Friday, September 16, 2011

संजा तू थारा घरे जा .....


कुँवारी लड़कियों की सखी 'संजाबाई' इन दिनों अपने पीहर में आई है। कुछ दिनों के लिए अपने पीहर में आई संजाबाई सा पार्वती जी का ही एक रूप है। जिनकी श्राद्धपक्ष में सोलह दिनों तक पूजा की जाती है। भारत के कई प्रांतों में संजा अलग-अलग रूप में पूजी जाती है। महाराष्ट्र में यही संजा 'गुलाबाई' बनकर एक माह तक अपने पीहर में रहती है तो वही राजस्थान में 'संजाया'के रूप में श्राद्ध पक्ष में यह कुँवारी लड़कियों की सखी बन उनके साथ सोलह दिन बिताती है। कुँवारी लड़कियाँ संजाबाई की पूजा अच्छे वर की प्राप्ति के लिए करती है।
            यदि हम मालवांचल की संजा की बात करे तो यहाँ के गाँवों में संजा का मजा ही कुछ ओर है। शाम ढलते ही गोबर से दीवारों पर संजा की आकृति सजना शुरू हो जाती है। उसके बाद गोबर से बनी संजाबाई को फूलों और रंग-बिरंगी चमक से सजाकर उनका श्रृंगार किया जाता है। संजा तैयार होने के बाद गाँव की लड़कियाँ सामूहिक रूप से संजा के गीत गाती है और बाद में उनकी आरती कर प्रसाद भी बाँटती है। आपसी मेलजोल बढाने का और अपनी संस्कृति व परंपराओं से जुड़े रहने का एक अच्छा बहाना है संजा।
           मुझे तो आज भी संजा के वो गीत याद आते है। जिसमें संजाबाई के रूप के वर्णन के साथ ही उनके ससुराल वालों को दी जाने वाली मीठी उलाहना भी होती थ‍ी। मालवी बोली की मिठास पाकर संजा ये गीत बड़े ही कर्णप्रिय बन जाते थे। यदि आप भी संजाबाई के दर्शन के साथ ही पारंपरिक मालवी गीतों का आनंद लेना चाहते है तो श्राद्ध के दिनों में मालवा के किसी भी गाँव में एक शाम बिताइए। गाँव ‍की किसी न किसी गली में आपको ये गीत जरूर सुनने को मिल जाएँगे -
1) संजा तू तो बड़ा बाप री बेटी, तू तो खावे खाजा रोटी।
2) छोटी सी गाड़ी लुढकती जाए। जामे बैठ्या संजा बाई, घाघरो घमकाता जावे, चूड़लो चमकाता जावे, बाईजी की नथनी झोला खाय, झोला खाय।
3) संजा तू थारा घरे जा नी तो थारी बाई मारेगा कि कूटेगा कि डेली में डकोचेगा, रेल गई गुजरात कि हिरनी का बड़ा-बड़ा दाँत कि छोरा-छोरी डरपेगा।

