Monday, July 28, 2014

बैरन भई बरखा ...

सैय्या बिना बरखा बैरन भई, गाजत रही विरह बिजुरी। 
प्रेम मगन सारा जग भया, मैं बिरहन ताकूँ पी की गली। 

उलाहना देत रही टपटप बूँदे, जब पड़त रही प्यासे मन पर। 
प्यास मिलन की और बढ़ी, जाके वर्षा जल बुझा न पाय।

देखत है सब कुछ पिया मोरे, मंद-मंद वह रहे मुसकाएँ।
बोले प्यार से - 'बैरी कहत रहे मोहे, अब बैरी को क्यों पास बुलाएँ'?
- गायत्री

बूँदों ने छेड़ा है प्रीत का जलतरंग

-          गायत्री शर्मा
मन में कल्पनाओं का जलतरंग बजने लगता है, जब बारिश की बूँदे  बादलों से गिरकर गालों पर अठखेलियाँ करती है, पत्तों पर फिसलती है, माटी पर मचलती है। पिया की दूत बनकर आई शीतल बूँदे जब विरह की तपिश में तप्त तन को भिगो देती है तो विरहणी का तन-बदन मिलन का संदेश लेकर आई बूँदों के स्पर्शमात्र से सिहरकर थर्रा उठता है। कल तक खुलकर मचलते उसके केश आज होठों की थरथराहट सुन लज्जावश सहम उठते हैं और कैद कर लेते हैं प्रेम के अहसास के इस खुशनुमा मंज़र को अपनी काली घटाओं की ‍सिकुड़न भरी चादर में। प्रेमी-प्रेमिका के मिलन के इस महापर्व पर धरती की सौंधी महक फिजाओं में चहुँओर प्रेम की खुशबू बिखेर देती है। जिससे आनंदित हो मयूर मोहनी मुद्रा में नृत्य करने लगता है और पेड़ों के पात भी प्रेम के इस उत्सव में मधुर धुनों की तान छेड़ देते हैं। उन्माद, उल्लास और प्रकृति के यौवन के इस पर्व पर सृष्टि का हर जीव अपने-अपने तरीकों से खुशियाँ मना रहा है। आखिर हो भी क्यों न बरखा मिलन, प्रेम और खुशहाली का पर्व जो है।
विरह की तपिश में तप्त नायिका की विरहवेला अब जल्द ही समाप्त होने वाली है। प्रेम के इस पर्व में जहाँ प्रेमी-प्रेमिका का मिलन हो रहा है। वहीं बूँदों के आलिंगन से बादल और धरा का भी मिलन हो रहा है। पपीहा पीहू-पीहू कर प्रेम धुन छेड़ रहा है। शाख और पात मिलकर प्रेम रूपी सुवासित पुष्पों को ‍खिला रहे हैं, खेतों में माटी और पानी के मिलन से बीजों में खुशियों के अंकुरण फूटने लगे हैं। बरखा की पूर्व सूचना लिए आई बयार फिजाओं में विरह की तपिश को काटने वाली ठंडक घोल रही है, जिससे सूर्य की तपिश से अशांत मन को शांति व सुकून का अहसास हो रहा है। ठंडी बयारें बादलों की मस्ती में मचलती हुई मचल-मचलकर, उमड़-घुमड़ के नृत्य के साथ प्रियतम के आने का, खेतों में फसलों के अंकुरण का, मँहगाई पर विजय का शुभ संदेशा लेकर आई है। ऐसे में हर कोई बरखा रानी के स्वागत को आतुर हो रहा है। इंतजार की घटती घड़ी में टकटकी लगाई आँखों पर जब टिप-टिप कर बरखा की बूँदे पड़ती है। तब लंबा इंतजार भी बूँदों की झमाझम में गुम हो जाता है और झूम उठता है हमारा तन-बदन बूँदों की लडि़यों के संग। खेत जोतकर बरखा की राह तकता ‍किसान बारिश की बूँदों को देख उसे अपनी दोनों हथेलियों में सहेजकर आँखों से लगाता है और धन्यवाद देता है उस इंद्र देव को, जिनकी कृपा से बरखा रानी आज उनके खेतों में दस्तक देने जा रही है तो वहीं नायिका भी पिया मिलन की प्यास जगाती प्रेम की इस बरखा में भीगकर अपनी खुशी का इज़हार कर रही है। बूँदों की झडि़यों का यह मौसम मचलन, सिहुरन और छेड़खानी का मौसम है। भौंर की दस्तक के साथ घर-आँगन में पधारी इस बरखा में सब कुछ उजला-उजला और खिला-खिला सा नज़र आ रहा है। हर चेहरे पर खुशियाँ छाई है। कवियों की कल्पनाओं की नाव भी अब बरखा के पानी में हिलोरे मारने लगी है। बरखा के एक ऐसे ही सुंदर दृश्य की कल्पना करते हुए कवि सुरेन्द्रनाथ मेहरोत्रा की कलम कुछ इन शब्दों में अपनी कल्पनाओं को उकेरती है –

‘बरखा ने रंग बिखेरे हैं
कजरी ने चित्र उकेरे हैं
बदरा झूलों पर ठहरे हैं
मन भावन चित्र सुनहरे हैं।‘

