Sunday, August 31, 2014

‘लव’ के नाम पर ‘जिहाद’ क्यों?

-          गायत्री शर्मा  
‘लव जिहाद’ यानि कि ‘प्रेम युद्ध’, यह शब्द अब उत्तरप्रदेश के सियासी गलियारों से निकलकर दिल्ली की ज़ामा मस्जि़द में गूँज रहा है। उत्तरप्रदेश में चुनाव के मद्देनजर भगवाधारी जहाँ इसे प्रमुख चुनावी मुद्दा बना रहे हैं वहीं इस्लाम धर्मावलंबी इसे इस्लाम की छवि को धूमिल करने के लिए काल्पनिक रूप से गढ़े मुद्दे का नाम दे रहे हैं। इस मुद्दे में कितनी हकीकत है। यह तो हमें वक्त और तथ्य ही बताएँगे लेकिन यहाँ सवाल यह उठता है कि चुनावी माहौल में अचानक इस मुद्दे को और वह भी मुस्लिम बाहुल्य राज्य उत्तरप्रदेश में उठाया जाना कितना लाजि़मी है?
     ‘लव जिहाद’ का सीधा अर्थ दुर्भावनावश किया गया प्रेम और विवाह है। हकीकत में हम इसे प्रेम भी नहीं कह सकते हैं क्योंकि प्रेम कभी भी इच्छा के विरूद्ध धर्मांतरण के नाप़ाक इरादे से नहीं किया जाता है। हाँ, यह ज़रूर हो सकता है कि प्रेम समाज के कड़े कायदों व कानून के शिंकजे से बचने के लिए स्वेच्छा से इस्लाम कबूल कर निकाह के रूप में विवाह करने की गली निकाल सकता है परंतु धोखाधड़ी के लिए जबरन धर्मांतरण कराना इसका भी मकसद नहीं होता है। यकीन मानिएँ, जहाँ प्रेम है, वहाँ जाति, धर्म, गौत्र आदि के बँधन गौण है क्योंकि ये बँधन तो तथाकथित समाज ने बनाएँ है और प्रेम कभी बँधनों में बँधकर नहीं रह सकता है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि शिद्दत से किए गए सच्चे प्रेम यानि कि ‘लव’ में कभी भी ‘जिहाद’ के नाप़ाक मंसूबे नहीं होते हैं। इसलिए यह बात तो स्पष्ट है कि ‘लव’, ‘जिहाद’ से अलहदा है। जहाँ ‘जिहाद’ है वहाँ ‘लव’ हो ही नहीं सकता। यहीं वज़ह है कि प्रेमियों से परे कट्टरपंथी जेहादियों के लिए ‘लव जिहाद’ शब्द का प्रयोग किया जाता है।
       किसी भी धर्म को दिल से व आपसी रजामंदी से अपनाया जाता है न कि जर्बदस्ती। खासकर प्रेम और धर्मांतरण के मामले में व्यक्ति की स्वेच्छा प्रमुख शर्त होती है लेकिन ‘लव जिहाद’ का कंसेप्ट ही किसी की इच्छा के विरूद्ध प्यार व शादी के नाम पर उसका गैर इस्लाम से इस्लाम में धर्मांतरण कराना है। प्यार में विवाह के नाम पर किसी के साथ धोखाधड़ी कर उसके जीवन को बर्बाद करने की इज़ाज़त हमारे यहाँ न तो कोई धर्म देता है और न ही कोई कानून, फिर चाहे वह इस्लाम धर्म हो या हिंदू धर्म। यदि हकीकत में किसी धर्म विशेष के नाम पर ऐसा किया जा रहा है तो वह निंदनीय है। ऐसा कृत्य करने व कराने वालों के प्रति कानून को कड़ा रूख अपनाना चाहिए, जिससे इस्लाम की छवि पर लगाया जाने वाला यह बदनुमा दाग धुल सके।
       धन के बदले धर्म परिवर्तन, यह सुनकर आपको ऐसा नहीं लगता कि आज हम फिर से गुलाम होने जा रहे हैं और वह भी अपने ही देश में अपने ही लोगों के द्वारा। आज ‘लव जिहाद’ के नाम पर इस्लाम धर्मांतरण की बात की जा रही है और दक्षिण में कुछ इसी तरह की सुगबुगाहट ईसाई धर्मांतरण के मामले में भी सुनने को मिली है। क्या आज हमारे लिए धर्म का अर्थ महज लोगों की भीड़ इकट्ठा कर उन पर अपने धर्म विशेष की छाप लगाना मात्र ही रह गया है या ऐसा करने वाले तथाकथित कट्टरपंथी ‘लव जिहाद’ के नाम पर भारत को बाँटने की और हमारी एकता को पाटने की नाप़ाक कोशिश कर रहे हैं? जरा अपने दीमाग पर जोर डालकर सोचिएँ कि किसी को धर्मांतरण के लिए प्रेरित करने वालों को आखिर ऐसा क्या मिल रहा है, जिसके बदले वह यह कार्य कर रहे हैं, क्या मोटी रकम या धर्मांतरण से मिलने वाली मानसिक शांति या फिर धर्म के नाम पर भारत को बाँटने की साजिश से मिलने वाला सुख? क्या पश्चिमी देश भारत में सांप्रदायिकता के गढ़ को ध्वस्त करने के लिए ऐसा कर रहे है या हमारे ही देश के लोग ‘फूट डालो, भीड़ बढ़ाओ’ की नीति के तहत ऐसा कर रहे हैं? ऐसे अनगिनत सवाल आज हमारे जेहन में गूँज रहे हैं। यकीन मानिएँ कोई भी व्यक्ति या धर्म आप पर तभी हावी हो सकता है, जब आपका अपने धर्म के प्रति विश्वास कमजोर हो या वह दूसरा धर्म आपके धर्म से अधिक ताकतवर हो। आखिर अपनी इच्छा के विरूद्ध लालच में आकर धर्मांतरण करने लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि हम लोग तो ऐसे लोकतांत्रिक देश के वासी है, जहाँ हमें धर्मावलंबन व धर्म परिवर्तन की पूर्णत: स्वतंत्रता है ऐसे में किसी धर्म विशेष के नाम पर कोई हमें क्यों प्रलोभित कर रहा है? इस ‘क्यों’ का जवाब जब आपको मिल जाएगा। तब आपको ऐसा करने वालों के नापाक मंसूबों का भी ज्ञान हो जाएगा।
          मेरा आपसे यह प्रश्न है कि क्या वाकई में आपको लगता है कि मानसिक व शारीरिक रूप से परिपक्व वयस्क युवा ‘लव जिहाद’ में फँसने की भूल कर सकते हैं या फिर कुछ पुराने मामलों का हवाला देकर इस मुद्दे को न केवल चुनावी मुद्दा बनाने की बल्कि ‘लव जिहाद’ के नाम पर सांप्रदायिक सद्भाव में खलल डालने की कोशिश की जा रही है? हमारा देश का अमन-चैन का देश है। ऐसे शांतिप्रिय देश में ‘लव जिहाद’ के नाम पर लोगों में सांप्रदायिकता फैलाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि सर्वधर्म सद्भाव के प्रतीक इस देश में ‘लव जिहाद’ के नाम पर इस्लाम की छवि पर प्रश्नचिन्ह लगाकर आरोप-प्रत्यारोप करने की बजाय हम सभी को मिलकर इस विषय पर खुली बहस करेंगे क्योंकि यह मामला कहीं न कहीं देश के भविष्य कहे जाने वाले युवाओं से जुड़ा है। यदि हकीकत में देश में इस तरह के कुछ मामले सामने आए है तो हिंदू-मुस्लिम दोनों को मिलकर उस मामले की पारदर्शी जाँच करानी चाहिएँ न कि धर्म की कट्टरता के नाम पर लाठियाँ लेकर सड़कों पर हो-हल्ला व प्रदर्शन करना चाहिए। आशा है आप और हम मिलकर इस मुद्दे पर अपनी शांतिप्रियता का परिचय देकर विवाद करने की बजाय सत्य के रहस्योद्घाटन की ओर अपना अगला कदम बढ़ाएँगे। जिससे कि इस मुद्दे पर दलगत राजनीति बंद होगी और असली हकीकत हमारे सामने आएगी।

