Thursday, December 18, 2014

रक्तरंजित हुआ शिक्षा का मंदिर

खिलौना बन गए खिलौनों से खेलने वाले

-          - गायत्री शर्मा
यह ‘तालिबानी आतंक’ की पाठशाला ही है, जिसमें निर्ममतापूर्ण तरीके से जिहाद के चाकू से इंसानों की खालें उधेड़ी जाती है, मानवीय संवेदनाओं को कट्टरता की आग में पकाया जाता है, इंसानों को इंसानों का खून पिलाया जाता है और इस तरह कई अग्निपरिक्षाओं के बाद तैयार होता है इंसान के भेष में आतंक का वह ‘खुँखार जानवर’, जो दुनियाभर में विंध्वस का कारक बनता है। खूँखार आतंकियों द्वारा जानवरों की तरह स्कूली बच्चों के सिर काटने व उन्हें गोलियों से भूनने की पेशावर के आर्मी स्कूल की नृशंस घटना इंसानियत के चिथड़े उड़ाती हैवानियत का वह अति क्रूरतम रूप है, जिसकी जितनी आलोचना की जाएं वह कम है। यह घटना कट्टर आतंक के अट्टाहस के रूप में दुनिया के सभी देशों के लिए एक चेतावनी भी लेकर आई है कि यदि आप आंतक के खिलाफ आज न जागे तो हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिए जाओगे।

आतंक की यह कैसी भाषा है, जिसमें जिंदगी बचाने वाले को ‘हैवान’ और जिंदगी छीनने वाले को ‘खुदा’ माना जाता है? बच्चों को स्कूल भेजने की वकालत करने वाली पाकिस्तान की मलाला के अपने ही देश के स्कूलों में आतंक का यह तांडव क्या मलाला के हौंसलों की अग्नि परीक्षा ले रहा है या पाकिस्तान की आस्तीन के ही साँप तालिबानी कोबरा का क्रूरतम रूप दिखा रहा है? इसके पीछे कारण कुछ भी हो लेकिन आतंक का यह खौफनाक खेल अब बर्दाश्त की सारी हदे लाँघ गया है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बारूद हमेशा विनाश करती है। यदि आप दूसरों पर हमला करने के लिए अपने घर में बारूद जमा कर रहे हैं तो कहीं ऐसा न हो कि वह बारूद आप ही के विनाश का कारण बन जाए। पेशावर की घटना का ईशारा भी इसी ओर ही है। पाकिस्तान के पेशावर के आर्मी स्कूल में तालिबानी आतंकियों के तांडव का अति भयावह दृश्य, जिसकी कल्पना मात्र ही हमारे रौंगटे खड़े कर देती है, सोचिएं वह मंजर असल में कितना खौफनाक होगा। खिलौनों से खेलने वाले बच्चे भी आतंक के इस कहर के सामने खिलौना बन गए, जिन्हें कतार में खड़े कर आतंकियों ने उनके साथ निशानेबाजी का खेल खेला। पलक झपकते ही सैकड़ों बच्चों समेत 141 लोगों को प्राण लेने वाली यह घटना पाकिस्तान को दुश्मनों से महफूज़ रखने वाले सेना के जवानों के मुँह पर मारा गया वह करारा तमाचा है, जो उन्हें अपने आकाओं की जी-हुजूरी के बदले रसीद किया गया है। 


ताबूतों में सजी लाशों की कतारों से भरे पेशावर के आर्मी स्कूल के भीतर झाँकने पर कठोर से कठोर इंसान का भी कलेजा मुँह तक आ जाएगा पर उन आतंकियों का क्या, जिनके कान सिले हैं, आँखे बंद है और दिमाग दूसरों के काबू में है। शिक्षा का मंदिर कहाने वाले इस स्कूल का रक्तरंजित फर्श आज आतंकियों के खूनी खेल की गवाही दे रहा है। यहाँ पग-पग पर लाशें बिछी है और खून के फव्वारें फूट रहे हैं। कल तक बच्चों की शरारतों और किलकारियों से गूँजनें वाला स्कूल अब रूदन की करूण चीखों से गूँजायमान हो रहा है। माँ-बाप की एक पुकार पर दौड़कर आने वाले बच्चे आज माँ-बाप की चीखें सुनकर भी खामोश है। स्कूल से निकलते से बच्चों के बैग उठाने वाले पालक आज स्कूल से उनकी लाशें लिए निकल रहे हैं। आज समूची दुनिया देख रही है उस पाकिस्तान में पसरे सन्नाटें को, जो अब तक आंतक के खिलाफ जंग छेड़ने से खिलाफत करता रहा है। 

आतंकी विनाश का वह मंजर जिसे कल आपने सिडनी में, परसों अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेंड सेंटर पर, ईरान के सिनेमा हॉल में और 1999 में मुबंई में बड़े करीब से देखा और महसूस किया था। आज पेशावर में आतंक के उसी खौफनाक मंजर के क्रूरतम रूप ने हमें रूह को थराथराने वाला कंपन महसूस करा दिया है। आंतकी कहर से आज ताबूतों की जो कतारें पाकिस्तान में लगी है वह किसी भी मुल्क में लग सकती है। हम सभी की संवेदनाएं आज उन पाकिस्तानियों के साथ है, जिनके घर की रौनक आज मातम के सन्नाटे में गुम हो गई है। लेकिन संवेदनाओं के साथ ही आज जरूरत है आतंक के खिलाफ सख्त कदम उठाने की, जिसके लिए भी मुश्किल की इस घड़ी में हम पाकिस्तान के साथ खड़े है। आतंकी हमलों की घटना कभी भी और कही भी घट सकती है। इससे पहले कि हमारे मुल्क में भी कुछ ऐसा हो। सम्हल जाइएं और खिलाफत कीजिए धार्मिक कट्टरता की उन दुकानों की, जहाँ धर्म और मज़हब के नाम पर भाई-भाई को लड़ाया जाता है। अब वक्त आ गया है धर्म और मजहब की कट्टरता को सदा के लिए भुलाकर मानवता का धर्म अपनाने का। अपनी एकता और ताकत से आतंक को मुंहतोड़ जवाब देने का। तो चलिए आप और हम भी अपने मन, वचन और कर्म से आतंक के खातमे के लिए कृत संकल्पित होकर आवाज उठाएं।

प्रतिष्ठित अखबारों व पोर्टलों में इस लेख का प्रकाशन -

देश के 3 राज्यों के 9 स्थानों (भोपाल, सागर, इंदौर, उज्जैन, जबलपुर, ग्वालियर, रतलाम, रायपुर तथा मुंबई) से एक साथ प्रकाशित ‘दैनिक दबंग दुनिया’ के 18 दिसंबर 2014, गुरूवार के अंक में ‘एक्सक्लूसिव खबर’ कॉलम में प्रकाशित मेरा लेख – ‘रक्तरंजित हुआ शिक्षा का मंदिर, खिलौना बन गए खिलौनों से खेलने वाले’

मथुरा, लखनऊ, आगरा, औरैया और फिरोजाबाद से एक साथ प्रकाशित उत्तर प्रदेश के प्रमुख दैनिक ‘कल्पतरू एक्सप्रेस’ के 18 दिसंबर 2014, गुरूवार के अंक में संपादकीय पृष्ठ के ‘नजरिया’ कॉलम में ‘रक्तरंजित हुआ शिक्षा का मंदिर’ शीर्षक से प्रकाशित मेरा लेख। कृपया इस लेख पर मुझे अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत कराएं।

गुड़गांव से प्रकाशित प्रमुख दैनिक ‘गुड़गांव टुडे’ के 18 दिसंबर 2014, गुरूवार के संपादकीय पृष्ठ पर पेशावर के आर्मी स्कूल में हुए आतंकी हमले पर केंद्रित मेरे लेख को ‘रक्तरंजित हुआ शिक्षा का मंदिर’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया।   

Wednesday, December 17, 2014

पेशावर में पाक रोया ....

-          गायत्री शर्मा

हर आँख नम है,
हर सीना छलनी है
मासूमों पर कहर बन बरपी
यह कैसी दहशतगर्दी है?

जिहाद की आग आज
मासूमों को जला गई
बुढ़ापें की लाठी अचानक
बूढ़े अब्बू के कंधों पर ताबूत चढ़ा गई

रक्तरंजित हुई मानवता
हैवानियत दहशत बरपा गई
नन्हों की किलकारियाँ आज
मातम का सन्नाटा फैला गई

कोसती है माँ, क्यों भेजा उसे स्कूल?
भेज दिया तो ये आफत आ गई
जिसके लिए की थी दुआएं पीर-फकीरों से
आज मौत उन दुआओं को पीछे छोड़ आगे आ गई  

माँ-बेटे का संवाद

अम्मी-अब्बू बुलाते हैं बेटा तुम्हें
चल उठ, हम तेरी जिद पूरी कराते हैं
जिस खिलौने के लिए रोता था तू रोज़
तुझे आज अब्बू वो खिलौना दिलाते हैं

पर ये क्या, मेरा नन्हा तो खुद ही
खूबसूरत खिलौना बन गया है?
सुनो, खामोश है क्यों लब इसके,  
क्या ये फटी आँखों से कुछ बोल रहा है?   

आज न जाने क्यों भारी है छाती मेरी
ममता के दूध अचानक आँचल भिगो रहा है
आ बेटा, कुछ देर गोद में आकर सो जा
मीठी थपकियों वाला पालना तेरी बाट जोह रहा है  

बच्चे की लाशें देखने पर

दहशतगर्दों ने ये क्या कर डाला?
मेरे नन्हें को जिहादी मुस्लिम बना डाला?  
जो नहीं जानता था फिरकापरस्ती
उसे जिहादी जंग के रक्त से क्यों रंग डाला?

