Sunday, October 12, 2014

‘मलाला’ है तो मुमकिन है ...

-          गायत्री शर्मा
नन्हीं आँखों से झाँकते बड़े-बड़े सपनें। ये सपनें है हिजाब में कैद रहने वाली पाकिस्तानी लड़कियों की शिक्षा के। ये सपनें हैं उन नन्हीं परियों की कट्टर कबिलाई कानून से आज़ादी के, जिनके सपनों में भी कभी आज़ादी की दुनिया नसीब न थी। तालिबानी आतंकियों के खौफ के बीच स्वात की मलाला ही वह मसीहा थी, जिसने डर के आगे जीत की नई परिभाषा गढ़ी। महात्मा गाँधी की तरह मलाला ने ‍भी हिंसा का जबाब अहिंसा से देकर दुनिया को यह दिखा दिया कि जब उम्मीदें हार मान जाती है। तब भी हौंसले जिंदा रहते हैं। यह मलाला के बुलंद हौंसले ही थे, जिसके चलते पाकिस्तानी लड़कियाँ अब लड़कों की तरह शिक्षा हासिल कर रही है। आज हम सभी के लिए यह सम्मान की बात है कि अशांति में शांति का संदेश फैलाने वाली मलाला को शांति के सर्वोच्च पुरस्कार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना गया है।
         
      कहते हैं नदी जब उफान पर होती हैं तब वह विशालकाय चट्टानों को भी फोड़ अपना रास्ता बना लेती है। जब मलाला के स्वर भी तीव्र वेग से बुलंद ईरादों के साथ प्रस्फुटित हुए, तब कट्टर तालिबानी फरमानों की धज्जियाँ उड़ गई और समूची दुनिया साक्षी बनी नन्हीं लड़की की आज़ादी की जिजिविषा की। अपने बुलंद हौंसलों की ऊँची उड़ान से मलाला ने नामुमकिन को मुमकिन बनाते हुए आतंक के साये में डरी-सहमी रहने वाली पाकिस्तानी लड़कियों के लिए शिक्षा के रूप में आज़ादी का मार्ग भी प्रशस्त किया। दुनिया के लिए मलाला मैजिकल इसलिए है क्योंकि मलाला ने उस देश में आज़ादी की एक नई इबारत लिखी, जिस देश में लड़कियों की आज़ादी कट्टर कानूनों के कायदों में जकड़ी होती है व उनका सुंदरता तथा माँसलता हिज़ाबों के पर्दों में ढँकी होती है। यहाँ औरतें बच्चे पैदा करने का एक जरिया होती है, जिनका जीवन पुरूषों की गुलामी व सपनें कायदे-कानूनों का अनुसरण करने में ही दम तोड़ देते हैं। मलाला जिस स्वात घाटी से आती है, वहाँ की तस्वीर तो उस वक्त बहुत ही भयावह थी, जब वर्ष 2009 में वहाँ तालिबानी आतंकियों का खौफ रहता था। मलाला ने उन दिनों आतंक के साये में लड़कियों की दम तोड़ती जिंदगीयों के दर्द को अपनी डायरी में हूबहूँ बँया किया।      
        

डायरी लेखन के साथ ही सोशल नेटवर्किंग साइट्स और सार्वजनिक मंचों से भी मलाला ने तालिबानी आतंकियों की कट्टरता, कबिलाई कायदें-कानून व खौफ का खुलासा किया। यह मलाला की आतंकियों से खिलाफत का ही नतीज़ा था कि लड़कियों की शिक्षा की वकालत करने वाली मलाला को 9 अक्टूबर 2012 को तालिबानी आतंकियों ने गोलियों का शिकार बनाया। उस वक्त हमले में गंभीर रूप से घायल मलाला की जिंदगी बचने की सारी उम्मीदें जब हार मान चुकी थी तब भी मलाला के बुलंद हौंसलों ने कौमा के रूप में नाउम्मीदी के कयासो के बीच भी उसे जिंदा रखा। आतंकियों के इस हमले ने मलाला के हौंसले को तोड़ने के बजाय उसे अपनी लड़ाई को दोगुनी तेजी से लड़ने की ऊर्जा दी। यह वहीं दिन था जिसके बाद न तो मलाला ने कभी पीछे मुड़कर देखा और न ही आतंकियों ने कभी मलाला को पीछे मुड़कर देखा।        
                 