Thursday, August 25, 2011

अण्णा हजारे पर केंद्रित 25 अगस्त 2011 के 'युवा' में प्रकाशित कवर स्टोरी

जाग उठा है लोकतंत्र

एक अण्णा ने सारे हिंदुस्तान को जगा दिया है। जन लोकपाल बिल की यह लड़ाई अकेले अण्णा की नहीं ‍बल्कि हम सभी के हक की लड़ाई है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की यह हुंकार अब जल्द ही सरकार के पतन की चित्कार में बदलना चाहिए। अब हमारी बारी है। अण्णा की आमरण अनशन ने यह तो सिद्ध कर ही दिया है कि जनता ही जर्नादन है। वह लोकतंत्र का आदि और अंत है। जो चाहे तो रातो रात सरकार का तख्ता पलट सकती है।
     अण्णा का यह अभियान असरकारक इसलिए भी है क्योंकि इस अभियान को आगे बढाने का बीड़ा देश की युवा पीढी ने उठाया है। यह वही युवा है कि जिसके बारे में आज तक यह कहा जाता था कि युवा अपनी मौजमस्ती व मॉर्डन लाइफस्टाइल से बाहर निकलकर कभी देश के बारे में नहीं सोच सकता है पर आज भ्रष्टाचार के विरोध में उसी युवा ने सड़कों पर आकर विद्रोह के स्वर मुखरित कर देश के असली जागरूक युवा की तस्वीर को प्रस्तुत किया है।
     यदि आपने रामलीला मैदान पर नजर डाली होगी तो आप यही पाएँगे कि आज रामलीला मैदान में आंदोलन की रूपरेखा से लेकर वहाँ सफाई,पानी,‍बिजली,जनता की सुरक्षा व शांति व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी सभी कुछ युवा स्वयंसेवकों के ही हाथ में है। इन स्वयंसेवकों में से अधिकांश युवा शिक्षक,छात्र, इंजीनियर,पत्रकार,चिकित्सक व व्यवसायी है। ये वही लोग है, जो कल तक आरामपोश जिंदगी जीते थे। आज वे ही उच्च शिक्षित युवा आपको झमाझम बारिश और भीड़ के बीच रामलीला मैदान पर अपनी सेवाएँ देते हुए चहलकदमी करते नजर आएँगे। सच कहूँ तो यह सब देखकर मुझे अचरज भी होता है और खुशी भी। अचरज इस बात का कि क्या ये वही युवा है जिनके लिए उनका करियर सर्वोपरि है पर आज वे अपना कामकाज और पढाई छोड़ देश सेवा को अपना करियर मान उसे सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। इस आंदोलन को देख मुझे खुशी इस बात की है कि आज हम सभी अनेक होते हुए भी एक है। अलग-अलग प्रांतों व विदेशों में बसे भारतीयों से अण्णा को मिल रहे सर्मथन ने यह तो सिद्ध कर ही दिया है कि हम कही भी रहे हम सभी का दिल हिंदुस्तानी है। भारत आज भी हमारी माता है और उस माँ के दामन को दागदार होने से बचाने के लिए हम अपनी जान तक देने को तैयार है।
    कुछ दिनों पहले जामा मस्जिद के शाही ईमाम सैयद अहमद बुखारी का मुसलमानों के लिए यह कहना बड़ा ही गलत है कि मुसलमान भाई अण्णा का सर्मथन इसलिए नहीं करे क्योंकि हम मुस्लिम भारत माता की जय और वन्दे मातरम कहने के सख्त खिलाफ है क्योंकि हम भारत को अपनी माँ नहीं मानते हैं। अरे, शर्म आती है मुझे उन लोगों पर जो उच्च पदों पर आसीन होकर सांप्रदायिकता को भड़काते हैं। भाई को भाई के खिलाफ खड़ा करते हैं। याद रखिए यह देश हम सभी का है। यदि हम भारत देश के के वासी है तो इस माँ की जय जयकार करने में हमे शर्म नहीं बल्कि गर्व होना चाहिए। आज मुझे यह जानकर बहुत अच्छा लगा कि मुंबई के मुसलमान भाईयों ने अण्णा के सर्मथन में रैली निकालकर इस आंदोलन में अपनी सहभागिता दर्ज कराई। दोस्तों,यह लड़ाई किसी कौम ‍विशेष की लड़ाई  नहीं होकर के आम आदमी के अधिकारों की लड़ाई है। जिसमें जीत पाने के लिए हमें एकजुट होना होगा। जो लोग इस आंदोलन से दूर है। वे पहले जन लोकपाल
बिल को पढने की जहमत करे। इस बिल का पास होना लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत होगी।        
       यदि हम अब नहीं जागे तो फिर कब जागेंगे। हो सकता है हम सभी के लिए सड़कों पर आकर आंदोलन में शरीक होना संभव नहीं हो पर हम सोशल मीडिया,अखबार,हस्ताक्षर अभियान आदि के द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़े और कम से कम जीवन में कभी भी रिश्वत का देन-लेन नहीं करने का संकल्प लेकर हम कुछ हद तक भ्रष्टाचार कम करने में अपनी भूमिका अदा तो जरूर कर सकते है।
ईमाम बुखारी के बयान को पढने के लिए नीचे दी गई यूआरएल पर क्लिक करे -



Friday, August 19, 2011

18 अगस्त 2011 के 'युवा' में प्रकाशित कवर स्टोरी 'पका मत यार'

विजयी भव अन्ना

अन्ना तेरी बात है कुछ निराली,
बापू की भाषा में तूने सरकार से बगावत कर डाली
तेरे ही रंग में रंग गया सारा हिंदुस्तान,
अंहिसा के अस्त्र ने इस दौर में भी दिखाया कमाल
माथे पर सफेद टोपी और अधिकारों के लिए उठते हाथ,
पहली बार सुनी है मैंने सड़कों पर आमजन की आवाज
'विजयी भव अन्ना'
                 - गायत्री शर्मा

Thursday, July 14, 2011

फिर दहल गई मुंबई

26/11 की तरह 13 जुलाई को भी जिंदादिल लोगों की मुंबई एक बार फिर धमाकों के कंपन से दहल व सहम गई है। शाम ढलते ही मुंबई की वह चहल-पहल रौंगटे खड़े कर देने वाले सन्नाटे में तब्दील हो गई है। चीख, चीत्कार और न्याय की गुहार बस मुंबई में तो अब यही सुनाई दे रहा है। अजमल कसाब अब तक जिंदा है और हर बार मर रहा है कोई बेकसूर आम आदमी। क्या हम पाकिस्तान की तरह अपने देश में भी आतंकियों व दगाबाज लोगों का शासन लाना चाहते हैं। यदि नहीं तो फिर क्यों नहीं हम एक इंसान की जान की कद्र समझते है?
              मेरा प्रश्न आप सभी से है कि हर बार धमाके का शिकार आम आदमी ही क्यों बनता है, कभी कोई राजनेता क्यों नहीं? ऐसा इसलिए कि कही न कही देश की गुप्त सूचनाएँ हमारे ही वफादार राजनेता व उच्च पद पर आसीन लोगों के माध्यम से आतंकियों तक पहुँचती है। हम माने या न माने पर आज हमें सबसे बड़ा खतरा हमारे देश के भीतर बैठे गद्दार व दगाबाज लोगों से हैं। आतंकियों को भारत की जेलों में शरण देना तो हमारी फितरत ही है। यदि आप साँप को प्यार से अपने पास बैठाकर पुचकारोगे तो इसका यह अर्थ नहीं कि साँप अपने जहरीले दंश को भूल आपको प्यार का जवाब प्यार से देगा। वह किसी दिन आप ही को डस लेगा।
         फाँसी की सजा देने के बाद भी हम अपराधी व आतंकी को जेल में सुरक्षित रखते हैं ताकि उसे छुड़ाने के लिए चार ओर आतंकी आकर देश में तबाही मचाएँ। वाह रे मेरे देश के कानून, आखिर कब तक तुम आतंकियों को जेल में सड़ाते रहोगे? अब वक्त आ गया है अन्ना की तरह विरोध के स्वर मुखरित करने का। जिससे यह बेहरी सरकार जागे और हरकत में आए। जागो भारतवासी अब तो जागो।

