Monday, June 30, 2014

स्वामी के मन में कब बसेगा साँईं ?

कहते हैं सत्ता, पद, स्त्री और माया का मोह छोड़े नहीं छुड़ता। यह मोह जब अति की सीमाएँ लाँघ जाता है तो व्यक्ति की बुद्धि विपरीत हो जाती है और प्रकाण्ड से प्रकाण्ड ज्ञानी मनुष्य भी विक्षिप्तों की तरह व्यवहार करने लगता है। इसी को ‘विनाशकाले विपरित बुद्धि’ भी कहा जाता है। हिंदुओं के सम्माननीय धर्मगुरू स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी का शिर्डी के साँईबाबा पर दिया विवादास्पद बयान कुछ इसी प्रकार की मानसिकता व ज्ञान के अतिरेक का परिचायक है। जिसके चलते आज उनकी नम्रता व शिष्टता धर्म की संर्कीण अलमारी में कैद होकर बौखलाहट व झुंझलाहट के रूप में सामने आ रही है। धर्म व आध्यात्म के प्रति लोगों की आस्था जागृत करने वाले धर्मगुरू का साँईबाबा व गंगास्नान के वर्जन पर दिया गया बयान उनकी बौखलाहट व ज्ञान के दंभ व बौखलाहट के अलावा और कुछ नहीं है।
जब ईश्वर और प्रकृति जीव मात्र में जात-पात व रंग-रूप का भेदभाव नहीं करती तो आप और हम इस विभेद को जन्म देने वाले कौन होते हैं, क्या हम ईश्वर से भी बड़े है या बड़े होने का नाटक कर महान बनना चाहते है? हम वहीं लोग है, जो सड़क पर पड़े पत्थर को भेरू मानकर, पेड़ को ईश्वर का वास स्थल मानकर व नदियों को माँ की उपमा देकर पूजते आएँ है तो हमारे द्वारा किसी फकीर को पूजे जाने में किसी धर्मगुरू विशेष को आपत्ति क्यों है? द्वारकापीठ के शंकराचार्य भी उसी धार्मिक पद्धति के अग्रेता है, जिसमें साधु-संत और गुरू को ईश्वर के समकक्ष मानकर उनकी पूजा की जाती है। हम तो राह चलते साधु को भी शीश झुकाकर नमन करते हैं। हिंदुओं में साधु-संतों का जातिगत आधार पर नहीं बल्कि ज्ञान के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है।

           विश्वभर में शांति व सांप्रदायिक सद्भाव का पैगाम फैलाने वाला यह वहीं भारत देश है, जहाँ धर्म व जाति से परे आध्यात्म की गंगा अविरत रूप से चहुँओर बहती है। यह वहीं देश है, जिसमें धर्मानुसरण करने, सत्संग सुनने या शिष्य बनने के लिए किसी जाति या उपजाति विशेष के टोकन की आवश्यकता नहीं होती है। इसके लिए तो आवश्यकता होती है केवल शुद्ध अंत:करण, आस्था और श्रृद्धा की। शिर्डी के साँई ने स्वयं को कभी ईश्वर नहीं माना। साँई का जीवन तो विशाल महलों में ऐशो आराम या बड़े-बड़े पांडालों में सजती धर्मगुरूओं की दुकानों से परे खंडहर में फकीरी में बीता। साँई मानवमात्र की सेवा करने वाले वह मसीहा थे, जिसने अल्लाह और राम सबको एक मानकर विश्व में सांप्रदायिक सद्भाव की अनूठी मिसाल पेश की। यह लोगों की साँई के प्रति, उनके जीवन चरित्र के प्रति अटूट आस्था ही है, जिसके चलते साँई का समाधि स्थल आज एक विशाल मंदिर के रूप में सज रहा है और साँई के अनुयायी दुनियाभर में फैल रहे हैं। जब साँई ने मानव मात्र में कभी जात-पात या छूत-अछूत का भेदभाव नहीं किया तो साँई के नाम पर स्वामी जी इस विभेद को जन्म देकर क्या सिद्ध करना चाहते हैं? जब मोक्षदायिनी गंगा ने एक माँ की तरह हर जाति व धर्म के लोगों को अपनी ममता से दुलारा है तो आज गंगा स्नान पर राजनीति क्यों की जा रही है? इस विभेद को उपजाने की बजाय स्वामी जी यदि अन्य धर्मों व धर्मगुरूओं की अच्छी बातों का जिक्र अपने उपदेशों में करते तो शंकराचार्य के पद की महत्ता सही अर्थों में दुनिया को पता चलती। याद रखिएँ पद की महिमा सदैव ज्ञान से होती है और ज्ञान किसी को दंभ करना नहीं सीखाता। ज्ञान तो व्यक्ति के व्यवहार में शिष्टता और नम्रता लाता है। स्वामी जी को चाहिए कि वह अपने विशाल हृदय में साँई व साँईभक्तों को भी छोटा सा स्थान दें व अपने विवादित बयान पर सार्वजनिक रूप से क्षमा माँगे। 
- गायत्री शर्मा 
नोट : मेरा यह लेख 30 जून 2014, सोमवार को उज्जैन से प्रकाशित होने वाले सांध्य दैनिक अखबार 'अक्षरवार्ता' के पृष्ठ क्रमांक 4 पर, लखनऊ से प्रकाशित समाचारपत्र दैनिक जनवाणी में 1 जुलाई 2014 को प्रकाशित हुआ है। कृपया इस ब्लॉग से कोई भी लेख या कविता का प्रयोग करने पर साभार देवें व इस संबंध में मुझे अवश्य अवगत कराएँ। 