पने शब्दों के मैजिक से पाकिस्तान में लड़कियों की आज़ादी के स्वप्न को हकीकत बनाने वाली मैजिकल मलाला के सराहनीय कार्यों की बदौलत ही उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार, पाकिस्तान का राष्ट्रीय युवा शांति पुरस्कार, वर्ष 2013 में संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार सम्मान, मैक्सिको का समानता पुरस्कार, साख़ारफ़ पुरस्कार आदि पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। मलाला की पाकिस्तानी लड़कियों की आज़ादी व शिक्षा के लिए चलाई जाने वाली मुहिम आज भी जारी है। यह मलाला मैजिक ही है, जिसके बूते आज पाकिस्तानी लड़कियाँ न केवल बुनियादी शिक्षा हासिल कर रही है बल्कि अपनी जि़दगी अपने तरीके से जीने के लिए भी स्वयं को आज़ाद महसूस कर रही है। नोबेल पुरस्कार के लिए चयनित मलाला के इस जोश व जुनून को मेरा सलाम है, जिसने लड़कियों की आज़ादी पर सख्ती के अवरोध खड़े करने वाले पाकिस्तान को भी आज यह कहने पर मजबूर कर दिया कि मलाला हमारे देश की शान है।
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Thursday, October 9, 2014

रहे सलामत मेरा सजना ...

- गायत्री शर्मा

प्रकृति ने विवाहिता के भावों को कुछ ऐसा बनाया है कि उसके हृदय के हर स्पंदन के साथ ‘अमर सुहाग’ की दुआएँ सुनाई पड़ती है। अपने लिए वह किसी से कुछ नहीं माँगती पर ‘उनके’ लिए वह सबसे सबकुछ माँग लेती है। धरती के पेड़-पौधे, देवी-देवताओं के साथ ही ‘करवाचौथ’ के दिन तो हजारों मील दूर आसमान में बैठे चाँद से भी वह अपने दांपत्य के चाँद के दीर्घायु होने की दुआएँ माँग लेती है। करवाचौथ वह शुभ दिन है, जब चाँद से दुआएँ माँगती तो पत्नी है पर उन दुआओं का फल मिलता पति को है। सुहाग की चीजों से सजती तो ‘सजनी’ है पर दमकता उसके ‘साजन’ का मुखड़ा है। 
      जिस स्त्री को पुरातन काल से हमारे समाज में नवरात्रि में ‘बेटी’ के रूप में, विवाह के समय ‘कन्या रत्न’ के रूप में, शुभ कार्यों में ‘शुभंकर’ के रूप में और तीज-त्योहारों पर ‘सुहागन’ के रूप में पूजा जाता रहा है। वहीं ‘देवी’ रूपी स्त्री अपने सुहाग के सुखमय जीवन को ‘सदा सुहागन रहने के’ शुभाशीष से भरने के लिए देवी-देवताओं को पूजने लगती है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि प्रेम व रिश्तों को निभाने के मामले में महिलाएँ पुरूषों से कहीं अधिक विश्वसनीय और ईमानदार होती है। यहीं वजह है कि गृहस्थी के रूप में परिवार की बागडोर संभालने से लेकर अपने जीवनसाथी की सुरक्षा को पुख्ता करने का जिम्मा भी व्रत-त्योंहारों के रूप में समाज ने स्त्री को ही दिया है।
       
