Wednesday, October 27, 2010

शराबियों के लिए रूकी राजस्थान परिवहन निगम की बस

लगभग हर शनिवार की तरह पिछले शनिवार यानि दिनांक 23 अक्टूबर को मेरा फिर अपने गृहनगर रतलाम को जाना हुआ। हर बार की तरह इस बार भी दफ्तर में काम की व्यस्तताओं के चलते मेरी 4 बजे वाली 'इंदौर-जोधपुर' बस छूट गई। उसके बाद अपना काम खत्म करके भागते-दौड़ते अंतत: मैं 6:30 से 6:45 के बीच गंगवाल बस स्टैंड पहुँची। जल्दी से मैंने पार्किंग में गाड़ी रखी। इतनी देर में राजस्थान परिवहन की रतलाम जाने वाली दूसरी बस ‍भी रवाना हो चुकी थी। अब मेरे पास विकल्प के तौर पर राजस्थान परिवहन निगम की 'इंदौर-नाथद्वारा-फालना'और 'इंदौर-उदयपुर' बस ही थी। ये दोनों ही बस रतलाम होकर ही राजस्थान बार्डर में प्रवेश करती है इसलिए इंदौर से चलने वाली राजस्थान परिवहन निगम की लगभग हर बस मेरे शहर रतलाम जाती है।    

मैं भी जल्दी से जल्दी रतलाम पहुँचने के चक्कर में रतलाम का टिकिट लेकर 'इंदौर-नाथद्वारा-फालना' की ओर जाने वाली बस क्रमांक RJ 22 PA 0932 बस में बैठ गई। बस में मुझे पीछे की 23 नंबर की सीट मिली थी पर आगे बैठने की जिद के चलते मैं हमेशा की तरह कंडक्टर की सीट पर बैठ ही गई। आमतौर पर राजस्थान परिवहन निगम की बसों के कंडक्टर महिलाओं को पीछे की सीट पर बैठाने के बगैर आगे की सीटों पर या अपनी सीट पर जगह दे ही देते हैं। परंतु उस बस के कंडक्टर को मेरा उनकी सीट पर बैठना यह नागवार गुजरा और उसने तुरंत मुझे कहा कि मैडम आप अपनी सीट पर बैठिए। उस वक्त बस में बैठी एकमात्र महिला सवारी होने के कारण व रात का सफर होने के कारण मैंने कंडक्टर से मेरी सीट किसी ओर से एक्सचेंज करने की जिद की और अंतत: कंडक्टर ने मेरी समस्या को समझकर मुझे तीन सवारियों वाली सीट पर दो पुरुषों के बीच में फँसाकर और कसाकर रतलाम तक बैठने की जगह दे दी।

बड़ी ही असहजता से अपने बदन को सिकोड़ते हुए मैं उन दो पुरुषों के बीच में बैठ गई। कुछ देर बाद मेरी सीट पर खिड़की की ओर बैठे युवक से जब मैंने उसकी जगह पर मुझे बैठने की इजाजत माँगी तो उसने यह कहकर कन्नी काट ली कि मैडम, बस में मेरा तो जी बड़ा घबराता है इसलिए मैं ही खिड़की की ओर बैठूँगा। उनका जवाब सुनकर मैंने भी मन ही मन सोचा - 'गायत्री, बेटा यह बचपन नहीं है। जब माँ-पापा से लड़-झगड़कर तू बस या ट्रेन में खिड़की की ओर बैठ जाती थी। अब तू बड़ी और गंभीर हो चुकी है और आजकल के लोग तो महिला को खड़ा देखकर भी आराम से सीट पर बैठे रहते हैं। ऐसे में मुझे कौन भला मानुष खिड़की पर बैठने देगा?'यह सब सोचकर तो मैं पीछे की बजाय बस में आगे की सीट पर उन दो पुरुषों के बीच बैठना ही अपना सौभाग्य मानने लगी। 