Tuesday, June 24, 2014

तू ही है ...

न चाहते हुए तेरे आकर्षण की तीव्रता
नाकाम कर देती है मेरे प्रतिकर्षण को
चाहता हूँ कर दूँ तुझे
दिलवालों की फेहरिस्त से अलग
पर तू है कि बार-बार सबको पछाड़कर
अव्वल नंबर पर आ जाती है
मन में जलती क्रोध की आग
तेरे दीदार मात्र से शांत हो जाती है
तुझे 'खड़ूस' कहूँ या कहूँ
मल्लिका-ए-हुस्न
सौंदर्य की हर उपमाओं में मुझे
तू ही तू नज़र आती है
प्रेम में राधा का
रौद्र में काली का
और वात्सल्य में तू
यशोदा का रूप धर आती है
मेरे ख्वाबों की परी
सपनों में रोज तू आती है
पर आँख खुलते ही क्यों ओझल हो जाती है?
चाहता हूँ कर लूँ कैद तुझे
प्रेमाकर्षण की मुट्ठियों में
बना दूँ एक आशियाना मोहब्बत का
दिल में प्रेमनगरी के अंदर
करूँगा हरक्षण तेरी पूजा
तेरे सिवा कोई न होगा
मन मंदिर में दूजा
तेरे सिवा कोई न होगा
मन मंदिर में दूजा ....।  
- गायत्री 

Monday, June 23, 2014

लिखूँ तो क्या लिखूँ

लिखूँ तो लिखूँ क्या
तेरा नाम या
तेरे नाम कोई पैगाम?

प्रेम लिखूँ, प्रियतम लिखूँ
या लिखूँ प्राणनाथ?
कुछ न लिखूँ तो
कोरे कागज पर ही
लिख दूँ तुझे
'तू है मेरी जान'

तू ही बता तारीफों के पुल बाधूँ
या लगा दूँ तुझ पर
मेरी नाफरमानी का इल्जाम?
कह दे तू तो खामोशी से
बन जाऊँ मैं तेरी गुलाम

फूल भेजूँ, गुलदस्ता भेजूँ
या भेज दूँ लिखकर मेरा नाम?
इत्र लगाऊँ, रंगों से सजाऊँ
या लगा लूँ सीने से यह पैगाम
तू ही बता कैसे भेजूँ तुझे पैगाम?

