Tuesday, December 14, 2010

शीशा पॉर्लरों में युवाओं का जमावड़ा (2 दिसंबर 2010 नईदुनिया युवा)

इंदौरी युवाओं में टैटू का क्रेज (2 दिसंबर के नईदुनिया 'युवा' में प्रकाशित मेरा आलेख)

पढ़ाई के तरीके (9 दिसंबर के नईदुनिया 'युवा' में प्रकाशित मेरा आलेख)

इंदौर के हॉट लवर्स प्वाइंट (नईदुनिया 'युवा' में दिनांक 9 दिसंबर को प्रकाशित मेरा आलेख)

भ्रष्टाचार और घोटालों पर केंद्रित 9 दिसंबर 2010 के नईदुनिया 'युवा' में मेरा आलेख

Friday, November 19, 2010

जॉब करें या बिजनेस

कक्षा 10 वीं के बाद से ही अपने करियर को लेकर स्टूडेंट्स में संशय की स्थिति बनी ही रहती है। कई बार पढ़ाई अच्छी होने के कारण भी अच्छी जॉब और सैलेरी नहीं मिल पाती है और कई बार फैमिली बिजनेस होने के बाद भी युवा उस बिजनेस के भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं होता है।
ऐसे में युवा अपने करियर को लेकर तनाव व संशय की स्थिति में फँसा रहता है। लेकिन यह स्थिति तब आती है। जब हम प्रापर प्लानिंग किए बगैर ही कोई भी काम शुरू कर देते हैं। जॉब या बिजनेस यही विषय लेकर मैंने चर्चा की प्रोटॉन बिजनेस स्कूल के स्टूडेंट्स से। जिनकी प्लॉनिंग सुनकर मैं स्वयं हैरान हो गई। मेरे द्वारा की गई इस स्टोरी का प्रकाशन 18 नवंबर 2010 के नईदुनिया युवा में हुआ था।  

पोस्टरों से घिरा मेरा शहर

दोस्तों, जब कोई शहर महानगर की शक्ल तब्दील करता जाता है। तब कहीं न कही उसमें गंदगी के ढ़ेर, फेक्ट्रियों के बदबूदार पानी, जहरीला काला धुँआ छोड़ते वाहन और इधर-उधर जहाँ जगह मिले वहाँ पैर पसारते पोस्टर यदा-कदा देखने को मिल ही जाते हैं।

मेरा शहर इंदौर भी एक ऐसा ही शहर है, जो अब विकास, आबादी और गंदगी के मामले में मिनी मुंबई बन रहा है। रिगल ब्रिज हो या पलासिया चौराहा, कलेक्टोरेट हो या टॉवर चौराहा हर जगह बड़े बड़े पोस्टर मुँह खोलकर हमारे बौनेपन का मजाक उड़ाकर अपने विदेशी ब्रांडों पर इठलाते नजर आ जाते हैं।

पोस्टरों से लिपटे इस शहर के बारे में आज के युवा क्या सोचते हैं। इस विषय पर मैंने एक स्टोरी की थी। युवाओं के विचारों पर केंद्रित एक स्टोरी, जिसका प्रकाशन 18 नवंबर 2010 के नईदुनिया युवा के प्रथम पृष्ठ पर हुआ था। कृपया आप भी इस स्टोरी को पढ़े और मुझे अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत कराएँ। 

Wednesday, October 27, 2010

शराबियों के लिए रूकी राजस्थान परिवहन निगम की बस

लगभग हर शनिवार की तरह पिछले शनिवार यानि दिनांक 23 अक्टूबर को मेरा फिर अपने गृहनगर रतलाम को जाना हुआ। हर बार की तरह इस बार भी दफ्तर में काम की व्यस्तताओं के चलते मेरी 4 बजे वाली 'इंदौर-जोधपुर' बस छूट गई। उसके बाद अपना काम खत्म करके भागते-दौड़ते अंतत: मैं 6:30 से 6:45 के बीच गंगवाल बस स्टैंड पहुँची। जल्दी से मैंने पार्किंग में गाड़ी रखी। इतनी देर में राजस्थान परिवहन की रतलाम जाने वाली दूसरी बस ‍भी रवाना हो चुकी थी। अब मेरे पास विकल्प के तौर पर राजस्थान परिवहन निगम की 'इंदौर-नाथद्वारा-फालना'और 'इंदौर-उदयपुर' बस ही थी। ये दोनों ही बस रतलाम होकर ही राजस्थान बार्डर में प्रवेश करती है इसलिए इंदौर से चलने वाली राजस्थान परिवहन निगम की लगभग हर बस मेरे शहर रतलाम जाती है।    

मैं भी जल्दी से जल्दी रतलाम पहुँचने के चक्कर में रतलाम का टिकिट लेकर 'इंदौर-नाथद्वारा-फालना' की ओर जाने वाली बस क्रमांक RJ 22 PA 0932 बस में बैठ गई। बस में मुझे पीछे की 23 नंबर की सीट मिली थी पर आगे बैठने की जिद के चलते मैं हमेशा की तरह कंडक्टर की सीट पर बैठ ही गई। आमतौर पर राजस्थान परिवहन निगम की बसों के कंडक्टर महिलाओं को पीछे की सीट पर बैठाने के बगैर आगे की सीटों पर या अपनी सीट पर जगह दे ही देते हैं। परंतु उस बस के कंडक्टर को मेरा उनकी सीट पर बैठना यह नागवार गुजरा और उसने तुरंत मुझे कहा कि मैडम आप अपनी सीट पर बैठिए। उस वक्त बस में बैठी एकमात्र महिला सवारी होने के कारण व रात का सफर होने के कारण मैंने कंडक्टर से मेरी सीट किसी ओर से एक्सचेंज करने की जिद की और अंतत: कंडक्टर ने मेरी समस्या को समझकर मुझे तीन सवारियों वाली सीट पर दो पुरुषों के बीच में फँसाकर और कसाकर रतलाम तक बैठने की जगह दे दी।

बड़ी ही असहजता से अपने बदन को सिकोड़ते हुए मैं उन दो पुरुषों के बीच में बैठ गई। कुछ देर बाद मेरी सीट पर खिड़की की ओर बैठे युवक से जब मैंने उसकी जगह पर मुझे बैठने की इजाजत माँगी तो उसने यह कहकर कन्नी काट ली कि मैडम, बस में मेरा तो जी बड़ा घबराता है इसलिए मैं ही खिड़की की ओर बैठूँगा। उनका जवाब सुनकर मैंने भी मन ही मन सोचा - 'गायत्री, बेटा यह बचपन नहीं है। जब माँ-पापा से लड़-झगड़कर तू बस या ट्रेन में खिड़की की ओर बैठ जाती थी। अब तू बड़ी और गंभीर हो चुकी है और आजकल के लोग तो महिला को खड़ा देखकर भी आराम से सीट पर बैठे रहते हैं। ऐसे में मुझे कौन भला मानुष खिड़की पर बैठने देगा?'यह सब सोचकर तो मैं पीछे की बजाय बस में आगे की सीट पर उन दो पुरुषों के बीच बैठना ही अपना सौभाग्य मानने लगी। 

बस में बैठते से ही कंडक्टर सीट के ठीक पीछे की सीट पर बैठे दो पुरुष बार-बार कंडक्टर से शराब खरीदने के लिए गाड़ी रोकने को कह रहे थे। कंडक्टर भी बस की सवारियों व समय की परवाह किए बगैर जगह-जगह पर शराब की दुकान की तलाश में गाड़ी रूकवा रहा था। कई बार बस रूकी और कई बार उस व्यक्ति ने उतरकर शराब की दुकान तलाशी। यहाँ तक कि बदनावर गाँव में भीतर बस स्टैंड तक न जाने वाली राजस्थान परिवहन निगम की बस उस दिन बस स्टैंड तक गई। उस दिन सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो रहा था। तभी तो मेरा दिमाग बस में बैठे-बैठे कुछ-कुछ ठनक रहा था। अंतत: पहले से शराब में धुत उस व्यक्ति को सफारी सूट पहने कंडक्टर ने हम सभी सवारियों की परवाह किए बगैर बदनावर में शराब की बोतल खरीदने और पीने का मौका दिया। उस समझदार व्यक्ति ने भी जी भर के शराब पी व नशे में धुत होकर बस में बैठ गया। कंडक्टर का उन दो शराबियों को खुश रखने का कोई और भी मतलब हो सकता था।