प्रेम की इस ऋतु में रंग-बिरंगे पुष्पों की महक से नायिका का रूप-लावण्य भी निखरने लगा है, विरह के अश्रु बारिश की बूँदों से धुल गए है और प्रकृति संग विरहणी भी तरह-तरह की साज-सामग्री से स्वयं को श्रृंगारित कर रही है। वर्षा की हर बूँद जैसे तन में स्फूर्ति का संचार कर रही है। हर कोई प्रकृति के यौवन के इस पर्व को खुशियों के पर्व की तरह मना रहा है। आखिर हो भी क्यों है, यह बारिश की बूँदे इस धरा के प्राणियों के लिए ‘जीवनधन’ है। जिसके बगैर सब ‘सून’ है। तभी तो बरखा का गुणगान करते हुए गीतकार मनोज श्रीवास्तव का कोमल मन यह कह उठता है –

‘पंख पसारे बदली रानी,
चुनरी ओढ़े श्यामल-धानी;
आंचल-पट पर दृश्य जगत के,
अमित कामिनी छल-छल छलके;
वसन जो उघरे हिय ललचाए,
ले अंगड़ाई सब अलसाए;
स्निग्ध बदन को नज़र जो छुए,
गड़ी शरम से खिल गए रोएँ;
               
फिर मत पूछो कैसे पिघली,
                       
लगी छलकने, ज्यों नभ-बिजली....’।

नोट : चरकली ब्लॉग पर आपका स्वागत है। इस ब्लॉग से किसी भी सामग्री का प्रकाशन या उपयोग करते समय मुझे सूचित करना व साभार देना न भूलें। मेरे इस लेख का प्रकाशन रतलाम से प्रकाशित होने वाले सांध्य दैनिक समाचार-पत्र 'रतलाम दर्शन', उज्जैन से प्रकाशित होने वाले सांध्य दैनिक समाचार-पत्र 'अक्षरवार्ता' तथा 'खरी न्यूज डॉ कॉम' पोर्टल पर किया जा चुका है।

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Friday, July 25, 2014

कल आई थी बूँदे ...

 मैंने बूँदों को देखा था
रोशनी के साबुन से
नहाते हुए
हवा के तौलिये से
बदन सुखाते हुए
बूँदों का मादक यौवन
तब शबाब पर आता था
जब भौंर का सूरज
उन्हें मखमली रोशनी का
आईना दिखाता था
टिप-टिप की पायल पहनी बूँदे
कल आई थी मेरे बागीचे में
बिखर गई थी खुशियाँ चहुँओर
बूँदों की बारात के ठहरने पर  
पत्तों ने बूंदों के लिए
मखमली बिछौना सजाया
घास के तिनकों ने उन्हें 
अपने सिर माथे पर बैठाया   
पर बूँदे तो परदेशी थी
क्षणिक मिलन को आई थी
ठहरना उसे कहाँ आता था
कुछ पल के बाद
भूमि से आलिंगन कर
उसे तो भूमि के गर्भ में ही
समाना था
चंचल बूँदे टिप-टिप करती आई थी

और बहुत खामोशी से चली गई
छोड़ गई कुछ मीठी यादें
जो बरखा की झडि़यों संग
फिर ताजा हो जाती है
बूँदे हर बार
टिप-टिप कर आती है
और खामोशी से
दबे पाँव चली जाती है ..। 
   गायत्री शर्मा

नोट : मेरी इस कविता का प्रकाशन उज्जैन, मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र ‘अक्षरवार्ता’ व ‘खरी न्यूज डॉट कॉम’ पोर्टल के 24 जुलाई 2014, गुरूवार के अंक में हुआ है। कृपया इस ब्लॉग से किसी भी सामग्री का उपयोग या प्रकाशन करते समय मुझे सूचनार्थ मेल प्रेषित करना व साभार देना न भूलें। 
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म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी की पुस्तक में मेरा नाम

मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल (म.प्र.) द्वारा प्रदेश के तीन प्रमुख विश्वविद्यालयों (विक्रम विश्वविद्यालय, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय एवं बरकतुल्ला विश्वविद्यालय) के बी.ए. षष्ठ सेमेस्टर हिन्दी साहित्य हेतु निर्धारित पाठ्यपुस्तक 'हिन्दी नाटक, निबंध तथा स्फुट गद्य विधाएँ एवं मालवी भाषा साहित्य' के पृष्ठ क्रमांक 280 में मालवी में ब्लॉगिंग व माइक्रो ब्लॉगिंग करने वाले चुनिंदा ब्लॉगरों में रतलाम (म.प्र.) से मेरा का नाम प्रकाशित किया गया है। मुझ पर अपना स्नेह बनाएँ रखने के लिए मेरे गुरू डॉ. शैलेन्द्र शर्मा को सादर नमन। 