बस में बैठते से ही कंडक्टर सीट के ठीक पीछे की सीट पर बैठे दो पुरुष बार-बार कंडक्टर से शराब खरीदने के लिए गाड़ी रोकने को कह रहे थे। कंडक्टर भी बस की सवारियों व समय की परवाह किए बगैर जगह-जगह पर शराब की दुकान की तलाश में गाड़ी रूकवा रहा था। कई बार बस रूकी और कई बार उस व्यक्ति ने उतरकर शराब की दुकान तलाशी। यहाँ तक कि बदनावर गाँव में भीतर बस स्टैंड तक न जाने वाली राजस्थान परिवहन निगम की बस उस दिन बस स्टैंड तक गई। उस दिन सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो रहा था। तभी तो मेरा दिमाग बस में बैठे-बैठे कुछ-कुछ ठनक रहा था। अंतत: पहले से शराब में धुत उस व्यक्ति को सफारी सूट पहने कंडक्टर ने हम सभी सवारियों की परवाह किए बगैर बदनावर में शराब की बोतल खरीदने और पीने का मौका दिया। उस समझदार व्यक्ति ने भी जी भर के शराब पी व नशे में धुत होकर बस में बैठ गया। कंडक्टर का उन दो शराबियों को खुश रखने का कोई और भी मतलब हो सकता था।

सच कहूँ तो यह सब देखकर मुझे लगा कि आजकल कैसा जमाना आ गया है। जब बस के कंडक्टर महिला सवारियों को धुत्कारकर शराबियों को आगे बैठा रहे हैं व उन्हें दिल खोल के शराब पीकर बस में सवारियों के बीच बैठने का मौका व उपद्रव मचाने के लिए आश्रय दे रहे हैं। ऐसे में खुदानखासता कभी कोई शराबी किसी महिला के साथ बदतमीजी या बलात्कार करने का प्रयास भी करें तो उस कंडक्टर जैसे गैरजिम्मेदार व्यक्ति जरूर खुली आँखों के अँधे बन यह सब तमाशा देखते रहेंगे क्योंकि गुलामी करने की उन्हें आदत है और झूठ बोलना उनका धंधा। उस दिन मुझे ठेस इसलिए भी पहुँची क्योंकि वह राजस्थान परिवहन निगम की बस थी न कि मध्यप्रदेश या बिहार परिवहन निगम की बस।

राजस्थान परिवहन निगम की बसों में अक्सर मैं रतलाम से इंदौर के बीच यात्रा करती रहती हूँ। मैंने जहाँ तक देखा है। इन बसों के ड्राइवर व कंडक्टर दोनों ही बड़े मृदुभाषी व कर्तव्यनिष्ठ होते हैं। बस में कभी कोई सवारी सिगरेट भी पिए तो वे लोग उन्हें यह कहकर रोक देते हैं कि बस में महिला सवारी है और इन बसों में सिगरेट व शराब पीना सख्त मना है। लेकिन मैंने शनिवार की रात इंदौर से शाम 7 बजे चली व रतलाम में रात्रि लगभग 10:30 बजे पहुँची जिस बस में सफर किया था। उसका कंडक्टर बेहद ही गैरजिम्मेदार था।

मैंने यह पोस्ट किसी का बुरा-भला कहने के लिए नहीं बल्कि ईंसानियत व मानवता को कुछ ओर समय तक बचाए रखने के लिए लिखी है। हम सभी अक्सर बसों में सफर किया करते है। हमारे यहाँ तो अमूमन बस के ड्रायवर या कंडक्टर को महिलाएँ 'भैया' कहकर ही बुलाती है। सामान्य तौर पर बोले जाने वाले इस 'भैया' शब्द का अर्थ बहुत गहरा है। इस शब्द से स्वत: आरोपित कर्तव्यों के लिए न सही पर मानवता के लिए ही सही मेरे भाईयों! जरा 'स्थान की गरिमा' का खयाल रखें व सार्वजनिक स्थानों पर धुम्रपान या नशा करने से गुरेज करे। कम से कम राजस्थान परिवहन निगम की बसों में सरेआम ऐसा होना कही न कही हमें शर्मसार करता है क्योंकि ये बसे अपने कुशल ड्रायवर, मृदुभाषी कंडक्टर, तेज गति व उम्दा सेवाओं के लिए पहचानी जाती है।