- गायत्री 

Tuesday, June 17, 2014

अक्षय आमेरिया की रेखाओं की दुनिया

आज महाकालेश्वर की नगरी उज्जैन में कदम रखते ही मेरी मुलाकात लकीरों से जिंदगी के विविध रंगों के चित्र उकेरने वाले चित्रकार श्री अक्षय आमेरिया जी से हुई। जिस प्रकार के केशों से प्रकृति ने आमेरिया जी के सिर को श्रृंगारित किया है। वह केश इस प्रतिभावान कलाकार का परिचय देने के साथ ही उनकी कल्पनाशीलता को भी अभिव्यक्त करते हैं। घुँघराले केशों की तरह इस चित्रकार की जिंदगी भी लकीरों के विविध आकारों से गुजरती हुई जीवन के विविध पक्षों व भावों को कैनवास के आईने पर प्रतिबिंबित करती है। कहते हैं कलाकार का कमरा मंदिर के समान पवित्र होता है। वहाँ पड़ी चीज़ों से उसकी कल्पनाशीलता व सृजनात्मकता का अंदाजा लगाया जा सकता है। अक्षय जी की कल्पनाओं को अभिव्यक्ति देने वाले कमरे में इस कलाकार के सपने इधर-उधर अलग-अलग आकारों में टंगे व बिखरे नज़र आते हैं, जिन्हें फुरसत में जोड़-जोड़कर अक्षय जी एक बोलता चित्र कैनवास पर बनाते हैं।
आमेरिया जी के साथ उनके निवास पर हुई मुलाकात मुझे चेहरों, भावों व विविध आकारों की उस दुनिया में ले गई। जहाँ एक सीधी सी लकीर भी अर्थपूर्ण होती है। अक्षय जी की हाथों से फिसलकर वह साधारण सी लकीर भी बोलने लगती है, चलने लगती है और कभी-कभी तो साँप सी रैंगने भी लगती है। वही लकीर जब कैनवास पर बिंदु से जा मिलती है तो इठलाती हुई यह लकीर अलग-अलग आकारों में ढ़ल कभी चेहरा बन जाती है, तो कभी चाँद, सूरज और पेड़ बन जाती है। अक्षय जी के रेखाचित्रों में अमूमन यह लकीर चेहरे पर उदासी का रंग जीवन के संघर्षों को बँया करती है तो कभी चुटकीभर खुशियाँ मिल जाने पर ही गुलाबी, हरे व लाल रंग से सजकर कैनवास पर खुशियों को बिखेरती है।
- गायत्री 

Tuesday, June 10, 2014

मोदी पर केंद्रित मेरी कविता

माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर केंद्रित मेरी कविता आप जरूर पढ़े अ अपनी प्रतिक्रियाओं से मुझे अवगत कराएँ। मेरी यह कविता उज्जैन से प्रकाशित सांध्य दैनिक अखबार 'अक्षरवार्ता' में भी दिनांक 29 मई 2014 को परकाशित हुई है। -

नमो-नमो छा गया
गर्जना प्रचंड है
हौंसले बुलंद है
देखकर अंचभ है
ये कौन सत्ता के सूने
गलियारों को गूँजा गया?
नमो-नमो छा गया

सिंह सी दहाड़ कर
शत्रुओं पे वार कर
भ्रष्ट पर प्रहार कर
ये कौन गाँधियों को
आईना दिखा के रूला गया? 
नमो-नमो छा गया

विकास का अस्त्र लिए
सुनितीयों का शस्त्र लिए
सुप्त जनादेश को पल में जगा गया
ये कौन माँ का लाल आज
विकास का अग्रदूत बने आ गया? 
नमो-नमो छा गया

हर कोई अंचभित है
विपक्ष दिग्भ्रमित है
कभी न सोचा वो कहर बरपा गया
ये कौन 16 जून को
देश का गौरव पर्व बनाकर छा गया?
नमो-नमो छा गया

चला पड़ा था वह अकेला
बढ़ता गया सर्मथकों का रैला
उसने जो ठाना, वो पा गया
ये कौन आकर हमें आज 
झूठें स्वप्न से जगा गया?
नमो-नमो छा गया

किसी ने कहाँ छोटा है
उसने दिखाया वह बड़ा है
छोटे काम को भी वह बड़ा काम बना गया
ये कौन दूधमुँहे बच्चे को आज 
चाय का स्वाद चखा गया ?
नमो-नमो छा गया 

देखों, आज माँ भारती
भगवा में इठला रही
खुशी के गीत गा रही
ये कौन झाँडू और पंजे पर भी
कमल खिलाकर आ गया?
नमो-नमो छा गया