सच कहूँ तो यह सब देखकर मुझे लगा कि आजकल कैसा जमाना आ गया है। जब बस के कंडक्टर महिला सवारियों को धुत्कारकर शराबियों को आगे बैठा रहे हैं व उन्हें दिल खोल के शराब पीकर बस में सवारियों के बीच बैठने का मौका व उपद्रव मचाने के लिए आश्रय दे रहे हैं। ऐसे में खुदानखासता कभी कोई शराबी किसी महिला के साथ बदतमीजी या बलात्कार करने का प्रयास भी करें तो उस कंडक्टर जैसे गैरजिम्मेदार व्यक्ति जरूर खुली आँखों के अँधे बन यह सब तमाशा देखते रहेंगे क्योंकि गुलामी करने की उन्हें आदत है और झूठ बोलना उनका धंधा। उस दिन मुझे ठेस इसलिए भी पहुँची क्योंकि वह राजस्थान परिवहन निगम की बस थी न कि मध्यप्रदेश या बिहार परिवहन निगम की बस।

राजस्थान परिवहन निगम की बसों में अक्सर मैं रतलाम से इंदौर के बीच यात्रा करती रहती हूँ। मैंने जहाँ तक देखा है। इन बसों के ड्राइवर व कंडक्टर दोनों ही बड़े मृदुभाषी व कर्तव्यनिष्ठ होते हैं। बस में कभी कोई सवारी सिगरेट भी पिए तो वे लोग उन्हें यह कहकर रोक देते हैं कि बस में महिला सवारी है और इन बसों में सिगरेट व शराब पीना सख्त मना है। लेकिन मैंने शनिवार की रात इंदौर से शाम 7 बजे चली व रतलाम में रात्रि लगभग 10:30 बजे पहुँची जिस बस में सफर किया था। उसका कंडक्टर बेहद ही गैरजिम्मेदार था।

मैंने यह पोस्ट किसी का बुरा-भला कहने के लिए नहीं बल्कि ईंसानियत व मानवता को कुछ ओर समय तक बचाए रखने के लिए लिखी है। हम सभी अक्सर बसों में सफर किया करते है। हमारे यहाँ तो अमूमन बस के ड्रायवर या कंडक्टर को महिलाएँ 'भैया' कहकर ही बुलाती है। सामान्य तौर पर बोले जाने वाले इस 'भैया' शब्द का अर्थ बहुत गहरा है। इस शब्द से स्वत: आरोपित कर्तव्यों के लिए न सही पर मानवता के लिए ही सही मेरे भाईयों! जरा 'स्थान की गरिमा' का खयाल रखें व सार्वजनिक स्थानों पर धुम्रपान या नशा करने से गुरेज करे। कम से कम राजस्थान परिवहन निगम की बसों में सरेआम ऐसा होना कही न कही हमें शर्मसार करता है क्योंकि ये बसे अपने कुशल ड्रायवर, मृदुभाषी कंडक्टर, तेज गति व उम्दा सेवाओं के लिए पहचानी जाती है।

यदि आज हम आमजन नहीं जागे तो कल को हममें से कोई भी किसी महिला को बस या ट्रेन में अकेले यात्रा करने की इजाजत देने से पहले सौ बार सोचेगा क्योंकि आज के माहौल को देखते हुए कल को बसों में सरेआम शराब बिकना या महिलाओं के साथ छेड़खानी होना एक आम बात हो जाएगी। इसलिए अब वक्त आ गया है ‍जागने और जगाने का।  

- गायत्री शर्मा

Monday, October 18, 2010

माँ ने देखा जलता हुआ रावण

इंदौर में दशहरे(रावण दहन) के अगले दिन 'बासी दशहरा' मिलने की परंपरा है। जिसमें 'पड़वा' की भाँति लोग एक-दूसरे के घर जाकर उन्हें सोना पत्ती (उस्तरा नामक पेड़ की पत्तियाँ) देकर दशहरे की बधाईयाँ देते हैं। चूँकि मैं रतलाम शहर से हूँ इसलिए इन इंदौरियों के कुछ त्योहारों से मैं भी थोड़ी बहुत अपरीचित हूँ। दशहरे की नहीं पर मेरे यहाँ भी माता की 'नवरात्रि' की धूम इंदौर के समान ही रहती है। यही कारण है कि यहाँ की नवरात्रि का मैंने भरपूर लुत्फ उठाया।

कल रात को ही मेरा इंदौर में रहने वाली अपनी मौसी के घर जाना हुआ। उनके घर तक पहुँचते-पहुँचते रास्ते में मेरी मुलाकात आकर्षक वेषभूषा में सजे कई रावणों से हुई। जो बड़ी ही प्रसन्नचित्त मुद्रा में पटाखों से लैस होकर दाँत और मुँह दिखाकर मुस्कुरा रहे थे। मैंने भी मन ही मन इन रावणों से यही कहा कि मुस्कुरा ले बेटा!आखिरकार कुछ देर बाद तो तुझे पटाखों से ही जलना है। तब तू रोएगा और तुझे जलाने वाले मुस्कुराएँगे।

तीन-चार जलते हुए रावणों का दीदार करने के बाद मैं पहुँची अपनी मौसी के घर। उनके घर के पड़ोस में ही गरबा पांडाल था। जहाँ दशहरे के दिन गरबों के पुरस्कार वितरण का कार्यक्रम चल रहा था। बालिकाओं को पुरस्कार वितरित करने के बाद वहाँ छोटी से लेकर बड़ी लड़कियों के अलग-ग्रुप में गरबे हुए। इन सभी के गरबे समाप्त होने के बाद कुछ महिलाओं के साथ मैंने भी राजस्थान के लोकनृत्य घूमर के गीतों पर नई-नई स्टेप्स के साथ गुजराती गरबे किए। रात्रि की करीब एक बजे तक हमने लगातार गरबे किए।

अलसुबह कॉलोनी में देवी माँ की प्रतिमा विसर्जन हेतु ले जाने के लिए लोडिंग रिक्शा मँगाया गया। ‍सुबह-सुबह बिस्तर से उठकर मुँह धोकर मैं भी वहाँ पहुँची और मैंने भी माँ शेरावाली के जयकारे लगाने के साथ देवी प्रतिमा पर मुट्ठी भर कुमकुम उड़ाकर माँ को बिदा किया। इतने सालों में आज पहली बार न जाने क्यों माँ को बिदा करते समय मुझे बहुत रोना आ रहा था और मैं जैसे-तैसे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण कर रही थी। उस वक्त मुझे लग रहा था मानों मेरा कोई अपना मुझसे बिछड़ रहा है। जिसे चाहकर भी मैं रोक नहीं पा रही हूँ। कुछ इस तरह माँ अपने मायके से ससुराल चली गई पर अपनी मीठी यादे मुझे दे गई।

आज के दिन कई स्थानों पर मैंने 'नवरा‍त्रि' हेतु माँ की विराजित प्रतिमा के दर्शन किए। रास्ते में कुछ प्रतिमाएँ तो ढोल-ढ़माकों के साथ विसर्जन हेतु ले जाई जा रही थी। वहीं कुछ गरबा-पांडालों में माँ थोड़े दिन और रूककर शरद पूर्णिमा के आने का इंतजार कर रही है क्योंकि उस दिन उनकी अपने माइके से बिदाई होनी है। मुझे तो यह सब देखकर ऐसा लगा जैसे कि कुछ स्थानों पर दशमी के दिन विसर्जन हेतु जाने से ना-नुकूर करने के पीछे माँ का मकसद संभवत: रावण दहन देखकर ही विसर्जन हेतु जाना होगा। आखिरकार बच्चों में रावण दहन देखने का अतना क्रेज है तो फिर माँ में क्रेज क्यों नहीं होगा?