चित्र हेतु साभार - ओपन दि मैग्जीन डॉट कॉम 

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Tuesday, August 26, 2014

कैसी हो तुम भैंस महारानी ?

-          गायत्री शर्मा
बाबूजीजरा धीरे चलोबिजली खड़ीयहाँ बिजली खड़ी ...’दम’ की याना गुप्ता की तरह अब मंत्री जी की वीआईपी भैंसे भी दमदार ठुमके लगाकर यही गीत गा रही है। जी हाँआप सही सोच रहे हैंयह वहीं यूपी हैजहाँ ससुरी भैंसन की सिक्यूरिटी में पूरा प्रशासनिक अमला लग जाता है और बेचारे आम आदमी को सुरक्षा के नाम पर ठेंगा दिखाया जाता है। यहाँ अपराधियों को पकड़ने में तो पुलिस सुस्ती दिखाती हैं पर मंत्री महोदय की गुम भैंसों को खोजने में उनकी रातों की नींद उड़ जाती है और आखिरकार कुत्तों की मदद से भैंसों को ढूँढने के बाद ही पुलिस राहत की सास लेती है। आपको क्या लगता हैऐसा क्या है इन भैंसों मेंजो इनकी अगुवाई के लिए सरकारी गाडि़याँ सायरन बजाते हुए आगे चलती है और कैटरीना कैफ सी नाजुक भैंसे हौले-हौले आरामदायक सफर का लुत्फ उठाती है। बुरा न लगे तो एक कड़वा सच कहूँ मंत्री जीयदि आपके राज में इसी तरह भैंसे वीआईपी बनती रही तो कहीं अतिशय भैंस प्रेम के कारण जनता आपको तबेले का रास्ता न दिखा दें।
         सुनने में आया है कि नेताजी को भैंसों से ईश्क हो गया है और उनकी वीआईपी भैंसों को देखकर अब दूसरे नेताओं को रश्क हो रहा है। हर कोई यह सोच रहा है कि मंत्री जी को खुश करने के लिए कहीं उन्हें भैंसों के रखरखाव की ट्रेनिंग न लेनी पड़े और जरूरत पड़ने पर इन मंत्री जी की भैंसों के साथ मंच शेयर न करना पड़े। कुछ ऐसी ही बात सुनने में आई है कि कुछ दिनों पहले मंत्री जी की भैंसों की अगुवाई करने वाले पुलिकर्मियों ने थाने में भैंसों की आवभगत में जी-जान लगा दी। किसी ने उन वीआईपी भैंस महारानियों को चारा खिलाया तो किसी ने रोटी और गुड़। यह दृश्य कुछ ऐसा था जैसे मंत्री जी की कोई प्रियतमा मजबूरीवश एक रात के लिए थाने में ठहरी हो और उनकी आवभगत में किसी भी कमी का होना पुलिसकर्मियों को मंत्री जी का कोपभाजन बना सकता हो। यहीं वजह है कि भैंसों के आगमन की सूचना मिलते ही नेता से लेकर अधिकारीगण सब सक्रिय हो गए और इन सभी ने मिलकर भैंसों की बेहतरीन खातिरदारी कर मंत्री जी को खुश करने का प्रयास किया। इससे पहले भी नेताजी की चहेती सात भैंसों के गुम होने की खबर सुनकर पुलिसकर्मियों में हडकंप मच गया था। उस वक्त तो सड़कों पर ‘भौ-भौ’ कर भैंसों को दौड़ानें वाले कुत्ते भी अपना स्वभाव भूलकर खेत-खलिहानों को सूँघ-सूँघकर बड़े ही प्यार से उन भैंसों को घर लौट आने के लिए पुकार रहे थे। हालाँकि अब तक यह पता नहीं चल पाया है कि भैंसों को तबेले से भटकाकर खेत-खलियानों में सैर कराने वाली चाल विपक्ष की थी या किसी शत्रु की।  
          कितना अच्छा हो यदि यूपी राज्य के चुनावों में भैंसों के लिए सीट आरक्षित हो और भैंसे ‘भैभै ...’ करके आपसे वोट माँगे। भैंसों पर अश्लील कमेंट करने पर आपको सजा मिले। ऐसा भी हो सकता है कि भैंसों की कृपा से उनके प्रिय नेताजी ही सीएम बन जाएँ फिर तो राज्य में भैंसों को अल्पसंख्यक वर्ग में आरक्षण मिल जाएगा और आपके साथ बस या ट्रेन के एसी कोच में भैंसे सफर करेगी। भैंस को ‘पशु शिरोमणी’ का दर्जा दिए जाने की पहल केवल यूपी में ही हो सकती है। जहाँ अपराधों के बढ़ते ग्राफ के कारण इंसान हर रोज जानवरों की तरह मरते हैं और जानवर की गिनती में आने वाली भैंसे आलीशान वातानुकूलित तबेलों में आराम फरमाती है।
        पंजाबहरियाणा की हरियाली को छोड़ यूपी में दस्तक देती भैंसों का भाग्य आज अपने भैंस होने पर इठला रहा होगा और वह बार-बार ईश्वर से यह दुआ कर रही होगी कि दाताअगले जनम मोहे भैंस ही किजो। यदि तू हमें भैंस बनइयों तो खान साहब के घर की भैंस बनईयो ताकि हमरी जवानी पर बुरी नजर डालने वालों की आँखे ही फूट जाएँ। सच कहूँ तो यह हमारे बड़बोले मंत्री साहब का उदार दिल ही हैजो भैंसों को भी मंत्रियों के समान वीआईपी ट्रीटमेंट मिल रहा है। वर्ना दूसरे राज्यों की भैंसे तो बेचारी लकड़ी की मार सह-सहकर बूढ़ी हो जाती है। उनकी किस्मत में नीलीपीली बत्तियों की गाड़ी की अगुवाई तो दूरइन गाड़ी के नीचे आकर जान देना भी नसीब नहीं होता है।
          अंत में चलते-चलते मैं इन खुशनसीब भैंसों को नमन करती हूँ और ईश्वर से दुआ करती हूँ कि किसी दिन मुझे भी इन मोहिनी भैंसों के दर्शन लाभ का सौभाग्य दिलाना ताकि मेरा भी भाग्य सँवर जाएँ और मैं भी मंत्री जी की मेहरबानी से सरकारी नौकरी पाने वाले खुशनसीबों की श्रेणी में शामिल हो जाऊँ। हे भैंस महारानीहम सब पर कृपा करो। मंत्री जी से कहकर देश में दूध के बढ़ते दाम को गिराओं और देश को गरीबी व मँहगाई से मुक्त कराओ। प्यारी भैंसआप अपने नेताजी को सींग मारते हुए जनता की ओर से यह नसीहत भी देना कि आम जनता उन्हें वोट देती है न कि कोई भैंस महारानी। इसलिए वे आपकी फिक्र छोड़ते हुए अपने वोटरों की फिक्र करें। कहीं ऐसा न हो कि अगले चुनाव में वोटर उन्हें ठेंगा दिखा दे और उन्हें परमानेंटली आपकी सेवा-चाकरी में लगना पड़ें।    