यदि आज हम आमजन नहीं जागे तो कल को हममें से कोई भी किसी महिला को बस या ट्रेन में अकेले यात्रा करने की इजाजत देने से पहले सौ बार सोचेगा क्योंकि आज के माहौल को देखते हुए कल को बसों में सरेआम शराब बिकना या महिलाओं के साथ छेड़खानी होना एक आम बात हो जाएगी। इसलिए अब वक्त आ गया है ‍जागने और जगाने का।  

- गायत्री शर्मा

Monday, October 18, 2010

माँ ने देखा जलता हुआ रावण

इंदौर में दशहरे(रावण दहन) के अगले दिन 'बासी दशहरा' मिलने की परंपरा है। जिसमें 'पड़वा' की भाँति लोग एक-दूसरे के घर जाकर उन्हें सोना पत्ती (उस्तरा नामक पेड़ की पत्तियाँ) देकर दशहरे की बधाईयाँ देते हैं। चूँकि मैं रतलाम शहर से हूँ इसलिए इन इंदौरियों के कुछ त्योहारों से मैं भी थोड़ी बहुत अपरीचित हूँ। दशहरे की नहीं पर मेरे यहाँ भी माता की 'नवरात्रि' की धूम इंदौर के समान ही रहती है। यही कारण है कि यहाँ की नवरात्रि का मैंने भरपूर लुत्फ उठाया।

कल रात को ही मेरा इंदौर में रहने वाली अपनी मौसी के घर जाना हुआ। उनके घर तक पहुँचते-पहुँचते रास्ते में मेरी मुलाकात आकर्षक वेषभूषा में सजे कई रावणों से हुई। जो बड़ी ही प्रसन्नचित्त मुद्रा में पटाखों से लैस होकर दाँत और मुँह दिखाकर मुस्कुरा रहे थे। मैंने भी मन ही मन इन रावणों से यही कहा कि मुस्कुरा ले बेटा!आखिरकार कुछ देर बाद तो तुझे पटाखों से ही जलना है। तब तू रोएगा और तुझे जलाने वाले मुस्कुराएँगे।

तीन-चार जलते हुए रावणों का दीदार करने के बाद मैं पहुँची अपनी मौसी के घर। उनके घर के पड़ोस में ही गरबा पांडाल था। जहाँ दशहरे के दिन गरबों के पुरस्कार वितरण का कार्यक्रम चल रहा था। बालिकाओं को पुरस्कार वितरित करने के बाद वहाँ छोटी से लेकर बड़ी लड़कियों के अलग-ग्रुप में गरबे हुए। इन सभी के गरबे समाप्त होने के बाद कुछ महिलाओं के साथ मैंने भी राजस्थान के लोकनृत्य घूमर के गीतों पर नई-नई स्टेप्स के साथ गुजराती गरबे किए। रात्रि की करीब एक बजे तक हमने लगातार गरबे किए।

अलसुबह कॉलोनी में देवी माँ की प्रतिमा विसर्जन हेतु ले जाने के लिए लोडिंग रिक्शा मँगाया गया। ‍सुबह-सुबह बिस्तर से उठकर मुँह धोकर मैं भी वहाँ पहुँची और मैंने भी माँ शेरावाली के जयकारे लगाने के साथ देवी प्रतिमा पर मुट्ठी भर कुमकुम उड़ाकर माँ को बिदा किया। इतने सालों में आज पहली बार न जाने क्यों माँ को बिदा करते समय मुझे बहुत रोना आ रहा था और मैं जैसे-तैसे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण कर रही थी। उस वक्त मुझे लग रहा था मानों मेरा कोई अपना मुझसे बिछड़ रहा है। जिसे चाहकर भी मैं रोक नहीं पा रही हूँ। कुछ इस तरह माँ अपने मायके से ससुराल चली गई पर अपनी मीठी यादे मुझे दे गई।

आज के दिन कई स्थानों पर मैंने 'नवरा‍त्रि' हेतु माँ की विराजित प्रतिमा के दर्शन किए। रास्ते में कुछ प्रतिमाएँ तो ढोल-ढ़माकों के साथ विसर्जन हेतु ले जाई जा रही थी। वहीं कुछ गरबा-पांडालों में माँ थोड़े दिन और रूककर शरद पूर्णिमा के आने का इंतजार कर रही है क्योंकि उस दिन उनकी अपने माइके से बिदाई होनी है। मुझे तो यह सब देखकर ऐसा लगा जैसे कि कुछ स्थानों पर दशमी के दिन विसर्जन हेतु जाने से ना-नुकूर करने के पीछे माँ का मकसद संभवत: रावण दहन देखकर ही विसर्जन हेतु जाना होगा। आखिरकार बच्चों में रावण दहन देखने का अतना क्रेज है तो फिर माँ में क्रेज क्यों नहीं होगा?