इस खौफनाक मंजर को देख
सहम गई होगी कुछ अम्मियाँ भी
जिनकी औलादें ये कहर बरपा रही थी
वो अम्मियाँ आज औलाद के होने पर आंसू बहा रही थी

बहुत हो चुका दहशतगर्दी का खेल
और इंसानी खून की होलियां
जहाँ हर आंख नम है वहाँ
कोई न बोलेगा अब जिहाद की बोलियां

बस करो अब जिहाद की इस जंग से
पकड़ लो तुम भी शांति की राह
गर अब न सुधर पाएं आतंकियों तुम तो

कर देंगे खत्म हम तुम्हारे नामो- निशा। 

चित्रों हेतु साभार - गूगल 

Wednesday, December 10, 2014

जागिएं और आवाज़ उठाइएं

-          गायत्री शर्मा 

जहाँ मौजूदा माहौल से छटपटाहट होती है वहीं परिवर्तन के कयास लगाए जाते हैं। मौन धारण करने से या हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से हमें कुछ हासिल नहीं होने वाला। जब तक हमें अपने अधिकारों की जानकारी, कर्तव्यों का भान और न्याय पाने की छटपटाहट नहीं होगी। तब तक इस देश की तस्वीर नहीं बदलेगी। आज ‘मानव अधिकार दिवस’ है। कानून द्वारा प्रदत्त मानव अधिकारों के प्रति जागरूक होने का दिन। आइएं आप और हम आज मिलकर शुरूआत करते हैं अपने अधिकारों को जानने की और ज़मीनी हकीकत में घटित हो रही मानव अधिकारों के हनन की कुछ घटनाओं से सबक लेने की।   

आज हम अपने सफर की शुरूआत करते हैं सरकारी योजनाओं, धार्मिक चैनलों में चमकने वाले बाबाओं और कुछ भ्रष्ट बाबूओं से। यह मेरे देश की तस्वीर ही है जहाँ नक्सलवाद नौनिहालों के हाथों में किताबों की जगह बंदूके थमा रहा है, जहाँ नवजात शिशु कटीली झाडि़यों में मौत के तांडव का रूदन गीत गा रहा है, जहाँ सरकारी शिविरों में नसंबदी ऑपरेशन महिलाओं की जिंदगी की नस काट रहा है और मोतियाबिंद का ऑपरेशन आँखों की रोशनी उम्मीदें छीन रहा है, जहाँ बाबाओं के आश्रम में सरेआम महिलाओं व बच्चों के साथ शोषण, बलात्कार व हत्या के अपराध हो रहे हैं। ऐसे देश में हर कदम पर मानव अधिकारों का मखौल उड़ रहा है। अरे आप रूक क्यों गए। मेरे देश की इस सच्ची कहानी में आम आदमी के अधिकारों की धज्जियां उड़ने का यह दृश्य आगे चलकर तब और भी घिनौना हो जाता है जब मध्याह्न भोजन में दाल में छिपकली और चावल में कीड़े बच्चों के मुख का ग्रास बनते हैं, जहाँ बच्चों को दलित रसोइएं की बनाई रोटी खाने से अभिभावक मना करते है, जहाँ सरकारी नौकरियों हेतु योग्यताएं भ्रष्ट बाबू लिफाफे में वज़न देखकर सिद्ध करते हैं और जहाँ सर्व शिक्षा अभियान केवल कागज़ों पर सजते हैं, ऐसे देश में आज भी मुझे मानव अधिकार मुंगेरीलाल के हसीन सपने की तरह दिखता है।

डूबते के लिए एक बुलबुला भी जिंदगी की उम्मीद को जिंदा रखता है लेकिन हम तो पूरी तरह से अज्ञान के तालाब में डूबे हुए है। तभी तो न हमें अपने अधिकारों का भान है और न कर्तव्यों का। यदि इस देश का हर आदमी अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो जाएँ तो कभी किसी के अधिकारों का हनन नहीं होगा। याद रखिएं आवाज़ उठाना आपका काम है, जब आप ही स्वयं के साथ हो रहे भेदभाव, अत्याचार, शोषण या दुर्वव्यवहार के खिलाफ आवाज़ नहीं उठा सकते तो आपकी इस कुंभकर्णी निद्रा को मानव अधिकार आयोग की जागरूकता का ढ़ोल भी भंग नहीं कर सकता है। आज बहाना है मानव अधिकार दिवस का, आज ही से आप भी एक नई शुरूआत कीजिएं इस कानून के बारे में जानने, पढ़ने व आवाज़ उठाने की। यदि आप साहस करके एक कदम आगे बढ़ेगे तो दूसरे कदम पर कानून भी आपका साथ देगा। इससे पहले कि और देर हो जाएँ, आप भी गौर कीजिए अपने मानव अधिकारों पर और स्वयं जागरूक होने के साथ ही लोगों में इस संबंध में जागरूकता फैलाइएं। उसके बाद देखिएं इस देश की तस्वीर कैसे बदलती है।
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Sunday, October 12, 2014

‘मलाला’ है तो मुमकिन है ...

-          गायत्री शर्मा
नन्हीं आँखों से झाँकते बड़े-बड़े सपनें। ये सपनें है हिजाब में कैद रहने वाली पाकिस्तानी लड़कियों की शिक्षा के। ये सपनें हैं उन नन्हीं परियों की कट्टर कबिलाई कानून से आज़ादी के, जिनके सपनों में भी कभी आज़ादी की दुनिया नसीब न थी। तालिबानी आतंकियों के खौफ के बीच स्वात की मलाला ही वह मसीहा थी, जिसने डर के आगे जीत की नई परिभाषा गढ़ी। महात्मा गाँधी की तरह मलाला ने ‍भी हिंसा का जबाब अहिंसा से देकर दुनिया को यह दिखा दिया कि जब उम्मीदें हार मान जाती है। तब भी हौंसले जिंदा रहते हैं। यह मलाला के बुलंद हौंसले ही थे, जिसके चलते पाकिस्तानी लड़कियाँ अब लड़कों की तरह शिक्षा हासिल कर रही है। आज हम सभी के लिए यह सम्मान की बात है कि अशांति में शांति का संदेश फैलाने वाली मलाला को शांति के सर्वोच्च पुरस्कार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना गया है।
         
      कहते हैं नदी जब उफान पर होती हैं तब वह विशालकाय चट्टानों को भी फोड़ अपना रास्ता बना लेती है। जब मलाला के स्वर भी तीव्र वेग से बुलंद ईरादों के साथ प्रस्फुटित हुए, तब कट्टर तालिबानी फरमानों की धज्जियाँ उड़ गई और समूची दुनिया साक्षी बनी नन्हीं लड़की की आज़ादी की जिजिविषा की। अपने बुलंद हौंसलों की ऊँची उड़ान से मलाला ने नामुमकिन को मुमकिन बनाते हुए आतंक के साये में डरी-सहमी रहने वाली पाकिस्तानी लड़कियों के लिए शिक्षा के रूप में आज़ादी का मार्ग भी प्रशस्त किया। दुनिया के लिए मलाला मैजिकल इसलिए है क्योंकि मलाला ने उस देश में आज़ादी की एक नई इबारत लिखी, जिस देश में लड़कियों की आज़ादी कट्टर कानूनों के कायदों में जकड़ी होती है व उनका सुंदरता तथा माँसलता हिज़ाबों के पर्दों में ढँकी होती है। यहाँ औरतें बच्चे पैदा करने का एक जरिया होती है, जिनका जीवन पुरूषों की गुलामी व सपनें कायदे-कानूनों का अनुसरण करने में ही दम तोड़ देते हैं। मलाला जिस स्वात घाटी से आती है, वहाँ की तस्वीर तो उस वक्त बहुत ही भयावह थी, जब वर्ष 2009 में वहाँ तालिबानी आतंकियों का खौफ रहता था। मलाला ने उन दिनों आतंक के साये में लड़कियों की दम तोड़ती जिंदगीयों के दर्द को अपनी डायरी में हूबहूँ बँया किया।      
        

डायरी लेखन के साथ ही सोशल नेटवर्किंग साइट्स और सार्वजनिक मंचों से भी मलाला ने तालिबानी आतंकियों की कट्टरता, कबिलाई कायदें-कानून व खौफ का खुलासा किया। यह मलाला की आतंकियों से खिलाफत का ही नतीज़ा था कि लड़कियों की शिक्षा की वकालत करने वाली मलाला को 9 अक्टूबर 2012 को तालिबानी आतंकियों ने गोलियों का शिकार बनाया। उस वक्त हमले में गंभीर रूप से घायल मलाला की जिंदगी बचने की सारी उम्मीदें जब हार मान चुकी थी तब भी मलाला के बुलंद हौंसलों ने कौमा के रूप में नाउम्मीदी के कयासो के बीच भी उसे जिंदा रखा। आतंकियों के इस हमले ने मलाला के हौंसले को तोड़ने के बजाय उसे अपनी लड़ाई को दोगुनी तेजी से लड़ने की ऊर्जा दी। यह वहीं दिन था जिसके बाद न तो मलाला ने कभी पीछे मुड़कर देखा और न ही आतंकियों ने कभी मलाला को पीछे मुड़कर देखा।        
                 
पने शब्दों के मैजिक से पाकिस्तान में लड़कियों की आज़ादी के स्वप्न को हकीकत बनाने वाली मैजिकल मलाला के सराहनीय कार्यों की बदौलत ही उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार, पाकिस्तान का राष्ट्रीय युवा शांति पुरस्कार, वर्ष 2013 में संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार सम्मान, मैक्सिको का समानता पुरस्कार, साख़ारफ़ पुरस्कार आदि पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। मलाला की पाकिस्तानी लड़कियों की आज़ादी व शिक्षा के लिए चलाई जाने वाली मुहिम आज भी जारी है। यह मलाला मैजिक ही है, जिसके बूते आज पाकिस्तानी लड़कियाँ न केवल बुनियादी शिक्षा हासिल कर रही है बल्कि अपनी जि़दगी अपने तरीके से जीने के लिए भी स्वयं को आज़ाद महसूस कर रही है। नोबेल पुरस्कार के लिए चयनित मलाला के इस जोश व जुनून को मेरा सलाम है, जिसने लड़कियों की आज़ादी पर सख्ती के अवरोध खड़े करने वाले पाकिस्तान को भी आज यह कहने पर मजबूर कर दिया कि मलाला हमारे देश की शान है।
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Thursday, October 9, 2014

रहे सलामत मेरा सजना ...

- गायत्री शर्मा

प्रकृति ने विवाहिता के भावों को कुछ ऐसा बनाया है कि उसके हृदय के हर स्पंदन के साथ ‘अमर सुहाग’ की दुआएँ सुनाई पड़ती है। अपने लिए वह किसी से कुछ नहीं माँगती पर ‘उनके’ लिए वह सबसे सबकुछ माँग लेती है। धरती के पेड़-पौधे, देवी-देवताओं के साथ ही ‘करवाचौथ’ के दिन तो हजारों मील दूर आसमान में बैठे चाँद से भी वह अपने दांपत्य के चाँद के दीर्घायु होने की दुआएँ माँग लेती है। करवाचौथ वह शुभ दिन है, जब चाँद से दुआएँ माँगती तो पत्नी है पर उन दुआओं का फल मिलता पति को है। सुहाग की चीजों से सजती तो ‘सजनी’ है पर दमकता उसके ‘साजन’ का मुखड़ा है। 
      जिस स्त्री को पुरातन काल से हमारे समाज में नवरात्रि में ‘बेटी’ के रूप में, विवाह के समय ‘कन्या रत्न’ के रूप में, शुभ कार्यों में ‘शुभंकर’ के रूप में और तीज-त्योहारों पर ‘सुहागन’ के रूप में पूजा जाता रहा है। वहीं ‘देवी’ रूपी स्त्री अपने सुहाग के सुखमय जीवन को ‘सदा सुहागन रहने के’ शुभाशीष से भरने के लिए देवी-देवताओं को पूजने लगती है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि प्रेम व रिश्तों को निभाने के मामले में महिलाएँ पुरूषों से कहीं अधिक विश्वसनीय और ईमानदार होती है। यहीं वजह है कि गृहस्थी के रूप में परिवार की बागडोर संभालने से लेकर अपने जीवनसाथी की सुरक्षा को पुख्ता करने का जिम्मा भी व्रत-त्योंहारों के रूप में समाज ने स्त्री को ही दिया है।
       