सूचना : कृपया इस ब्लॉग से किसी भी सामग्री का प्रयोग करते समय साभार देना व सूचनार्थ मेल प्रेषित करना न भूलें। मेरे इस लेख का प्रकाशन रतलाम सेे प्रकाशित होने वाले दैनिक 'सिंघम टाइम्स' अखबार और हिंदी सटायर' पोर्टल के दिनांक 26 अगस्त 2014 के अंक में प्रकाशित हुआ है। 
http://hindisatire.com/?p=1448

http://singhamtimes.com/?p=2341

उत्तरप्रदेश के प्रमुख अखबार ‘जनसंदेश टाइम्स’ के दिनांक 27 अगस्त 2014, बुधवार के अंक में ‘कैसी हो तुम भैंस महारानी’ शीर्षक से प्रकाशित मेरा व्यंग्य।

उत्तरप्रदेश व उत्तराखंड के प्रमुख अखबार दैनिक ‘जनवाणी’ के 27 अगस्त 2014, बुधवार के अंक में ‘अगले जनम मोहे भैंस ही किजो’ शीर्षक से प्रकाशित मेरा व्यंग्य लेख।  

‘खरी न्यूज डॉट कॉम’ पोर्टल के 27 अगस्त 2014, बुधवार के अंक में प्रकाशित यूपी की भैंसों पर केंद्रित मेरा व्यंग्य लेख

Thursday, August 21, 2014

कहाँ गुम हो गई बिजली ?


- -          गायत्री शर्मा
घोटालों के लिए विश्व प्रसिद्ध इस देश में प्रतिवर्ष किसी न किसी नए घोटाले से पर्दाफाश होता है। भारत की राजनीति में घोटालों की सड़ांध लागाने वाले राजनेताओं ने कभी चारा खाया तो कभी स्टाम्प में घपला किया, कभी टैक्स चोरी की तो कभी ये नेता देश की 193 कोयला खदानों को ही निगल गए। सिर से पाँव तक कोयले की कालिमा से रंगे राजनेता करोड़ों रुपयों के लालच में बेसुध बन सरकार के पास रिजर्व कोयले से बिजली आपूर्ति के उस महत्वपूर्ण गणित को लगाना तो भूल ही गए, जिससे देश के करोड़ों घरों की रोशनी हमेशा के लिए छिनने की नौबत आ गई। यही वजह है कि आज 1 लाख 86 हजार करोड़ रुपए के अनुमानित नुकसान के साथ कोयला घोटाला देश के अव्वल घोटालों में शुमार हो गया है।
      सुबह का भूला भी थक हारकर शाम को घर लौट आता है पर बैरन बिजली तो आजकल बार-बार हमारे घरों का रास्ता भटकती जा रही है। कुछ पल का अँधेरा तो हम बर्दाश्त कर सकते हैं लेकिन जब अँधेरा कभी खत्म न होने की बुरी खबर लेकर आएँ तो उस अँधेरे में गुम रोशनी की कीमत हमें पता चलती है। जिस तरह प्यासा पानी की एक-एक बूँद के लिए तरसता है ठीक उसी तरह बिजली संकट से जूझते लोग पंखे और लाइट की तरफ टकटकी लगाए बिजली की मेहरबानी के इंतजार में अपनी कई रातें गुजार देते हैं। देश की राजनीति में वोट बैंक का खजाना कहा जाने वाला राज्य उत्तरप्रदेश कल तक बिजली संकट से त्राहि-त्राहि कर रहा था लेकिन अब राजनेताओं की नगरी दिल्ली भी बिजली की किल्लत से कराह रही है। आपकी जानकारी के लिए हमारे देश में लगभग 69 प्रतिशत बिजली कोयले से बनाई जाती है यानि कि बिजली निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण कारक कोयला ही है। कोयले की कीमत का अंदाजा हम इस बात से भी लगा सकते है कि महज 1 यूनिट बिजली पैदा करने ‍में लगभग 800 ग्राम कोयले की खपत होती है। जो अमूल्य कोयला देश के करोड़ों घरों को रोशन कर रहा है। वहीं कोयला आज घोटालों का शिकार बन बड़ी आसानी से सरकारी हाथों से फिसलकर निजी हाथों में जा रहा है। देश में गहराते बिजली संकट पर ऊर्जा मंत्री कोयले की अनुपलब्धता का रोना रो रहे हैं तो वहीं सस्ते में कोल ब्लॉक पाने वाले खुशनसीब उद्योगपति व राजनेता कोल ब्लॉक से जमकर नोट छाप रहे हैं। हमारे घरों की कीमती बिजली उन्हें मुफ्त मिल रही है। कोयला घोटाले में लिप्त राजनेताओं की कोल ब्लॉक आवंटन में पूंजीपतियों के प्रति उदारता को देखकर यहीं कहा जाएगा कि उर्जा मंत्री जी अपने घर में अँधेरा कर दूसरों के घरों को रोशन करने चले है।
    गरीबों की तरह कम बिजली की खपत करने वाले देश भारत का भरपूर कोल ब्लॉक होते के बावजूद भी बिजली के लिए त्राहि-त्राहि करना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। अमेरिका (13,647 यूनिट), ‍चीन (2,456 यूनिट) और कनाडा (1,237 यूनिट) के मुकाबले भारत में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत सबसे कम यानि कि मात्र 734 यूनिट है लेकिन न्यून बिजली खपत के बावजूद भी आज हमें भरपूर बिजली नहीं मिल पा रही है। संसद में बार-बार गूँजायमान कोयला घोटाला तो बहुत बड़ा हुआ पर जाँच के नाम पर मात्र औपचारिकताओं ने इस घोटाले को छोटा करार देकर दबा दिया। यह बड़े अचरज की बात है कि कोयला घोटाले की अब तक दर्ज 20 एफआईआर में केवल 2 मामलों में ही सीबीआई ने चार्जशीट दायर की अन्य 4 मामलों में सीबीआई क्लोजर रिपोर्ट दर्ज कर पाई। इसी से पता लगता है कि कोल ब्लॉक आवंटन में हुई भारी गड़बड़ी में राजनेताओं, उद्योगपतियों व प्रशासनिक अधिकारियों सबकी साठ-गाँठ है।    