लेकिन कुछ भी कहो माँ की नवरात्रि में नौ दिनों तक हर गली-मोहल्ले में जो रौनक थी। वह रौनक अब सन्नाटे में तब्दील हो गई है और इन दिनों हर किसी की तरह मैं भी लोगों से यही कह रही हूँ कि यार!नवरात्रि कब चली गई, मुझे तो पता ही नहीं चला।

- गायत्री शर्मा

विजयादशमी और रावण

पहले गणेश जी फिर माताजी, फिर रावण और उसके बाद लक्ष्मी जी ... ऐसा लगता है जैसे सभी भगवान में इस बात की ट्यूनिंग चल रही हो कि कैसे वे एक के बाद एक आकर भक्तों को अपनी आव-भगत करने का मौका देंगे। बेचारे भक्त भी अपने शुभमंगल की कामना के लिए कभी लड्डू,कभी पेड़ा,कभी चूरमा तो कभी पकोड़े खिला-खिलाकर आए दिन भगवानों को प्रसन्न करने में लगे हुए हैं। घर में पधारों गजानन जी के बाद, अम्बे तू है जगदंबे काली और अब रामचंद्र कह गए सिया से ... के गीत गली-गली में यक ब यक सुनाई पड़ रहे हैं।

चलिए अब बात करते हैं असत्य पर सत्य की विजय के पर्व 'विजयादशमी'की। इंदौर में विजयादशमी पर केवल आयुधों की ही पूजा नहीं होती है बल्कि यहाँ हर गली-मोहल्ले में रावण के प्रतीक पुतले बनाए जाते हैं,जिन्हें आतिशबाजियों के साथ जलता देखकर लोग खुशियाँ मनाते हैं और एक-दूसरे को दशहरे की बधाईयाँ देते हैं। दशहरे के दूसरे दिन लोगों के घर दशहरा मिलने जाने का चलन मुझे केवल इंदौर में ही देखने को मिला क्योंकि मेरे शहर रतलाम में केवल 'पड़वा'पर ऐसा होता है। लेकिन कुछ भी कहो इंदौर की विजयादशमी का आनंद ही कुछ और है।

दूसरे भगवानों की बजाय रावण ही क्यों ... इसके पीछे भी एक फनी लॉजिक है और वह यह कि रावण को स्थापित करने व बिदा करने में दोनों में बड़ी आसानी होती है। रावण जैसे महाज्ञानी शिव भक्त को दूसरे देवताओं की तरह किसी ‍विशेष आव-भगत की जरूरत ही नहीं होती है। इसे तो आप सेम डे बनाकर गली-चौराहा,घर का आँगन,बगीचा चाहे जहाँ खड़ा कर दो आखिरकार ऐसे या वैसे उसे तो जलना ही है।

रावण बनाने का सबसे ज्यादा क्रेज बच्चों में देखने को मिलता है,जो कागज,कपड़े,स्केज पेन,घास-पूस आदि के साथ अपनी पसंद,आकार-प्रकार और कद-काठी के रावण को बनाकर उसमें खूब सारे पटाखे लगाकर उसका दहन करते हैं और दोस्तों के सात खूब मौजमस्ती करते हैं। कुछ इस तरह बहुत कम लागत में बनने वाला रावण केवल बच्चों का ही नहीं बल्कि हम सभी का फेवरेट बन जाता है। इस रावण को हँसते-हँसते बनाया जाता है और हँसते-हँसते ही विदा किया जाता है।
- गायत्री शर्मा 

Sunday, October 17, 2010

माँ की आराधना नवरात्रि में

माँ दुर्गा की आराधना का पर्व 'नवरात्रि' अपने अवसान के साथ-साथ जोश, ऊर्जा व भक्ति के मामले में चरम पर पहुँचता जाता है। कोई अपने पदवेश (चप्पल-जूते) छोड़कर तो कोई नौ दिन तक कठोर उपवास रख माँ की भक्ति कर माँ से अपने परिवार के शुभमंगल की कामना करते हैं। दुल्हनों की तरह सजे गरबा-मंडल दिन भर सुस्ताकर शाम को फिर से माँ की आराधना के लिए तैयार होकर जगमगाने लगते हैं और सांझ ढ़लते-ढ़लते माँ के भक्ति गीतों व चंटियों की आवाजों से गुँजने लगते हैं। छोटी-बड़ी बालिकाएँ भी चमचमाते वस्त्रों के साथ इन गरबा मंडलों में अपने सुंदर गरबा रास की प्रस्तुति देकर इन्हें जीवनदान दे देती है।

यदि मैं अपनी बात करूँ तो मुझे भी गरबा खेलने का बहुत शौक है। जिसके लिए मैं हर साल समय निकाल ही लेती हूँ। पर क्या करूँ व्यस्तताओं के चलते इस बार न तो मैं माँ के लिए उपवास रख पाई और न ही नौ दिनों तक गरबा खेलने जा पाई। इतना सब होने के बावजूद भी इसे माँ की कृपा ही कहे कि अष्टमी के दिन इंदौर के बड़ा गणपति स्थित शारदा नवदुर्गोत्सव समिति के आयोजकों ने मुझे बालिकाओं का गरबा देखने हेतु अतिथि के रूप में आमंत्रित किया व अतिथि होने के नाते मुझे माँ की तस्वीर पर माल्यापर्ण कर माँ की आराधना का एक मौका प्रदान किया।

वह अष्टमी का दिन था। उसी दिन मुझे अपने दफ्तर के साथियों के साथ दफ्तर की छत पर गरबा करने का मौका मिला। जिसका मैंने भरपूर लुत्फ उठाया और रात में घर पहुँचकर हमारे पड़ोस स्थित गरबा प्रागंण में आरती के रूप में माँ की आराधना की। आज नवमी के दिन भी मैंने अपनी कॉलोनी स्थित गरबा प्रागंण में कुछ देर तक गरबे किए। इन सभी के लिए मैं देवी माँ को धन्यवाद देती हूँ कि मैंने नौ दिनों तक इंदौर के कई गरबा-पांडालों में आरती होते हुए देखी पर आलस्य के चलते मैंने वहाँ जाकर आरती करने की जहमत कभी नहीं की लेकिन माँ की कृपा से अष्टमी व नवमी के दिन मुझे कई गरबा पांडालों में गरबा खेलने व आरती करने दोनों का मौका मिला।

महात्मा गाँधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में ब्लॉगरों का जमावड़ा

वर्धा स्थित महात्मा गाँधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय परिसर में हिंदी ब्लॉगिंग की आचार-संहिता पर 9 व 10 अक्टूबर को आयोजित दो दिवसीय गोष्ठी में सम्मिलित होकर बहुत अच्छा लगा। पहले दिन अपरीचित व दूसरे दिन सुपरीचित ब्लॉगरों से मेल-मिलाप व बातचीत करने में दो दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला।

वर्धा में दो दिवसीय प्रवास के दौरान मुझे देश भर से वर्धा आए ब्लॉगरों से मिलने का व लगातार दो दिनों तक उनके संपर्क में रहने का सुअवसर प्राप्त हुआ। इनमें से सुरेश चिपलूनकर और यशवंत सिंह तो मैं पहले से ही परीचित थी इसलिए गोष्ठी के पहले दिन इन दोनों के दर्शन अपरीचितों के बीच सुकून की ठंडी छाँव की तरह थे। तभी तो मुझे देखकर यशवंत जी के मुँह से अनायास निकल ही गया कि गायत्री अब हम लगातार तीसरी बार किसी कर्यक्रम में साथ मिल रहे हैं। अब तो लगता है कि यहाँ कोई न कोई धमाका होगा। सच कहूँ तो धमाका हुआ भी ...।

अब बात करते हैं इस गोष्ठी के सूत्रधार सिद्धार्थ जी के बारे में। जिनके स्नेहिल निमंत्रण पर मुझे अपने सारे कार्य छोड़कर वर्धा आना ही पड़ा। केवल ‍सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी ही नहीं बल्कि उनकी श्रीमती रचना त्रिपाठी की मिलनसारिता भी लाजवाब थी। महात्मा गाँधी विश्वविद्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम में पधारे पामणों के आव आदर में इन दोनों ने कोई कसर बाकी नहीं रखी। इनके लिए हर कोई अपरीचित होकर भी परीचित सा था। इनसे विदा लेते समय भी इनका प्यार खाने के पैकेट के रूप में सफर भर मुझे इनकी याद दिलाता रहा।

अरे ... मैं तो भूल ही गई सिद्धार्थ और रचना जी की खूबियों को समेटे इनके बेटे मतलब हमारे नन्हे ब्लॉगर सत्यार्थ के बारे में आपको कुछ बताने को। दिन-भर धमाल चौकड़ी में लगा रहने वाला सत्यार्थ जितना शरारती है। उससे कई गुना ज्यादा प्रतिभावान। तभी तो इस नन्हें ब्लॉगर ने हममें से हर किसी की गोद में बैठकर हमारा दुलार पाया। वही किसी से चॉकलेट के रूप में मिठास भरा प्यार पाया।