Saturday, July 19, 2014

किशोर व वयस्क अपराधियों के लिए समान दण्ड

-          गायत्री शर्मा
अपराधियों के लिए खौंफ का पर्याय बनने वाला कानून ही आज सवालों के कटघरे में खड़ा हो गया है। यहाँ अपराधियों का वकील किशोरता की आड़ लेकर अपने मुवक्किल को बचाने के लिए अदालत में पेचीदा धाराओं और पुराने निर्णीत मामलों के पाँसे फेंकता है तो वहीं दूसरे कटघरे में खड़े बलात्कार व हत्या के शिकार लोगों के परिजन कानून के सामने गिड़गिड़ाकर दोषियों को कड़ी सजा देने की गुहार करते हैं। ऐसे अधिकांश मामलों में लचीली धाराओं के पेचीदा जालों में उलझा कानून असहायों की तरह मौन साध लेता है और किताबी अक्षरों को सर्वोपरि मान किशोर अपराधियों को सजा में राहत देकर स्वयं की बेबसी पर आँसू बहाता है। वाह रे मेरे देश के कानून! बलात्कार और हत्या जैसे संगीन मामलों में किशोरवयता के आधार पर दोषियों को कड़ी सजा से राहत देना कहाँ का न्याय है, जो समाज में कानून की सार्थकता का ही मखौल उड़ा रहा है? जब दोषियों ने कुकर्म करने में क्रूरता की सारी हदों को लाँघ दिया तो ऐसे में दोषियों को सजा देने में कानून को कड़ेपन से इंकार क्यों? शर्म आती है मुझे उन लोगों पर जो कानून में संशोधन का अधिकार होते हुए भी उसकी पहल न करके गैंग बलात्कार जैसे मामलों पर राजनीति करते हैं और औरतों के छोटे वस्त्र, मादक सौंदर्य तथा स्वतंत्रता पर ही नकेल कसने की बात करते हैं।
      कामुकता के नशे में औरत की आबरू के साथ-साथ उसके स्वाभिमान को भी सरेआम नग्न कर बलात्कार और हत्या जैसे संगीन अपराधों को अंजाम देने वाले अपराधियों की मानसिकता पर अब एक सवालिया निशान उठ रहा है। कहते हैं जिसे अंजाम का भय नहीं होता। वह व्यक्ति अपनी भूख, लालसा व चेष्ठा की पूर्ति के लिए कुछ भी कर सकता है। कुछ ऐसी ही मानसिकता से ग्रसित होकर किशोर अपरा‍धी अपराधों को अंजाम देते है। यहाँ हम बात कर रहे हैं औरत के जिस्म के भूखे दरिंदों यानि कि बलात्कार के अपराधियों की। फैशन व काम के मद में अंधे किशोर अपराधी कानून को खिलौना समझकर पहले उसके साथ खूब मस्ती से खेलते हैं और जब यह खिलौना उनके गले के लिए फाँसी का फंदा बन जाता है तब किशोर होने की दलील देकर वे अपराध की कठोरता से बड़ी आसानी से बच निकलते हैं। यह एक कटु सत्य है कि किशोर अपराधियों के लिए आज कानून महज एक खिलौना बनकर रह गया है। यह ज्वलन्त मुद्दा सवाल उठा है कैबिनेट मंत्री मेनका गाँधी के हाल ही में दिए गए उस बयान से जिसमें उन्होंने बलात्कार, हत्या व अन्य संगीन अपराधों के किशोर अपराधियों को वयस्क अपराधियों की तरह कड़ी सजा देने की वकालात की है। रिटायर्ड हाईकोर्ट जस्टिस श्रीमती इंद्राणी दत्ता के अनुसार भी कानून में समय के साथ-साथ जरूरी बदलाव होने चाहिए। मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेषतौर पर बलात्कार जैसे मामलों में कानून को दोषियों के प्रति सख्त रवैया अपनाना चाहिए।