लेकिन कुछ भी कहो माँ की नवरात्रि में नौ दिनों तक हर गली-मोहल्ले में जो रौनक थी। वह रौनक अब सन्नाटे में तब्दील हो गई है और इन दिनों हर किसी की तरह मैं भी लोगों से यही कह रही हूँ कि यार!नवरात्रि कब चली गई, मुझे तो पता ही नहीं चला।

- गायत्री शर्मा

विजयादशमी और रावण

पहले गणेश जी फिर माताजी, फिर रावण और उसके बाद लक्ष्मी जी ... ऐसा लगता है जैसे सभी भगवान में इस बात की ट्यूनिंग चल रही हो कि कैसे वे एक के बाद एक आकर भक्तों को अपनी आव-भगत करने का मौका देंगे। बेचारे भक्त भी अपने शुभमंगल की कामना के लिए कभी लड्डू,कभी पेड़ा,कभी चूरमा तो कभी पकोड़े खिला-खिलाकर आए दिन भगवानों को प्रसन्न करने में लगे हुए हैं। घर में पधारों गजानन जी के बाद, अम्बे तू है जगदंबे काली और अब रामचंद्र कह गए सिया से ... के गीत गली-गली में यक ब यक सुनाई पड़ रहे हैं।

चलिए अब बात करते हैं असत्य पर सत्य की विजय के पर्व 'विजयादशमी'की। इंदौर में विजयादशमी पर केवल आयुधों की ही पूजा नहीं होती है बल्कि यहाँ हर गली-मोहल्ले में रावण के प्रतीक पुतले बनाए जाते हैं,जिन्हें आतिशबाजियों के साथ जलता देखकर लोग खुशियाँ मनाते हैं और एक-दूसरे को दशहरे की बधाईयाँ देते हैं। दशहरे के दूसरे दिन लोगों के घर दशहरा मिलने जाने का चलन मुझे केवल इंदौर में ही देखने को मिला क्योंकि मेरे शहर रतलाम में केवल 'पड़वा'पर ऐसा होता है। लेकिन कुछ भी कहो इंदौर की विजयादशमी का आनंद ही कुछ और है।

दूसरे भगवानों की बजाय रावण ही क्यों ... इसके पीछे भी एक फनी लॉजिक है और वह यह कि रावण को स्थापित करने व बिदा करने में दोनों में बड़ी आसानी होती है। रावण जैसे महाज्ञानी शिव भक्त को दूसरे देवताओं की तरह किसी ‍विशेष आव-भगत की जरूरत ही नहीं होती है। इसे तो आप सेम डे बनाकर गली-चौराहा,घर का आँगन,बगीचा चाहे जहाँ खड़ा कर दो आखिरकार ऐसे या वैसे उसे तो जलना ही है।

रावण बनाने का सबसे ज्यादा क्रेज बच्चों में देखने को मिलता है,जो कागज,कपड़े,स्केज पेन,घास-पूस आदि के साथ अपनी पसंद,आकार-प्रकार और कद-काठी के रावण को बनाकर उसमें खूब सारे पटाखे लगाकर उसका दहन करते हैं और दोस्तों के सात खूब मौजमस्ती करते हैं। कुछ इस तरह बहुत कम लागत में बनने वाला रावण केवल बच्चों का ही नहीं बल्कि हम सभी का फेवरेट बन जाता है। इस रावण को हँसते-हँसते बनाया जाता है और हँसते-हँसते ही विदा किया जाता है।
- गायत्री शर्मा 