हमारी सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका उसी ‘शक्ति’ की तरह है, जो सदा अपने प्रियजनों व परिवार की रक्षा के लिए तत्पर रहती है। हाँ, यह बात अलग है कि महिलाओं का पुरूषों की रक्षा करने का अंदाज कुछ अलहदा होता है। कहने को सप्तपदी के सात वचन वर-वधू दोनों एक साथ लेते हैं पर इन वचनों को निभाने की शिद्दत स्त्रियों में पुरूषों से अधिक होती है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्त्री जब कुछ करने की ठान लेती है तो उसकी जिद को नकारना ईश्वर के भी बूते की बात नहीं होती है। जप, तप, संयम, श्रृद्धा और विश्वास के तेज से सुशोभित स्त्री जब ‘करवाचौथ’ के दिन चाँद से अखण्ड सौभाग्य की कामना करती है तो आसमान का चाँद भी स्त्री के तप के आगे नतमस्तक हो ‘तथास्तु’ कहकर उसकी हर मुराद को पूरी कर देता है।
       विवाह के पश्चात पत्नी के रूप में जब कोई स्त्री पुरूष के जीवन में प्रवेश करती है। तो लक्ष्मी स्वरूपा उस स्त्री के कदम पड़ते ही खुशियाँ भी अर्धांगिनी की अनुगामिनी बन पुरूष के जीवन में प्रवेश करने लगती है। यह वहीं भारतीय स्त्री है, जो विवाहिता के रूप में सुहाग की चीजों से न केवल स्वयं को सजाती है बल्कि पति के प्रति सर्मपण के भावों से अपनी गृहस्थी को भी श्रृंगारित करती है। भारतीय सुहागन के ललाट की ‘बिंदियाँ’ उसके स्वाभिमान का, माँग का ‘सिंदूर’ पति की मौजूदगी का, पैरों की ‘बिछियाँ’ रिश्तों के प्रेमिल बँधन में खुशी-खुशी बँधने का व ‘मंगलसूत्र’ विवाहिता बनने के गौरव का प्रतीक होता है। सुहाग के इन प्रतीकों से स्वयं को सजाना विवाहिता की विवशता या शौक नहीं बल्कि उससे कही अधिक उसके लिए सम्मान का प्रतीक होता है। करवाचौथ के दिन शादी का जोड़ा पहनकर फिर से सजनी अपने सजना के लिए दुल्हन सी सजती है। आज शादी के जोड़े में सजे विवाहित जोड़े के साथ ही यादें ताजा हो जाती है, जीवन के उस यादगार दिन की, जब गठबंधन की गाँठों ने दो शरीर के साथ ही दो आत्माओं को भी एक कर दिया था।
     
करवाचौथ के बहाने ही सही ‍पति-पत्नी के प्रेमिल यादों की पोटली फिर से खुल जाती है और उस पोटली से निकलती है कुछ शरारतें, प्यार भरी तकरार और ढ़ेर सारा प्यार। प्रेम के प्रतीक उस चाँद को साक्षी मान दंपत्ति आज फिर से एक नई ऊर्जा के साथ अपने दापंत्य जीवन की शुरूआत करते हैं। आज करवे के जल में चीनी की मिठास घोल पत्नी अपने दांपत्य जीवन में प्रेम की मिठास की कामना करती है और चाँद के बाद अपने पति को निहारते हुए वह जीवन में सुख-दुख की छलनी में से सुखों को पति की ओर छनकर जाने का तथा दुखों को अपने हिस्से में बचा लेने का संकेत देती है। अन्य व्रतों की तरह यह व्रत भी सुहागन स्त्रियाँ ‘सर्वमंगल’ की कामना के साथ करती है। तभी तो एक-दूसरे की माँग भरने व बड़ों से आशीष लेने के बहाने वह अपने साथ ही अपनी साथी सुहागनों के भी अमर सुहाग की दुआ करती है।
     पति चाहे कैसा भी हो पर पत्नी उसके लिए दुआएँ माँगना नहीं छोड़ती। जब पत्नी पति के लिए खुशी-खुशी सर्वस्व समर्पित करती है तो क्या यह पति की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह भी अपनी पत्नी के लिए भी कुछ ऐसा करें, जो उसके लिए इस करवाचौथ के व्रत को यादगार बना दें? कितना अच्छा हो गर पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे के लिए ‘करवाचौथ’ का व्रत रखें। जब जीवनसाथी के रूप में जीने-मरने की कसमें व सुख-दुख में साथ निभानें की कसमें दोनों एकसाथ खाते हैं तो फिर चौथ का व्रत करने के लिए दंपत्ति एक-दूसरे का साथ क्यों नहीं निभातें? आप भी मेरी इस बात पर गौर कीजिएगा। यदि आप ऐसी पहल करते हैं तो निश्चित रूप से आपके दांपत्य जीवन में खुशियों की खनक पहले से कहीं अधिक बढ़ जाएगी। इसी के साथ ही आप सभी को करवाचौथ की शुभकामनाएँ।  


Thursday, October 2, 2014

कर्फ्यू के सन्नाटें में पुलिस का गरबा

- गायत्री शर्मा
सांप्रदायिकता की दीवारों ने हमारे दिलों में ऐसी दरारे डाल दी है कि जब किसी हिंदू पर आक्रमण होता है तो बगैर सोचे-समझे हम मुस्लिमों पर ऊँगली उठाने लगते हैं और जब किसी मुस्लिम को कोई गोली मार देता है तो हम हिंदूओं पर लाठियाँ लेकर बरस पड़ते हैं। क्या आज धर्म की कट्टरता की हैवानियत हमारी इंसानियत पर इतनी हावी हो गई है कि हर दिन एक साथ रहने और घूमने वाले राम-रहीम दंगों और कर्फ्यू के समय एक-दूसरे को ही मारने पर उतारू हो जाते है? पिछले दिनों मध्यप्रदेश के रतलाम शहर में हुई गोलीबारी की घटना में भी कुछ ऐसा ही हुआ। मुस्लिम और हिंदू नेताओं पर एक ही दिन में दो अलग-अलग स्थानों पर हुए जानलेवा हमला के बाद हमेशा की तरह राजनीति के कीचड़ में पत्थर फेंककर तमाशा देखने वाले छुटपुट नेताओं की राजनीति दम पकड़ने लगी। जिसके चलते भाजपा ने कांग्रेस को आरोपों के कटघरे में खड़ा किया और कांग्रेस भाजपा को। ऐसे में मरण हुआ बेचारे आम-आदमी का, जो दंगा, कर्फ्यू और मारपीट की घटनाओं के कारण अपना रोजगार छोड़ घर की चारदीवारी में कैद होकर रह गया।
       क्या होता है कानून की उन धाराओं की पेचीदगी से, जो आम आदमी से उसका रोजगार व दो वक्त की रोटी ही छीन ले? मुझे आज नरेंद्र मोदी की मैडिसन स्केवयर पर कही वह बात याद आती है, जिसमें प्रधानंमत्री ने यह कहा कि लोग कानून बनाने की बात करते हैं और मैं कानून को खत्म करने की ताकि आम आदमी कानून की पेचीगदियों से बाहर निकल सके। यह सही भी है क्योंकि कानून की उलझनों में हर बार बेचारा आम आदमी ही दम तोड़ता है कोई राजनेता या व्यवसायी नहीं। बड़ी घटनाओं में मारा कोई मंत्री जाता है पर धारा 144 की उलझनों में आम आदमी फँस जाता है। जिसकी वजह से शहरों में दंगे भड़कते हैं और कर्फ्यू के हालात बनते है, उन नेताओं की गाड़ी पर लगी बत्ती तो उन्हें दंगों और कर्फ्यू से भी राहत दिला देती है। पर हमारे पास तो न कोई लाल, पीली, नीली बत्ती है और न कोई प्रेस का कार्ड। हमारे पास है तो बस भारत के नागरिक होने का पहचान पत्र, जो न तो कभी दंगों में काम आता है और न किसी कर्फ्यू में राहत दिलाता है। कितनी हास्यास्पद बात है यह कि आम आदमी को नेता के रूप में ‘खास’ बनाने वाले आम आदमी का वजूद भी देश में कितना आम हो गया है।            
रतलाम में मुस्लिम महिला पार्षद को अज्ञात हमलावरों द्वारा गोली मारने की घटना के कुछ ही घंटों के भीतर शहर के बंजरग दल के नेताओं पर जानलेवा हमला हो जाता है। हो सकता है इन घटनाओं के पीछे कोई सोची-समझी साजिश हो या यह भी हो सकता है कि ये दोनों घटनाएँ एक-दूसरे की प्रतिक्रियास्वरूप न होकर कुछ अलग ही मामले हो। लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि जब हिंदू-मुस्लिम के साथ एक ही दिन में एक सी घटना घटित होती है तो दोनों कौमों का एक-दूसरे के विरोध में खड़ा होना और दंगों का भड़कना स्वभाविक ही होता है। फिर चाहें ऐसी घटना मध्यप्रदेश में हो या उत्तर प्रदेश में हो या फिर भारत के किसी ओर राज्य में। सच कहा जाएं तो हमारे विश्वास की डोर इतनी कमजोर है कि देश में हिंदू-मुस्लिम दंगे मात्र अफवाहों की आँधी से भी भड़क जाते हैं।
        सोने की चमक से चमकने वाला चाँदनीचौक, सेव की महक से महकने वाला स्टेशन रोड और साडि़यों के ग्राहकों से सजने वाला माणकचौक चार दिनों तक कर्फ्यू से उपजे सन्नाटे व दंगों के खौफ के साये में खामोश रहा। सड़के सूनी रही और व्यापार-व्यवसाय ठप्प। ऐसे में आम आदमी के कानों में हर दस मिनिट सुनाई देने वाली पुलिस की गाडि़यों के साइरन की आवाजे ही गूँज रही थी। खाकी वर्दी वालों के खौफ के माहौल में शहर में दिनभर में क्या, कब, कैसे और क्यों हुआ, इसकी खबर आम आदमी को उड़ती-उड़ती अफवाहों से मिलने लगी। क्या आप जानते हैं कि कर्फ्यू के चलते बोझा ढ़ोकर रोजी-रोटी कमाने वाला मजदूर परिवार चार दिन तक भूखा सोया, दूध की आस में कई नन्हीं आँखों ने टकटकी लगाई और दवाई की आस में कई बूढ़े गले खासने लगे? इधर डेंगू और मलेरिया से मरीज घरों में कराह रहे थे और उधर घर से बाहर निकलने वालों पर पुलिस वाले डंडे बरसा रहे थे। पिछले दो ‍दिनों से कर्फ्यू से मिली कुछ घंटों की राहत में राशन की दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ से मेले लगने लगे। ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की तर्ज पर महिलाएँ छूट में मिली चुटकी भर राहत में परिवार के राशन का इंतजाम करने नंगे पैर घरों से निकली। कर्फ्यू में राहत की संक्षिप्त समय सीमा के चलते राशन की कतार में अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को अक्सर खाली हाथ लौटना पड़ा क्योंकि उसका नंबर आने से पहले ही राशन वाला स्टॉक न होने के कारण भीड़ के हाथ जोड़ लिए। नवरात्रि के दिन है पर गरबा पांडाल सूने पड़े हैं ऐसा लग रहा है इस नवरात्रि में शहर में बालिकाएँ नहीं बल्कि खाकी वर्दी वाले अपनी गाडि़यों के सायरन की आवाजों और डंडों की ठक-ठक के साथ शहरभर में गरबा नृत्य कर रहे हैं। इस कर्फ्यू में बस एक चीज पुलिस की सख्ती से नहीं रूकी और वह थी बादलों से बरसने वाली बरसात। जिस पर न पुलिस के डंडों का जोर चला और न ही कर्फ्यू का खौफ।
       मेरा आप सभी से प्रश्न है कि आखिर क्या होगा इस कर्फ्यू से, भागने वाला आरोपी तो गोली मारकर कब से भाग चुका होगा और पुलिस हर बार की तरह आम आदमी के साथ ही सख्ती दिखाएगी। आखिर क्यों नहीं हम सभी मिल-जुलकर शांतिपूर्ण तरीके से इन घटनाओं का विरोध प्रदर्शन करते हैं, जिससे कि शहरवासियों को कर्फ्यू की मार न झेलना पड़े? ऐसी घटनाओं की निंदा करना लाजिमी है पर दलगत राजनीति से परे भी विरोध का एक सही व शांतिपूर्ण तरीका हो सकता है। यह वहीं भारत है, जहाँ हम सभी हिंदू-मुस्लिम एक साथ रहते हैं, एक सा पानी पीते हैं, एक ही प्रकार की वायु में साँस लेते हैं लेकिन न जाने क्यों धर्म की कट्टरता के नाम पर हम जेहाद की नंगी तलवारे लिए एक-दूसरे पर बरस पड़ते है? पुलिस की छावनी में किसी भी शहर की तब्दीली से हिंदू या मुस्लिम किसी का कुछ भला नहीं होने वाला है। इससे तो उल्टा हमारा ही नुकसान होगा क्योंकि हममें से जब कोई घर से बाहर निकलकर जाने की कोशिश करेगा तो पुलिस की लाठियों की मार पड़ने से दंगे की आग थमने की बजाय और तेजी से भभक उठेगी। मेरी आप सभी से विनती है कि कृपया शांतिपूर्ण माहौल बनाएं, जिससे कर्फ्यू खुलने की उम्मीद जागें और हमारे शहर के बाजार फिर से नमकीन की तीखी महक, सोने की पीली चमक व साडि़यों के चटख रंगों की खूबसूरती की रौनक से गुलजार हो जाएं।
 