वर्धा में आए ब्लॉगरों के मिलन और बिछड़ने के क्षण दोनों ही भूलाएँ नहीं भूलते। मुझे तो ऐसा लग रहा था मानों सिद्धार्थ जी के घर शादी हो और हम सभी उनके निमंत्रण पर उनके घर जा पहुँचे हो। वैसा ही आव-आदर और वैसी ही बिदाई ... यह सब तो जैसे एक परिवार का आयोजन लग रहा था। जिसमें हम सभी उस परिवार के सदस्य बन शरीक होने आए थे। यही पर मेरी मुलाकात डॉ. कविता वाचक्नवि, डॉ. अजित गुप्ता, डॉ. मिश्र व डॉ. महेश सिन्हा, ... और अविनाश वाचस्पति जी से भी हुई। अब तक मैंने इन सभी के नाम सुने थे पर इनके साक्षात दर्शन का मौका मुझे यही मिला।

इनमें से कोई कवि, कोई डॉक्टर, कोई प्रोफेसर ... ऐसा लग रहा था मानों सभी चुनिंदा नगीनों को छाँट-छाँटकर सिद्धार्थ जी ने वर्धा में बुलाया था। 'फुरसतिया' ब्लॉगर अनूप शुक्ल जी का बात-बात पर ठहाके लगाना और इन ठहाकों में कविता जी व अनिता कुमार जी का शामिल हो जाना भूलाए नहीं भूलता है। इन सभी की बीते दिनों की मुलाकातों और बातों के किस्सों की महफिल जब शाम को बरामदे में जमती, तो कब घड़ी की सुईयाँ बारह बजे की सीमाएँ लाँघ जाती। पता ही नहीं चलता था। बगैर नींद के न जाने इनके शरीर की बैटरी कैसे चार्ज होती थी?

युवा ऊर्जा से लबरेज सुरेश जी, प्रभात कुमार झा साहब, विवेक सिंह, यशवंत सिंह, शैलेश भारतवासी, हर्षवर्धन त्रिपाठी ज‍ी, रविंद्र प्रभात जी, प्रियंकर पालीवाल, जाकीर अली रजनीश, अशोक कुमार मिश्र, डॉ. महेश सिन्हा, संजीत त्रिपाठी, जयकुमार झा, संजय बेंगाणी ... इन सभी की तो बात ही निराली थी। बातचीत में ठेठ यूपी का अंदाज और मौका मिलते ही एक-दूसरे की टाँग खीचने वाली बात ... इनमें घनिष्ठ मित्रता का परिचय दे रही थी। जिसमें औपचारिकता की बजाय दोस्ती का अधिक पुट था। हम सभी ब्लॉगरों को एक साथ देखकर ऐसा लगता था जैसे फादर कामिल बुल्के छात्रावास (जहाँ हम ठहरे थे) में ब्याव के लिए न्यौते गए 'पामणों' का जमावड़ा लगा हो। दिन भर हँसी-मजाक-ठहाके, रात के अँधेरे में मोमबत्ती की रोशनी में कवि सम्मेलन और गीतों की महफिल ... समा को इतना खुशनुमा कर देती कि लगता बस वक्त यही थम जाएँ पर हमारी मस्ती की महफिल रातभर चलती जाए।

जहाँ हम सभी लोग छात्रावास में बच्चों की तरह मौज-मस्ती कर खूब हँसी-ठहाके लगाते थे। वही गोष्ठी के स्थल पर उतनी ही खामोशी व गंभीरता का परिचय दे अपने गंभीर व जागरूक ब्लॉगर होने का परिचय भी दे देते थे। यही नहीं मौका मिलने पर मंच से सबके सामने चुटकियाँ लेने में व अपनी बेपाक राय रखने में भी हम ब्लॉगरों का कोई जवाब नहीं था। विचारों में स्पष्टता, चिंतन में गंभीरता व कुछ कर गुजरने का जज्बा यहाँ आमंत्रित हर ब्लॉगर से चेहरे से झलक रहा था। कार्यक्रम के दूसरे दिन प्रसिद्ध ब्लॉगर प्रवीण पाण्डेय जी भी इस आयोजन में सम्मिलीत होने के लिए सपत्नीक वर्धा पधारे। ब्लॉगिंग के बारे में प्रवीण जी के विचार बहुत ही सुलझे हुए थे। उनके वक्तव्य को सुनकर मैं तो यही कहूँगी कि कम बोलों पर सटीक बोलो और ऐसा बोलो जो सीधे-सीधे दर्शकों तक आपकी बात पहुँचाए। इस मामले में प्रवीण जी मेरी अपेक्षाओं प पूर्णत: खरे उतरे।

10 अक्टूबर को दिल्ली के साइबर लॉ विशेषज्ञ श्री पवन दुग्गल जी के आने का हमने जितना इंतजार किया। हमारे सब्र का उतना ही मीठा फल उन्होंने हमें साइबर लॉ की जरूरी बाते समझाकर दिया। पवन जी का उद्बोधन सही माइने में इस आयोजन की सार्थकता सिद्ध हुआ। उन्हें सभी ब्लॉगरों ने बड़ी ही गंभीरता से सुना व उनस सीधे प्रश्नों के माध्यम से साइबर लॉ के संबंध में अपनी जिज्ञासाओं का समाधान किया। पवन दुग्गल ने एक ओर तो ब्लॉगरों के सिर पर कानून की टँगी तीखी तलवार की धार के वार से ब्लॉगरों को डराया तो वहीं दूसरी ओर कानून के शिकंजे में कसने से बचने के लिए ब्लॉगरों को महत्वपूर्ण टिप्स भी दिए।

अपनी बात को समाप्त करते-करते अब बात उन बड़ों की, जिनके बगैर इस आयोजन का मजा बगैर नमक की सब्जी की तरह होगा और वो हैं वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा जी और साहित्यकार विषपायी जी। हर किसी से प्यार, मोहब्बत से बतियाने वाले और हर वक्त सहजता से उपलब्ध होने वाले धन्वा जी के गर्दन से कंधे को मिलाते लंबे बाल और टोपी वाला लुक माशाअल्लाह था। जिसके कारण वह भीड़ में भी अलग पहचाने जा सकते थे। अपनी ही धुन में मनमौजी व जिंदगी को अपने ढंग से जीने वाले आलोक धन्वा जी हर बात में लाजवाब और अनुभवों की खान थे। इसे इनका जादुई आकर्षण ही कहे कि जो कोई भी इनके पास पाँच मिनिट के लिए जाता वह घंटे भर पहले तो इनके पास उठ ही नहीं पाता।

धनवा जी के साथ ही ‍महात्मा गाँधी विश्वविद्यालय के कुलपति श्री विभूति नारायण व प्रति कुलपति श्री .. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा से जुड़े प्रो. ऋषभदेव शर्मा, प्रो. अनिल अंकित राय का मार्गदर्शन भी तारीफ के काबिल था। बड़े ही सहज, सरल इन वरिष्ठजनों के आशीष व उपस्थिति ही इस आयोजन की सफलता की द्योतक थी।

Thursday, September 30, 2010

श्राद्ध पक्ष में दीपावली

आज हमारा 60 वर्षों का इंतजार खत्म हुआ और माननीय उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद हम सभी ने मानो राहत की सास ली है। इस निर्णय के पूर्व व पश्चात पुलिस प्रशासन की सख्त चौकसी व हर चौराहे पर बड़ी मात्रा में मौजूदगी काबिलेतारीफ व आमजन की सुरक्षा के लिहाज से बहुत ही अच्छी थी। एक लंबे इंतजार के बाद आए इस फैसले पर अफवाहों का बाजार काफी पहले से गर्म था पर फिर भी लोगों को यह विश्वास था कि न्यायालय का जो भी निर्णय होगा वह निसंदेह ही दोनों पक्षों की भावनाओं को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा और वैसा ही हुआ भी।

जहाँ तक एक पत्रकार होने के नाते मैंने लोगों से इस विषय पर चर्चा की तो उनका यही कहना था कि अयोध्या में मंदिर बने या मस्जिद, उससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। वे तो बस यही चाहते है कि फैसला जल्द से जल्द व दोनों समुदायों की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखकर लिया जाए। सच कहूँ तो अब आम आदमी भी ऐसे मुद्दों पर कट्टरवादिता दिखाकर या तोड़-फोड़ कर अपना समय व जन या धन की क्षति करने के जरा भी मूड में नहीं है। अब वो दिन गए जब लोग लड़ाई झगड़े करने की फिरात में घुमा करते थें। कुछेक शरारती तत्वों को छोड़कर हर कोई इस मुद्दे पर शांति व अमन की गुहार करता नजर आया फिर चाहे वह हिंदु हो या मुस्लिम।