Sunday, October 17, 2010

माँ की आराधना नवरात्रि में

माँ दुर्गा की आराधना का पर्व 'नवरात्रि' अपने अवसान के साथ-साथ जोश, ऊर्जा व भक्ति के मामले में चरम पर पहुँचता जाता है। कोई अपने पदवेश (चप्पल-जूते) छोड़कर तो कोई नौ दिन तक कठोर उपवास रख माँ की भक्ति कर माँ से अपने परिवार के शुभमंगल की कामना करते हैं। दुल्हनों की तरह सजे गरबा-मंडल दिन भर सुस्ताकर शाम को फिर से माँ की आराधना के लिए तैयार होकर जगमगाने लगते हैं और सांझ ढ़लते-ढ़लते माँ के भक्ति गीतों व चंटियों की आवाजों से गुँजने लगते हैं। छोटी-बड़ी बालिकाएँ भी चमचमाते वस्त्रों के साथ इन गरबा मंडलों में अपने सुंदर गरबा रास की प्रस्तुति देकर इन्हें जीवनदान दे देती है।

यदि मैं अपनी बात करूँ तो मुझे भी गरबा खेलने का बहुत शौक है। जिसके लिए मैं हर साल समय निकाल ही लेती हूँ। पर क्या करूँ व्यस्तताओं के चलते इस बार न तो मैं माँ के लिए उपवास रख पाई और न ही नौ दिनों तक गरबा खेलने जा पाई। इतना सब होने के बावजूद भी इसे माँ की कृपा ही कहे कि अष्टमी के दिन इंदौर के बड़ा गणपति स्थित शारदा नवदुर्गोत्सव समिति के आयोजकों ने मुझे बालिकाओं का गरबा देखने हेतु अतिथि के रूप में आमंत्रित किया व अतिथि होने के नाते मुझे माँ की तस्वीर पर माल्यापर्ण कर माँ की आराधना का एक मौका प्रदान किया।

वह अष्टमी का दिन था। उसी दिन मुझे अपने दफ्तर के साथियों के साथ दफ्तर की छत पर गरबा करने का मौका मिला। जिसका मैंने भरपूर लुत्फ उठाया और रात में घर पहुँचकर हमारे पड़ोस स्थित गरबा प्रागंण में आरती के रूप में माँ की आराधना की। आज नवमी के दिन भी मैंने अपनी कॉलोनी स्थित गरबा प्रागंण में कुछ देर तक गरबे किए। इन सभी के लिए मैं देवी माँ को धन्यवाद देती हूँ कि मैंने नौ दिनों तक इंदौर के कई गरबा-पांडालों में आरती होते हुए देखी पर आलस्य के चलते मैंने वहाँ जाकर आरती करने की जहमत कभी नहीं की लेकिन माँ की कृपा से अष्टमी व नवमी के दिन मुझे कई गरबा पांडालों में गरबा खेलने व आरती करने दोनों का मौका मिला।

महात्मा गाँधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में ब्लॉगरों का जमावड़ा

वर्धा स्थित महात्मा गाँधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय परिसर में हिंदी ब्लॉगिंग की आचार-संहिता पर 9 व 10 अक्टूबर को आयोजित दो दिवसीय गोष्ठी में सम्मिलित होकर बहुत अच्छा लगा। पहले दिन अपरीचित व दूसरे दिन सुपरीचित ब्लॉगरों से मेल-मिलाप व बातचीत करने में दो दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला।

वर्धा में दो दिवसीय प्रवास के दौरान मुझे देश भर से वर्धा आए ब्लॉगरों से मिलने का व लगातार दो दिनों तक उनके संपर्क में रहने का सुअवसर प्राप्त हुआ। इनमें से सुरेश चिपलूनकर और यशवंत सिंह तो मैं पहले से ही परीचित थी इसलिए गोष्ठी के पहले दिन इन दोनों के दर्शन अपरीचितों के बीच सुकून की ठंडी छाँव की तरह थे। तभी तो मुझे देखकर यशवंत जी के मुँह से अनायास निकल ही गया कि गायत्री अब हम लगातार तीसरी बार किसी कर्यक्रम में साथ मिल रहे हैं। अब तो लगता है कि यहाँ कोई न कोई धमाका होगा। सच कहूँ तो धमाका हुआ भी ...।