-          - गायत्री


Thursday, June 5, 2014

कानून का अज्ञान, नहीं है बचाव का उपाय

एक-दूसरे के बीच रफ्तार की प्रतिस्पर्धा और जल्दबाजी के कारण होती सड़क दुर्घटनाएँ आए दिन हमें धरती पर ही नरकलोक के दर्शन करा जाती है। फोर लेन, सिक्स लेन या रेड बस की लेन ही क्यों न हो, खुली आँखों से अंधी बन अंधाधुंध रफ्तार से दौड़ती गाडि़याँ कभी रैलिंग से टकराती है तो कभी गड्ढ़े में गिर जाती है, कभी आपस में ‍भीड़ जाती है तो कभी राह चलतो को घसीट ले जाती है। गंभीर सड़क दुर्घटनाओं की भयावहता को देखकर ऐसा लगता है जैसे गहरी नींद में या शराब के नशे में धूत होकर ड्राइवर गाडि़यों के स्टेयरिंग थामता है और यमराज बन कई लोगों की मौत की कहानी रचता है। हाल ही में कैबिनेट मंत्री गोपीनाथ मुंडे की सड़क दुर्घटना में हुई दुखद मौत ड्राइवर की लापरवाही की ओर ही ईशारा कर रही है। कहते हैं जब आम आदमी मरता है तो प्रशासन सोता है लेकिन जब खास आदमी मरता है तो उसकी मौत के कारणों को खोजने के लिए प्रशासन सरपट इधर-उधर दौड़ता है। कुछ ऐसा ही इस हादसे के बाद भी देखा गया। इस हादसे से सबक लेते हुए मौजूदा सरकार ने मोटर व्हीकल एक्ट में बदलाव के संकेत दिए है, जो जनता की सुरक्षा के प्रतिनई सरकार की एक सराहनीय पहल है।

मोटर व्हीकल एक्ट 1988, इस एक्ट के अंर्तगत वाहन की गति, वाहन चलाने संबंधी गति, सुरक्षा आदि संबंधी नियम और उन नियमों को तोड़ने पर जुर्माने व सजा का प्रावधान है लेकिन शायद हममें से बहुत से लोगों ने तो इस एक्ट का नाम पहली बार सुना होगा। तभी तो एक्ट के बारे में जानकारी के अभाव में हम ट्राफिक के जरूरी कायदे-कानून को नहीं समझ पाते हैं और मनचाहे ढंग से फॉर्मूला वन रेसर बन वाहनों को फर्राटे से सड़कों पर दौड़ाते हैं। जब हमारे नियमों से ट्राफिक नियमों की धज्जियाँ उड़ती है तब पुलिस वालों से बहस करते समय यदा-कदा हम इस कानून के नाम से परीचित होते हैं। याद रखिए कानून की अनभिज्ञता सजा से बचने का बहाना नहीं है। यदि आप सड़क पर वाहन चला रहे हैं तो अपनी आँख, कान व ज्ञान चक्षु खुले रखें। ट्राफिक के कायदें-कानूनों के बारे में जानकारी हासिल करें। जुगाड़ से ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त कर लेना मात्र ही आपके वाहन चालक होने का परिचायक नहीं है। जब तक आपको ट्राफिक संबंधी कानून की जानकारी नहीं होगी और आप उसका पालन नहीं करेंगे। तब तक आप नौसिखियाँ वाहन चालक ही कहलाएँगे।

आज हम जर्मनी, चीन और यूरोप के देशों के ट्राफिक नियमों की बात करें तो वहाँ के नियम बड़े सख्त है। वहाँ रेड लाइट जंप करने, ट्राफिक नियमों का उल्लंघन करने, अनियंत्रित गति से वाहन चलाने, नशा करके वाहन चलाने एवं दुर्घटना में मौत का कारण बनने वाले वाहन चालकों पर न केवल जुर्माना लगाया जाता है बल्कि सामान्य मामलों में कुछ माह तक तथा गंभीर मामलों में हमेशा के लिए ड्राइवर का ड्राइविंग लाइसेंस तक रद्द कर दिया जाता है ताकि वे जीवन भर वाहन चला ही न सके। चीन में ‘हीट एंड रन’ मामले में ड्राइवर का ड्राइविंग लाइसेंस हमेशा के लिए रद्द कर दिया जाता है, नेपाल में शराब पीकर वाहन चलाने वाले चालकों को शराब छोड़ने की न केवल हिदायत दी जाती है बल्कि उन्हें नशा छोड़ने के लिए नशामुक्ति संबंधी क्लासों में भेजा जाता है। यूरोपियन देशों में ट्राफिक ‍नियमों के उल्लंघन पर 20 यूरो यानि की 25,000 रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। हमारे देश में भी वर्ष 2005 में जस्टिस लक्ष्मणन की अध्यक्षता में बनी समीति ने मोटर व्हीकल एक्ट में कुछ अहम बदलावों जैसे कि ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त करने हेतु न्यूनतम आयु को बढ़ाना, शैक्षणिक योग्यता निर्धारित करना, ट्राफिक सिग्नलों पर सीसीटीवी कैमरे की अनिवार्यता आदि सुझाव दिए थे लेकिन अमल में ना लाने के कारण ये सुझाव महज कागज़ों पर ही सिमटकर रह गए।  