नोट : कर्फ्यू में आमजन की जिंदगी किस तरह बद से बदतर हो जाती है और 'करे कोई, भरे कोई' की तर्ज पर उसकी रोजी रोटी पर लात पड़ जाती है। इस पर मेरी कलम ने कुछ लिखने का प्रयास किया है। 1 अक्टूबर 2014, बुधवार को रतलाम के प्रमुख सांध्य दैनिक 'रतलाम दर्शन' व 2 अक्टूबर 2014, गुरूवार के अंक में रतलाम के अन्य प्रमुख सांध्य दैनिक 'सिंघम टाइम्स' में प्रकाशित मेरा लेख 'कर्फ्यू के सन्नाटे में पुलिस का गरबा'। मेरे इस लेख के माध्यम से आप भी लीजिए रतलाम में कर्फ्यू के हालात का जायज़ा। 
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Monday, September 29, 2014

जय हो 'मोदी'

- गायत्री 
कल संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुनना और आज न्यूयार्क के मैडिसन स्केवयर गार्डन पर नरेंद्र मोदी का परिवार के किसी सदस्य की तरह अमेरिका के प्रवासी भारतीयों से मुखातिब होना दोनों ही आयोजन मोदी की मौजूदगी व उनके वक्तव्य की सकारात्मक ऊर्जा के कारण सदा-सदा के लिए यादगार बन गए। इन दोनों ही आयोजनों में मोदी का वक्तव्य मौके की नब्ज़ को भाँपकर चौका मारने के बेमिसाल उदाहरण थे। कल मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय से विश्व की सबसे बड़ी समस्या ‘आतंकवाद’ को खत्म करने हेतु दुनिया के सभी देशों के सम्मिलित सहयोग की बात कह जहाँ सभी देशों को एकजुट होने का संदेश दिया वहीं अपने वक्तव्य में मोदी ने बाहरी आक्रमणों के समय सैन्य शक्ति व बलिदान देने वाले छोटे-छोटे देशों की निर्णय में भूमिका को बढ़ावा देने की महत्वपूर्ण बात भी कही। भारतीयों की क्षमता व कौशल को विश्व के विकास में महत्वपूर्ण बताकर मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच से भारत की शक्ति का जयघोष दुनियाभर में कर दिया। कल के धमाकेदार भाषण के बाद आज मैडिसन स्केवयर गार्डन से प्रवासी भारतीयों को वीजा के मामले में होने वाली फजीहत से मोदी ने ‘आजीवन वीजा’ की सुविधा के रूप में जो सहूलियत भरी राहत दी है वह प्रवासी भारतीयों के लिए भारत के प्रधानमंत्री का उनको दिया गया सबसे बड़ा तोहफा है। जिसके कारण देश का यह प्रधानमंत्री वर्षों तक प्रवासी भारतीयों का चहेता नेता बना रहेगा। इसमें कोई शक नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का व्यक्त्वि बेहद ही जादुई व आकर्षक है। उनकी वाणी में मुझे दूसरा युवा अटल बिहारी वाजपेयी नजर आता है, जिसकी आवाज की ताकत पूरे माहौल को अपने सर्मथन में करने की जादुई ताकत रखती है।
मोदी ‘झूठ’ पर नहीं, ‘सच’ पर यकीन करते हैं। वह ‘कोरे दावों’ की नहीं बल्कि ‘किए गए कार्यों’ की बात करते हैं। मोदी ‘भविष्य के स्वप्नों’ की बजाय ‘वर्तमान को सँवारने’ की वकालत करते हैं। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री विश्व मंच पर भ्रष्टाचार, महँगाई और गरीबी के बदनुमा दाग से मैली हुई भारत की तस्वीर को उजला करने की न केवल बात करते हैं बल्कि उन्होंने ऐसा कर दिखाने के लिए यथोचित कदम भी उठाएं है। यह मोदी की खूबी ही है कि वह ‘खास’ होकर भी ‘आम’ बनकर लोगों से मुखातिब होते हैं। प्रधानमंत्री के भारी भरकम चोले की बजाय उन्हें ‘चाय वाला’ आम आदमी कहाना अधिक पसंद है। यह मोदी का बड़ा दिल ही है कि वह स्वयं को ‘चाय वाला’ कहने में शर्म नहीं बल्कि गर्व का अनुभव होता है क्योंकि मोदी मानते हैं कि छोटे-छोटे काम करने से ही व्यक्ति ‘बड़ा’ होता है। हमारे यहाँ ऐसा कहा भी जाता है
‘बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर’
जिसका अभिप्राय यह है कि यदि व्यक्ति बहुत बड़ा भी बन जाएं पर किसी के काम न आएं तो उसके बड़ा होने का क्या फायदा? ‘बड़ा’ होकर देश की छोटी-छोटी समस्याओं को तवज्जू देते हुए मोदी ने महात्मा गाँधी के ‘स्वच्छता अभियान’ को जन अभियान का व्यापक रूप देकर ‘स्वच्छ भारत’ बनाने की एक अनूठी पहल की है, जिससे कि भारत के पर्यटन का बंद पड़ा द्वार फिर से विदेशी सैनानियों के लिए खुले और हमारा देश ‘गंदगी’ के कारण नहीं बल्कि ‘स्वच्छता’ व ‘अतिथि देवो भव’ के भाव के कारण विश्वभर में अपनी पहचान बनाएं। अब तक दुनिया कहती थी कि भारत तकनीक के मामले में बहुत पीछे हैं लेकिन सीमित संसाधनों व कम खर्च में मंगल तक भारत की यात्रा का गुणगान करते हुए मोदी कहते हैं कि एक ओर हम धरती पर अमेरिका से हाथ मिला रहे हैं तो दूजी ओर हम मार्स पर भी अमेरिका से हाथ मिला रहे हैं। तकनीक के मामले में भारत को बेहतर देश मानने वाले मोदी आध्यात्म व पर्यटन की दृष्टि से भी भारत को प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। गंगा का स्वच्छता अभियान, प्रधानमंत्री जनधन योजना और स्वच्छ भारत अभियान उनके द्वारा भारत के कायाकल्प की दिशा में उठाए गए कुछ ऐसे ही सराहनीय कदम है। विश्व मंच पर मोदी ने आज भारत की जो तस्वीर बनाई है, उसका शत प्रतिशत परिणाम ‍हमें दुनिया के देशों की भारत में व्यापार-व्यवसाय करने में देखी जाने वाली उत्सुकता से पता लग रहा है। मेरे देश के इस ‘सुपरहीरो’ को मेरा सलाम है और साथ ही ढ़ेर सारी अग्रिम शुभकामनाएँ भी है इस देश की तस्वीर में विकास के नए रंग से सजाने की ओर कदम बढ़ाने के लिए।

Thursday, September 18, 2014

‘संजा’ के रूप में सजते हैं सपने

कुँवारी लड़कियों की सखी ‘संजा’
-          गायत्री शर्मा
संजा
 
 श्राद्ध पक्ष में शाम होते ही गाँवों की गलियों में गूँजने लगते हैं संजा के गीत। कुँवारी कन्याओं की प्यारी सखी ‘संजा’, जब श्राद्ध पक्ष में उनके घर पधारती है तो कुँवारियों के चेहरे की रंगत और हँसी-ठिठौली का अंदाज ही बदल जाता है। सोलह दिन की संजा की सोलह आकृतियों में मानों कुँवारी लड़कियों के सपने भी दीवारों पर गोबर के चाँद-सूरज, फूल, बेल, सातिये, बंदनवार आदि अलग-अलग आकृतियों में सजने लगते हैं और अपने प्रियतम को पाने की ललक उनके गीतों के समधुर बोलों में तीव्र हो उठती है।
 