कोई भी नहीं चाहता है कि उसके दफ्तर या बच्चों के स्कूल कॉलेजों की छुट्टी हो या फिर मजदूरी करके अपने परिवार को पालने वाला आम आदमी दंगों की दहशत के कारण कुछ दिनों के लिए बेरोजगार हो जाए और दाने-पानी के लिए तरस जाएँ। हर समझदार व्यक्ति तो यही चाहता है कि देश में अमन-चैन बना रहे और जिंदगी हर दिन उसी रफ्तार से दौड़े। दोपहर में साढ़े तीन बजे ऑफिस से लौटते वक्त इंदौर की सड़कों का सूनापन और छावनी में तब्दील चौराहे मुझे ऐसे लगे जैसे हट्टा-कट्टा स्वस्थ शहर मानो बीमार होकर चुपचाप उदास बैठा हो।

अब तक के जीवन में आज पहली बार अपने मोहल्ले में रात को सैर करते समय कई घरों में श्राद्ध पक्ष में दीपावली का नजारा देखकर एक बारगी आँखों को भी अपने देखे पर यकीन नहीं हुआ। जब इसके कारण की पूछताछ की गई तो पता लगा कि यह हिंदुओं की रामलला के प्रति आस्था थी,जो घरों के आँगन में चमचमाती रोशनी के माध्यम से अभिव्यक्त हो रही थी। मैं तो यही चाहती हूँ कि हम सभी समुदायों की आस्था को कभी ठेस न पहुँचे और हम सभी सदैव मिल-जुलकर रहे।

न्यायालय के फैसले से असंतुष्ट पक्ष के लिए माननीय उच्चतम न्यायालय के दरवाजे खुले हैं। वह अपनी असंतुष्टि को कानूनी तरीके से अभिव्यक्त कर सकते हैं। वैसे मेरी राय में यह फैसला बहुत अधिक सोच समझकार गहन चिंतन के पश्चात लिया गया फैसला है। जो दोनों पक्षों के हित में है। अत:हमें इस फैसले का सम्मान करना चाहिए।


- गायत्री शर्मा

Thursday, September 23, 2010

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना

जात-पात, धर्म-मजहब हम हमें अलगाववाद या एकेश्वरवाद नहीं सिखाता है। याद रखें कोई मजहब कभी कट्टरपंथिता नहीं लाता। हमें कट्टरपंथी तो हमारी सोच बनाती है। जो मंदिर और मस्जिद में दूरियाँ बढ़ाती है।

गीता कभी मुस्लिम को बैरी बनाने का और कुरान कभी हिंदु को मार गिराने का संदेश नहीं देती है। यह सब हम अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए करते है और अल्लाह और राम के नाम को कलंकित करते है। क्यों नहीं हम ऐसे समाज की कल्पना करते है। जहाँ मं‍दिर में अज़ान और मस्जिद में आरती हो? ऐसा समाज हकीकत में भी बन सकता है। बस जरूरत है तो थोड़ा नम्र होने की व अपनी कट्टरपंथिता छोड़ने की।


- गायत्री शर्मा

चित्र हेतु साभार : देवेंद्र शर्मा, रतलाम

Tuesday, September 21, 2010

16 सिंतबर 'युवा' प्रथम पृष्ठ


16 सिंतबर 2010 का नईदुनिया 'युवा'


प्रति गुरूवार सुबह-सुबह आपके घर आकर दस्तक देना और आपके साथ गरमा-गरम चाय पीना मुझे बड़ा अच्छा लगता है। पर क्या यह सोच दुखी भी होती हूँ और खुश भी कि मेरी जगह मेरी कलम आपसे मेरी पहचान कराती है और आपकी अच्छी बुरी प्रतिक्रियाओं को मेरे दफ्तर लेकर आती है।

आप सभी पाठक ही मेरी कलम की ताकत है। जो लिखने की मेरी ऊर्जा को बढ़ाते हैं। यदि युवा का जिक्र निकला ही है तो क्यों न पढ़ ली जाए 16 सितंबर 2010 नईदुनिया युवा में प्रकाशित मेरी स्टोरियाँ। एक ओर बात कि मुझे आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा।

- गायत्री शर्मा

जब होने लगे मंदिरों में अजान

कैसा लगे जब हिंदु करे अजान
और मुस्लिम गाए आरती
जब हम सभी रहे मिलजुलकर
और प्रेम बने जीवनरथ का सारथी

जब एक सी ऑक्सीजन
हम सभी के दिल को है धड़काती
तब जाति-धर्म के नाम पर
हमारी सांसे क्यों है घुट जाती?
क्यों नहीं मक्का शरीफ को
गंगा जल की धार है पावन बनाती ?

अल्लाह नहीं कहता हमें
मस्जिद से बाहर जाने को
पर इंसान बन अल्लाह
कह जाता है हिंदू को मुस्लिम बन जाने को

मंदिरों की घंटियाँ मुस्लिम की इबादत
पर भी सुनाई आती है
पर पुजारी की पूजा की आरती
कभी मस्जिद में क्यों नहीं जाती है?

बहुत से प्रश्न अब तक है अनुत्तरित
जिन्हें अब सुलझना चाहिए
मुस्लिम के मुँह से गीता
और हिंदु के मुँह से 'अल्लाह हो अकबर'
अब तो निकलना चाहिए

'मौन'या 'हिंसा'नहीं है किसी समस्या का हल
प्रेम और भाईचारा ही है अब सुलह का एक विकल्प
आओं करे एक ऐसे देश की कल्पना
जहाँ हर घर में मस्जिद,मस्जिद, गुरूद्वारा हो
ईद की मीठी सेवईयाँ के दूध में
गणेश चतुर्थी के मोतीचूर के लड्डू का मसाला हो


- गायत्री शर्मा

Friday, September 3, 2010

शिक्षक दिवस विशेष 'नईदुनिया युवा' इंदौर

गुरु और शिष्य के बीच का रिश्ता इतना मधुर होता है कि उसमें शब्दों की बजाय मौन ही सबकुछ कह जाता है। गुरू के मौन में गुरु की गुरुता, उसका ज्ञान, उसका अनुभव और शिष्य की कामयाबी में गुरु की झलक और शिष्य की मेहनत स्वत: ही दिखाई पड़ती है। इस रिश्ते का बखान करने के लिए न तो कोई झूठी तारीफ के शब्द चाहिए और न ही कोई महँगे उपहार।

गुरु का दिल तो शिष्य के मन में उसके प्रति सम्मान और शिष्य की कामयाबी को देख ही गद्गद हो जाता है। गुरु भी स्वयं को तभी धन्य समझता जब उसका शिष्य दुनिया में अपने अच्छे कार्यों से गुरु के नाम को रोशन करता है। गुरु शिष्य के बीच समझ और सहयोग के इसी रिश्ते पर आधारित मेरी कवर स्टोरी है 2 सितंबर के नईदुनिया युवा में। कृपया इस स्टोरी को पढ़ मुझे अपने फीडबैक अवश्य दें। आप इस समाचार पत्र को www.naidunia.com पर लॉग इन 'युवा' वाले बॉक्स पर क्लिक कर भी पढ़ सकते हैं।

- गायत्री

याद आती है माँ

आज फिर से कसक उठी है मन में
और हुआ है जीने-मरने के बीच द्वंद्व
जीवन कहता है मैं तुझे तिल तिल खाऊँगा
मौत का सौदागर कहता है करले मेरा आलिंगन
मैं तुझे दु:खों से मुक्ति दिलाऊँगा ....
कभी तो लगता है क्या इन संघर्षों का अंत होगा
या फिर अंत होगा रात दिन दु:खों की सिसकियों का


दोनों का मुझे कोई अंतिम छोर नजर नहीं आता है
इसी बीच मेरे भीतर बैठा दिल कसमसाता है
लेकिन दु:ख की घडि़यों में भी कोई ऊर्जा दे जाता है
मेरे आँसूओं को पौछता मुझे माँ का झीना आँचल नजर आता है
जो मुझमें फिर से जीने का जोश जगाता है
सच कहूँ तो दु:ख में हमेशा माँ का चेहरा ही मुस्कुराता नजर आता है।

मेरी प्रेरणा मेरी माँ है,जिसके संघर्ष ही मेरी ऊर्जा है
‍जिसकी खुशियाँ ही मेरे जीवन की सार्थकता
सच कहूँ तो दोस्तों,जब जब भ‍ी यह दुनिया मुझे सताती है
तब तब मुझे माँ की शीतल गोद नजर आती है।


