर्मुग की तरह रेत में अपना मुँह छुपा लेने से तूफान हमारा नुकसान नहीं करेगा। ऐसा सोचना हमारा भ्रम है। आपने यह तो सुना ही होगा –

‘कभी किसी को मुकम्मल जँहा नहीं मिलता
कही ज़मी तो कहीं आसमा नहीं मिलता।‘

-          गायत्री