मालवाचंल की संजा
यह स्त्रियों के एक-दूसरे से सुख-दुख को साझा करने की प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा ही है, जिसे कुँवारियाँ संजा बाई की उनकी सासु-ननद से हुई तीखी नोंकझोक के गीतों के माध्यम से एक-दूसरे से साझा करती है। इसे हम ग्रामीण संस्कृति में घुली मधुर संबंधों के प्रेम की मिठास ही कहेंगे, जिसके चलते दीवारों पर उकेरी जाने वाली संजा के प्रति भी युवतियों में सखी सा अपनत्व भाव दिखाई देता है और कुवारियाँ अपनी प्यारी संजा को अपने घर जाने की हिदायत कुछ इस अंदाज में देती है – ‘संजा, तू थारा घरे जा, नी तो थारी बाई मारेगा कि कूटेगा कि डेली में डचोकेगा।’ संजा गीतों में कभी गाड़ी में बैठी संजा बाई के सौंदर्य का चित्रण ‘छोटी सी गाड़ी लुढ़कती जाय, लुढ़कती जाय, जामे बैठी संजा बाई। घाघरो घमकाती जाय, चूड़लों चमकाती जाय, बाईजी की नथनी झोला खाय, झोला खाय‘ गाकर किया जाता है तो कभी संजा को ‘बड़े बाप की बेटी’ होने का ताना देकर उसके अच्छे पहनावे व लज़ीज खान-पान पर अस अंदाज में कटाक्ष किया जाता है – ‘संजा, तू तो बड़ा बाप री बेटी, तू तो खाये खाजा-रोटी। तू पेरे मनका-मोती। गुजराती बोली बोले, पठानी चाल चाले .... ।‘
    भ्राद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर अश्विन मास की अमावस्या तक मनाया जाने वाला संजा पर्व राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात आदि राज्यों में मनाया जाता है। मालवा-निमाड़ अंचल में ‘संजा’ के रूप में पूजी जाने वाली ‘संजा बाई’ को देश के अलग-अलग राज्यों में संझया, गुलाबाई, सांझी, सांझी-धूंधा आदि नामों से जाना जाता है। ‘संजा’ के सोलह दिनों में क्रमश: पूनम का पाटला, एकम की छाबड़ी, बीज का बिजौरा, तीज का घेवर, चौथ का चाँद, पंचमी का पाँच कटोरा, छट की छ: पंखुड़ी का फूल, सप्तमी का सातिया, अष्टमी का बंदनवार, नवमी का नगाड़ा, दसमी का दीया, ग्यारह का गलीचा, बारस का पंखा और तेरस से सोलहवें दिन तक किला-कोट आदि की आकृतियाँ बनाई जाती है। संजा एक ऐसा पर्व है, जिसमें भित्ति-चित्रण की विविध आकृतियों के रूप में ग्राम्य सभ्यता के चित्रण के साथ ही संजा के लोकगीतों के माध्यम से लड़कियों को विवाह हेतु गंभीर होने की हिदायत भी दी जा‍ती है। गोबर की संजा मांडने से लेकर संजा का प्रसाद बनाने व आरती करने की सभी जिम्मेदारियाँ लड़कियों की ही होती है। इन छोटे-छोटे कार्यों के बहाने ग्रामीण संस्कृति में लड़कियों को पारिवारिक जिम्मेदारियों के प्रति गंभीर होने का व वैवाहिक जीवन में सफलता का फलसफा सिखाया जाता है।

     
संजा की आकृति
यह पर्व, देश की उस समृद्ध ग्राम्य संस्कृति व लोकगीत परंपरा का परिचायक है, जिसमें पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, चाँद-सूरज, देवी-देवता आदि को विविध अवसरों पर पूजा जाता रहा है। संजा पर्व है उल्लास का, उत्साह का व सबसे अधिक कुँवारी लड़कियों के कोमल स्वप्नों की ऊँची उड़ान का। वह उड़ान, जिसमें सूरज की गर्माहट में उनके प्रेम को पाने की तीव्रता का अहसास छुपा है और चाँद की शीतलता में सफल होने के लिए संयम रखने का सबक भी। संजा के बहाने कुँवारी लड़कियों का मेल-मिलाप होता है और प्रसाद पहचानने के बहाने होती है उनके सपनों के राजकुमार की खूबियों को पहचानने की बात। संजा के ये सोलह दिन कुँवारियों के लिए उनकी जिंदगी के वे खास दिन होते हैं, जब वह अपनी सखी संजा से अपने दिल की बात करती है और संजा के ससुराल के लिए विदा लेने पर उससे गुणवान और रूपवान पति पाने का आशीष माँगती है। संजा के बहाने कुँवारियों के सपने सोलह दिन तक गोबर की सुंदर आकृतियों में उकेरे जाते हैं, उम्मीदों की चमक से चमकाएं जाते है, गीतों की शिद्दत से पुख्ता किए जाते हैं, धूप की अग्नि से महकाएं जाते है और इन सभी के माध्यम से आशा की जाती है सुयोग्य वर व अखण्ड सौभाग्य की। मुझे उम्मीद है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण के इस दौर में भी संजा के रूप में हमारी माटी की महक सदैव हमें अपनी समृद्ध लोक संस्कृति से जोड़े रखेगी और इस समृद्ध परंपरा के साक्षी बनेंगे, संजा के सुमधुर गीत। 

नोट : कृपया इस ब्लॉग से किसी भी सामग्री का प्रयोग करते समय साभार अवश्य देंवे व मुझे सामग्री के प्रयोग का सूचनार्थ मेल भी भेंजे। 
मेरे इस लेख का प्रकाशन 'वृग्राम' पोर्टल, दैनिक दबंग दुनिया, दैनिक सिंघम टाइम्स आदि में हो चुका है, जिस पर जाने के लिए कृपया निम्न यूआरएल पर क्लिक करें - 

‘वृद्धग्राम’ पोर्टल पर 16 सितंबर 2014, मंगलवार की पोस्ट में शामिल मेरा लेख ‘संजा के रूप में सजते हैं सपने’। मेरे इसी लेख का प्रकाशन रतलाम से प्रकाशित दैनिक ‘सिंघम टाइम्स’ के 16 सितंबर 2014 के अंक में हुआ है।
http://vradhgram18.blogspot.in/2014/09/sanja-parv.html#.VBhuYpSSxeA
देश के तीन राज्यों से प्रकाशित 9 संस्करणों (इंदौर, भोपाल, उज्जैन, सागर, रतलाम, जबलपुर, ग्वालियर, रायपुर और मुंबई) से एक साथ प्रकाशित दैनिक ‘दबंग दुनिया’ के ‘दि वूमेन’ पृष्ठों के 17 सितंबर के 17 नंबर पृष्ठ पर प्रकाशित मेरा लेख - ‘कुंवारी लड़कियों की सखी संझा’।  

Monday, September 15, 2014

भाषा के समझिए ‘भाव’

         गायत्री शर्मा  
यह भाषा ही है, जो भावों को जन्म देती है, जो हमारी कल्पनाओं को शाब्दिक अनुभूति प्रदान करती है। भाषा को निष्प्राण समझने की भूल कभी मत कीजिएगा क्योंकि व्याकरण भाषा के प्राण है। शब्द, इसका शरीर है और ध्वनि इसकी आवाज़ है। गौर से सुनो तो भाषा बोलती भी है, आँखों से देखों तो भाषा चलती भी है और महसूस करो तो भाषा मरती भी है। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि आज हम अपनी पहचान, यानि कि अपनी भाषा को भूल चुके है। यहीं वजह है कि वर्ष के एक दिन ’14 सिंतबर’ को ही हम हिन्दी को याद कर अगले ही दिन फिर से अंग्रेजी के गुलाम बन जाते हैं। ऐसा करते समय शायद हम यह भूल जाते हैं कि आज हमने भाषा का त्यजन किया है परंतु जिस दिन भाषा हमारा त्यजन कर देगी। उस दिन हमारी पहचान ही हमसे खो जाएगी और हमने अपने ही देश में पराये बन जाएँगे।    
     भाषा का पतन संस्कृति का पतन है और संस्कृति का पतन, देश का पतन। किसी भी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की उन्नति में भाषा का सर्वाधिक योगदान होता है। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम होने के साथ ही हमें अपनी संस्कृति से जोड़े रखने वाली वह मजबूत गाँठ होती है, जिसकी मजबूती पर किसी देश की कामयाबी व विकास की इबारत लिखी जाती है। जिस देश की भाषा जितनी अधिक समृद्ध होती है उस देश का साहित्य भी उतना ही अधिक समृद्ध व चिरायु होता है। तभी तो कहा गया है कि किसी देश को बर्बाद करने के लिए उसे उसकी भाषा व साहित्य से दूर कर देना ही पर्याप्त है। ऐसा करने से वह देश पंगु होकर स्वयं ही लड़खड़ाकर गिर पड़ेगा। विदेशियों ने भी हमारे साथ यही किया। उन्होंने हमें अपनी भाषा और साहित्य से दूर कर दिया। जिसका असर यह है कि आज हम खान-पान से लेकर पहनावे व भाषा में भी अंग्रेजी के गुलाम बन चुके है। यह एक कटु सत्य है कि आज हम अपनी भाषा व साहित्य से इतने अधिक दूर हो गए है कि हमें न तो अपनी भाषा की लिपि व व्याकरण का ज्ञान है और न ही इस भाषा को समृद्ध बनाने वाले भाषाविदों व साहित्यकारों का। यह तो गनीमत है कि अखबारों में प्रकाशित लेखों के माध्यम से हमें 14 सितंबर को ‍’हिन्दी दिवस’ मनाए जाने की जानकारी मिलती है वर्ना यह दिन तो कबसे हमारा अतीत बन चुका होता।  
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’हिन्दी दिवस’ जिसे हम प्रतिवर्ष 14 सितंबर को मनाते हैं। करोड़ों भारतवर्षियों की राष्ट्रभाषा कही जाने वाली हिन्दी का सम्मान इस दिन केवल अखबारों में छपे लेखों, बैंकों में टंगी हिन्दी की तख्तियों और चुनिंदा हिन्दी की गोष्ठियों में ही नजर आता है और उसके बाद तो जैसे रद्दी की टोकरी में पड़े कूड़े की तरह हिन्दी को हम अपने ही देश में परित्यक्ता बनाकर मरने को छोड़ देते हैं। यह विडंबना है हिन्दी की, जो इसे अपने देश में उसे परित्यक्ता बनकर जीना पड़ रहा है, वहीं चीन और अमेरिका के लोग इसे सिर माथे बैठाकर हिन्दी सीखने व अपनाने की पहल कर रहे हैं।
     नौनिहालों को किसी भी देश का भविष्य कहा जाता है पर हमारे देश का भविष्य तो अब इंटरनेशनल व कान्वेंट स्कूलों में फ्रेंच, रूसी तथा जर्मन भाषाओं की छत्र-छाया में पल बढ़ रहा है। जिस भाषा में आज देश के नौनिहाल तालिम हासिल कर रहे हैं। उस भाषा के साहित्य के प्रति उनका आकर्षण आज उनके व्यक्तित्व, बॉडी लैंग्वैज व उच्चारण में प्रतिबिंबित भी हो रहा है। निजी तो दूर सरकारी स्कूलों के बच्चों को भी आज बारहखड़ी और अनार, आम ...  पूरी तरह से याद नहीं है। अंग्रेजी में गिनती बोलने वाले, अंग्रेजी में सोचने वाले अंग्रेजी स्कूलों के बच्चों की मानसिकता कभी ‘ए, बी, सी, डी...’ से आगे निकलकर ‘क, का, कि, की ...’ तक नहीं पहुंच पाती है। यह दोष उनका नहीं बल्कि हमारी उस शिक्षण प्रणाली का है, जिसने हमें संस्कृत व हिन्दी से दूर कर हमारे संस्कारों से भी दूर कर दिया है।
     भाषा के पतन में शिक्षण प्रणाली के साथ ही सरकार भी बराबर की भागीदार है। आज आपको बिरले ही नेता संसद में हिन्दी में भाषण देते मिलेंगे। यदि कोई ऐसी पहल करता है तो उसकी वाहवाही केवल इसलिए की जाती है कि फलाँ नेता ने ‘हिन्दी’ में भाषण दिया। ऐसा करना आज शायद इसलिए भी आश्चर्य बन गया है क्योंकि भाषा के मामले में अब हम पूरी तरह से अंग्रेज बन गए है और 100 अंग्रेजों के बीच यदि एक भी हिन्दी भाषी मिल जाएं तो यह संयोग किसी विस्मय से कम नहीं होगा। हिन्दी के मामले में जो स्थिति विधायिका व कार्यपालिका की है कमोवेश उससे कही गुना ज्यादा बुरी स्थिति न्यायपालिका में हिन्दी की है। देश के सभी उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय में कामकाज की भाषा अंग्रेजी ही है। मुझे यह कहने में बड़ा दुख होता है कि आज हमने अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी को इतना अधिक पराया कर दिया है कि हिन्दी भाषी राष्ट्र में अब ‘हिन्दी दिवस’ पर हमें हिन्दी बोलने वालों का सम्मान करना पड़ रहा है। इससे पहले भाषा की दुर्गति हमारे नैतिक व सांस्कृतिक पतन का नव तांडव रचे। सम्हल जाइएं और हिन्दी को उसका खोया सम्मान दिलाइएं। याद रखिएं जब तक भाषा है, तब तक भाव है, संवेदनाएँ हैं और हमारी पहचान कायम है। जिस दिन भाषा ही नहीं रहेगी तो उस दिन हमारी स्थिति भी पशुवत हो जाएगी और हम अपने ही देश में अपनी पहचान को तरस जाएंगे। याद रखिएं हिन्दी शर्म की नहीं बल्कि शान की भाषा है। आप भी आज से हिन्दी अपनाइएं और देश के विकास में अपनी सहभागिता निभाइएं।  
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 नोट : कृपया इस ब्लॉग से किसी भी सामग्री का प्रयोग करने पर सूचनार्थ मेल भेजें व साभार अवश्य देंवे। मेरे इस लेख का प्रकाशन 14 सितंबर 2014, रविवार के दैनिक 'दबंग दुनिया' अखबार के हिन्दी दिवस विशेषांक पृष्ट पर व 'गुडगांव टूडे' अखबार के संपादकीय पृष्ठ पर हुआ है। इसी के साथ ही 'वृद्धग्राम' ब्लॉग के 14 सितंबर 2014, रविवार के अंक में मेरे इस लेख को स्थान मिला है। 