- गायत्री शर्मा

Tuesday, August 24, 2010

ये मिलन है कितना प्यारा

कितना सुकून है दोस्तों
प्रकृति की गोद में ...
हरियाली का घना आँचल है दोस्तों
प्रकृति की गोद में ...
कल कल का कलरव करते झरने
फूटे चट्टानों के सीनों से
बरखा रानी की बाट जोहते थे
जो पिछले कई महीनों से

बरखा से दीदार करने को
प्रकृति ने खुद को सजाया
उसकी खूबसूरती पर निखार लाने को
सूरज मीठी मीठी सुनहरी धूप लाया
बादल ने ठंडी बयारों का आँचल
प्रकृति को पहनाया
देखों बरखा संग प्रकृति के
मधुर मिलन का मौसम आया।

- गायत्री शर्मा

नोट : यह कविता मेरी स्वरचित है व साथ ही कविता के साथ संलग्न चित्र भी मेरे द्वारा ही लिया गया है। कृपया इनका उपयोग करने से पूर्व मेरी अनुमति जरूर लें।

अबकी राखी लाई लंबा इंतजार

राखी पर अपने भाई अमित के इंतजार में भूमिका दरवाजे की ओर टकटकी लगाए उसके आगमन के इंतजार में पलके बिछाए बैठी है। वहीं अमित के माता-पिता दरवाजे से आती हर आहट पर चौककर देखते हैं कि शायद कोई उनके बेटे अमित के मिलने की खबर आया होगा। जिसे सुन उनके मन को कुछ संतोष मिलेगा और उनका लंबा इंतजार खत्म होगा पर अब वक्त हर दिन उनके हाथों से रेत की तरह फिसलता जा रहा है लेकिन उनके बेटे का कोई पता नहीं चल पा रहा है। अबकी राखी पर जहाँ हर घर में जश्न का माहौल है। वहीं रतलाम में कस्तूरबा नगर निवासी हरीशचंद्र शर्मा के घर में पिछले कई दिनों से सन्नाटा ही सन्नाटा पसरा हुआ है। यहाँ बस गूँजती है तो फोन की घंटियाँ या अमित के इंतजार में बार-बार बेसब्र होते माता-पिता के करूण रूदन की आवाजें।

इस घर में हर किसी के माथे पर नजर आती चिंता की मोटी लकीरे व पल-पल में डबडबाती आँखों के आँसू बस हर मिलने-जुलने वालों से यही सवाल पूछ रहे है कि क्या आप हमारे अमित को ढूँढकर ला सकते हो? इस परिवार का बेटा अमित शर्मा गुड़गाँव की 'इंफो एज इंडिया' कंपनी में फील्ड ऑफिसर के पद पर कार्य कर रहा था। कंपनी के लिए बिहार के बक्सर में राजनैतिक सर्वे करने गया अमित विगत 6 माह से वहाँ सर्वे कार्य कर रहा था। सर्वे में सहयोग हेतु अमित ने बिहार के ही 10 युवकों को नियुक्त भी किया था। अपने अधीन कार्य करने वाले इन कर्मचारियों को वेतन देने के बाद जब अमित 16 अगस्त को अपने गृहनगर आने की तैयारी कर रहा था। तब के लिए काल का कहर बनकर आए 16 अगस्त के उस मनहूस दिन न जाने ऐसा क्या हुआ कि बक्सर की उन वादियों में अमित लापता हो गया। उस दिन से लेकर आज तक अमित के जीवित या मृत होने की किसी पुख्ता खबर का पता नहीं चल पाया है।

अमित के साथ बिहार में सर्वे कार्य कर रहे मनोज राम द्वारा अमित के परिवारजनों को फोन पर दी गई सूचना पर यकीन करें तो अमित बक्सर(आरा जिला) के यमुना घाट पर गंगा नदी में स्नान करने के दौरान गंगा के तेज बहाव में बह गया पर मनोज क‍ी कही इस बात में कितनी सच्चाई है इस पर से पर्दा उठना अभी शेष है।

अब आप ही विचार कीजिए कि यदि अमित गंगा में बह जाता तो आज दिन तक कही न कही से अमित का मृत शव किसी न किसी के हाथ लगता और उसके मृत होने की खबर उसके परिवार को मिलती। परिस्थितियों को देखते हुए यह भी हो सकता है कि अमित का अपहरण हो गया हो या हो सकता है उसे किसी ने मारकर उसके शव को नदी में बहा दिया हो। ऐसे में निश्चित तौर पर हमारे संदेह की सुई अमित के सहयोगी मनोज राम पर जाकर ही टिकती है। जिसके द्वारा अमित के परिवारजनों को अमित के गंगा नदी में बहने की सूचना दी गई थी।

मैं आपसे केवल इतना अनुरोध करना चाहूँगी कि कही न कही मेरे या आपके माध्यम से अमित के लापता होने की खबर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचे व प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप हम सभी लोग हरीशचंद्र शर्मा के परिवार की तलाश में उनके सहयोगी बने। आप सभी ब्लॉगर बंधुओं के सहयोग की कामना में अंत में मैं यही कहूँगी।


न कोई कहासुनी, और न ही कोई ग़म
कहाँ गया इस घर का लाल, इसी बात का है ग़म
जब बँधी है हम सभी की कलाईयों में राखियाँ
तो क्यों सूनी सूनी है लापता अमित की कलाईयाँ


- गायत्री शर्मा

Wednesday, July 21, 2010

एक सुनहरी शाम

इस धुंध में भी एक चेहरे की
मधुर मुस्कान बाकी है।
यादों के पुरिंदे में अब तक
एक सुनहरी शाम बाकी है।
बीत गया हर लम्हा
खत्म हो गया ये साल
लेकिन अभी भी कुछ यादें बाकी है।

एक साथी सफर का
अब तक याद है मुझे।
उस अजनबी रिश्ते का
अब तक अहसास है मुझे।
खुशियाँ इतनी मिली कि
झोली मेरी मुस्कुराहटों से भर गई।‍
जिंदगी में सब कुछ मिला मुझे
पर तेरी कमी खल गई।

इस साथी को 'अलविदा' कहना
खुशियों से जुदा होना था,
अपनों से खफा होना था।
परंतु वो रहेगा कायम हमेशा
मेरे होठों की मुस्कान में,
इन आँखों की तलाश में,
मेरी लेखनी के शब्दों में .....

- गायत्री शर्मा

यह कविता मेरे द्वारा अपने वेबदुनिया वाले ब्लॉग पर 2 जनवरी 2009 को प्रकाशित की गई थी।

नजर आती है वो सामने वाली कुर्सी

बार-बार मेरी निगाह मेरे सामने वाली कुर्सी पर जाकर टिक जाती है। जहाँ कभी वेबदुनिया के हमारे साथी पत्रकार अभिनय कुलकर्णी बैठा करते थें। उनकी जितनी कमी पिछले महीने उनके द्वारा वेबदुनिया को खुशी-खुशी अलविदा कहकर जाने से न हुई। उससे ज्यादा कमी आज उनके दुनिया छोड़ जाने से हो रही है। अब बार-बार मेरी नजर उसी खाली‍ पड़ी कुर्सी पर जाकर ठहर जाती है। जहाँ कभी मराठी भाषा में हँसी-ठिठौली की व फोन पर बातचीत की आवाजें मेरे कानों में पड़ा करती थी।

आज भी जिंदा हूँ मैं :
मराठी वेबदुनिया का एक सशक्त पत्रकार 19 जुलाई 2010 की रात को हम सभी से रूठकर अंधेरे के आगोश के साथ ही रात ही को पौने दो बजे सदा के लिए मौत की गहरी नींद में सो गया। जब दूसरे दिन इस दुर्घटना की खबर हम सभी को लगी। तब अचानक वो मँजर आँखों के सामने आ गया। जब कभी वेबदुनिया के कार्यक्रमों में हम सभी एक साथ बैठकर मुस्कुराते थें। नवरात्रि, गणेशोत्सव ... आदि अवसरों में हमेशा हँसते-मुस्कुराते अभिनय जी का चेहरा आज मेरी आँखों के सामने आकर मानों बार-बार यहीं कह रहा हो कि मैं मरा नहीं हूँ। मैं जिंदा हूँ आप सभी के आत्मविश्वास में, आपके दिलों में आपक‍ी ऊर्जा बनकर। मैं एक पत्रकार हूँ। जो कभी मरता नहीं। जिसकी लेखनी की सशक्त आवाज उसे हमेशा आपकी यादों में जीवित रखती है। ऐसी प्रतिध्वनि के कानों में गूँजते ही मुझे लगा कि अब राह में बिछड़े हमारे साथी की आवाज और उसके परिवार का संबंल हम लोग है। जो इस दु:ख की घड़ी में कुलकर्णी परिवार का साथ देने के साथ ही अपनी निष्पक्ष व सच्ची पत्रकारिता द्वारा अपने साथी को सच्ची श्रृद्धांजलि अर्पित करेंगे।