कहते हैं जब सैय्या कैबिनेट मंत्री हो तो पूरा देश जैसे आपकी जागीर बन जाता है। कुछ ऐसा ही हमारे ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल के राज में भी हो रहा है। ताबड़तोड़ अँधेरी रातों में दिल्ली की सड़कों पर पावर स्टेशनों के निर्माण कार्यों का जायजा लेकर अपनी चुस्ती दिखाने वाले नेताजी आज मन ही मन बिजली किल्लत को लेकर उठते सवालों से घबरा रहे हैं। घोटालों से गले-गले तक भर चुके ये राजनेता अब बिजली संकट पर जनता के तीखे सवालों से कन्नी काटने में ही अपनी समझदारी मान रहे हैं। लेकिन मुँह छिपाने या चुप्पी साधने से कुछ नहीं होगा। मानसून की मेहरबानी बिजली संकट से त्रस्त लोगों को कुछ समय तक राहत दे सकती है पर असली राहत तो हमें तब मिलेगी, जब कोल ब्लॉक आवंटन में हुई गड़बडि़याँ सार्वजनिक रूप से स्वीकारी जाएगी। जब बिजली कटौती पूरी तरह से बंद होगी और हमें सस्ती दरों पर बिजली मिलेगी।   

सूचना : इस ब्लॉग से किसी भी सामग्री का उपयोग करते समय साभार देना व सूचनार्थ मेल करना न भूलें। मेरे इस लेख का प्रकाशन उत्तरप्रदेश के प्रमुख दैनिक 'कल्पतरू एक्सप्रेस' के दिनांक 21 अगस्त 2014 के अंक में हुआ है।
 

Friday, August 15, 2014

कितने आज़ाद है हम ?

-          गायत्री शर्मा
15 अगस्त, केवल तिरंगा फहराकर, राष्ट्रागान गाने का ही दिन नहीं है। यह दिन है देश की मौजूदा स्थिति में आम आदमी की आज़ादी पर चिंतन करने का। यह दिन है देश में भीतराघात करने वाले भ्रष्ट व दागी नेताओं से देश को आज़ाद करने का। यह दिन है पूरी तरह से आज़ाद होकर आज़ादी पर्व मनाने का। 15 अगस्त के दिन चौराहों पर लहराता यह वहीं तिरंगा है, जो किसी सैनिक के लिए कुरान, गीता, बाइबल व गुरू ग्रंथ साहिब के समान पवित्र है। जिसकी आन, बान, शान के लिए वह अपने प्राणों की आहूति देने से भी गुरेज नहीं करता, उस तिरंगे को आखिर हम कैसे उन भ्रष्ट नेताओं के हाथों में फहराने को दे सकते हैं, जो स्वयं भ्रष्टचार व अपराधों के दाग से इसे दागदार कर रहे हैं? आज आप स्वयं से यह प्रश्न कीजिए और सोचिए कि क्या हमारे देश में एक भी ऐसा ईमानदार आम आदमी नहीं है, जो देश के राष्ट्रध्वज तिरंगे को फहरा सके? क्या तिरंगे को फहराने के लिए राजनेता होना ही प्रमुख शर्त है या ‍क्या हमारे लिए राजनेता ही ईमानदार बेदाग व्यक्ति का परिचायक है?    

आज़ादी का आपके लिए क्या अर्थ है? क्या अंग्रेजों की गुलामी से आजादी को ही आप आज़ादी मानते हैं या फिर इससे अधिक भी आपके लिए आजादी का कोई अर्थ हैं? स्वतंत्रता से रहने, बोलने और घुमने-फिरने से परे भी आज़ादी का एक और अर्थ है, जिससे हम अब तक अनभिज्ञ है। कहने को तो आज हम आज़ाद है पर शायद पूरी तरह से नहीं क्योंकि कहीं न कहीं महँगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अशिक्षा और गरीबी के रूप में गुलामी की बेडि़याँ हमें अब तक जकड़े हुए है। यहीं वज़ह है कि सरकारें बदल-बदलकर बार-बार हम आज़ाद होने के लिए अपने पंख फड़फड़ाते हैं परंतु मौजूदा व्यवस्था के आगे बेबस होकर हर बार हम हारकर खामोश बैठ जाते हैं। आप ही बताइएं ऐसी आज़ादी के क्या माइने हैं, जिसमें अभिव्यक्ति की आज़ादी तो हैं पर कूट राजनीति के अंकुश के साथ, जहाँ मीडिया की स्वतंत्रता तो है परंतु राजनीतिक दलों के परोक्ष नियंत्रण के अधीन, जहाँ रोटी, कपड़ा और मकान की उपलब्धता तो है पर महँगाई के खूबसूरत टैग के साथ?