Wednesday, July 13, 2011

मर्डर 2 की बदबूदार कहानी

दोस्तों, आज दुर्भाग्यवश मैंने 'मर्डर 2' फिल्म देखी। इस फिल्म को देखकर मुझे इस कड़वे सच का आभास हुआ कि भारतीय संस्कृति व संस्कारों को भूल अब हमारा युवा एक अंधेरी राह की ओर बढ रहा है। बहुत से लोगों को यह फिल्म अच्छी लगी और उन्ही लोगों की वजह से बॉक्स ऑफिस पर भी यह फिल्म हाल की हिट फिल्मों में अपना नाम दर्ज कराने में काबिज रही होगी। पर मेरा व्यक्तिगत मत यही है कि यह फिल्म एक घटिया स्तर की फिल्म है।
     यदि हम बात करे तो आज से 10-20 साल पहले की तो उस वक्त तक फिल्मों के हिट होने का पैमाना उनका सशक्त कथानक, कथावस्तु, पात्र और फिल्म में निहित संदेश हुआ करते थे। जो समाज को सही राह दिखाकर रिश्तों में प्रेम को काबिज रखते थे। उन फिल्मों में भी डरावने विलेन होते थे पर ऐसे नहीं, जैसे कि मर्डर 2 या दुश्मन फिल्म में दिखाया गए है। इस फिल्म को देखकर तो जहाँ एक ओर बॉलीवुड के किसिंग किंग ईमरान हाशमी के किस की बरसात हमें बारिश के मौसम में शर्म से पानी-पानी करके भिगों देती है। वहीं इस फिल्म के विलेन का लड़कियों को काटकर उन्हें कुँए में फेक देने की आदत हमारे मन में घृणा पैदा कर देती है।
        मुझे तो उस व्यक्ति की सोच पर बड़ा अचरज होता है। जिसने इस फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी होगी या फिर जिसने इस फिल्म का निर्माण किया होगा। क्या वाकई में उन लोगों की सोच वैसी ही है। जैसी की फिल्म के रूप में उन्होंने दर्शकों तक पहुँचाई है या फिर वे समाज को इतनी गंदी सोच देकर उन्हें अमानवीय बनाना चाहते हैं। सच कहूँ तो कम उम्र की लड़कियों का इस कदर शोषण दिखाया जाना किसी भी दृष्टि में मुझे उचित नहीं लगता। किस तरह से फिल्म निर्माण करने वाले कथित बुद्धिजीवी कहलाने वाले वे लोग जिस्म के आदतन भक्षक बन चुके फिल्म के अभिनेता को बेदाग बनाकर बेडरूम से पुलिस थाने में इस काम के लिए बुलाते हैं कि वह लड़कियों को गायब करने वाले उस व्यक्ति को ढूँढे, जो कॉलगर्ल को एक रात के लिए बुक कर उन्हें गायब करा देता है।
     फिल्म में वही व्यक्ति उन लड़कियों की जान बचाने को आगे आता है, जो हर रोज जिस्म की भूख का प्यासा बन खूबसूरती के पीछे भटकता है। यह तो सौ-सौ चूँहे खाकर बिल्ली हज को चली वाला हिसाब होता है। यदि बगैर किसी लाग लपेट के कहूँ तो इस फिल्म में अश्लीलता व विभत्स दृश्यों की भरमार है। जिसमें कहानी के माध्यम से समाज को संदेश देने की बजाय समाज में अश्लीलता व फूहड़ता के एक सड़े-गले तथा गंदे ट्रेंड को शुरू करने का प्रयास किया जा रहा है।