खुशियों पर काल का कहर :
अभिनय कुलकर्णी को महाराष्ट्र में एक अच्छी नौकरी मिली थी। जिसके पदभार को ग्रहण करके फिर से अपने परिवारजनों के चेहरों पर खुशियों की मुस्कुराहट बिखेरने के लिए यह पत्रकार सपत्निक नासिक जा रहे थे। लेकिन समय को इनकी खुशियाँ रास नहीं आई और काल ने इन पर ऐसा कहर बरपाया कि बीच राह में ही धूलिया के करीब इनकी बस की ट्रक से हुई जोरदार टक्कर ने हमसे हमारा एक हँसमुख व प्रतिभावान साथी पत्रकार हमेशा हमेशा के लिए छीन लिया और हमें हँसते-मुस्कुराते अभिनय कुलकर्णी की यादों के भँवर में छोड़ दिया।

किसी के साथ भी ऐसे हादसें न हो :
बड़े ही शालीन, सभ्य व बेदाग चरित्र वाले अभिनय कुलकर्णी की कमी को कोई पूरा नहीं कर सकता पर वक्त के आगे किसी की नहीं चली है। हम आज है कल नहीं। हममें से किसी के भी साथ ऐसा हादसा घटित हो सकता है। अभिनय जी को नम आँखों से श्रृद्धांजलि देने के साथ ही मैं बस यही कहना चाहूँगी कि आखिर क्यों हमारे वाहनों की रफ्तार इतनी अधिक बढ़ जाती है कि ये बेलगाम होते वाहन समय की रफ्तार को भी मात देकर हमारी जिंदगियों से खेल जाते हैं और हमें दे जाते हैं तन-मन में सिहरन पैदा करने वाली दुर्घटनाओं की यादें।

मेरे साथियों! आओं और आवाज उठाओं ताकि इस बेलगाम होते ट्राफिक पर लगाम कसी जाएँ और हम बेखौफ होकर अपने परिवार के साथ सड़कों पर वाहनों से सुखद यात्रा कर सके। कही न कही किसी वाहन चालक की लापरवाही व तेज रफ्तार ने ही हमारे साथी को हमेशा के लिए मौत की गहरी नींद में सुला दिया है।

अंत में अभिनय जी को श्रृद्धांजलि अर्पित करने के साथ ही उन्हें मेरा शत-शत नमन।

Tuesday, July 20, 2010

कैमरे के सामने मैं और नेहा हिंगे

आज दूरदर्शन के लिए मुझे नेहा हिंगे का साक्षात्कार लेने का मौका मिला। इसी बहाने मैंने नेहा को करीब से जाना। साक्षात्कार के दौरान मेरे बगल वाली कुर्सी पर बैठी नेहा के चेहरे पर अब भी वह चमक बाकी थी, जो उनके चेहरे पर उस वक्त थी। जब वह फेमिना मिस इंडिया इंटरनेशनल 2010 बनी थी। नेहा के साथ ही स्टूडियों में उनकी माताजी,बहन,बुआ और पिताजी थें। जिनका साथ पाकर नेहा बहुत खुश थी।

अपने परिवार के साथ अपने पसंदीदा शहर इंदौर की यात्रा पर आई नेहा को इस शहर ने बहुत प्यार और सम्मान देकर सिर आँखों पर बिठाया और नेहा ने भी अपनी मधुर मुस्कुराहट और प्यारी सी बोली से सभी इंदौरवासियों का दिल जीत लिया।

यदि साक्षात्कार की बात करें करीब आधे घंटे तक चला यह साक्षात्कार इतना शानदार रहा कि उसने नेहा के साथ साथ मेरे भी चेहरे पर मुस्कुराहट बिखेर दी। इस साक्षात्कार के बाद मुझे भी पता चला कि सिर पर मिस इंडिया का सम्माननीय क्राउन पहनने वाली नेहा हकीकत में भी इस क्राउन की असली हकदार है। सच कहूँ तो नेहा ने अपनी खुली आँखों से सपने देखे व उन्हें हकीकत बना हम सभी को बता दिया कि आजकल लड़कियाँ भी हर मामले में लड़कों से आगे है। नेहा आप भविष्य में भी बहुत नाम कमाएँ। ऐसी मेरी शुभकामनाएँ है।

- गायत्री शर्मा

नेहा हिंगे से मेरी चर्चा के कुछ अंश

मध्यप्रदेश के देवास शहर से अपने सफर की शुरूआत करने वाली नेहा ने जो भी सपना देखा। उसे पूरा कर दिखाया। बचपन से ही 'मिस इंडिया' बनने का ख्वाब देखने वाली नेहा आज बचपन में देखे अपने सपने को जी रही है। नेहा के 'फेमिना मिस इंडिया इंटरनेशनल 2010'का क्राउन जीतने के दो दिन बाद जब मेरी नेहा से फोन पर बातचीत हुई। तब उनके जीत की खुशी उनके शब्दों में घुली मिठास से झलक रही थी।

मृदुभाषी नेहा से मेरी उस दिन से लेकर अब तक कई बार टेलीफोन पर बातचीत हो चुकी है पर मुझे इस बात की बेहद प्रसन्नता है कि उनसे हुई पहली चर्चा में मुझे इस बात का तनिक भ‍ी आभास नहीं हुआ कि यह वहीं लड़की है, ‍‍‍जिसने दो ‍दिन पहले 'फेमिना मिस इंडिया इंटरनेशनल' का खिताब जीता है। स्वयं की जीत पर न कोई गुरूर और न ही बातचीत में किसी तरह का अक्खड़पड़ ... कुछ ऐसी ही है नेहा। जिसका बस एक ही शौक है और वह है मोबाइल को घंटों कान से लगाकर बतियाने का।

खुशमिजाज और अलमस्त नेहा की आवाज फोन पर पूर्णत: आत्मविश्वास से लबरेज थी। बातों ही बातों में नेहा ने मुझे बताया कि बचपन में वो बार-बार आईने में खुद को देखकर तरह-तरह के पोज़ बनाती थी और खुश जाती थी। अपने बचपन में हर लड़की की तरह नेहा भी यही सोचती थी कि मैं भी बड़ी होकर 'मिस इंडिया' बनूँ। नन्ही नेहा का यह सपना आज हकीकत बन गया है और जब कोई सपना हकीकत बनता है तो उसे जीने का मजा ही कुछ और होता है।

पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर नेहा जितना अपने माता-पिता और बहन से प्यार करती है। उतना ही प्यार वह अपनी बुआ से भी करती है। तभी तो फोन पर बात करते हुए बार-बार नेहा ने मुझसे कहा कि प्लीज मैडम, आप भले ही मेरे इंटरव्यू में मेरे माता-पिता का नाम मत देना पर देवास में रहने वाली मेरी बुआ का नाम मेरे नाम के साथ जरूर देना क्योंकि मैं उनसे बहुत प्यार करती हूँ। इसी के साथ ‍ही नेहा ने मुझे उनके स्कूली दिनों की यह बात भी बताई कि जब वह देवास में स्कूल जाती थी। तब उनकी बुआ हर रोज लंच टाइम में अपनी प्यारी सी भतीजी को चॉकलेट खिलाती थी। नेहा इसे अपनी बुआ की खिलाई चॉकलेट का ही असर मानती है कि आज वह सबसे बहुत मीठा बोलती है।

कामयाबी की इस बुलंदी को छुने के बाद भी नेहा का अपनी जमीन से जुड़ाव है। आज भी वह देवास में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद करती है। देवास का अपना घर, बचपन के खेल, देवास की माहेश्वरी की मिठाईयाँ, बचपन के वो साथी सभी आज भी मीठी याद बनकर नेहा के यादों के पिटारे में बंद है, जिसे खोलते ही वह अपने बचपन में खो जाती है। नेहा की दिली ख्वाहिश है कि बुढापे में भी यदि ईश्वर ने चाहा तो वह देवास में आकर ही अपने जीवन का बचा वक्त बिताना चाहेगी।
- गायत्री शर्मा