Tuesday, September 9, 2014

गणेश के पाँच वचन है खास

-          गायत्री शर्मा
गणेश विर्सजन, भावुकता का वह क्षण। जब हर भक्त अपने आराध्य शुभकर्ता, विघ्नहर्ता प्रभु श्री गणेश को भावभिनी बिदाई देता है व साथ ही उनसे वादा लेता है शरीर से विसर्जित होने पर भी मन से सदा अपने भक्तों से जुड़े रहने का। विर्सजन के विरोधाभासी रूप में यह न्यौता होता है गणेश को इस वर्ष प्रतीकात्मक विदाई देकर अगले वर्ष फिर नई खुशखबरी के साथ अपने घर-परिवार में विराजित करने का। गणेश को दिए वादे के साथ ही यह स्वयं से वादा होता है अपने परिवार तथा देश में प्यार व सद्भाव को कायम रखने में भागीदारी निभाने का। कल अनंत चर्तुदर्शी पर हमारे प्रतीकात्मक गणेश तो विसर्जित हो गए पर हमारी आस्था के गणेश अब भी हमारी भावनाओं में जीवित है। आस्था के प्रदर्शन के अंतिम पड़ाव पर जलमग्न होते हुए गणेश पानी की बूँदों की गुड़गुड़ाहट के साथ हमें अपने पाँच वचनों के संग छोड़े जा रहे हैं। ये पाँच वचन है – जल प्रदूषण से तौबा करने का, पीओपी की प्रतिमाओं व पॉलीथिन से परहेज करने का, सांप्रदायिक सौहार्द बनाएं रखने का, आपदा प्रबंधन हे‍तु अंशदान करने का व भ्रष्टाचार से गुरेज करने का। अब फैसला हमारा है कि हम श्रीगणेश के इन पाँच वचनों पर अमल कर अपने देश की रक्षा के संकल्प को कितनी शिद्दत से पूरा करते है?
      सड़कों पर हो-हल्ला या शोर मचाने से कभी भक्ति का प्रदर्शन नहीं होता। सच्ची भक्ति व आस्था का प्रदर्शन तो अपने आराध्य के सिद्धांतों पर अमल करने से होता है। श्री गणेश बुद्धि के देवता है, जो हमें अपनी बुद्धि, कौशल व प्रतिभा का सही अवसर पर प्रयोग करने की सीख देते हैं। कल गणेशोत्सव के समापन के साथ हमारी आस्था की अविरत धारा के प्रवाह में कुछ क्षण का विराम आ गया है। यह विराम है बुद्धि के देवता गणेश को विसर्जित कर कुछ दिनों बाद शक्ति की प्रतीक माता को अपने घर लाने का। आपने गौर किया होगा कल जब गणेश हमसे विदा ले रहे थे। उस समय क्या क्षणिक भी आपको ऐसा नहीं लगा कि झाँकियों की चकाचौंध में शान से सज-धजकर जा रहे गणेश का मन कुछ उदास था? वह गणेश मन ही मन पर्यावरण प्रदूषण का जिम्मेदार स्वयं को मान रहे थे। कहीं ऐसा न हो जैसे कल गणेश दुखी मन से हमसे विदा लेकर गए वैसे ही माता भी दुख के अश्रुओं के साथ हमसे विदा ले?
याद कीजिए, अब तक हम गणेश के कानों में फुसफुसाकर अपनी मिन्नत कहते आए हैं पर कल गणेश भी जाते-जाते हमारे कानों में कुछ कहकर गए है। क्या हम गणेश की उस मिन्नत को पूरा नहीं करेंगे, जिसमें एक इशारा छुपा था गणेश की तरह माता को भी पर्यावरण प्रदूषण का जिम्मेदार बनने से रोकने का तथा ईको फ्रेंडली प्रतीकात्मक प्रतिमाओं के प्रयोग का। यदि आप अपने आराध्य गणेश के पाँच वचनों पर अमल करेंगे तो गणेश की तरह उनकी माता भी खुशी-खुशी आपके घर-आँगन में पधारेगी।
     हिंदुओं के जीवन में भगवान को आमंत्रित करने व विसर्जित करने का यह सिलसिला लगातार चलता रहता है। कभी लीलाधारी कृष्ण हमारे घर पधारते हैं तो कभी विघ्नहर्ता गणेश, कभी ममतामयी माता भक्तों को अपना स्नेह देने आती है तो कभी समृद्धि के शुभ कदमों के साथ माता लक्ष्मी हमारे घरों में पधारती है। देवताओं के आने-जाने के इस बदस्तूर सिलसिले में बस एक चीज ही हमारे पास सदैव रहती है और वह है आस्था और श्रृद्धा, जिसके जीवित रहने तक इस संसार में धर्म का अस्तित्व कायम है।
     आपकी जानकारी के लिए लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने देश में गणेश स्थापना की शुरूआत ही एक शसक्त भारत के स्वप्न के साथ की थी। जिसमें समाज के सभी वर्गों के लोग एकजुट होकर धार्मिक आयोजनों में भाग ले व सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल कायम करें। आज जरूरत है तिलक के उस स्वप्न को साकार बनाने की।
  आज हमारा देश कामयाबी के लक्ष्य से कुछ ही दूरी पर है। भारत की कामयाबी के इस लक्ष्य को पूरा होने में बस जरूरत है तो सामाजिक संकीर्णताओं की दीवारों को लाँघने की। अपने भीतर छुपी प्रतिभा और शक्ति को पहचानकर देश की कामयाबी में अपना बूँदभर योगदान देने की। फिर देखिए विघ्नहर्ता श्री गणेश की कृपा से कैसे कामयाबी अपने शुभ कदमों से हमारे देश में पधारेगी और सदा के लिए यही ठहर जाएगी। साप्रंदायिक सद्माव की झाँकियों में जब हमारी आस्था के गणेश विराजित होंगे तो घोटालों के अवरोध इस झाँकी के हौंसलों के पहियों के नीचे बौने होकर खत्म हो जाएँगे और यह रथ सदैव कामयाबी की ओर अग्रसर होगा। यदि आप सच्चे गणेश भक्त है तो अपनी भक्ति का परिचय तन-मन-धन से दीजिए और तन से कर्मठ बनिए, मन से ईमानदार बनिए तथा धन से देश में मची जल त्रासदी के लिए अपना आर्थिक सहयोग दीजिए। जब देश में हम सभी स्वस्थ, खुश और संपन्न होंगे तो निश्चित तौर पर ‘बप्पा मोरिया’ के रूप में गणेश की हर जय-जयकार हमें सही माइने में आत्मिक सुकून व राहत की खिलखिलाहट का अहसास कराएगी।  


Tuesday, September 2, 2014

'कृष्ण' को संचालित करने वाली शक्ति है - 'राधा'

- गायत्री शर्मा 
राधा और कृष्ण प्रेम मार्ग के पुल के वह दो आधार है, जिनके बगैर सृष्टि में प्रेम की कल्पना ही अधूरी है। लीलाधारी कृष्ण समूची सृष्टि को संचालित करते हैं और कृष्ण को, जो शक्ति संचालित करती है, वह परम शक्ति है – राधा रानी। राधा, प्रेम में पवित्रता की वह कस्तूरी है, जिसकी सुंगध से वशीभूत होकर कृष्ण व्याकुल हो उठते है और इसी व्याकुलता में जब कृष्ण अपने हृदय को स्पर्श करते हैं। तब उनके अधरों के साथ हृदय से भी राधे-राधे नाम ही स्पंदित होता है। वह ‘राधा’ नाम की कस्तूरी कृष्ण की आत्मा में महककर कृष्ण को ‘राधामय’ और राधा को ‘कृष्णमय’ बनाती है। कहने को ‘राधा’, कृष्ण’ एक-दूसरे से अलग है पर प्रेम के चक्षुओं से देखों तो कृष्ण ही ‘राधा’ है और राधा ही ‘कृष्ण’ है। 
       यह राधा के प्रेम की ऊष्णता ही है, जो चंचल, ठगोरे, बावरे नंद के लाला को ‘राधा’ से सदैव जोड़े रखती है और यह दुनिया प्रेम की इस मोहिनी मूरत को ‘राधा-कृष्ण’ नाम से पूजता है। कृष्ण पर आकर्षण व नियंत्रण सब राधा का ही है। राधा ऐसी ‘अलबेली सरकार’ है, जो हमारे सरकार यानि कि ठाकुर जी को भी मोहित व नियंत्रित करने की शक्ति रखती है। सरल शब्दों में कहा जाएं तो जगत में शाश्वत प्रेम का आधार स्तंभ ही राधा रानी है। राधा ने ही कृष्ण को अपने आकर्षण में बाँधकर कृष्ण के प्रेम में पूर्णता का पूर्णविराम लगाया। 

वृषभानु की लली राधिका रानी को उनके जन्मदिवस ‘राधाअष्टमी’ की हार्दिक शुभकामनाए। जय-जय श्री राधे ....   