Tuesday, July 12, 2011

दादी की जंग जिंदगी और मौत से

व्यक्ति की पल-पल अपनी गिरफ्त में लेती मौत और मौत की सुस्त चाल पर अट्टाहस करते कैंसर के बीच वार्तालाप का दृश्य बड़ा ही खौफनाक होता है। जीवन और मौत के बीच लड़ाई कुछ घंटों की हो तो ठीक है। पर जब यह लड़ाई घंटों को दिनों में तब्दील कर देती है और आवाज को मौन के सन्नाटे में। तब मौत और जीवन की जंग बड़ी कठिन हो जाती है। हम सभी जानते हैं कि अंतत: जीत मौत की ही होनी है पर फिर भी न जाने क्यों हम जिंदगी को जिताने में कोई कसर शेष नहीं रखते। इन दिनों जीवन-मृत्यु के बीच साँसों के तार की लड़ाई मेरी 75 वर्षीय दादी कमलाबाई लड़ रही है।
               पिछले शुक्रवार तक तो सबकुछ थोड़ा ठीक था। शनिवार को चलते-चलते गिर पड़ने के कारण अचानक उनके सीधे हाथ की कलाई की हड्डी टूटती है और रविवार को उस हाँथ में प्लास्टर लगाया जाता है। जिस दौरान वह बार-बार कभी अस्पताल की टेबल पर तो कभी कार में बैठे-बैठे मुझसे सोने की जिद करती है, हाथ पकड़कर चलने से इंकार कर गोद में उठाने की जिद करती है और मैं बार-बार उन्हें यही कहती हूँ कि प्लीज दादी, अब तो अपने पैरों पर चलो। क्यों बच्चों की तरह नाटक करते हो? मेरी इस बात पर झल्लाकर वह अपनी ही भाषा में मुझे कहती है 'रहने दे थारी वाता, मूँ अटे मरी री हूँ और तू मने चलवा रो कई री है।' यहाँ तक कि इंजेक्शन व जीवन में पहली बार प्लास्टर चढने के डर के कारण वह डॉक्टर से भी कहती है कि डॉक्टर साहब, थे तो मने कोई दवा ने हाथ पे मसरवा रो टूब दई दो। मने कई नी वियो है। पापा, भैया और मेरे द्वारा दादी को बहुत समझा-बुझाकर और मान-मनुहार कर रविवार को प्लास्टर चढवाने के लिए राजी किया जाता है।उन्हें रविवार को रतलाम में प्लास्टर चढवाने के बाद मैं सोमवार को अपने काम पर अर्थात इंदौर लौट आती हूँ।
               मेरे इंदौर आने के बाद मंगलवार से दादी की तबीयत बिगड़ना शुरू होती है और मंगलवार से रविवार तक वह इस स्थिति में पहुँच जाती है कि उनका खाना-पीना, उठना, चलना, बोलना सब बंद हो चुका होता है। मैं 10 जुलाई 2011, रविवार को ही उनसे मिलकर आई हूँ पर उनका सूजन से फूला चेहरा, चिपकी हुई आँखे व बिस्तर से चिपके हाथ-पैर देखकर मैं दंग रह गई और अपने आँसू रोक नहीं पाई। हालाँकि अभ‍ी भी उनके पास उनके स्नेहीजनों का हुजूम जमा है पर आज की स्थिति में लगातार तीन-चार दिनों से आँखे बंद होने के कारण ना तो वह उन्हें देख पा रही है और मुँह बंद होने की वजह से ना ही वो उन्हें कुछ कह पा रही है। यहाँ तक कि अब उनके शरीर ने धीरे-धीरे बदबू मारना व गलना भी शुरू कर दिया है। शायद इसे ही कहते कैंसर का विकराल व विभत्स रूप। जिसने 8 साल बाद एक बार फिर से उन पर अपना रंग जमाना शुरू कर दिया है।
                भीतर ही भीतर उनका शरीर किस कदर दर्द से कराह रहा होगा। उसे शब्दों में बँया कर पाना भी मेरे लिए बड़ा मुश्किल है। आज मुझे धार्मिक आस्था रखने वाले अपने बड़े-बुर्जुगों क‍ी वह बात याद आती है कि इंसान को अपने कर्मों का फल इसी धरती पर भुगतना होता है। कर्मों का फल भुगते बगैर उसकी मौत नहीं होती है।              
                ब्रेस्ट से आरंभ होकर फेफड़े, हड्डियों और अब दादी की किडनी को अपनी गिरफ्त में ले चुका कैंसर उन्हें जिंदगी की बजाय मौत से प्रेम करना सीखा रहा है। पर ऐसी स्थिति में भी मौत और जिंदगी दोनों में से कोई भी हार मानने को तैयार नहीं है। यही वजह है कि उनकी साँसों की रिदम रूक-रूककर भ‍ी चल रही है। दोस्तों, सच कहूँ तो दादी की स्थिति देखकर मैं कभी अपने किसी दुश्मन को भी कैंसर होने की बददुआ नहीं दूँगी। यह बीमारी जिंदगी को या तो निगल जाती है या फिर इंसान को तिल-तिल मरने को छोड़कर जिंदगी को मौत से भी बदतर कर देती है।            

30 जून 2011 को 'युवा' में प्रकाशित कवर स्टोरी

Friday, April 15, 2011

खामोशी की खामोशी से बातें


आओ करे खामोशी से बातें
खो जाएँ उस शून्य में
जिसका विस्तार है अनंत
आओं करे खामोशी से बातें

शब्द का शोर भूलकर
अँधेरे की खूबसूरती में खोकर
खोले दिल के राज
कह दो आज तुम भी
मन की पोटली में छुपी प्यारी सी बात
आओ करे खामोशी से बातें

समझे आँखों के ईशारे
जो ले चले हमें रिवाजों से परे
चलो सनम हम चले वहाँ 
जहाँ न हो कोई तीसरी आँख
दो आँखे ही कहे और समझे
दिल से दिल की कही बात
आओ करे खामोशी से बातें

बैठे उस आम के पेड़ की गोद में
जिसकी पत्तियों की सरसराहट में
छुपी है मधुर संगीत की धुन
जिसके फलों से टकराकर पत्तियाँ
बजती हो ऐसे जैसे जलतरंग
सी‍खे उस आम से
प्रेम की ठंडक का अहसास
आओ करे खामोशी से बातें

मेरे आँचल में छुप जाओं तुम इस तरह
जैसे छुपा हो चाँद बादलों की ओट में
शरमाई सी अलसाई सी हवा भी
हमसे ऐसे लिपट जाएँ
जैसे हो रहा हो
धरा और गगन का मिलन
आओ करे खामोशी से बातें  

        - गायत्री शर्मा  

Wednesday, April 13, 2011

नईदुनिया 'युवा' इंटरव्यू टिप्स 07 अप्रेल 2011


नईदुनिया 'युवा' इंटरव्यू टिप्स 31 मार्च 2011


नईदुनिया 'युवा' इंटरव्यू टिप्स 24 मार्च 2011


नईदुनिया 'युवा' थॉट बबल में मेरे द्वारा युवाओं से पूछे गए प्रश्न 07 अप्रेल 2011



नईदुनिया 'युवा' थॉट बबल में मेरे द्वारा युवाओं से पूछे गए प्रश्न 31 मार्च 2011



नईदुनिया 'युवा' थॉट बबल में मेरे द्वारा युवाओं से पूछे गए प्रश्न 24 मार्च 2011



नईदुनिया MP09 06 अप्रेल 2011 में मेरे द्वारा किया कवरेज


Sunday, April 3, 2011

क्रिकेट को 'हाँ' .... हॉकी को 'ना'