Thursday, July 15, 2010

अब आप भी जुड़े नेहा हिंगे के साथ

आज हम सभी युवाओं के लिए गौरव की बात है कि हमारे प्रदेश की नेहा हिंगे ने फेमिना मिस इंडिया इंटरनेशनल 2010 का क्राउन जीता है। आत्मविश्वास व सकारात्मक ऊर्जा से लबरेज नेहा पूना में रहकर आज भी मध्यप्रदेश के देवास व इंदौर शहरों को नहीं भूल पाई है। इन दोनों शहरों में बिताए अपने बचपन के दिनों का जिक्र करते वह नहीं थकती है। आखिर हो भी क्यों न,इन दोनों शहरों से नेहा की बचपन की यादें जो जुड़ी है।

मुझे खुशी है कि फेमिना मिस इंडिया इंटरनेशनल का क्राउन जीतने के बाद सर्वप्रथम मैंने ही मध्यप्रदेश के एक प्रतिष्ठित अखबार के लिए नेहा का साक्षात्कार लिया था। तब से अब तक नेहा और हमारे बीच पत्रकार और सेलिब्रिटी से शुरू हुआ रिश्ता अब हमारी दोस्ती में तब्दील हो गया है। नेहा से मेरी कल और आज भी बातचीत हुई परंतु इस बार हमारी चर्चा मीडिया संबंधित विषय पर न होकर के दोस्ती का हक माँगने वाले दोस्तों के रूप में हुई।

आप सभी को यह जानकर खुशी होगी कि आप सभी की चहेती नेहा अब गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए फंड एकत्र कर रही है। 'आकांक्षा'और'टीच फॉर इंडिया' संस्था से जुड़कर नेहा अब गरीब बच्चों के चेहरों पर शिक्षा की मुस्कान ला रही है पर इंदौर और देवास में नेहा का यह अभियान तभी सफल हो सकता है। जब आप और हम नेहा के साथ मिलकर देश के बच्चों की शिक्षा के लिए आगे आए। मात्र 200 रुपए की स्टोरी बुक्स खरीदकर आप देश के एक बच्चे की शिक्षा में अभूतपूर्व योगदान देकर नेहा के इस कार्य को अच्छा प्रतिसाद दे सकते हैं। नेहा इस कार्य की शुरूआत करने के लिए जल्द ही अपने गृहनगर देवास आने वाली है।

सभी ब्लॉगर बंधुओं से नेहा हिंगे का अनुरोध है कि आप भी इस पुनीत कार्य में नेहा के सहयोगी बनें। यदि आप स्वयं या अपने मित्रों व रिश्तेदारों के साथ मिलकर धनराशि एकत्र कर नेहा का सहयोग कर सकते हैं तो कृपा करके मुझे अपना फीड बैक भेजें ताकि मैं आपके फीडबैक से नेहा को अवगत करा सकूँ।

गायत्री शर्मा

Tuesday, July 13, 2010

बरखा का श्रंगार

बरखा की बूँदों ने
किया श्रंगार।
सूरज ने लुटाया
मुझ पर अपना प्यार।

कल तक था मैं गुमनाम
जलता था तपिश में मैं।
बरखा रानी चुपके से आई
धीरे से कानों में फुसफुसाई।

बूँदे बोली मुझसे
क्यों है तू उदास?
चल मेरे साथ कर ले
मौज-मस्ती और उल्लास।

खुशबू अपनी तू लुटा
झुम-झुम के तू गा।
मस्त पवन के झोको संग
तू मंद-मंद मुस्का।

पवन लेकर चली पाती प्रेम की
बूँदों ने मधुर गान गाया।
बरखा के मौसम में फूल
खुलकर मुस्कुराया।

-गायत्री

(यह कविता मेरे व्यक्तिगत ब्लॉग aparajita.mywebdunia.com पर 26 मई 2008 को पोस्ट की गई थी।)

मेरी यह कविता आपको कैसी लगी, आपके विचारों से मुझे अवश्य अवगत कराएँ।

Sunday, July 11, 2010

हे ईश्वर! तू कहाँ है?

ढ़ूढँती हूँ तुझे पहाड़ों, कंदराओं में
कहते है तू बसता है मन के भावों में

पुष्प, गंध, धूप क्या करू तुझे अर्पित?
खुश है तू अंजुली भर जल में

तुझमें मुझमें दूरी है कितनी?
मीलों के फासले है या है समझ अधूरी

क्या तू सचमुच बसा है पाषाण प्रतिमाओं में?
या तू बसा है दिल की गहराईयों में

आखिर कब होगा तेरा मेरा साक्षात्कार?
मिलों मुझसे पूछने है तुझसे कई सवाल

अब मन के इस अंधकार को दूर भगाओं
हे ईश्वर जहाँ भी हो अब तो नजर आओ।

- गायत्री शर्मा

(22 नवंबर 2008 को मेरे द्वारा मेरे व्यक्तिगत ब्लॉग aparajita.mywebdunia.com पर मेरे द्वारा यह कविता पोस्ट की गई थी।)


मेरी यह कविता आपको कैसी लगी? आपके विचारों से मुझे अवश्य अवगत कराएँ।

कराह उठी मानवता


कराह उठी मानवता
मौत के इन दंरिदों से

बू आती है दगाबाजी की
पड़ोसी के इन हथकंडों से।

हर बार बढ़ाया दोस्ती का हाथ
प्यार नहीं लाशे बनकर आई उपहार
बस अब खामोश बैठों देश के सत्ताधारों
अब वक्त है करदो शासन जनता के हवाले।

जेहाद का घूँट जिसे पिलाया जाता
भाई को भाई का दुश्मन बताया जाता
वो क्या जाने प्यार की भाषा
प्यार निभाना जिसे न आता?

मेरा देश जहाँ है शांति और अमन
दुश्मन नहीं सबके दोस्त है हम
जरा आँखे खोलों ऐ दगाबाज नौजवानों
अपने भटके कदमों को जरा सम्हालों।

जानों तुम उन माओ का दर्द
जिसने खोया है अपना लाल
सेज सजाएँ बैठी थी दुल्हन
पूछे अब पिया का हाल।

उन अनाथों के सपने खो गए
माँ-बाप जिनके इन धमाको में खो गए
ममता लुटाते सगे-संबंधी सारे
माँ-बाप की लाशों से लिपटकर रोते ये बेचारे।

आतंक का तांडव मचाकर
क्यों माँगता है तू मौत की भीख?
ऐ दरिंदे जरा सोच उन लोगों के बारे में
जो हो गए अब लाशों में तब्दील।

कब्रगाह बने है आज वो स्थान
जहाँ बसते थें कभी इंसान
काँपती है रूहे अब वहाँ जाने से
आती है दुर्गंध अब पड़ोसियों के लिबाज़ों से।

- गायत्री शर्मा

(मुंबई आतंकी हमलों के बाद 3 दिसंबर 2008 को मेरे व्यक्तिगत ब्लॉग aparajita.mywebdunia.com पर मैंने यह कविता पोस्ट की थी।)

आपको कैसी यह कविता लगी, आपके विचारों से मुझे अवश्य अवगत कराएँ।

औरत का सच्चा रूप है माँ

बचपन में लोरियाँ सुनाती माँ
हर आहट पर जाग जाती माँ
आज गुनगुनाती है तकिये को लेकर
भिगोती है आँसू से उसे बेटा समझकर

स्कूल जाते समय प्यार से दुलारती माँ
बच्चे के आने की बाट जोहती माँ
अब रोती है चौखट से सर लगाकर
दुलारती है पड़ोस के बच्चे को करीब बुलाकर

कल तक चटखारे लेकर खाते थे दाल-भात को
और चुमते थें उस औरत के हाथ को
आज फिर प्यार से दाल-भात बनाती है माँ
बच्चे के इंतजार में रातभर टकटकी लगाती माँ

लाती है 'लाडी' बड़े प्यार से लाडले के लिए
अपनी धन-दौलत औलाद पर लुटाती माँ
आज तरसती है दाने-पानी को
यादों और सिसकियों में खोई रहती माँ

लुटाया बहुत कुछ लुट गया सबकुछ
फिर भी दुआएँ देती है माँ
प्यार का अथाह सागर है वो
औरत का सच्चा रूप है माँ
औरत का सच्चा रूप है माँ ....

- गायत्री शर्मा

(यह कविता मेरे व्यक्तिगत ब्लॉग aparajita.mywebdunia.com पर 11 मई 2009 को पोस्ट की गई थी।)

मेरी यह कविता आपको कैसी लगी, आपके विचारों से मुझे अवश्य अवगत कराएँ।