हमारी सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका उसी ‘शक्ति’ की तरह है, जो सदा अपने प्रियजनों व परिवार की रक्षा के लिए तत्पर रहती है। हाँ, यह बात अलग है कि महिलाओं का पुरूषों की रक्षा करने का अंदाज कुछ अलहदा होता है। कहने को सप्तपदी के सात वचन वर-वधू दोनों एक साथ लेते हैं पर इन वचनों को निभाने की शिद्दत स्त्रियों में पुरूषों से अधिक होती है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्त्री जब कुछ करने की ठान लेती है तो उसकी जिद को नकारना ईश्वर के भी बूते की बात नहीं होती है। जप, तप, संयम, श्रृद्धा और विश्वास के तेज से सुशोभित स्त्री जब ‘करवाचौथ’ के दिन चाँद से अखण्ड सौभाग्य की कामना करती है तो आसमान का चाँद भी स्त्री के तप के आगे नतमस्तक हो ‘तथास्तु’ कहकर उसकी हर मुराद को पूरी कर देता है।
       विवाह के पश्चात पत्नी के रूप में जब कोई स्त्री पुरूष के जीवन में प्रवेश करती है। तो लक्ष्मी स्वरूपा उस स्त्री के कदम पड़ते ही खुशियाँ भी अर्धांगिनी की अनुगामिनी बन पुरूष के जीवन में प्रवेश करने लगती है। यह वहीं भारतीय स्त्री है, जो विवाहिता के रूप में सुहाग की चीजों से न केवल स्वयं को सजाती है बल्कि पति के प्रति सर्मपण के भावों से अपनी गृहस्थी को भी श्रृंगारित करती है। भारतीय सुहागन के ललाट की ‘बिंदियाँ’ उसके स्वाभिमान का, माँग का ‘सिंदूर’ पति की मौजूदगी का, पैरों की ‘बिछियाँ’ रिश्तों के प्रेमिल बँधन में खुशी-खुशी बँधने का व ‘मंगलसूत्र’ विवाहिता बनने के गौरव का प्रतीक होता है। सुहाग के इन प्रतीकों से स्वयं को सजाना विवाहिता की विवशता या शौक नहीं बल्कि उससे कही अधिक उसके लिए सम्मान का प्रतीक होता है। करवाचौथ के दिन शादी का जोड़ा पहनकर फिर से सजनी अपने सजना के लिए दुल्हन सी सजती है। आज शादी के जोड़े में सजे विवाहित जोड़े के साथ ही यादें ताजा हो जाती है, जीवन के उस यादगार दिन की, जब गठबंधन की गाँठों ने दो शरीर के साथ ही दो आत्माओं को भी एक कर दिया था।
     
करवाचौथ के बहाने ही सही ‍पति-पत्नी के प्रेमिल यादों की पोटली फिर से खुल जाती है और उस पोटली से निकलती है कुछ शरारतें, प्यार भरी तकरार और ढ़ेर सारा प्यार। प्रेम के प्रतीक उस चाँद को साक्षी मान दंपत्ति आज फिर से एक नई ऊर्जा के साथ अपने दापंत्य जीवन की शुरूआत करते हैं। आज करवे के जल में चीनी की मिठास घोल पत्नी अपने दांपत्य जीवन में प्रेम की मिठास की कामना करती है और चाँद के बाद अपने पति को निहारते हुए वह जीवन में सुख-दुख की छलनी में से सुखों को पति की ओर छनकर जाने का तथा दुखों को अपने हिस्से में बचा लेने का संकेत देती है। अन्य व्रतों की तरह यह व्रत भी सुहागन स्त्रियाँ ‘सर्वमंगल’ की कामना के साथ करती है। तभी तो एक-दूसरे की माँग भरने व बड़ों से आशीष लेने के बहाने वह अपने साथ ही अपनी साथी सुहागनों के भी अमर सुहाग की दुआ करती है।
     पति चाहे कैसा भी हो पर पत्नी उसके लिए दुआएँ माँगना नहीं छोड़ती। जब पत्नी पति के लिए खुशी-खुशी सर्वस्व समर्पित करती है तो क्या यह पति की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह भी अपनी पत्नी के लिए भी कुछ ऐसा करें, जो उसके लिए इस करवाचौथ के व्रत को यादगार बना दें? कितना अच्छा हो गर पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे के लिए ‘करवाचौथ’ का व्रत रखें। जब जीवनसाथी के रूप में जीने-मरने की कसमें व सुख-दुख में साथ निभानें की कसमें दोनों एकसाथ खाते हैं तो फिर चौथ का व्रत करने के लिए दंपत्ति एक-दूसरे का साथ क्यों नहीं निभातें? आप भी मेरी इस बात पर गौर कीजिएगा। यदि आप ऐसी पहल करते हैं तो निश्चित रूप से आपके दांपत्य जीवन में खुशियों की खनक पहले से कहीं अधिक बढ़ जाएगी। इसी के साथ ही आप सभी को करवाचौथ की शुभकामनाएँ।  