- गायत्री शर्मा

सड़कों पर कर्फ्यू सा सन्नाटा,घरों और मुख्य चौराहों पर रौनक ... यह नजारा था आज देश के हर शहर का। जहाँ टीवी वहाँ लोग,जैसे कि एक अनार और सौ बीमार। कुछ लोगों ने तो जनसेवा करने के लिए अपनी दुकानों के बाहर बड़ी सी टीवी लगाकर ट्रॉफिक जाम करने की भरपूर व्यवस्था कर दी थी। कुछ भी कहो लेकिन यह बात तो अच्छी हुई कि वर्ल्ड कप में जीत हासिल करने से आज हम ‍फिर से विश्व विजेता बन गए। आज फिर से ‍क्रिकेट के मैदान में तिरंगे की जय-जयकार हुई। भारत का लाडला क्रिकेट जीतकर आया तो ऐसा लगा जैसे पटाखों के रूप में तारे जमीन पर आकर धोनी के धुरंधरों को सलाम कर रहे हैं। सचमुच यह भारतीयों की क्रिकेट के प्रति अँधी दीवानगी का ही असर है कि वर्ल्ड कप के शुरू होते ही बाजार खामोश हो गया। यह सब देखकर मुझे तो ऐसा लगा जैसे किसी राजनेता का देवलोकगमन हो गया हो और राजकीय शोक के साथ शासकीय अवकाश घोषित कर दिया गया हो। आने वाले 10 सालों में कुछ हो न हो पर हमारे कैलेंडर में क्रिकेट हे का अवकाश जरूर घोषित कर दिया जाएगा।  

बढ गई टीवी से नजदीकियाँ :
हाल ही में वर्ल्ड कप में भारत-पाकिस्तान के मैच के दिन तो जैसे सड़कों पर कर्फ्यू सा लग गया था। जिसमें अधिकांश लोग घरों में दुबककर बैठे थे। ‍क्रिकेट के देवता कहे जाने वाले सचिन के इस आ‍खरी वर्ल्ड कप में लोग टीवी से ऐसे चिपके जितने कि वह कभी अपनी धर्मपत्नी या प्रेमिका से भी ना चिपके होंगे। विश्वकप क्रिकेट की वजह से जहाँ कुछ घरों में पति वक्त पर घर लौटते हुए मिले तो कही क्रिकेट विरोधी पार्टनर होने के कारण टीवी का गला दबाकर उसे मारने तक की भी नौबत आ गई। सच कहूँ तो वाह रे क्रिकेट!तूने तो कमाल कर दिया। वर्ल्ड कप जीतने के कारण कुछ लोग हरभजन,सचिन और धोनी के चेहरे देखकर खुशी के मारे रोने लगे तो वहीं कुछ लोग यह कहते हुए खुशी से उछल पड़े कि अब हमारी टीवी डेली सोप के लिए मुक्त हो गई।

सम्मान को तरसता हॉकी :
वैसे क्रिकेट कोई बुरा खेल नहीं है। मैं भी कभी-कभार क्रिकेट देख लेती है। लेकिन मेरा आपसे यह सवाल है कि जब राष्ट्रीय खेल हॉकी का फाइनल मैच होता है तब क्या हम उसे ‍क्रिकेट जितने चाव से देखते हैं,क्या हमारे देश के मशहूर अभिनेता व राजनेता हॉकी मैच के दौरान स्टेडियम में खिलाडि़यों का उत्साहवर्धन करने जाते हैं ??? .... बिल्कुल नहीं। ऐसा इसलिए क्योंकि जो दिखता है वहीं बिकता है। मीडिया ने क्रिकेट को बार-बार दिखाया,सेलीब्रिटीज ने इसे सर पर चढ़ाया और राजनेताओं ने इसे गले लगाया .... तभी तो मेरा क्रिकेट हॉकी से महान कहलाया। 

मुझे तो दुख इस बात का है कि ये हमें क्या हो गया है। क्रिकेट के जीत के जश्न में तो हो-हल्ला करके हम पूरे मोहल्ले को जगा रहे हैं पर हॉकी के प्रति सरकार व मीडिया की बेरूखी पर हम खामोशी का ढोंग रचा रहे हैं। जो कि गलत है। मेरा दावा है कि यदि क्रिकेट जितना प्रमोशन हॉकी का किया जाएँ तो हॉकी भी इस देश में ‍क्रिकेट जितना पॉपुलर हो सकता है। ऐसा होने पर उन खिलाडि़यों को भी सेलीब्रिटिज सा सम्मान मिलेगा,जो अभावों व गुमनामी के अँधेरों में जीते हुए भी भारत के राष्ट्रीय खेल हॉकी में देश का मान बढ़ाए हुए है।

अंत में चलते-चलते मैं आसे यही कहूँगी कि हम भारतीय है। भारत के सम्मान की रक्षा करनी व हर खेल को समभाव से देखकर सभी खेलों में देश का मान बढ़ाना हमारा परम कर्तव्य है। जय हो ....      