         बलात्कार के मामलों में उम्र से पहले ही अवस्कता से वयस्कता में प्रवेश करती किशोरों की मानसिकता में इस बदलाव के कई कारण है। कुछ लोग इसे हमारी जीवन शैली में बदलाव से उपजी सोच मानते हैं तो कुछ इसे पश्चिम सभ्यता में जि़स्मानी संबंधों आज़ादी की नकल का नतीजा। इसमें कोई दोमत नहीं है कि बाजार में आसानी से मिलता नीला जहर यानि पोर्नोग्राफी भी किशोरों की मानसिकता में विकृति लाने का एक प्रमुख कारण है। उम्र में संक्रमण का यह दौर यानि कि 14 से लेकर 18 वर्ष तक की उम्र में हार्मोनल बदलाव नीले जहर के प्रति किशोरों की रूचि में उत्प्रेरक का काम करते हैं। माता-पिता के अतिशय प्रेम व टैक्नो सेवी होने के नाम पर किशोरों के लिए मोबाइल, टेलीविजन व इंटरनेट आदि की सुलभता व परिवार के बड़ों की किशोरों के कार्यकलापों पर अनदेखी ही बलात्कार और हत्या जैसे मामलों में अपराधियों के रूप में किशोरों की बढ़ती भूमिका की ओर ईशारा करती है। चिकित्सकीय दृष्टिकोण से किशोरों की मानसिकता पर प्रकाश डालते हुए इंदौर के प्रसिद्ध मनोरोग चिकित्सक डॉ. आशीष गोयल का कहना हैं कि 13 से 17 वर्ष की उम्र में किशोरों में हार्मोनल बदलाव बड़ी तेजी से होते हैं जो 18 वर्ष यानि कि वयस्कता की उम्र पर आकर स्थिरता पाते हैं। ये हार्मोनल बदलाव किशोरों में न केवल शारीरिक बदलाव बल्कि मानसिक बदलावों के भी द्योतक होते हैं। यहीं वजह है कि किशोरों में अपोजिट सेक्स के प्रति आकर्षण सर्वाधिक देखा जाता है। आजकल के किशोरों का खान-पान, गलत संगत, पब कल्चर, सिनेमा, देर रात तक इंटरनेट से नजदीकी और माता-पिता की अपने बच्चों के प्रति अनदेखी व संवादहीनता ही कुछ ऐसे कारण है, जो किशोरों में आपराधिक मानसिकता के पनपने की वजह बनते जा रहे हैं।     
          किशोर अपराधियों के लिए विशेष तौर पर बना ‘जुवेलाइन जस्टिस एक्ट’ (किशोर न्याय बोर्ड) आज बलात्कार व हत्या जैसे मामलों में पीडि़त लोग व मृतकों के परिजनों के साथ सही इंसाफ नहीं कर पा रहा है। यहीं वजह है कि जघन्य अपराधों के दोषी किशोरों को अब वयस्कों के लिए बनाएँ गए कानून के दायरे में लाने की माँग की जा रही है। निर्भया सामूहिक बलात्कार मामले में भी पीडि़ता के परिजन जेवुलाइन जस्टिस बोर्ड के निर्णय से असंतुष्ट होकर सुप्रीम न्यायालय में याचिका दाखिल कर यह माँग कर चुके हैं कि इस मामले के किशोर अपराधियों पर सामान्य न्यायालय में भी बलात्कार का मुकदमा चलाया जाना चाहिए, जिससे कि मृतका के साथ सही न्याय हो। लेकिन न्यायालय ने उनकी याचिका को नाबालिग अपराधियों पर एक ही अपराध के लिए दो बार मुकदमा न चलाएँ जाने का तर्क प्रस्तुत कर नामंजूर कर दिया। ‍अकेले निर्भया मामले में ही नहीं बल्कि शक्ति मिल सामूहिक बलात्कार मामले में भी कुछ ऐसा ही चौंकाने वाला फैसला आया। इस मामले में किशोर न्यायालय ने बलात्कार के आरोपी दो नाबालिगों को अच्छा व्यवहार सीखने के मकसद से नासिक के बोस्टन स्कूल भेजने का निर्देश जारी कर दिया। बलात्कार व हत्या जैसे गंभीर मामलों में पीडि़ताओं व उनके परिजनों के साथ किया गया आखिर यह कैसा न्याय है, जो आज भी क्रूर अपराधियों के प्रति सुधारवादी रवैये की वकालत कर रहा है? यदि कानून में जघन्य व गंभीर अपराधों के मामले में किशोर और वयस्क अपराधियों पर समान दण्ड देने संबंधी संशोधन किया जाता है तो निश्चित तौर पर देश का कानून प्रभावी बनने के साथ ही दुष्कर्म पीडि़ताओं व उनके परिवारों के साथ सही न्याय कर पाएगा। कानून में कठोरता से समाज में कानून का भय निर्मित होगा और अपराधों की संख्या में भी आशातीत कमी आएगी।
........................................    