Thursday, October 2, 2014

कर्फ्यू के सन्नाटें में पुलिस का गरबा

- गायत्री शर्मा
सांप्रदायिकता की दीवारों ने हमारे दिलों में ऐसी दरारे डाल दी है कि जब किसी हिंदू पर आक्रमण होता है तो बगैर सोचे-समझे हम मुस्लिमों पर ऊँगली उठाने लगते हैं और जब किसी मुस्लिम को कोई गोली मार देता है तो हम हिंदूओं पर लाठियाँ लेकर बरस पड़ते हैं। क्या आज धर्म की कट्टरता की हैवानियत हमारी इंसानियत पर इतनी हावी हो गई है कि हर दिन एक साथ रहने और घूमने वाले राम-रहीम दंगों और कर्फ्यू के समय एक-दूसरे को ही मारने पर उतारू हो जाते है? पिछले दिनों मध्यप्रदेश के रतलाम शहर में हुई गोलीबारी की घटना में भी कुछ ऐसा ही हुआ। मुस्लिम और हिंदू नेताओं पर एक ही दिन में दो अलग-अलग स्थानों पर हुए जानलेवा हमला के बाद हमेशा की तरह राजनीति के कीचड़ में पत्थर फेंककर तमाशा देखने वाले छुटपुट नेताओं की राजनीति दम पकड़ने लगी। जिसके चलते भाजपा ने कांग्रेस को आरोपों के कटघरे में खड़ा किया और कांग्रेस भाजपा को। ऐसे में मरण हुआ बेचारे आम-आदमी का, जो दंगा, कर्फ्यू और मारपीट की घटनाओं के कारण अपना रोजगार छोड़ घर की चारदीवारी में कैद होकर रह गया।
       क्या होता है कानून की उन धाराओं की पेचीदगी से, जो आम आदमी से उसका रोजगार व दो वक्त की रोटी ही छीन ले? मुझे आज नरेंद्र मोदी की मैडिसन स्केवयर पर कही वह बात याद आती है, जिसमें प्रधानंमत्री ने यह कहा कि लोग कानून बनाने की बात करते हैं और मैं कानून को खत्म करने की ताकि आम आदमी कानून की पेचीगदियों से बाहर निकल सके। यह सही भी है क्योंकि कानून की उलझनों में हर बार बेचारा आम आदमी ही दम तोड़ता है कोई राजनेता या व्यवसायी नहीं। बड़ी घटनाओं में मारा कोई मंत्री जाता है पर धारा 144 की उलझनों में आम आदमी फँस जाता है। जिसकी वजह से शहरों में दंगे भड़कते हैं और कर्फ्यू के हालात बनते है, उन नेताओं की गाड़ी पर लगी बत्ती तो उन्हें दंगों और कर्फ्यू से भी राहत दिला देती है। पर हमारे पास तो न कोई लाल, पीली, नीली बत्ती है और न कोई प्रेस का कार्ड। हमारे पास है तो बस भारत के नागरिक होने का पहचान पत्र, जो न तो कभी दंगों में काम आता है और न किसी कर्फ्यू में राहत दिलाता है। कितनी हास्यास्पद बात है यह कि आम आदमी को नेता के रूप में ‘खास’ बनाने वाले आम आदमी का वजूद भी देश में कितना आम हो गया है।            
रतलाम में मुस्लिम महिला पार्षद को अज्ञात हमलावरों द्वारा गोली मारने की घटना के कुछ ही घंटों के भीतर शहर के बंजरग दल के नेताओं पर जानलेवा हमला हो जाता है। हो सकता है इन घटनाओं के पीछे कोई सोची-समझी साजिश हो या यह भी हो सकता है कि ये दोनों घटनाएँ एक-दूसरे की प्रतिक्रियास्वरूप न होकर कुछ अलग ही मामले हो। लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि जब हिंदू-मुस्लिम के साथ एक ही दिन में एक सी घटना घटित होती है तो दोनों कौमों का एक-दूसरे के विरोध में खड़ा होना और दंगों का भड़कना स्वभाविक ही होता है। फिर चाहें ऐसी घटना मध्यप्रदेश में हो या उत्तर प्रदेश में हो या फिर भारत के किसी ओर राज्य में। सच कहा जाएं तो हमारे विश्वास की डोर इतनी कमजोर है कि देश में हिंदू-मुस्लिम दंगे मात्र अफवाहों की आँधी से भी भड़क जाते हैं।