यह अच्छी बात है कि गोपीनाथ मुंडे की मौत से सबक लेकर भारत सरकार ने भी अब विदेशों के ट्राफिक कायदों का अध्ययन कर भारत के मोटर व्हीकल एक्ट को भी सख्त व प्रभावी बनाने के निर्देश दे दिए है। यह अच्छे दिन आने का एक शुभ संकेत है। दूसरे देशों के ट्राफिक कानूनों की खूबियों को शामिल करने से भारत का मोटर व्हीकल एक्ट भी एक सख्त एक्ट बन जाएगा, जिससे निश्चित तौर पर देश में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में कमी आने के साथ ही लोगों की सुरक्षा का सरकार का वादा भी पुख्ता होगा। देश में समस्याएँ बहुत है और हमारी सरकार से उम्मीदें भी बहुत है। बस देखना यह है कि हमारे अच्छे दिनों की शुरूआत कब से होती है।
- गायत्री शर्मा 

Tuesday, June 3, 2014

बदायूं के बाद बरेली में बलात्का‍र

यहाँ कराहती है मानवता ‍दरिंदों के खौफ से। आज सहम गई है बेटियाँ अब निर्भया और बदायूं की बेटियों की करूण चित्कार सुन। हर तरफ से आवाज़ें आ रही है कि अब बस करो। हैवानियत का यह विभत्स दृश्य अब हमें और न दिखाओ। आप कानून में सख्ती बरतो या इंसाफ को आमजन के हवाले कर दो। लेकिन ये क्या आज फिर अखबारों की लीड खबर बनी बरेली गैंगरेप की घटना ने हमें चौंका दिया। कानून की धज्जियाँ उड़ाने के साथ ही बरेली की घटना ने मानवता के नाम पर भी एक करारा तमाचा जड़ दिया। इस घटना ने हैवानियत की सारी हदों को लांघते हुए हमारे समक्ष निर्ममता और क्रूरता एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया है। जिसे देखकर यहीं कहा जा सकता है कि इस देश का कानून लचर है और अपराधियों के हौंसले बुलंद। यहाँ अपराधियों को न तो फाँसी का खौफ नहीं है और नही पुलिस के डंडों का भय। आखिरकार अपराधियों के प्रति हमारे देश में अपनाई जाने वाली सुधारवादी सोच आखिरकार कब बदलेगी? शायद यहीं वजह है कि इस देश में सजा भोगने के बाद भी अपराधी तो नहीं सुधरते बल्कि इसके उलट बाहर निकलकर बहुगुणित रूप में वे नए अपराधियों को तैयार करते हैं। क्या आज सच में कानून अपराधियों के लिए एक ऐसा खिलौना बन गया है, जिसकी सँकरी गलियों में भी वह अपने बच निकलने का रास्ता आसानी से खोज लेते हैं?

आज मेरा मन बड़ा विचलित है। स्तब्ध हूँ मैं बरेली की घटना के बारे में सोचकर। बदायूं में बलात्कार के बाद पेड़ पर लटकती चचेरी बहनों की लाशें अभी इंसाफ के लिए अपनी आवाज़ बुलंद कर ही रही थी कि बरेली में 22 वर्षीय युवती के साथ गैंगरेप की घटना ने हैवानियत की सारी हदों को लांघ दिया और फिर से अमानवीयता का एक क्रूर उदाहरण समाज के समाज के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। बरेली की शर्मनाक घटना में युवती के साथ गैंगरेप तो हुआ लेकिन ऐसा करने के बाद भी जब जिस्म के भूखे हैंवानों को तृप्ति नहीं मिली तो उसने युवती के मुँह में तेजाब डालकर उसकी सिसकियों को भी जलाकर खाँक कर दिया।
बलात्कार पीडि़ता की साँसों के तार तेजाब की आग में धूँ-धूँ कर जलकर टूट रहे थे लेकिन मानवता का मखौल उड़ाने वाले दरिंदों की भूख तो अभी भी अतृप्त थी। अपनी तृप्ति को आखिरी अंजाम देने के लिए बलात्कारियों ने तेजाब पिलाने के बाद हैवानियत का शिकार बनाई युवती को पेट्रोल से जलाया और अंत में उसे बोरी में बाँधकर फेंक दिया। वह युवती तो जलकर मर गई लेकिन जाते-जाते वह छोड़ गई अपनी अधूरी कहानी इस समाज को सुनाने के लिए छोड़ गई। वह छोड़ गई अपनी अंतिम साँसों की पुकार हमें बैचेन करने के लिए और उसे इंसाफ दिलाने के लिए। आप भी मानवता को शर्मशार करने वाली इन घटनाओं की निंदा कीजिए और माध्यम चाहें जो भी हो, इन बेटियों को इंसाफ दिलाने की मुहिम में अपना बूँदभर योगदान देकर बेटियों के सम्मान की रक्षा कीजिए।   