क्रिकेट को 'हाँ' .... हॉकी को 'ना'


- गायत्री शर्मा

सड़कों पर कर्फ्यू सा सन्नाटा,घरों और मुख्य चौराहों पर रौनक ... यह नजारा था आज देश के हर शहर का। जहाँ टीवी वहाँ लोग,जैसे कि एक अनार और सौ बीमार। कुछ लोगों ने तो जनसेवा करने के लिए अपनी दुकानों के बाहर बड़ी सी टीवी लगाकर ट्रॉफिक जाम करने की भरपूर व्यवस्था कर दी थी। कुछ भी कहो लेकिन यह बात तो अच्छी हुई कि वर्ल्ड कप में जीत हासिल करने से आज हम ‍फिर से विश्व विजेता बन गए। आज फिर से ‍क्रिकेट के मैदान में तिरंगे की जय-जयकार हुई। भारत का लाडला क्रिकेट जीतकर आया तो ऐसा लगा जैसे पटाखों के रूप में तारे जमीन पर आकर धोनी के धुरंधरों को सलाम कर रहे हैं। सचमुच यह भारतीयों की क्रिकेट के प्रति अँधी दीवानगी का ही असर है कि वर्ल्ड कप के शुरू होते ही बाजार खामोश हो गया। यह सब देखकर मुझे तो ऐसा लगा जैसे किसी राजनेता का देवलोकगमन हो गया हो और राजकीय शोक के साथ शासकीय अवकाश घोषित कर दिया गया हो। आने वाले 10 सालों में कुछ हो न हो पर हमारे कैलेंडर में क्रिकेट हे का अवकाश जरूर घोषित कर दिया जाएगा।  

बढ गई टीवी से नजदीकियाँ :
हाल ही में वर्ल्ड कप में भारत-पाकिस्तान के मैच के दिन तो जैसे सड़कों पर कर्फ्यू सा लग गया था। जिसमें अधिकांश लोग घरों में दुबककर बैठे थे। ‍क्रिकेट के देवता कहे जाने वाले सचिन के इस आ‍खरी वर्ल्ड कप में लोग टीवी से ऐसे चिपके जितने कि वह कभी अपनी धर्मपत्नी या प्रेमिका से भी ना चिपके होंगे। विश्वकप क्रिकेट की वजह से जहाँ कुछ घरों में पति वक्त पर घर लौटते हुए मिले तो कही क्रिकेट विरोधी पार्टनर होने के कारण टीवी का गला दबाकर उसे मारने तक की भी नौबत आ गई। सच कहूँ तो वाह रे क्रिकेट!तूने तो कमाल कर दिया। वर्ल्ड कप जीतने के कारण कुछ लोग हरभजन,सचिन और धोनी के चेहरे देखकर खुशी के मारे रोने लगे तो वहीं कुछ लोग यह कहते हुए खुशी से उछल पड़े कि अब हमारी टीवी डेली सोप के लिए मुक्त हो गई।  

सम्मान को तरसता हॉकी :
वैसे क्रिकेट कोई बुरा खेल नहीं है। मैं भी कभी-कभार क्रिकेट देख लेती है। लेकिन मेरा आपसे यह सवाल है कि जब राष्ट्रीय खेल हॉकी का फाइनल मैच होता है तब क्या हम उसे ‍क्रिकेट जितने चाव से देखते हैं,क्या हमारे देश के मशहूर अभिनेता व राजनेता हॉकी मैच के दौरान स्टेडियम में खिलाडि़यों का उत्साहवर्धन करने जाते हैं ??? .... बिल्कुल नहीं। ऐसा इसलिए क्योंकि जो दिखता है वहीं बिकता है। मीडिया ने क्रिकेट को बार-बार दिखाया,सेलीब्रिटीज ने इसे सर पर चढ़ाया और राजनेताओं ने इसे गले लगाया .... तभी तो मेरा क्रिकेट हॉकी से महान कहलाया। 

मुझे तो दुख इस बात का है कि ये हमें क्या हो गया है। क्रिकेट के जीत के जश्न में तो हो-हल्ला करके हम पूरे मोहल्ले को जगा रहे हैं पर हॉकी के प्रति सरकार व मीडिया की बेरूखी पर हम खामोशी का ढोंग रचा रहे हैं। जो कि गलत है। मेरा दावा है कि यदि क्रिकेट जितना प्रमोशन हॉकी का किया जाएँ तो हॉकी भी इस देश में ‍क्रिकेट जितना पॉपुलर हो सकता है। ऐसा होने पर उन खिलाडि़यों को भी सेलीब्रिटिज सा सम्मान मिलेगा,जो अभावों व गुमनामी के अँधेरों में जीते हुए भी भारत के राष्ट्रीय खेल हॉकी में देश का मान बढ़ाए हुए है।

अंत में चलते-चलते मैं आसे यही कहूँगी कि हम भारतीय है। भारत के सम्मान की रक्षा करनी व हर खेल को समभाव से देखकर सभी खेलों में देश का मान बढ़ाना हमारा परम कर्तव्य है। जय हो ....      

Thursday, March 24, 2011

कही शर्म न हो जाएँ शर्मसार


विचारों में खुलापन होना समय की माँग है पर जब विचारों का खुलापन शरीर पर आ जाता है तब इसे आजादी या खुलापन नहीं बल्कि 'अश्लीलता' कहना ही उचित होगा। कहते हैं व्यक्ति के परिवार में जब तक संस्कार जीवित रहते हैं। तब तक संस्कारों व मर्यादा का आवरण उसे हर बुराई से बचाता है। लेकिन जब अच्छाइयों पर आधुनिकता का भद्दा रंग चढ़ता है तब संस्कार, मर्यादाएँ, प्रेम, विश्वास सब ताक पर रख दिया जाता है।