नोट : कृपया इस ब्लॉग पर प्रकाशित किसी भी सामग्री का प्रयोग करते समय मुझे सूचित करें व इस ब्लॉग का साभार सामग्री के साथ अवश्य देंवे। 
मेरे इस लेख का प्रकाशन दैनिक कल्पतरू एक्सप्रेस, दैनिक कैनविज टाइम्स, सांध्य दैनिक रतलाम दर्शन, सांध्य दैनिक अक्षरवार्ता आदि अखबारों में किया जा चुका है।

Monday, July 14, 2014

बचपन मिल गया बारिश में

आज तन के साथ मन भी भीगा,
कल्पनाएँ भी भीग गई बारिश में।
मन का मयूर नाचने लगा,
बचपन मिल गया मुझे बारिश में।
     
     सुप्त स्वप्न अब जाग उठे ,
     झूम उठी स्मृतियाँ भी बारिश में।  
     प्रकृति की चंचलता ने छेड़े प्रेम के तराने
     बूँदों के स्पर्श से सिहम गई हवा बारिश में।

- गायत्री शर्मा 

Sunday, July 13, 2014

हास्य का ‘हुल्लड़’ हो गया गुम

-         गायत्री शर्मा 
साहित्य जगत में हास्य-व्यंग्य का एक चमकता सितारा आज आसमान का सितारा बन बादलों की भृकुटी के बीच सज गया। काव्य मंचों पर ठहाकों की गुदगुदी बिखेरने वाला वह कवि हँसते-हँसते दुनिया को अलविदा कह गया। जाते-जाते छोड़ गया वह प्रकृति को खुशनुमा मौसम में हम सभी को हँसने-मुस्कुराने के लिए। व्यंग्य लेखन व प्रस्तुतिकरण के अपने अलहदा अंदाज से सुशील कुमार चड्ढ़ा ने व्यंग्य जगत में अपनी एक ऐसी पुख्ता पहचान बनाई थी, जिसके समकक्ष खड़े रहना किसी मामूली व्यंग्यकार के लिए एक दिवास्वप्न के समान ही था। सही पहचाना आपने, मैं बात कर रही हूँ साहित्य जगत में हास्य-व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर सुशील कुमार चड्ढ़ा की, जिसे काव्य के रसिक श्रोता ‘हुल्लड़ मुरादाबादी’ के नाम से जानते हैं। काव्य जगत में वर्षों से टिमटिमाता यह सितारा शनिवार शाम हमें अलविदा कह अकेले ही निकल पड़ा उस लंबे सुनसान सफर पर, जहाँ यह हँसाने वाला तो है पर उसकी कविताओं पर दाद देने वाले श्रोता काफी पीछे छूट गए है।
कहते हैं जिस पर साक्षात् माँ सरस्वती की कृपा होती है उसके लिए कोई विधा नामुमकिन नहीं होती। माँ सरस्वती के लाडले हुल्लड़ जी ने वीर रस की कविताओं से साहित्य जगत में अपना पहला कदम रखा। देखते ही देखते वीर रस का यह कवि हास्य-व्यंग्य के क्षेत्र में भी एक बड़ा व मशहूर नाम हो गया। हरफनमौला हुल्लड़ जी कवि होने के साथ ही एक बेहतरीन अदाकार, शायर व गायक भी थे। एक कवि के रूप में हुल्लड़ जी ने समाज की समस्याओं का अपनी कविताओं में बखूबी प्रस्तुतिकरण किया। गंभीर विषयों में हास्य का पुट पैदा करना व ठहाकों की चुटकियाँ भरना केवल हुल्लड़ जी के ही बस की बात थी। आज भी उनकी कविताएँ, शायरी व दोहे बड़ी ही पाकीज़गी के साथ पाठकों पर व्यंग्य की फुहारें बिखेरते प्रासंगिक प्रतीत होते है। उनमें न तो अश्लीलता की गंदगी है और न ही सस्ती लोकप्रियता के चोचले।
हास्य-व्यंग्य के बहाने हुल्लड़ जी ने आम आदमी
की समस्याओं जैसे भ्रष्टाचार, मँहगाई, सत्ता लोलुभता आदि पर जोरदार कटाक्ष किए। ‘कोई सीट पर बैठा था, कोई खड़ा था। जिसे खड़े होने की भी जगह नही मिली वो सीट के नीचे पड़ा था…. भारतीय रेल की बदहाल स्थिति के दृश्य को जीवंतता व व्यंग्यात्मकता प्रदान करने का यह हूनर हुल्लड़ जी की लेखनी के बूते की ही बात थी। व्यंग्य के अंदाज में गंभीर बातों को भी हु्ल्लड़ जी ने कुछ इस अंदाज़ में बँया किया - इक चपरासी को साहब ने कुछ ख़ास तरह से फटकारा, औकात न भूलो तुम अपनी यह कह कर चाँटा दे मारा‘, ‘जिंदगी में मिल गया कुरसियों का प्यार है, अब तो पांच साल तक बहार ही बहार है, कब्र में है पाँव पर, फिर भी पहलवान हू, अभी तो मैं जवान हूँ...। अमूमन कवि अपनी कविताओं में लड़कियों से ईश्क फरमाते हैं पर हुल्लड़ जी अपनी कविता में न केवल मँहगाई, भूख और गरीबी को अपनी प्रेमिका बताते हैं बल्कि इन तीनों की कृपा से तकलीफें झेल रहे आम आदमी के दर्द को भी कुछ इस अंदाज़ में व्यक्त करते हैं - भूख, मँहगाई, गरीबी इश्क मुझसे कर रहीं थीं, एक होती तो निभाता, तीनो मुझपर मर रही थीं’। न केवल कविताएँ बल्कि दोहों में भी हुल्लड़ जी ने ‘गागर में सागर’ भरकर यह सिद्ध कर दिया कि जो असली कलाकार है। वह साहित्य की हर विधा गीत, गज़ल, दोहे व कविता की हर कसौटी पर खरा उतरने की महारथ रखता है। अंत में चलते-चलते मशहूर व्यंग्यकार हुल्लड़ मुरादाबादी को विनम्र श्रृद्धांजलि के साथ ही मैं आपके छोड़ चलती हूँ हुल्लड़ जी के स्वाभिमान के परिचायक इस दोहे के साथ –

‘मिल रहा था भीख में, सिक्का मुझे सम्मान का

मैं नहीं तैयार था, झुक कर उठाने के लिए।‘ 
................................
सूचना : मेरे इस लेख का प्रकाशन रतलाम, मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाले सांध्य दैनिक समाचार पत्र 'रतलाम दर्शन' व उज्जैन, मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र 'अक्षरवार्ता' में दिनांक 13 जुलाई 2014, रविवार के अंक में हुआ था। कृपया इस ब्लॉग से किसी भी सामग्री के प्रकाशन पर साभार दें व सूचना संबंधी मेल अवश्य करें।  


Saturday, July 12, 2014

मैजिकल मलाला ...

12 जुलाई – मलाला के जन्मदिन ‘मलाला डे’ पर विशेष

-          गायत्री शर्मा 
कलम की ताकत के आगे तख्त़ की ताकत भी गौण है। जब कलम क्रांति पर आमदा होती है। तब रातों-रात तानाशाहों के तख्तों-ताज़ पलट जाते हैं और र्स्वणिम इतिहास रचा जाता है। मिस्त्र की क्रांति इसका ताज़ा उदाहरण है। पाकिस्तान की स्वात घाटी में तालिबानी आंतकियों की तानाशाही के खौफ की तीव्र आँधी ने जब आज़ादी की उम्मीदों के सारे दिए बुझा दिए थे। तब दूर कहीं गोलियों की गड़गड़ाहट के बीच उम्मीद का एक नन्हा दिया मलाला युसूफज़ई के रूप में टिमटिमा रहा था। मलाला रूपी इस एक दिए ने ही आज स्वात घाटी में आज़ादी की उम्मीदों के हजारों दिए रोशन कर दिए है। नारी अधिकारों की मशाल थामें मलाला ने पूरी दुनिया में बालिका शिक्षा का अलख जगाया और यह साबित कर दिया कि तालिबानियों की कट्टरता के गढ़ को ध्वस्त करने के लिए वह अकेली ही काफी है। मलाला वह जुगनू है, जिसने स्वात घाटी में कबिलाई कानून और जातिय रिवाजों की कट्टरता के काले कायदों को आज़ादी की उम्मीदों की रोशनी से जगमगा दिया है।
     