नारी के सम्मान और उसकी आज़ादी पर नकेल कसती ये घटनाएँ आखिरकार हमें क्या सबक दे रही है? क्या यह हमारी बेटियों को घरों में कैद रखने का संकेत हैं या उन्हें बचाने के लिए आवाज़ उठाने का? अब मौन बने ऐसे मंजरों को देखते रहने की बजाय हमें भी पीडि़ता के परिवारों के साथ आगे आकर देश की इन बेटियों के इंसाफ के लिए और कानून में बदलाव के लिए आवाज़ उठानी होगी। अब वक्त आ गया है रइतना कुछ बुरा सुनने व बुरा देखने के बाद बुरे को बढ़ने से रोकने के लिए आगे आने का। खुलकर यह कहने का कि बेटियाँ देश की आन, बान और शान है, परिवार का सम्मान है। इन्हें बचाओं और बलात्कारियों को कड़ी से कड़ी से सजा दिलाओं। तभी निर्भया, बदांयू की बहनों और बरेली की युवती के साथ ही देश की हर बेटी को इंसाफ मिलेगा और उनके चेहरे पर फिर से स्वाभिमान की मुस्कुराहट होगी और निर्भयता का आत्मविश्वास।

-  गायत्री शर्मा

Sunday, June 1, 2014

गैंगरेप पर राजनीति -

गैंगरेप, नारी की आज़ादी पर मारा गया सामाजिक मर्यादाओं के उल्लंघन का वह करारा तमाचा है, जो खुद को आज़ाद कहने वाली नारी की आवाज़ को सदा के लिए खामोशी के अँधेरों में गुम कर देता है। इस तमाचें की मार शिकार महिला के साथ ही समस्त नारी जाति पर भी पड़ती है। बलात्कार की असहनीय पीड़ा को सहती एक नारी है पर ऐसी घटना के नाम पर जाती है धुत्कारी हजारों-लाखो नारियां। बलात्कार किसी एक का होता है पर खौफ के मारे हजारों लड़कियों की आज़ादी पर बेडि़याँ लगा दी जाती है। घटना एक स्थान पर लेकिन सन्नाटा हर जगह। ऐसे में समाज में सम्मान की दुहाई देने वाले लोग घरों में कैद हो जाते हैं और बैखोफ घुमते हैं वो दरिंदे, जो बैखोफ इस तरह की घटनाओं को अंजाम देते है।
बंदिशे हमेशा नारियों पर लगाई जाती है। कभी उनके छोटे वस्त्रों को दोष दिया जाता है तो कभी चंचलता और मांसल सौंदर्य को, लेकिन पुरूष की निगाहों की खौट पर कभी समाज पाबंधी नहीं लगाता। पुरूषों को अपना मनचाहा पहनने और करने की आज़ादी है लेकिन स्त्री को नहीं। आखिर क्यों? यह प्रश्न भी हमारा है और इसका उत्तर भी हमारे ही पास है। आखिर कब तक हम इन सब चीजों के पीछे समाज के कायदें-कानूनों की दुहाई देकर बचते रहेंगे। आखिर समाज का एक अहम हिस्सा हम भी तो है। हमसे समाज है तो फिर हम बदलाव की अगुवाई क्यों नहीं करते?  