पश्चिम की तर्ज पर खुलेपन की कवायद करने वाले हम लोग अब 'लिव इन रिलेशनशिप' और 'समलैंगिक संबंधों' का पुरजोर समर्थन कर विवाह नामक संस्कार का खुलेआम मखौल उड़ा रहे हैं। आखिर क्या है यह सब? यदि यह सब उचित है तो फिर माँ-बेटी, ससुर-जमाई, बाप-बेटा, बहन-बहन यह सब रिश्ते तो 'समलैंगिक संबंधों' की भेट ही चढ़ जाएँगे और हमारा बचा-कुचा मान-सम्मान किसी के घर में उसके बेडरूम तक दखल कर 'लिव इन रिलेशनशिप' के रूप में चादरों की सिलवटों में तब्दील होकर शर्मसार हो जाएगा।

यदि ऐसा होता है तो भारत जल्द ही ब्रिटेन बन जाएगा। जहाँ 7 से 8 वर्ष की उम्र तक आते-आते बच्चों में सेक्स संबधों का न होना शर्मिंदगी की निशानी माना जाता है। शिक्षित होने के बावजूद भी इस देश में हर दिन 12 से 14 साल के बीच की कई लड़कियाँ माँ बनने का सुख जरूर हासिल करती है। 

यदि हमें भी ब्रिटेन की तरह यह सब करना ही है तो क्यों न हम हिंदू विधि में उल्लेखित एक विवाह के कानूनी रूप में मान्य व शादीशुदा होने हुए एक से अधिक विवाह के कानूनी रूप से अमान्य होने के सिस्टम को ही खत्म कर दें और जब मर्जी हो जहाँ मर्जी हो शुरू हो जाएँ। उस वक्त हमें कौन रोकने वाला होगा न तो धरती पर मौजूद व्यक्तियों का समूह, जिसे हम समाज कहते हैं और न ही वह सर्व शक्तिमान सत्ता, जिसे हम भगवान कहते हैं।  

आदमी और जानवर में कुछ तो फर्क समझो मेरे भाई। यदि आदमी पशुता पर उतर आएगा तब तो यह धरती जंगल बन जाएगी और हर वयस्क आदमी भूखा भेडि़याँ। कहीं न कहीं मेरे ये शब्द आपके दिलों में शूल की तरह चुभ रहे होंगे पर क्या करूँ खामोश रहना भी तो जुल्म की मौन स्विकारोक्ति के समान है। मेरी मानों तो अब वक्त आ गया है जागने का और जगाने का। अपनी आवाज उठाने का। यदि हम आवाज नहीं उठाएँगे तो शायद हम अपने संस्कारों को खो देंगे। जिसकी वजह से आज विश्व में हमारी एक अलग पहचान काबिज है। 

- गाय‍त्री शर्मा 

खुश रहना देश के प्यारों


'शहीदों की चिताओं पर लगेगे हर बरस मेले' जिस किसी ने भी यह कहा था। सच कहूँ तो बहुत गलत कहा था। शहीदों की जयंतियाँ आज भी आती है पर शायद हममें से इक्के-दुक्के लोग ही उन्हें याद रख पाते है। हमें तो सेलिब्रेशन और जयंती के नाम पर केवल क्रिसमस,दिपावली और होली जैसे त्योहार और जयंतियों के नाम पर स्कूलों में रटाएँ जाने वाले निंबधों में मौजूद चाचा नेहरू और बापू ही याद रहते हैं। बाकी के सब शहीद तो वीआईपी शहीदों की गिनती में आते ही नहीं।

कही दूर की बात क्यों गाँधी जयंती तो हमें याद है पर मुबंई आतंकी हमले में शहीद उन्नीकृष्णन की जयंती हमें याद नहीं है। जो हमारी आँखों के सामने घटित हुआ उसे हम नकार रहे हैं पर अतीत के मुर्दों को सीने से लगाकर हम उनके नाम के नारे लगा रहे हैं। आखिर हमसे बड़ा आँख वाला अँधा और कौन होगा भला?  

पहले तो शैक्षणिक संस्थानों में भी भगत सिंह,तिलक,सरदार पटेल आदि का जिक्र कभी कभार हो ही जाता था पर अब स्कूल भी किताबों की भाषा बोलते हैं और विद्यार्थी अंग्रेजों की क्योंकि ये आजकल के किताबी ज्ञान वाले स्कूल है पहले की तरह संस्कारों सीखाने वाली पाठशाला नहीं। अब स्कूलों व कॉलेजों में भी शहीदों की जयंतियों पर भाषणबाजी कर या उनका जिक्र कर अपना वक्त खराब नहीं किया जाता है।

आप आज ही की बात लीजिए। आज के ही दिन सुखदेव और भगतसिंह को फाँसी दी गई थी पर यह दिन हमें याद नहीं रहा क्योंकि हम तो रंगपंचमी पर हुड़दंग की तैयारियों में व्यस्त है। रंगों के त्योहार पर केमिकल के रंगों से रंगे रंगीन चेहरे तो हमें बड़े लुभाते हैं पर खून के रंग से रंगे माँ भारती के सपूत हमें बड़े खटकते हैं। हमें शर्म आनी चाहिए अपने भारतीय होने पर। जिन्हें आजादी का दुरूपयोग करना तो आता है पर आजादी के लिए बलिदान देने वाले शहीदों को सलाम करना नहीं।

- गायत्री शर्मा 

Wednesday, March 23, 2011

मैं स्टेच्यू तो नहीं ...