स्वात घाटी में वो दहशत के दिन थें, जब दुनिया से बेखबर घाटी की लड़कियों के लिए आज़ादी से घुमना-फिरना, हँसना-खिलखिलाना और टेलीविजन देखना तक प्रतिबंधित होता था। उनका सौंदर्य हिजाबों में और बचपन जिम्मेदारियों के बोझ तले बितता था। बचपन की अठखेलियाँ, मेले, झूले, स्कूल आदि लड़कियों के लिए नहीं होते थे। यहाँ लड़कियों की माँसलता और चंचलता पर लज्जा व खौफ का पर्दा ढ़का जाता था। ऐसे में जवानी कब उनके बचपन पर हावी हो जाती थी, पता ही नहीं चलता था। अपनी उम्र से पहले ही रिश्तों के प्रति गंभीर हो चुकी स्वात घाटी की लड़कियाँ घरों में कैद रहकर सपने देखती थी सफेद घोड़े वाले उस राजकुमार के, जो इन्हें गुलामी की बेडि़यों से आज़ाद कर बाहर की दुनिया दिखाएगा। आज़ादी इन लड़कियों के लिए उस दिवास्वप्न की तरह होती थी, जिसके सच होने की उम्मीद ना के बराबर थी। स्वात में स्कूल तालिबानियों की मर्जी से खुलते थे और उन्हीं के आदेश पर बंद हो जाया करते थे। स्कूलों में गोलाबारी करना व स्कूलों को बमों से उड़ाना वहाँ आम बात थी। यहीं वजह है कि घाटी की लड़कियों के स्वप्न, शिक्षा, कल्पनाएँ और जिंदगी सबकुछ कट्टर फरमानों के सीमित दायरें में सिमटकर रह गई थी। पूरी दुनिया के सामने स्वात घाटी की लड़कियों की इस दर्दनाक व खौफनाक जिंदगी के सच को डायरी के रूप में उजागर किया 11 साल की मलाला ने। तालिबानी आतंकियों से खुलकर लौहा लेने वाली मलाला ने अपनी पूरी लड़ाई महज एक कलम के बूते पर लड़ी।
आतंकियों के कट्टर फरमानों से मलाला की कलम अकेली लड़ती गई। मलाला की कलम ने दुनियाभर में नारी मुक्ति की नई क्रांति का जयघोष किया। बीबीसी ऊर्दू में छद्म नाम ‘गुल मकई’ से जब मलाला की डायरी सार्वजनिक हुई। उस दिन पहली बार मलाला के दर्द को दुनिया ने जाना और मलाला की यही कोशिश उनके लिए मुश्किलों का सबब बन गई। स्वात घाटी में बालिका शिक्षा की अलख जगाने वाली इस बच्ची को अक्टूबर 2012 में तालिबानी आतंकियों ने अपनी गोलियों का शिकार बनाया। लेकिन यह मलाला का जीने का ज़ज्बा ही था जिसने उसे मौत के मुँह से बाहर खींच लिया और मौत को मात देने के बाद पहले से अधिक ताकत के साथ मलाला ने तालिबानी कट्टरता के खिलाफ अपने स्वर मुखरित किए। उसके बाद वह न हारी और न भागी और बस चलती रही, लगातार चलती रही। स्वात से शुरू हुई मलाला की यह यात्रा ब्रिटेन से आज भी जारी है।  

         कहते हैं नदी जब उफान पर होती हैं तब वह विशालकाय चट्टानों को भी फोड़ अपना रास्ता बना लेती है। जब मलाला के स्वर भी तीव्र वेग से बुलंद ईरादों के साथ प्रस्फुटित हुए, तब कट्टर तालिबानी फरमानों की धज्जियाँ उड़ गई और समूची दुनिया साक्षी बनी नारी की आज़ादी की जिजिविषा की। डायरी लेखन के साथ ही सोशल नेटवर्किंग साइट्स और सार्वजनिक मंचों से भी मलाला ने तालिबानी आतंकियों की कट्टरता, कबिलाई कायदें-कानून व खौफ का खुलासा किया। मलाला की लंबी लड़ाई की बदौलत ही उनकी हमउम्र हजारों लड़कियों को शिक्षा के साथ ही आजादी की रोशनी भी नसीब हुई है। घरों में कैद रहने वाली घाटी की लड़कियाँ अब फिर से स्कूल जाने लगी है, गुलामी से आज़ादी के बड़े-बड़े स्वप्न अब उनकी भी आँखों में सजने लगे हैं। मलाला को आदर्श मान उनका अनुसरण करते हुए दुनियाभर की लाखों लड़कियाँ आज अपने बूते पर अपने अधिकारों की लड़ाई रह रही है। शोषण की शिकार लड़कियों की मसीहा कहाने वाली मलाला ने लड़कियों को न केवल आजादी के स्वप्न दिखाएँ बल्कि अपने अधिकारों को पाने की व स्वप्न को पूरा करने की एक राह भी दिखाई। लड़कियों की शिक्षा के प्रति समाज की संकीर्ण सोच पर यह मलाला की जीत ही है, जिसके चलते मलाला को अंतरराष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार, पाकिस्तान का राष्ट्रीय युवा शांति पुरस्कार, वर्ष 2013 में संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार सम्मान, मैक्सिको का समानता पुरस्कार, साख़ारफ़ पुरस्कार आदि पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। 12 जुलाई को मलाला का जन्मदिन है, जन्मदिन की शुभकामनाओं के साथ अंहिसा से हिंसा पर विजय पाने के उनके ज़ज्बे को मेरा सलाम है।       
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सूचना : मेरा यह लेख 'दैनिक जनवाणी' समाचारपत्र के 12 जुलाई 2014 के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर 'न्यूज फॉर ऑल' पोर्टल के आज के अंक में प्रकाशित हुआ है। ‍पोर्टल पर प्रकाशित लेख को आप इस लिंक http://www.newsforall.in/2014/07/mala-birthday-article.html पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं। कृपया इस ब्लॉग से किसी भी सामग्री के प्रकाशन की स्थिति में साभार दें व सूचनार्थ मेल अवश्य करें। 

गुरू एक कैसे?