15 अगस्त, आज़ादी पर्व के रूप में खुशियाँ मनाने के साथ ही गहन चिंतन करने का दिन है। चितंन इस बात पर कि आखिर क्यों हम अब तक गुलाम है? क्या 67 वर्षों में हमने कभी इस गुलामी से आज़ादी की पहल नहीं की? कहने को भारत दुनिया का सबसे बड़ा ‘लोकतंत्र’ है परंतु असल में इस लोकतंत्र में ‘लोक’ की भूमिका मुहर मात्र की है और भ्रष्ट ‘तंत्र’ उस ‘लोक’ पर लगातार हावी हो रहा है। अच्छे दिनों की आस में पिछले 67 सालों से टकटकी लगाएँ बैठे लोग अब निराश हो चुके हैं क्योंकि बेरोजगारी व महँगाई के चलते अमीरी-गरीबी के मध्य खाई अब कम होने की बजाय दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है।

आज देश का युवा शिक्षित तो है पर बेरोजगार है, उसके पास हूनर व प्रतिभा है पर उसे प्रदर्शित करने का मंच नहीं है, यहीं वजह है कि आज देश का युवा रोजगार की तलाश में विदेशों की ओर पलायन कर रहा हैं। भारत का उच्च शिक्षित युवा अब अपने ज्ञान का उपयोग अमेरिका, दुबई, जापान और मलेशिया के विकास में कर रहा है और भारत की स्थिति जस से तस पिछड़े देशों में होती जा रही है। इसे हमारी मूर्खता ही कहें कि विदेशों में भारतवंशियों की कामयाबी के किस्से सुनकर हम फूले नहीं समाते हैं पर ऐसा करते समय एक बार भी यह नहीं सोचते कि यदि ये लोग भारत में रहकर भारत का नाम रोशन करते तो इससे उनके अपने देश की ही कायापलट होती। हालाँकि इससका दोष उनसे कहीं अधिक हमारी सरकार का है, जो देश के नौजवानों को नए दौर का कूड़ा समझकर उसकी अनदेखी कर रही हैं।

अब बात आती है आम आदमी की दो सबसे बड़ी समस्याओं गरीबी और महँगाई की, जिसकी गुलामी से हम आज तक मुक्त नहीं हो पाएं है। यह सरकार की आम आदमी के प्रति अनदेखी ही है, जिसके चलते गरीबों के पास न तो रहने को मकान है, न खाने को रोटी है और न ही तन ढ़कने को कपड़ा। आज देश के अधिकांश गाँवों में शौचालय नहीं है, शिक्षा के नाम पर वहाँ खंडहरों की शक्ल में तब्दील होते सरकारी विद्यालय है, जिनकी सुरक्षा भगवान के भरोसे हैं। विदेशों में जैसा होता है, उससे ठीक उलट हमारे देश में होता है। विदेशों में सरकारी महकमा आम आदमी को रोजगार, सुरक्षा व बेहतर सुविधाओं की ग्यारन्टी देता है लेकिन हमारे यहाँ जिस तंत्र को सदा अपने कार्य के प्रति मुस्तैद होना चाहिए, वह सरकारी तंत्र भ्रष्ट, सुस्त और आरामी है। तभी तो आज बाजार में प्राइवेटाइजेशन का बोलाबाला है, जो आम आदमी की मेहनत को निचौड़कर अपने बढ़ते कद के साथ सरकारी तंत्र को मुँह चिढ़ा रहा है। दुनिया तो दुनिया आज हमारा देश ही स्वयं अपनी हालत पर अट्टाहस कर रहा है। तभी तो हमारे यहाँ योजना आयोग की गरीबी की परिभाषा हवाओं में हकीकत के धरातल से परे कल्पनाओं में गढ़ी जाती है।

आम आदमी को मुँह चिढ़ाती महँगाई डायन हमारी आमदनी को इतनी अधिक तेजी से निगल रही है कि घर चलाने के लिए मजबूरन हमें कर्ज लेना पड़ रहा है। यह महँगाई डायन ही है, जिससे त्राहि-त्राहि कर हर आम आदमी के मुँह से यह निकल रहा है – ‘सखि, सैय्या तो खूब ही कमात है, महँगाई डायन खाएँ जात है।‘ फिल्म ‘पीपली लाइव’ की कहानी आज हकीकत में आम आदमी के दर्द के रूप में बँया हो रही है। महँगाई पर भ्रष्टाचार का तड़का अब आम आदमी की कमर तोड़ने की आखिरी कसर भी पूरी कर रहा है। सच में कभी-कभी तो शर्म आती है मुझे यह कहते हुए कि इस देश में ईमानदार बनने के लिए भी बेईमानी का सहारा लेना पड़ता है। यहीं कारण है कि यूपीएसी व पीएससी, सिविल जज परीक्षाओं तथा पुलिसकर्मियों की भर्ती की प्रक्रियाओं में आए दिन भ्रष्टाचार के अनगिनत मामले सामने आते हैं।

क्या होगा इस देश का? आपको नहीं लगता कि अतीत की सुनहरी यादों में कभी सोने की चिडि़याँ कहाने वाले इस देश की सारी सोने की चिडि़याँ स्विस बैंक में जाकर बैठ गई है और हम अब तक गरीबी के भम्र में चि‍रनिद्रा में सोएँ हुए है? हमारा धन राजनेताओं के आलीशान बँगलों की चकाचौंध में आज भी चमक रहा है और हम है कि अपनी ईमानदारी का परिचय देते हुए तरह-तरह के टैक्स देकर देश के विकास के स्वप्न सजाएँ हुए है। 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कोयला घोटाला, चारा घोटाला, स्टाम्प घोटाला ... ऐसा लगता है कि इस देश की पहचान ही अब घोटाले बन गए है और हमारे नेता घोटालेबाज। मुझे नहीं लगता कि हमारे यूँ खामोश बैठे रहने से यह देश आजा़द हो जाएगा। जागिए, मेरे देशवासियों! इससे पहले कि भ्रष्टाचार हमारी आवाज़ को कुचल दें और महँगाई हमारे गले को काट दें। अपने हक के लिए आवाज़ उठाइएँ और सही माइनों में इस देश को महँगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अशिक्षा और गरीबी की गुलामी से आज़ाद कर सही अर्थों में स्वतंत्रता दिवस मनाइएँ।

सूचना : कृपया इस ब्लॉग से किसी भी सामग्री का प्रयोग करते समय मुझे सूचनार्थ मेल भेजना व साभार देना न भूलें। मेरे इस लेख का प्रकाशन ‘खरी न्यूज डॉट कॉम’ पोर्टल के 15 अगस्त 2014 के अंक में हुआ है।

http://kharinews.com/news/khari-baat/%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%86%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%B9%E0%A4%AE/

Sunday, August 10, 2014

विश्वास को बाँधती रेशम की डोर ...