दिखावे के नाम पर हम भीड़ तो जुटा सकते हैं पर उस भीड़ के माध्यम से दोषियों को सजा नहीं दिला सकते। इसका कारण स्पष्ट है – हमारा भय, राजनीति और स्वार्थ। तभी तो ईमानदार लोग कम और नारी की अस्मिता को लूटने वाले ही उसकी आबरू बचाने की बात करते हैं। निर्भया के वक्त भी यहीं हुआ था और आज बदायूं में भी यहीं हो रहा है। क्या यही हैं असली राजनीति, जो इस देश में अक्सर मानवता को झकझोर देने वाली घटनाओं पर की जाती है। नेताजी सज-धजकर औपचारिकता निभाने घटनास्थल पर जाते हैं और शोक संवेदना की बयानबाजी कर दिल्ली की सड़कों पर हमेशा के लिए गुम हो जाते हैं। उसके बाद तो नेता दर्शन, देव दर्शन की तरह दुर्लभ व दुष्कर हो जाते हैं। सुनवाई कहीं नहीं होती। 

साँप के निकलने के बाद जैसे लाठी पीटी जाती है, वैसे ही हमारे देश में बलात्कार के बाद पीडि़ता के दम तोड़ते ही उसकी लाश पर राजनीति की जाती है। मुझे यह कहने में तनिक भी अफसोस नहीं है कि यह उन्हीं सुप्त लोगों का देश है, जो रातभर जागती सड़कों पर निर्भया की करूण पुकार को सुन सका और न ही आज यूपी के बदायूं की बच्चियों की नौची हुई पेड़ सी लटकी लाशों को देख जागा है। हमारे राजनेता तो इंतजार कर रहे हैं किसी अगली बड़ी घटना का, जिस पर दोबारा केंद्र सरकार व राज्य सरकार अपने राजनीतिक विरोधों की रोटियाँ सेक सके। ऐसी घटनाओं पर विरोध कम और सौदेबाजी अधिक होती है। विधायक और सांसद मध्यस्थ बन खुलेआम सौदा करते है - नोट और सामाजिक सम्मान के बीच, जिसमें अंतत: जीत नोटों की राजनीति की होती है। जिसे नारी की आबरू लुटने वाले दुर्योधनों की जान बक्शने व अपना मुँह बंद रखने के ऐवज में दिया जाता है। राजनेताओं को अपना माई-बाप मानने वाले गरीब माता-पिता के लिए उनकी बेटियाँ तो दोबारा जिंदा नहीं हो सकती इसलिए जीवन की गुजर-बसर के लिए नोटो का प्रलोभन यहाँ भी अक्सर राजनीति के आगे नतमस्तक हो जाता है। आखिरकार ज्यादा हो-हल्ले से बदनामी उनकी दिवंगत बेटियों की ही होगी। उसकी आबरू लुटने वाले दुर्योधनों की नहीं। कोई उस नारी को शहीद नहीं कहेगा, जिसने आ‍खरी दम तक दरिंदों का ग्रास बनने से इंकार किया। वह अपनी आखरी सांस तक जिंदगी के लिए लड़ती रही और अंत में जब लड़ते-लड़ते हार गई। तब मौत को गले लगा लिया। ऐसी बलात्कार पीडि़ता को कोई शहीद नहीं कहेगा। उल्टा उन पर व उनके परिवार पर फब्तियाँ कसी जाएगी। आखिर यह कब तक चलेगा? मान, सम्मान, प्रतिष्ठा, मर्यादा, जिसे हम अपने सामाजिक सम्मान का परिचायक मानते हैं।
आखिरकार वह कब तक सरेआम बिकती रहेगी? कहते हैं अंधेरे से जंग अगर जितनी हो तो मशालें हर हाथ में जलनी चाहिए। ठीक उसी तरह गैंग रेप की घटनाओं का विरोध करने के लिए हम सब को आगे आना होगा और एकस्वर में इन घटनाओं की निंदा करनी होगी। इस विरोध का माध्यम कोई भी हो सकता है। नारी पर हो रहे अपराधों के खिलाफ विरोध की आवाज़ तब तक उठनी चाहिए। जब तक बलात्कार के दुष्कर्मियों को फाँसी के तख्ते पर न लटका दिया जाएँ। याद रखिएँ केवल हो-हल्ला करने से कुछ नहीं होगा। हमें अब आगे आकर ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले दरिंदों को सामने लाकर उन्हें सख्त सजा दिलाने तक आवाज़ उठानी होगी।

- गायत्री शर्मा