गुरू कोई भी हो सकता है। फिर चाहें वह आपका शिक्षक, माता-पिता, बच्चे या मित्र ही क्यों न हो। प्रतिस्पर्धा जीवन में सदैव चलती रहती है। शिष्यों में प्रतिस्पर्धा हो तो अच्छा लगता है परंतु जब गुरू ही बड़े-छोटे की लड़ाई में उलझ जाएँ तो वह गुरू ज्ञान में बड़े होकर भी उदारता में निम्न बुद्धि वाले छोटे हो जाते हैं। मैं कभी गुरू में एकैश्वरवाद का सिद्धांत नहीं मानती। मैं किसी भी एक व्यक्ति को ज्ञान, चरित्र और मानवता के गुणों में उत्कृष्ट नहीं मान सकती। हालांकि इसमें भी कुछ अपवाद होंगे, जो दुनिया की चकाचौंध से दूर हिमालय की कंदराओं में बैठे उस परमपिता परमात्मा से एकाकार करने में ध्यानमग्न होंगे।गुरू, जिसकी हम चरणवंदना कर उन्हें अपने मन मंदिर में पवित्र भावों के साथ भगवान के स्थान पर विराजित करें। वहीं गुरू यदि किसी स्त्री की अस्मिता से खेंले, दूसरे धर्मों का अनादर करें तो उस गुरू की पूजा मैं द्विभाव से डरते-सहमते कैसे कर सकूँगी? कैसे उस गुरू से एकांत में मैं अपने प्रश्नों के समाधान पूछूँगी? कैसे उससे जिरह करूँगी, जो स्वयं पवित्रता की कसौटी पर निम्नतम स्तर पर जा रहा है? इन प्रश्नों का जवाब जिस दिन मुझे मिल जाएगा उस दिन शायद मुझे अपना ज्ञानी गुरू भी मिल जाएगा।
       
मेरी मानें तो गुरू अनेक हो सकते हैं। वे आपसे छोटे भी हो सकते हैं, आपके हमउम्र भी हो सकते हैं और आपसे बड़े भी हो सकते हैं। मित्र भी गुरू है और शत्रु भी गुरू है बशर्ते हैं उनके उपदेश या ठोकर से आपके जीवन को कोई नई दिशा मिली हो। मैं तो उसे ही अपना गुरू मानती हूँ, जिसने जीवन के संघर्षों में मुझे संबल प्रदान किया। जब दुनिया ने साथ छोड़ा तो वह साथ खड़ा नजर आया। मेरे लड़खड़ा कर गिरने पर मेरा हाथ नहीं थामा पर मुझे अपने बूते पर उठकर खड़े होने को प्रेरित किया। मेरे उस गुरू कहाने वाले घनिष्ट मित्र को बारंबार नमन है।
- गायत्री शर्मा 

Friday, July 11, 2014

कहाँ सो रहे है आप?

मेरे शब्दों को सूखा खा गया
भावों को सूरज निगल गया

माटी सूखे का मातम मना रही है
पेड़ों की हरियाली पर अब शुष्णता छा रही है

अब तो आँसू भी सूख-सूखकर रो रहे है
पानी बाबा आप कहाँ छुपकर सो रहे है?

- गायत्री   

Wednesday, July 9, 2014

‘निकर’ में खिल रहें ‘कूलनेस के फूल’

-          गायत्री शर्मा
‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान’, आजकल की अजीबोगरीब फैशन को देख मेरी ज़ुबाँ पर तो बार-बार यही गाना आता है। समय के बदलाव के साथ हमारा खान-पान बदला, आचार-विचार बदलें पर ये क्या नए जमाने के फैशन ने तो स्त्री-पुरूष दोनों के पहनावें में एकरूपता लाकर सबको एक जैसी ‘निकर’ धारण करवा दी? एक जमाने में पैंट-शर्ट, धोती-कुर्ता और कुर्ते-पायजामें धारण करने वाले पुरूषों के साथ ही अब साड़ी व सलवार कमीज़ में अपने बदन को लपटने वाली स्त्रियाँ भी फैशनजनित बीमारी से ग्रसित हो बेखौफ निकरों में घुम रही है। निकरप्रेमियों से उनके इस नए फैशन प्रेम के पीछे कारण पूछों तो जवाब मिलता है कि ‘ये आराम का मामला है’। देखिएँ, जहाँ आराम का मामला हो, वहाँ हमारे खलल करने का तो सवाल ही नहीं होता इसलिए अपने प्रश्नों की पोटली को समेटते हुए निकर रूपी चड्ढ़ों पर खिल रहे फूलों को ही देखकर ही मंद-मंद मुस्कुराते हुए मैं चुपचाप वहाँ से खिसक लेती हूँ।