- -  गायत्री शर्मा
यहाँ रिश्तों का नहीं बल्कि भावों का मोल है। भाई और बहन के स्नेहिल रिश्तें में भाव ही तो अनमोल होते हैं। रक्षाबंधन के दिन भाई की कलाई पर बँधने वाली रेशम की फिसलन भरी डोर भी भावों की गाँठों से इतनी अधिक मजबूत हो जाती है कि उसकी हर एक गाँठ भाई-बहन को जन्म-जन्मांतर के अटूट बँधन से बाँध देती है। अपनी लाडली बहन पर दुनियाभर का प्यार लुटाने वाला भाई आज फिर रक्षाबंधन के बहाने अपनी बहन की रक्षा के संकल्प को दुहराता है और शुरूआत करता है उस मधुर रिश्तें की, जिसमें प्रेम है, विश्वास है, पवित्रता है और उससे भी कहीं ज्यादा सुरक्षा का अहसास है।
हमारे यहाँ त्योंहार की फेहरिस्त बड़ी लंबी है पर उन सभी त्योंहारों को मनाने का मकसद अमूमन एक ही होता है और वह होता हैं – समाज में प्रेम, विश्वास, भाईचारा और रिश्तों की पवित्रता को बरकरार बनाएँ रखने का। इस आपाधापी भरी जिंदगी में यूँ तो हमें फुरसत नहीं है दुनियादारी के रिश्तों को निभाने की, पर ‘रक्षाबंधन’ एक ऐसा त्योंहार है, जिसमें हमारे पास दूरियों और व्यस्तताओं का बहाना नहीं होता। भाई की एक प्यार भरी पुकार पर उसकी बहन मीलों की दूरियाँ तय कर भाई को अपने करीब होने का अहसास कराने आ ही जाती है। बात-बात पर भाई की बलाईयाँ लेने वाली बहन की सफर की सारी थकान भाई के दीदार से मिलने वाली खुशी के आगे गौण हो जाती है। तभी तो बाबुल के अँगना में चिडि़याँ सी चहकने वाली चंचल बहना रेशम की डोर व खुशियों की मिठास के साथ भाई के दरवाजे पर दस्तक देती हैं और भाई भी बहन के आगे शीश नवाकर और उसके माथे पर अपना स्नेहिल स्पर्श देकर प्रीत के इस बँधन के आगे नतमस्तक हो जाता है। यही है प्रेम का सजदा, जिसमें भावों का कोई रंग नहीं है। यहाँ जात-पात और ऊँच-नीच का कोई बँधन नहीं है। कलाई की नब्ज़ से सीधे दिल को छूने वाले ‍अटूट रिश्तों की नाड़ी को कसकर बाँधने वाली बहन की राखी कलाई से छूट जाने पर भी अपने पवित्र भावों के बँधन से भाई को सदा के लिए बाँध जाती है। यह रिश्तों में प्रीत की गर्माहट ही है, जो भाई-बहन के दिलों में मीठी यादों की धड़कन बन धड़कती है।
रिश्तों में प्रेम और विश्वास ही इस त्योंहार को मनाने का मुख्य मकसद है फिर चाहें वह जन्मजात रिश्तें हो या प्रेमवश बनाऐँ गए रिश्तें। आप और हम इस मकसद में कितने कामयाब हुए है। यह तो हम बखूबी जानते हैं। याद रखिएँ रिश्ता कैसा भी हो हममें उसको निभाने की शिद्दत और ईमानदारी का होना बेहद जरूरी है। तभी तो ऐसे मधुर रिश्तें याद करने मात्र से ही हमारे होठों पर मुस्कुराहट छेड़ देते हैं, स्मृतियों में कैद मीठी यादों की पोटली खोल देते हैं और हमें फक्र से यह कहने पर मजबूर कर देते हैं कि हम भाई-बहन का रिश्ता दुनिया के हर रिश्तें से खूबसूरत और दोस्ताना है। आप सभी को रक्षाबंधन की अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ हर बहन के लिए यहीं संदेश कि इस बार आप अपनी भाईं की कलाई पर विश्वास की मजबूत गाँठ बाँधना मत भूलना।

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नोट : इस ब्लॉग से किसी भी सामग्री का प्रयोग करते समं सूचनार्थ मेल भेजना व साभार देना न भूलें। मेरे इस लेख का प्रकाशन 'खरी न्यूज डॉट कॉम' पोर्टल व 'गुड़गांव टूडे' अखबार के दिनांक 10 अगस्त 2014, रविवार के अंक में हुआ है। 

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बहन की रक्षा करने में कितने कामयाब हुए है हम?