राधा तू बडभागिनी, कौन पुण्य तुम कीन। 
तीन लोक तारन तरन, सो तोरे आधीन।।

Monday, September 1, 2014

नईदुनिया की पत्रकार सोनाली राठौर नहीं रही ...

‍- गायत्री शर्मा 
आज सोनाली दीदी के जाते ही मेरी स्मृति में कैद उनकी यादों की पोटली अचानक खुल गई और उसमें से निकली लज़ीज लिट्टी-चौखे की महक, मंडी भाव की खबरें और उससे भी कहीं ज्यादा प्रेम विवाह से उनके जीवन में आए उस फरिश्ते के किस्से थे, जिससे उनकी जिंदगी के गुलशन में खुशियों की बहार थी।
         कहते हैं हमारी जिंदगी की डोर ऊपर हाथों में होती है। वह सर्वशक्तिमान परमात्मा ही है, जो हमें धन-दौलत, ऐश-आराम, कामयाबी आदि दुनिया के सब सुख देता है। हमें अपने कर्म से किस्मत बदलने का मौका और हौंसला भी देता है पर एक महत्वपूर्ण चीज, जो वह परमात्मा हमें नहीं देता है। वह होता है – मौत पर नियंत्रण। हम लाख कोशिशें कर ले पर जब उस ऊपर वाले का बुलावा आता है तब हमें उसके आदेश पर जाना ही होता है। मृत्यु के देवता का कुछ ऐसा ही आदेश मेरी पत्रकार साथी को हुआ। पिछले दिनों इंदौर के सीएचएल अपोलो हॉस्पिटल में वेटिंलेटर पर लेटे-लेटे साँसों की टूटती-जुड़ती डोर के बीच मौत के घनघोर अँधेरे में जीवन की उम्मीदों के स्वप्न संजोती सोनाली आज हमारे बीच नहीं रही। 1 सितम्बर 2014, सोमवार की सुबह ‘नईदुनिया’ की यह वरिष्ठ पत्रकार जिंदगी और मौत की जंग में जिंदगी से जंग हार गई और सदा के लिए मौत के आगोश में जाकर सो गई। जाते-जाते अपने पीछे छोड़ गई वह उस खिलखिलाहट को, जिससे दफ्तर में उनकी मौजूदगी पुख्ता होती थी। मैं बात कर रही हूँ उस सोनाली राठौर की, जिसकी कर्मठता व दंबग व्यक्तित्व ही उनकी पहचान था। मुझे भी नईदुनिया में कुछ समय तक सोनाली दीदी के साथ काम करने का मौका मिला था। यही वह वक्त था, जब मैंने तन से चुस्त-दुरूस्त, काम के मामले में सबके छक्के छुड़ाने वाली और हर बात पर हाजिर जवाब देने वाली इस महिला पत्रकार को बड़े करीब से जाना था। हाँलाकि उनके साथ बिताया वह समय मेरे लिए कुछ माह का अल्प समय था पर उस समय की यादें आज भी बहुत मीठी है। पत्रकारिता के नए-पुराने सभी साथियों की सहायता के लिए सदैव तत्पर, काम के तनाव को मुस्कुराहट की गूँज से हटाने वाली सोनाली दीदी जितना अधिक बोलती थी। उससे कहीं अधिक उनका काम बोलता था।
            हँसमुख व मिलनसार सोनाली दीदी की अक्समात मृत्यु की खबर पर आज भी मुझे यकीन नहीं हो रहा है क्योंकि उनको याद करते ही मेरी आँखों के सामने उस दबंग लड़की की छवि आती है, जिसके हिस्से में आम लड़कियों सी शरमाहट व सकुचाहट नहीं थी। अपने से पंगा लेने वालों की बोलती बंद करना व बेहतर काम से अपने प्रतिद्वंदियों का मुँह बंद करना वह बखूबी जानती थी। काम के प्रति बेहद ईमानदार सोनाली दीदी पत्रकारिता में बेदाग महिला व्यक्तित्व का उदाहरण थी। भले ही आज वह हमसे बहुत दूर चली गई है पर उनकी यादें सदैव हमारी स्मृति में उन्हें जीवित रखेगी।

मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि वह हमारी इस साथी को अपने चरण कमलों में स्थान दें और उनके परिवार को इस दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। अश्रुपूरित श्रृंद्धांजलि के साथ .... ॐ शांति ...

‘संत’ और ‘समाज’ मिलकर करें ‘समाज सुधार’

- गायत्री शर्मा 
आस्था की चिकनी राह पर हमारे धर्म की कमजोर गाड़ी इतनी बार लुढ़की कि आज हमने ‘संत’ की जगह ‘साँई’ को ही मंदिरों से बाहर का रास्ता दिखा दिया। साँई के नाम पर सनातन संत की यह जंग अब ‘धर्म-संसद’ के वृहद रूप में मनमाने फतवे जारी करने का मंच बन चुकी है। जिसमें धर्म के नाम पर हमारी आस्था का मखौल उड़ाकर धर्म को जातिगत राजनीति का अखाड़ा बनाया जा रहा है। ऐसे में आप ही बताइएँ कि आखिर यह कैसा धर्म और कैसी ‘धर्म-संसद’ है, जिसमें धार्मिक सहिष्णुता तो गौण हो गई है और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का भाव सर्वोपरि? बार-बार साँई प्रतिमा से अपना सिर फोड़ने वाले हिंदुओं के धर्मगुरू को आखिरकार अचानक ऐसी क्या सनक सवार हुई कि वे खिसियाई बिल्ली की तरह ‘साँई हटाओं, साँई हटाओं’ की रट लगाए बैठे है?  
         
‘संत’, व ‘समाज’ का जुड़ाव बड़ा गहरा है। जब ‘समाज’ के साथ कोई ‘संत’ जुड़ जाता है तब उस संत से हमारी समाज कल्याण की अपेक्षा करना लाजिमी हो जाता है। व्यवहारिक तौर पर ‘संत’ से अभिप्राय धार्मिक प्रवचन करने वाले व्यक्ति से कहीं अधिक समाज को नव विचार व नव दिशा देने वाले व्यक्ति से है। सही माइनों में संत की सार्थकता ही समाज सुधार में निहित है। हमारी ‘संत’ की इस परिपाटी पर शिर्डी के ‘साँई’ बखूबी खरे उतरते हैं, जिनकी कार्यशैली के साथ ही उनकी जीवन दृष्टि भी अनुकरणीय है। वह साँई ही थे, जिसने धार्मिक प्रवचनों की दुकाने खोलने की बजाय उन प्रवचनों के सार को अपने जीवन में आत्मसात करने के साथ ही समाज को भी उस पर अमल करना सिखाया। साँई ने अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव, दहेज प्रथा जैसी कई कुरीतियों पर वार कर समाज को एकता के सूत्र में बाँधने की कोशिश की। उन्होंने जहाँ आम आदमी के पीड़ा को अपने शरीर में महसूस किया, वहीं उन्होंने मूक पशुओं के प्रति भी दयाभाव व मानवता की अनूठी मिसाल कायम की। भिक्षा माँगकर अपना पेट भरने वाले साँई ने कभी भगवान के रूप में पूजे जाने की चाह नहीं की। उनके लिए तो भक्तों की श्रृद्धा के दिए में सबूरी की बाती होना ही पर्याप्त थी। यह साँई का उत्तम जीवन-चरित्र ही था, जिसने साँई के जाने के बाद उसे फकीर से भगवान बनाकर मंदिरों में विराजित कर दिया और अपने सराहनीय कार्यों से परोपकार में अपना जीवन बिताने वाला वह साँई आज हमारी आस्था के मंदिरों का सर्वोच्च संत बन गया।
   ‘साँई’ बनाम ‘संत’ के रूप में आज ‘साँई’ को छूछाछूत व धर्म-मज़हब के जिस कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। साँई ने तो उसके नाम पर कभी जंग ही नहीं की थी। साँई को किसी धर्म-संसद ने ‘संत’ या ‘भगवान’ नहीं बनाया है, उसे तो हमने ‘भगवान’ बनाया है क्योंकि साँई का जीवन चरित्र दुनिया के लिए सांप्रदायिक सद्भाव की एक ऐसी मिसाल है, जिससे हर संत व धर्मगुरूओं को सीख लेना चाहिए। मुझे बड़े दु:ख के साथ कहना पड़ रहा है कि आज हमारे संतों के लिए ‘धर्मगुरू’ की पदवी समाज सुधार की जिम्मेदारी से कहीं अधिक ‘तू-तू, मैं-मैं’ की गंदी राजनीति करने का लाइसेंस बन गई है।        धर्म, आध्यात्म व समाज सुधार के भाव को त्यजकर हमारे धर्मगुरू अब लोगों की धार्मिक आस्था के मामलों में के साथ ही राजनीति में भी दखल देने लगे हैं। धार्मिक कट्टरता के प्रदर्शन के लिए धर्म की दुकानें आज ‘धर्म-संसद’ के एयरकंडीशनर पांडालों के रूप में सज रही है और उसमें बैठा व्यक्ति पद के मद में मनमानें फतवें जारी कर रहा है। केवल तथाकथित धर्म गुरू ही नहीं बल्कि धर्म व आध्यात्म के नाम पर हमारी आस्था से खिलवाड़ करने वाले हठी, दागी और स्वार्थी संतों के फेहरिस्त बड़ी लंबी है।       
     अहमदाबाद के संत से लेकर समझौता ब्लॉस्ट के आरोपी संत तक कई संतों का जिस्मफरोशी, हत्या, अपहरण, भ्रष्टाचार, लूट जैसे अपराधों में लिप्तता का सिद्ध होना आज समाज में संतों की भूमिका व ‘संत’ की पदवी पर सवालिया निशान लगा रहा है। ऐसे माहौल में यदि कोई संत फिल्मी कहानी में ट्विस्ट की तरह अचानक प्रकट होकर आपकी आस्था को ठोकर मार दें तो मेरी नजर में यह उस संत के अपनी जिम्मेदारी से दिग्भ्रमित होने का सूचक है। ‘धर्म-संसद’ की दुकान में अर्नगल बहस करने वाले संत की बार-बार साँई के नाम पर फिसलती जिव्हा अब उनकी बढ़ती उम्र का तकाज़ा व मानसिकता में विकृति की ओर ईशारा कर रही है। बेहतर होगा कि ऐसे संत को समाज के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी को समझते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए। जिससे कि आने वाले समय में ‘धर्म-संसद’ में धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा देने की पहल के शब्द गूँजे न कि मंदिर-मस्जिद व हिंदू-मुस्लिम के नाम पर कटुता की कड़वाहट।
       आपको क्या लगता है कि ‘धर्म-संसद’ के मनमानें फतवों से क्या साँई के प्रति भक्तों की आस्था कम हो जाएगी या साँई प्रतिमाएँ मंदिरों से विस्थापित कर दी जाएँगी? जी नहीं, यह तो हमारी आस्था के साँई है, जो सदियों तक हमारे दिलों में बसे रहेंगे। यह तो भक्तों की आस्था व साँई का उत्तम जीवन चरित्र ही है, जिससे प्रभावित होकर भक्त साँई को ‘राम’ और ‘रहीम’ समरूप मानकर पूजते आएँ है। सर्वधम सद्भाव के प्रतीक साँई को मंदिरों से हटाने वाले तथाकथित लोग हमारी आत्मा में बसे आस्था के साँई को आखिर कैसे हटा पाएँगे? मेरी आप सभी से अपील है कि आप धर्म, मंदिर और मस्जिद के नाम पर हो रही जंग से तौबा कर अहिंसा का मार्ग अपनाइए। यदि आप कमजोर पड़ गए तो आपके धर्म व आस्था की आयु भी अल्प हो जाएगी। आपको धर्म के नाम पर उकसाने वालों का प्रमुख लक्ष्य ही देश की एकता छिन्न-भिन्न कर लोगों को जाति व धर्म के नाम पर बाँटना है। याद रखिएँ किसी भी धर्म व आस्था के नाम पर हिंसा भड़काने का अधिकार किसी भी ‘धर्म-संसद’ को नहीं है फिर चाहे वह हिंदुओं की धर्म संसद हो या इस्लाम के फतवे।