अब बात करते हैं इस गोष्ठी के सूत्रधार सिद्धार्थ जी के बारे में। जिनके स्नेहिल निमंत्रण पर मुझे अपने सारे कार्य छोड़कर वर्धा आना ही पड़ा। केवल ‍सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी ही नहीं बल्कि उनकी श्रीमती रचना त्रिपाठी की मिलनसारिता भी लाजवाब थी। महात्मा गाँधी विश्वविद्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम में पधारे पामणों के आव आदर में इन दोनों ने कोई कसर बाकी नहीं रखी। इनके लिए हर कोई अपरीचित होकर भी परीचित सा था। इनसे विदा लेते समय भी इनका प्यार खाने के पैकेट के रूप में सफर भर मुझे इनकी याद दिलाता रहा।

अरे ... मैं तो भूल ही गई सिद्धार्थ और रचना जी की खूबियों को समेटे इनके बेटे मतलब हमारे नन्हे ब्लॉगर सत्यार्थ के बारे में आपको कुछ बताने को। दिन-भर धमाल चौकड़ी में लगा रहने वाला सत्यार्थ जितना शरारती है। उससे कई गुना ज्यादा प्रतिभावान। तभी तो इस नन्हें ब्लॉगर ने हममें से हर किसी की गोद में बैठकर हमारा दुलार पाया। वही किसी से चॉकलेट के रूप में मिठास भरा प्यार पाया।

वर्धा में आए ब्लॉगरों के मिलन और बिछड़ने के क्षण दोनों ही भूलाएँ नहीं भूलते। मुझे तो ऐसा लग रहा था मानों सिद्धार्थ जी के घर शादी हो और हम सभी उनके निमंत्रण पर उनके घर जा पहुँचे हो। वैसा ही आव-आदर और वैसी ही बिदाई ... यह सब तो जैसे एक परिवार का आयोजन लग रहा था। जिसमें हम सभी उस परिवार के सदस्य बन शरीक होने आए थे। यही पर मेरी मुलाकात डॉ. कविता वाचक्नवि, डॉ. अजित गुप्ता, डॉ. मिश्र व डॉ. महेश सिन्हा, ... और अविनाश वाचस्पति जी से भी हुई। अब तक मैंने इन सभी के नाम सुने थे पर इनके साक्षात दर्शन का मौका मुझे यही मिला।

इनमें से कोई कवि, कोई डॉक्टर, कोई प्रोफेसर ... ऐसा लग रहा था मानों सभी चुनिंदा नगीनों को छाँट-छाँटकर सिद्धार्थ जी ने वर्धा में बुलाया था। 'फुरसतिया' ब्लॉगर अनूप शुक्ल जी का बात-बात पर ठहाके लगाना और इन ठहाकों में कविता जी व अनिता कुमार जी का शामिल हो जाना भूलाए नहीं भूलता है। इन सभी की बीते दिनों की मुलाकातों और बातों के किस्सों की महफिल जब शाम को बरामदे में जमती, तो कब घड़ी की सुईयाँ बारह बजे की सीमाएँ लाँघ जाती। पता ही नहीं चलता था। बगैर नींद के न जाने इनके शरीर की बैटरी कैसे चार्ज होती थी?

युवा ऊर्जा से लबरेज सुरेश जी, प्रभात कुमार झा साहब, विवेक सिंह, यशवंत सिंह, शैलेश भारतवासी, हर्षवर्धन त्रिपाठी ज‍ी, रविंद्र प्रभात जी, प्रियंकर पालीवाल, जाकीर अली रजनीश, अशोक कुमार मिश्र, डॉ. महेश सिन्हा, संजीत त्रिपाठी, जयकुमार झा, संजय बेंगाणी ... इन सभी की तो बात ही निराली थी। बातचीत में ठेठ यूपी का अंदाज और मौका मिलते ही एक-दूसरे की टाँग खीचने वाली बात ... इनमें घनिष्ठ मित्रता का परिचय दे रही थी। जिसमें औपचारिकता की बजाय दोस्ती का अधिक पुट था। हम सभी ब्लॉगरों को एक साथ देखकर ऐसा लगता था जैसे फादर कामिल बुल्के छात्रावास (जहाँ हम ठहरे थे) में ब्याव के लिए न्यौते गए 'पामणों' का जमावड़ा लगा हो। दिन भर हँसी-मजाक-ठहाके, रात के अँधेरे में मोमबत्ती की रोशनी में कवि सम्मेलन और गीतों की महफिल ... समा को इतना खुशनुमा कर देती कि लगता बस वक्त यही थम जाएँ पर हमारी मस्ती की महफिल रातभर चलती जाए।