-          गायत्री शर्मा
यह रिश्ता है प्रेम और विश्वास का, जिसमें औपचारिकताएँ गौण है और विश्वास सर्वोपरि। हम बात कर रहे हैं भाई-बहन के पवित्र रिश्तें की। जिसमें प्रेम की मधुर स्मृतियों को संजोने के लिए ‘रक्षाबंधन’ का पर्व मनाया जाता है और कलाई पर रेशमी धागा बाँधकर रक्षा का संकल्प लिया जाता है। यदि हम प्रतीकात्मक रूप में रक्षाबंधन को समझे तो रक्षा का संकल्प कोई भी ले सकता है फिर चाहें वह भाई हो, मित्र हो, पिता हो या फिर पति ही क्यों न हो। बशर्ते कि उस संकल्प में जिम्मेदारी का अहसास व संकट के समय रक्षा करने का माद्दा भी होना चाहिए। लेकिन बनावटी रिश्तों की हमारी जिंदगीयों में आज रेशमी धागों की चिकनी गाँठों की तरह भाई का बहन के लिए लिया गया रक्षा, प्रेम व विश्वास का संकल्प भी बहुत जल्द टूट जाता है और एक-दूसरे से औपचारिक व सामाजिक रिश्तें निभाकर भाई-बहन एक-दूजे से बेखबर बन फिर से अपनी अलग-अलग दुनिया में रम जाते हैं।
यह जरूरी नहीं है कि रक्षाबंधन के दिन केवल भाई-बहन का रिश्ता ही जोड़ा जाएँ। हम चाहें तो मित्र, पति, भाई या पिता के किसी भी रिश्तें को रक्षा के मजबूत सूत्र से बाँध सकते हैं। ऐसा करना कोई नई बात नहीं है। कभी भाई के हाथों में राखी बाँधकर तो कभी पिता के हाथों में पूजा का पवित्र लाल धागा बाँधकर, कभी दोस्त की कलाई में फ्रेंडशिप बेंड बाँधकर तो कभी पति के हाथों में ब्रेसलेट पहनाकर वर्षों से हम ऐसा करते भी आ रहे हैं। हालाँकि वर्तमान में औपचारिकताओं के चलते इन रिश्तों के भावों को समझकर उन्हें बरकरार रखने में हम अब तक पूरी तरह से कामयाब नहीं हुए है। तभी तो खूनी रिश्तों के साथ ही सामाजिक रिश्तों में भी विश्वास व सुरक्षा का ताना-बाना उस वक्त टूटकर बिखर जाता है, जब किसी महिला पर सरेआम अत्याचार होता हैं और तमाशाबीन पुरूषों की भीड़ आँखे फाड़-फाड़कर ऐसे दृश्य का लुत्फ उठाती हैं। रिश्तों में पवित्रता के भावों के साथ ही मानवता को ताक में रखकर आखिरकार ये पुरूष उस वक्त पति, भाई, मित्र, पिता में से कौन से रिश्तें में ईमानदारी निभा रहे होते हैं? इस प्रश्न का सीधा सा जवाब है - अमानवीयता के रिश्तें को। यह अमानवीयता ही है जिसके हमारे यहाँ केवल जीवित महिलाओं के साथ ही नहीं बल्कि महिलाओं की लाशों के साथ भी राजनीति की जाती है। बलात्कार की भेंट चढ़ी नग्न लाशों पर कैमरे के फ्लश चमकाएँ जाते हैं और फेसबुक, व्हाट्सएप्प पर गंदी कमेंट्स के चटखारें लेकर उस तस्वीर व वीडियों की धड़ल्ले से शेयरिंग की जाती है। बलात्कार के मामलों में पुरूषों की हैवानियत या दुष्चरित्र की चर्चा नहीं होती बल्कि महिलाओं के कम कपड़ों व चरित्र को लेकर राजनीति होती है। ऐसे में क्या आपको रक्षाबंधन महज एक रेशम की डोर बाँधने की औपचारिकता नहीं लगता?
यह कहने में मुझे कोई खेंद नहीं है कि आज़ हम बनावटी रिश्तों की जिंदगी जी रहे हैं और औपचारिकताओं के नाम पर अपनी जिम्मेदारियों से इतिश्री कर रहे हैं। रक्षाबंधन एक पर्व है, रिश्तों में मानवता और विश्वास को जिंदा रखने का। लेकिन हम और आप इस मकसद में कितने कामयाब हुए है। यह तो हम बखूबी जानते है। यदि किसी बहन के भाई कहाने वाले पुरूषों में मानवता और रिश्तों में आज विश्वास जिंदा होता तो कोई निर्भया दिल्ली की सड़कों पर बेआबरू नहीं होती, बदायूँ में चचेरी बहने फाँसी के फँदों पर नहीं झूलती और बरेली में बलात्कार के बाद महिला के चेहरे पर तेजाब़ फेंकने की हैवानियत की घटना सामने नहीं आती। इन घटनाओं को अंजाम देने वाले पुरूष भी किसी न किसी बहन के भाई, पिता या मित्र ही है, सरेआम बलात्कार रूपी नग्नता का तमाशाबीन बनने वाले भी किसी बहन के भाई ही हैं? ... मुझे लगता है कि विश्वास के साथ मानवता को भी तख्त पर रखने वाले इन लोगों को आज ‘भाई’ कहलाने का कोई हक नहीं है।
आज ‘रक्षाबंधन’ के दिन उन भाईयों की कलाईयों में अवश्य कंपन हो रहा होगा, जिनकी बहनें कभी न कभी बलात्कार, छेड़छाड़, दहेज हत्या, शारीरिक प्रताडना और घरेलू हिंसा की शिकार बनी होगी। वे स्वयं को मन ही मन कोसते हुए यह कह रहे होंगे कि बहन की सुरक्षा और उसके प्रति जिम्मेदारी में आखिर यह हमारी ही चूक होगी, जिसके चलते हम तो जिंदा रह गएँ पर हमारी लाडली हमसे रूठकर दूर आसमान में चली गई। अब इस घर में न उसकी शरारतों की गूँज है और न हीं मुझ पर उसकी डाँट का डर। काश, वो फिर से जमीं पर आ जाएँ और एक बार यह कह दें भैया, उन हैवानों को खुलेआम मत छोड़ों वर्ना हर दिन आपकी कोई न कोई बहन सड़कों पर बेआबरू होती रहेगी। दिल से महसूस करों तो यह करूण पुकार हैं, उन बहनों की, जो स्वाभिमान और संघर्ष की जंग में आखिरी दम तक लड़ी और छोड़ गई पुरूषों की गंदी मानसिकता व हैवानियत की हदें पार करती घटनाओं की कड़वी यादें। ऐसी रणचंडी बहनों को हमारे इस समाज से किसी पुरस्कार की नहीं बल्कि लोगों से मानवता की व कानून से सख्ती की उम्मीद थी। उनके द्वारा जलाई इंसाफ की मशाल आज हर औरत के दिल में धधकती ज्वाला बन प्रज्वलित हो रही हैं। इससे पहले कि औरत अपना विकराल रूप इस दुनिया को दिखाएँ। सम्हल जाइएँ और सीख लीजिएँ ‘रक्षाबंधन’ के इस त्योंहार से, जो हमें यह संदेश देता हैं कि रिश्तों में विश्वास का न केवल होना बल्कि उस पर खरा उतरना भी बेहद जरूरी है फिर चाहें वह जन्मजात रिश्ता हो या मानवता का रिश्ता।

गौर कीजिएँ मेरी इस बात पर कि रक्षाबंधन के दिन आपसे राखी बँधवाने वाले क्या ये वहीं भाई है, जो दिल्ली, बदायूँ और बरेली की घटनाओं पर चुप्पी साधे बैठे रहे? उनके मन में क्षणभर को भी यह विचार नहीं आया कि ऐसी घटनाओं की शिकार यदि मेरी सगी बहन होती तो क्या मैं खामोश बैठता? रिश्तों में अपनों और परायों का ठप्पा लगाने वाले ऐसे भाईयों की कलाईयों पर क्या आज उनकी बहन राखी बाँधना पसंद करेगी? शायद औरत का स्वाभिमान उसे ऐसा करने की इज़ाजूत नहीं देगा। रिश्ता चाहें भाई-बहन का हो या सामाजिक मानवता का। दोनों ही रिश्तों की पहली जरूरत कलाईयों पर बड़ी-बड़ी राखियाँ सजाने की औपचारिकताओं से कहीं अधिक औरत की रक्षा के संकल्प को दुहराने की है, जिससे समाज में फिर कभी मानवता का मखौल ना उड़े। एक भाई होने के नाते हर पुरूष को इस दिन अपनी कलाई पर रेशम की डोर बँधवाने से पहले यह संकल्प लेना चाहिएँ कि वह न केवल अपनी ‍बहन की बल्कि दुनिया की हर औरत की सम्मान की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहेगा। इसी संदेश के साथ आपको ‘रक्षाबंधन’ की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।    

सूचना : इस ब्लॉग से किसी भी सामग्री का प्रयोग करते समय सूचनार्थ मेल प्रेषित करें व साभार अवश्य देंवे। मेरे इस लेख का प्रकाशन 'खरी न्यूज डॉट कॉम' पोर्टल पर दिनांक 10 अगस्त 2014, रविवार के 'रक्षाबंधन स्पेशल' अंक में हुआ है। जिसे देखने के लिए कृपया इस यूआरएल पर क्लिक करें - 

Friday, August 1, 2014

जय हो बाबा इंटरनेट की ...