        सोने की चमक से चमकने वाला चाँदनीचौक, सेव की महक से महकने वाला स्टेशन रोड और साडि़यों के ग्राहकों से सजने वाला माणकचौक चार दिनों तक कर्फ्यू से उपजे सन्नाटे व दंगों के खौफ के साये में खामोश रहा। सड़के सूनी रही और व्यापार-व्यवसाय ठप्प। ऐसे में आम आदमी के कानों में हर दस मिनिट सुनाई देने वाली पुलिस की गाडि़यों के साइरन की आवाजे ही गूँज रही थी। खाकी वर्दी वालों के खौफ के माहौल में शहर में दिनभर में क्या, कब, कैसे और क्यों हुआ, इसकी खबर आम आदमी को उड़ती-उड़ती अफवाहों से मिलने लगी। क्या आप जानते हैं कि कर्फ्यू के चलते बोझा ढ़ोकर रोजी-रोटी कमाने वाला मजदूर परिवार चार दिन तक भूखा सोया, दूध की आस में कई नन्हीं आँखों ने टकटकी लगाई और दवाई की आस में कई बूढ़े गले खासने लगे? इधर डेंगू और मलेरिया से मरीज घरों में कराह रहे थे और उधर घर से बाहर निकलने वालों पर पुलिस वाले डंडे बरसा रहे थे। पिछले दो ‍दिनों से कर्फ्यू से मिली कुछ घंटों की राहत में राशन की दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ से मेले लगने लगे। ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की तर्ज पर महिलाएँ छूट में मिली चुटकी भर राहत में परिवार के राशन का इंतजाम करने नंगे पैर घरों से निकली। कर्फ्यू में राहत की संक्षिप्त समय सीमा के चलते राशन की कतार में अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को अक्सर खाली हाथ लौटना पड़ा क्योंकि उसका नंबर आने से पहले ही राशन वाला स्टॉक न होने के कारण भीड़ के हाथ जोड़ लिए। नवरात्रि के दिन है पर गरबा पांडाल सूने पड़े हैं ऐसा लग रहा है इस नवरात्रि में शहर में बालिकाएँ नहीं बल्कि खाकी वर्दी वाले अपनी गाडि़यों के सायरन की आवाजों और डंडों की ठक-ठक के साथ शहरभर में गरबा नृत्य कर रहे हैं। इस कर्फ्यू में बस एक चीज पुलिस की सख्ती से नहीं रूकी और वह थी बादलों से बरसने वाली बरसात। जिस पर न पुलिस के डंडों का जोर चला और न ही कर्फ्यू का खौफ।
       मेरा आप सभी से प्रश्न है कि आखिर क्या होगा इस कर्फ्यू से, भागने वाला आरोपी तो गोली मारकर कब से भाग चुका होगा और पुलिस हर बार की तरह आम आदमी के साथ ही सख्ती दिखाएगी। आखिर क्यों नहीं हम सभी मिल-जुलकर शांतिपूर्ण तरीके से इन घटनाओं का विरोध प्रदर्शन करते हैं, जिससे कि शहरवासियों को कर्फ्यू की मार न झेलना पड़े? ऐसी घटनाओं की निंदा करना लाजिमी है पर दलगत राजनीति से परे भी विरोध का एक सही व शांतिपूर्ण तरीका हो सकता है। यह वहीं भारत है, जहाँ हम सभी हिंदू-मुस्लिम एक साथ रहते हैं, एक सा पानी पीते हैं, एक ही प्रकार की वायु में साँस लेते हैं लेकिन न जाने क्यों धर्म की कट्टरता के नाम पर हम जेहाद की नंगी तलवारे लिए एक-दूसरे पर बरस पड़ते है? पुलिस की छावनी में किसी भी शहर की तब्दीली से हिंदू या मुस्लिम किसी का कुछ भला नहीं होने वाला है। इससे तो उल्टा हमारा ही नुकसान होगा क्योंकि हममें से जब कोई घर से बाहर निकलकर जाने की कोशिश करेगा तो पुलिस की लाठियों की मार पड़ने से दंगे की आग थमने की बजाय और तेजी से भभक उठेगी। मेरी आप सभी से विनती है कि कृपया शांतिपूर्ण माहौल बनाएं, जिससे कर्फ्यू खुलने की उम्मीद जागें और हमारे शहर के बाजार फिर से नमकीन की तीखी महक, सोने की पीली चमक व साडि़यों के चटख रंगों की खूबसूरती की रौनक से गुलजार हो जाएं।
 
नोट : कर्फ्यू में आमजन की जिंदगी किस तरह बद से बदतर हो जाती है और 'करे कोई, भरे कोई' की तर्ज पर उसकी रोजी रोटी पर लात पड़ जाती है। इस पर मेरी कलम ने कुछ लिखने का प्रयास किया है। 1 अक्टूबर 2014, बुधवार को रतलाम के प्रमुख सांध्य दैनिक 'रतलाम दर्शन' व 2 अक्टूबर 2014, गुरूवार के अंक में रतलाम के अन्य प्रमुख सांध्य दैनिक 'सिंघम टाइम्स' में प्रकाशित मेरा लेख 'कर्फ्यू के सन्नाटे में पुलिस का गरबा'। मेरे इस लेख के माध्यम से आप भी लीजिए रतलाम में कर्फ्यू के हालात का जायज़ा। 
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