- गायत्री शर्मा

चौराहों पर खड़े नेताओं की मूर्तियाँ एक ओर जहाँ राहगीरों का ध्यान भटकाती है। वहीं दूसरी ओर दुर्घटनाओं का कारण भी बनती है। एक तो ये नेता लोग जीतेजी किसी का भला नहीं करते हैं और मरने के बाद भी ये हमारा बुरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। मंच,माइक,माया,पोस्टर और स्टेच्यू से इनका प्रेम तो जगजाहिर है। जब तक ये इस जीवित रहते हैं। तब तक ये हमें अखबारों,पोस्टरों व सार्वजनिक मंचों पर माइक से ज्ञान बाँटते नजर आते हैं और जब ये भगवान को प्यारे हो जाते हैं। तब दूसरों के स्टेच्यू पर फूल चढ़ाने वाले इन नेताओं के स्टेच्यू पर भी फूल चढ़ाने की बारी आ जाती है। इनके मरने के बाद इन्हीं की शोक सभा में 10 नए नेता उभरकर सामने आते हैं,जो टेस्टिंग के तौर पर नेता के मौत के गम में डूबी जनता को एक बढि़या सा शोक संदेश भावों के साथ पढ़कर सुनाते हैं।

हमारे दिवंगत नेता की आत्मा की शांति के लिए चौराहों पर भव्य साजसज्जा वाले मंच सजते हैं। जिसमें बिजली की खुलेआम चोरी करके आकर्षक विद्युत सज्जा की जाती है,जी भर के खाया और पिया जाता है और इस तरह एक दिवंगत नेता को श्रृद्धांजलि देने के बहाने मस्त शोक सभा कम और पब्लिसिटी पार्टी का अधिक आयोजन किया जाता है।

अब आप ही सोचिए ऐसे में बेचारे नेताजी की आत्मा तो धरती पर ही भटकेगी ना?मंच और पोस्टर देखकर उनका मन भ‍ी फिर से उसी कुर्सी पर आसन जमाने को करता होगा ना? ऊपर से आग में घी डालने के  लिए इन बेचारे दिवंगत राजनेता के हमशकल पत्थर के बाँके-टेढ़े पुतले को चौराहों पर ट्रॉफिक कंट्रोल करने को सजा दिया जाता है। यह सब इन्हीं पत्थर बने नेताओं की गालियों का असर है कि भ्रष्टाचार इस देश की राजनीति से कही जाता ही नहीं। घुम-फिरकर एक नेता से दूसरे नेता में यह अपने अपग्रेटेड लेटेस्ट वर्जन के साथ बॉय डिफाल्ट इंस्टाल हो जाता है।

मेरी सलाह माने तो अब नेताजी को याद करने की बजाय यदि कलियुग रूपी सागर से हमारा बीड़ा पार लगाने वाले भगवान को याद किया जाएँ और उनके स्टेच्यू चौराहों पर लगाएँ जाऐँ तो बेहतर होगा। ऐसा करने से प्रात: स्मरणीय भगवान के दर्शन कर जहाँ हमारा दिन अच्छा निकलेगा। वहीं हमें चौराहों से आते-जाते जगत के तारणहार भगवान की आराधना करने का एक मौका भी मिल जाएगा।

Sunday, March 20, 2011

होली आई .... बचत का संदेश लाई

दोस्तों, आप सभी को होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। आज शहर में जगह-जगह पर होलिका दहन पर बिखरे पड़ी अधजली लकडि़यों को देखा। ये वही लकडि़याँ थी, जो कल दोपहर तक हरे पत्तों से लहलहा रही थी। सुबह से चौराहे पर सीना ताने खड़ी ये लकडि़याँ शाम तक सिर झुकाकर मुरझाई हुई सी अपनी मौत से पहले अंतिम इच्छा के रूप में अपनी जिंदगी माँग रही थी पर परंपरा की आड़ में प्रदर्शन के नाम पर हर 4-6 घर छोड़कर हमने होलिका के नाम पर इनका ढ़ेर लगाकर इन्हें अग्नि के सुर्पुद कर दिया tऔर रंगों के नाम पर बेफिजूल रंगीन पानी सड़कों पर बहाकर पर्यावरण को गंदा कर दिया।

सच कहूँ तो अब मुझे होली में प्रेम का रंग कम और गंदगी और विद्रोह का रंग अधिक नजर आता है। इस त्योहार का सबसे अधिक शिकार शहर के  सार्वजनिक स्थल व इमारते बनती है। जिन्हें मनचले लोग इस दिन जी भर के गंदा और रंगीन करते है।

होली प्रेम और उल्लास का त्योहार है। आप चाहे तो इसे शांतिपूर्ण तरीके से मना सकते हैं। होलिका दहन यदि हमारी परंपरा है तो क्यों न हम हर गली-मोहल्ले की बजाय शहर में एक स्थान पर एकत्र होकर सार्वजनिक होली दहन कर इस परंपरा का निर्वहन करे। हम चाहे तो गीले रंगों की बजाय सूखे रंगों से होली खेलकर अपने शरीर को व पर्यावरण को बेहतर स्वास्थ्य का सुख दे सकते हैं। गर्मी के मौसम में सूखे से त्राहि-त्राहि करने की बजाय प्लीज, आप कृपा करके पानी के अपव्यय को रोके और सूखे रंगों से होली खेले।     

Thursday, January 20, 2011

एक्शन रिप्ले, नईदुनिया 'युवा' उज्जैन, 13 जनवरी 2011

नईदुनिया 'युवा' 13 जनवरी 2011 (प्रथम पृष्ठ)

नईदुनिया 'युवा' 6 जनवरी 2011 में मेरा आलेख

नईदुनिया 'युवा' 6 जनवरी 2011 (लक्ष्य से भटकते न्यूज चैनल)