Sunday, August 31, 2014

‘लव’ के नाम पर ‘जिहाद’ क्यों?

-          गायत्री शर्मा  
‘लव जिहाद’ यानि कि ‘प्रेम युद्ध’, यह शब्द अब उत्तरप्रदेश के सियासी गलियारों से निकलकर दिल्ली की ज़ामा मस्जि़द में गूँज रहा है। उत्तरप्रदेश में चुनाव के मद्देनजर भगवाधारी जहाँ इसे प्रमुख चुनावी मुद्दा बना रहे हैं वहीं इस्लाम धर्मावलंबी इसे इस्लाम की छवि को धूमिल करने के लिए काल्पनिक रूप से गढ़े मुद्दे का नाम दे रहे हैं। इस मुद्दे में कितनी हकीकत है। यह तो हमें वक्त और तथ्य ही बताएँगे लेकिन यहाँ सवाल यह उठता है कि चुनावी माहौल में अचानक इस मुद्दे को और वह भी मुस्लिम बाहुल्य राज्य उत्तरप्रदेश में उठाया जाना कितना लाजि़मी है?
     ‘लव जिहाद’ का सीधा अर्थ दुर्भावनावश किया गया प्रेम और विवाह है। हकीकत में हम इसे प्रेम भी नहीं कह सकते हैं क्योंकि प्रेम कभी भी इच्छा के विरूद्ध धर्मांतरण के नाप़ाक इरादे से नहीं किया जाता है। हाँ, यह ज़रूर हो सकता है कि प्रेम समाज के कड़े कायदों व कानून के शिंकजे से बचने के लिए स्वेच्छा से इस्लाम कबूल कर निकाह के रूप में विवाह करने की गली निकाल सकता है परंतु धोखाधड़ी के लिए जबरन धर्मांतरण कराना इसका भी मकसद नहीं होता है। यकीन मानिएँ, जहाँ प्रेम है, वहाँ जाति, धर्म, गौत्र आदि के बँधन गौण है क्योंकि ये बँधन तो तथाकथित समाज ने बनाएँ है और प्रेम कभी बँधनों में बँधकर नहीं रह सकता है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि शिद्दत से किए गए सच्चे प्रेम यानि कि ‘लव’ में कभी भी ‘जिहाद’ के नाप़ाक मंसूबे नहीं होते हैं। इसलिए यह बात तो स्पष्ट है कि ‘लव’, ‘जिहाद’ से अलहदा है। जहाँ ‘जिहाद’ है वहाँ ‘लव’ हो ही नहीं सकता। यहीं वज़ह है कि प्रेमियों से परे कट्टरपंथी जेहादियों के लिए ‘लव जिहाद’ शब्द का प्रयोग किया जाता है।
       किसी भी धर्म को दिल से व आपसी रजामंदी से अपनाया जाता है न कि जर्बदस्ती। खासकर प्रेम और धर्मांतरण के मामले में व्यक्ति की स्वेच्छा प्रमुख शर्त होती है लेकिन ‘लव जिहाद’ का कंसेप्ट ही किसी की इच्छा के विरूद्ध प्यार व शादी के नाम पर उसका गैर इस्लाम से इस्लाम में धर्मांतरण कराना है। प्यार में विवाह के नाम पर किसी के साथ धोखाधड़ी कर उसके जीवन को बर्बाद करने की इज़ाज़त हमारे यहाँ न तो कोई धर्म देता है और न ही कोई कानून, फिर चाहे वह इस्लाम धर्म हो या हिंदू धर्म। यदि हकीकत में किसी धर्म विशेष के नाम पर ऐसा किया जा रहा है तो वह निंदनीय है। ऐसा कृत्य करने व कराने वालों के प्रति कानून को कड़ा रूख अपनाना चाहिए, जिससे इस्लाम की छवि पर लगाया जाने वाला यह बदनुमा दाग धुल सके।
       धन के बदले धर्म परिवर्तन, यह सुनकर आपको ऐसा नहीं लगता कि आज हम फिर से गुलाम होने जा रहे हैं और वह भी अपने ही देश में अपने ही लोगों के द्वारा। आज ‘लव जिहाद’ के नाम पर इस्लाम धर्मांतरण की बात की जा रही है और दक्षिण में कुछ इसी तरह की सुगबुगाहट ईसाई धर्मांतरण के मामले में भी सुनने को मिली है। क्या आज हमारे लिए धर्म का अर्थ महज लोगों की भीड़ इकट्ठा कर उन पर अपने धर्म विशेष की छाप लगाना मात्र ही रह गया है या ऐसा करने वाले तथाकथित कट्टरपंथी ‘लव जिहाद’ के नाम पर भारत को बाँटने की और हमारी एकता को पाटने की नाप़ाक कोशिश कर रहे हैं? जरा अपने दीमाग पर जोर डालकर सोचिएँ कि किसी को धर्मांतरण के लिए प्रेरित करने वालों को आखिर ऐसा क्या मिल रहा है, जिसके बदले वह यह कार्य कर रहे हैं, क्या मोटी रकम या धर्मांतरण से मिलने वाली मानसिक शांति या फिर धर्म के नाम पर भारत को बाँटने की साजिश से मिलने वाला सुख? क्या पश्चिमी देश भारत में सांप्रदायिकता के गढ़ को ध्वस्त करने के लिए ऐसा कर रहे है या हमारे ही देश के लोग ‘फूट डालो, भीड़ बढ़ाओ’ की नीति के तहत ऐसा कर रहे हैं? ऐसे अनगिनत सवाल आज हमारे जेहन में गूँज रहे हैं। यकीन मानिएँ कोई भी व्यक्ति या धर्म आप पर तभी हावी हो सकता है, जब आपका अपने धर्म के प्रति विश्वास कमजोर हो या वह दूसरा धर्म आपके धर्म से अधिक ताकतवर हो। आखिर अपनी इच्छा के विरूद्ध लालच में आकर धर्मांतरण करने लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि हम लोग तो ऐसे लोकतांत्रिक देश के वासी है, जहाँ हमें धर्मावलंबन व धर्म परिवर्तन की पूर्णत: स्वतंत्रता है ऐसे में किसी धर्म विशेष के नाम पर कोई हमें क्यों प्रलोभित कर रहा है? इस ‘क्यों’ का जवाब जब आपको मिल जाएगा। तब आपको ऐसा करने वालों के नापाक मंसूबों का भी ज्ञान हो जाएगा।
          मेरा आपसे यह प्रश्न है कि क्या वाकई में आपको लगता है कि मानसिक व शारीरिक रूप से परिपक्व वयस्क युवा ‘लव जिहाद’ में फँसने की भूल कर सकते हैं या फिर कुछ पुराने मामलों का हवाला देकर इस मुद्दे को न केवल चुनावी मुद्दा बनाने की बल्कि ‘लव जिहाद’ के नाम पर सांप्रदायिक सद्भाव में खलल डालने की कोशिश की जा रही है? हमारा देश का अमन-चैन का देश है। ऐसे शांतिप्रिय देश में ‘लव जिहाद’ के नाम पर लोगों में सांप्रदायिकता फैलाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि सर्वधर्म सद्भाव के प्रतीक इस देश में ‘लव जिहाद’ के नाम पर इस्लाम की छवि पर प्रश्नचिन्ह लगाकर आरोप-प्रत्यारोप करने की बजाय हम सभी को मिलकर इस विषय पर खुली बहस करेंगे क्योंकि यह मामला कहीं न कहीं देश के भविष्य कहे जाने वाले युवाओं से जुड़ा है। यदि हकीकत में देश में इस तरह के कुछ मामले सामने आए है तो हिंदू-मुस्लिम दोनों को मिलकर उस मामले की पारदर्शी जाँच करानी चाहिएँ न कि धर्म की कट्टरता के नाम पर लाठियाँ लेकर सड़कों पर हो-हल्ला व प्रदर्शन करना चाहिए। आशा है आप और हम मिलकर इस मुद्दे पर अपनी शांतिप्रियता का परिचय देकर विवाद करने की बजाय सत्य के रहस्योद्घाटन की ओर अपना अगला कदम बढ़ाएँगे। जिससे कि इस मुद्दे पर दलगत राजनीति बंद होगी और असली हकीकत हमारे सामने आएगी।

चित्र हेतु साभार - ओपन दि मैग्जीन डॉट कॉम 

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