-          गायत्री शर्मा
तकनीक के इस युग में अपनी सुरक्षा अपने हाथों करते हुए हम निकल पड़ते है तीर-कमान और बंदूक की जगह मोबाइल और लैपटॉप लिए। जहाँ कहीं असुरक्षा का भाव हुआ, वहीं भेज दिया व्हाट्स एप्प पर दोस्तों को ग्रुप मैसेज और पलभर में लोगों की भीड़ जमा कर हो गए हम सुरक्षित। तनाव के कारण नींद नहीं आ रही है तो एफबी स्टेटस पर अपनी मनोदशा शेयर कर सोशल नेटवर्किंग के माध्यम से हम जमाज जमा कर लेते हैं सहानुभूति देने वालों और नए-नए टोटके बताने वालों की। नया युग, सब कुछ नवीन तकनीक से संपन्न। इस युग में आदमी के जेब में पैसा मिले न मिले पर उसके मोबाइल पर इंटरनेट रिचार्ज जरूर मिलेगा। मोबाइल के मैमोरी कार्ड में सनी लियोनी का सेक्सी विडियों और यो-यो हनी सिंग का ‘आई स्वेयर छोटी ड्रेस में तू, बॉम्ब लग दी मेनू’ गीत जरूर मिलेगा। यह मायावी इंटरनेट देवता ही है, जिनके जलवे आज कम्प्यूटर, मोबाइल व लेपटॉप पर छा रहे हैं और लोग अपनी गर्लफ्रेंड व बी‍वियों की बजाय कम्प्यूटर व मोबाइल के साथ अधिक बतिया रहे हैं।  
इंटरनेट एडिक्शन के चलते अच्छा भला इंसान आज उल्लू बन गया है। जिसका प्रमाण यह है कि नए दौर के इंटरनेट प्रेमियों की गोद में घने काले केशों वाली घरवाली या गर्लफ्रेंड की बजाय अब देर रात तक मोबाइल व लैपटॉप आराम फरमाते हैं। नींद व खर्राटों की खर्रर् खर्रर् ... में उलझने पर भी ये उपकरण नजदीकी बढ़ाना नहीं छोड़ते और धीरे-धीरे अपने प्रियतम की चौड़ी छाती पर सवार हो जाते हैं। ऐसा करने के बाद तो शुरू हो जाती है इनकी वाइब्रेशन की ‘ड्रू ड्रू ...’ तथा नोटिफिकेशन की ‘टू-टू ...’ , जिसका सिलसिला रात 12 बजे से शुरू होकर सुबह 4 बजे तक बदस्तूर जारी रहता है।
          कहते हैं कि बड़े-बड़े नेत्र, खुले-खुले केश और ‘सुनोंऽऽऽऽ’ की घर्र्राती आवाज़ से पतियों को डराने वाली घरवाली के आगे बड़े-बड़े शेरदिल पति भी भीगी बिल्ली बन जाते हैं। पर ये क्या, आज ये सारे शेर सब्जीमंडी का रास्ता कैसे भटक गए है? अरे हाँ, याद आया। दिल में एफबी वाली गर्लफ्रेंड की प्रीत की हांडी को गरम रखने के लिए जनाब को सब्जीमंडी के सौ-सौ चक्कर लगाने भी बुरे नहीं लगते। तभी तो इंटरनेट से एकांत में बतियाने के लिए पति ‘नियम व शर्ते लागू’ कहते हुए अपनी घरवाली की सारी फरमाईशें पूरी कर देता है फिर चाहें वह बाजार से टमाटर, प्याज लाना हो या फिर घरवाली को सोने के कंगन दिलाना ही क्यों न हो। पत्नी की आज्ञा मानने के लिए इंटरनेट प्रेमी पतियों की एक ही मुख्य शर्त होती है – ‘हे देवी! रात को जब मैं ऑनलाइन रहूँ। तब तुम ऑफलाइन रहना और खामोशी से तकियें में अपना मुँह छुपाकर सो जाना। उस वक्त कोई बड़-बड़ या शक-सवाल नहीं।‘ ऐसे में भला घरवाली की क्या मजाल, जो आज्ञा की अवहेलना कर सोने के अंडे देने वाली मुर्गी से बैर करें। हाँ, यह जरूर है मौका मिलते ही ईष्यालु घरवाली अपने पति परमेश्वर के देर रात तक कम्प्यूटर से आलिंगन वाली बात लोगों के सामने उगल ही देती है। ऐसे में पति बेचारा क्या करें क्योंकि स्विच ऑफ करके कम्प्यूटर व मोबाईल का मुँह तो बंद किया जा सकता है पर इंटरनेट की ‘क ख ग’ से अपरीचित घरवाली का मुँह बंद करना बेहद ही मुश्किल है? यह इंटरनेट का जादुई आकर्षण ही है, जिसके लिए आजकल के युवा अपने घरवालों से झूठ बोलने, रजाई में छुप-छुपकर चेटिंग करने, अपने मोबाइल को दोस्त का मोबाइल बताने आदि से भी गुरेज नहीं करते हैं। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी के ओर भी बहुत सारे किस्से है मोबाइल, इंटरनेट व लैपटॉप की तिकड़ी से जुड़े। फिलहाल तो इस मायावी इंटरनेट के आकर्षण को देखते हुए मेरे मुँह से तो यहीं वाक्य निकलता है - वाह रे तकनीक क्रांति के प्रणेता! तूने भी कमाल कर दिया। आदमी तो काम का था पर तूने उसे बेकार कर दिया।

सूचना : इस ब्लॉग से किसी भी सामग्री का प्रयोग करते समय साभार देवें व मुझे सूचनार्थ मेल अवश्य भेंजे। मेरे इस व्यंग्य लेख का प्रकाशन उत्तर प्रदेश के वाराणासी, इलाहबाद, लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर, मेरठ एवं गाजियाबाद से प्रकाशित दैनिक 'जनसंदेश टाइम्स' के दिनांक 1 अगस्त 2014, शुक्रवार के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर 'उलटबांसी' कॉलम में 'जय हो बाबा इंटरनेट की' शीर्षक से हुआ है। अखबार में प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दि गई लिंक पर क्लिक करें - 

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