जहाँ हम सभी लोग छात्रावास में बच्चों की तरह मौज-मस्ती कर खूब हँसी-ठहाके लगाते थे। वही गोष्ठी के स्थल पर उतनी ही खामोशी व गंभीरता का परिचय दे अपने गंभीर व जागरूक ब्लॉगर होने का परिचय भी दे देते थे। यही नहीं मौका मिलने पर मंच से सबके सामने चुटकियाँ लेने में व अपनी बेपाक राय रखने में भी हम ब्लॉगरों का कोई जवाब नहीं था। विचारों में स्पष्टता, चिंतन में गंभीरता व कुछ कर गुजरने का जज्बा यहाँ आमंत्रित हर ब्लॉगर से चेहरे से झलक रहा था। कार्यक्रम के दूसरे दिन प्रसिद्ध ब्लॉगर प्रवीण पाण्डेय जी भी इस आयोजन में सम्मिलीत होने के लिए सपत्नीक वर्धा पधारे। ब्लॉगिंग के बारे में प्रवीण जी के विचार बहुत ही सुलझे हुए थे। उनके वक्तव्य को सुनकर मैं तो यही कहूँगी कि कम बोलों पर सटीक बोलो और ऐसा बोलो जो सीधे-सीधे दर्शकों तक आपकी बात पहुँचाए। इस मामले में प्रवीण जी मेरी अपेक्षाओं प पूर्णत: खरे उतरे।

10 अक्टूबर को दिल्ली के साइबर लॉ विशेषज्ञ श्री पवन दुग्गल जी के आने का हमने जितना इंतजार किया। हमारे सब्र का उतना ही मीठा फल उन्होंने हमें साइबर लॉ की जरूरी बाते समझाकर दिया। पवन जी का उद्बोधन सही माइने में इस आयोजन की सार्थकता सिद्ध हुआ। उन्हें सभी ब्लॉगरों ने बड़ी ही गंभीरता से सुना व उनस सीधे प्रश्नों के माध्यम से साइबर लॉ के संबंध में अपनी जिज्ञासाओं का समाधान किया। पवन दुग्गल ने एक ओर तो ब्लॉगरों के सिर पर कानून की टँगी तीखी तलवार की धार के वार से ब्लॉगरों को डराया तो वहीं दूसरी ओर कानून के शिकंजे में कसने से बचने के लिए ब्लॉगरों को महत्वपूर्ण टिप्स भी दिए।

अपनी बात को समाप्त करते-करते अब बात उन बड़ों की, जिनके बगैर इस आयोजन का मजा बगैर नमक की सब्जी की तरह होगा और वो हैं वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा जी और साहित्यकार विषपायी जी। हर किसी से प्यार, मोहब्बत से बतियाने वाले और हर वक्त सहजता से उपलब्ध होने वाले धन्वा जी के गर्दन से कंधे को मिलाते लंबे बाल और टोपी वाला लुक माशाअल्लाह था। जिसके कारण वह भीड़ में भी अलग पहचाने जा सकते थे। अपनी ही धुन में मनमौजी व जिंदगी को अपने ढंग से जीने वाले आलोक धन्वा जी हर बात में लाजवाब और अनुभवों की खान थे। इसे इनका जादुई आकर्षण ही कहे कि जो कोई भी इनके पास पाँच मिनिट के लिए जाता वह घंटे भर पहले तो इनके पास उठ ही नहीं पाता।

धनवा जी के साथ ही ‍महात्मा गाँधी विश्वविद्यालय के कुलपति श्री विभूति नारायण व प्रति कुलपति श्री .. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा से जुड़े प्रो. ऋषभदेव शर्मा, प्रो. अनिल अंकित राय का मार्गदर्शन भी तारीफ के काबिल था। बड़े ही सहज, सरल इन वरिष्ठजनों के आशीष व उपस्थिति ही इस आयोजन की सफलता की द्योतक थी।