‘चड्ढ़ी’ का अब्बा बन अवतरित हुए ‘चड्ढ़े’ यानी कि ‘निकर’ का फैशन आजकल के नौजवानों पर इस कदर छाया है कि अब वे बाजार, ट्रेन, बस और यहाँ तक कि छुट्टी वाले दिन दफ्तरों में भी निकर पहनकर ‘कूल-कूल’ होने का अनुभव कर रहे हैं। अक्सर हम छोटे बच्चों को निकर पहनाते हैं लेकिन बच्चे भी जब बड़े थोड़े बड़े होने लगते हैं। तब वे भी निकर को ‘ना’ कह जल्दी से पैंट धारण कर बड़ा बनने के लिए प्रमोशन चाहते हैं। नौनिहालों की कमर से तो निकर निकल गई पर अंग्रेजों की इस निकर को हमारे बड़ों ने बड़ा कसकर पकड़ लिया है। आजकल के बच्चों के लिए ‘कल की बात’ बन चुकी निकर अब उनके बड़ों का ‘आज’ बन रही हैं। तभी तो बेटे-बेटी की निकर को पापा-मम्मी और पापा-मम्मी के कपड़ों को उनके बच्चे नए जमाने की फैशन मानकर शान से पहन रहें है।

यदि आपको भी फैशन के नाम पर भाँति-भाँति की प्रयोगधर्मिता की शिकार हुई निकरों व उनकों धारण करने वाले महानुभावों के दर्शन लाभ लेना है तो इसके लिए आपको अपने नजदीकी रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्मों पर आने वाली लंबी दूरी की ट्रेनों पर नज़रे गड़ानी होगी। प्लेटफॉर्म पर ट्रेन के रूकते ही आपको एक के बाद एक कई निकरधारी चूहों की तरह अपने एसी रूपी बिल से बाहर निकलकर खाने की तलाश में इधर-उधर घुमते नजर आ जाएँगे। निकरधारियों की संख्या में इजाफें व निकर की लंबाई में कमी को देखने के लिए आपको थर्ड एसी से फर्स्ट एसी कोच की ओर रूख करना होगा। इतना करते ही निकरधारियों के दर्शन की आपकी अधूरी ख्वाहिश अवश्य ही पूरी हो जाएगी। राजधानी, शताब्दी, गरीब रथ एक्सप्रेस जैसी गाडि़यों में तो ऐसे प्राणी बहुतायत में अवश्वमभावी रूप से पाएँ जाते हैं। अंग प्रदर्शन, फैशन, स्टेटस, कंफर्ट आदि बहाने है निकर को पैंट, सलवार व साड़ी का रिप्लेसमेंट बनाने के। नौजवान तो नौजवान आजकल बुर्जुग अंकल-ऑटी भी निकर पहनना अपना स्टेटस सिंबल समझ रहे हैं। नन्हीं-नन्हीं जिस दुर्लभ निकर के दर्शन कल तक हमें बच्चों की स्कूल यूनिफॉर्म में व आरएसएस के कार्यकर्ताओं की कमर पर होते थे वहीं दुर्लभ निकर अब सुलभता से 24 से लेकर 84 साइज़ तक की कमर में फिट बैठ नौजवानों से लेकर बुर्जुगों तक को फैशन के नाम पर हिट करा रही है।
आजकल तो ‘बड़े लोग, छोटी निकर’ का चलन भी जोरों पर है। जितना बड़ा आपका ओहदा, उतनी ही छोटी आपकी निकर। यह सब देखते हुए अब वह दिन दूर नहीं है जब ‘मोदी कुर्ते’ की तरह ‘राहुल निकर’ भी बाजारों में बड़े ब्रांड के रूप में अवतरित हो धड़ल्ले से बिकेगी, जिसे आप और हम प्री बुकिंग कर सबसे पहले खरीदकर पहनना चाहेंगे। आखिर आराम का मामला जो है। अंत में ‍चलते-चलते सभी निकरधारी अंग्रेजों को प्रणाम करते हुए मैं उन्हें धन्यवाद देना चाहूँगी कि गर्मी की मार झेल रहे भारत में कम से कम उनकी निकर के फूल व पत्तियाँ तो हमें कुछ राहत का अहसास करा रहे हैं।
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सूचना : मेरे इस लेख का प्रकाशन उत्तरप्रदेश के प्रमुख दैनिक समाचार-पत्र 'जनवाणी' के 9 जुलाई 2014 के अंक में व मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर से प्रकाशित सांध्य दैनिक 'अक्षरवार्ता' के 7 जुलाई 2014 के अंक में हुआ है। कृपया इस ब्लॉग की किसी भी सामग्री का प्रयोग करते समय साभार अवश्य देंवे व इस संबंध में मुझे सूचनार्थ मेल या संदेश भेंजे। 

Tuesday, July 8, 2014

पाणी बाबा, भाटा से दई पाड़ूँगा थने ...

- गायत्री शर्मा  
घणा दन वई गिया वाट जोता-जोता। पण यो पाणी है कि अपणा गाम रो रस्तों भूली ज गियो। काले मैं वाटे-वाटे जई री थी तो गाम रा गोयरे ठूठड़ा सा उबा झाड़का मुंडो लटकायो आसमान में देखी रिया था। मैं वासे पूछियों – ‘कई वई गियो रे भई! ऊपरा से कोई राकेट तो नी पड़ी रियो?’ म्हारों सवाल हुणी ने झाड़का बोल्या – ‘बेन! राकेट पड़ी जातो तो हऊ रेतो। हमी तो अठे पाणी रा वना ज मरी गिया हा।‘ काई करो झाड़का हे भी हाची ज किदो। पाणी वगर तो मनक भी हुक्की जावें तो ई बापड़ा झाड़का कद तक ऊबा रेगा? वाट में आगे चालता मह्ने भैं ने ऊका पाड़ा-पाड़ी मल्या। वणा से मैं पूछ्यो – ‘कई वई गियो रे बेन! आज तू हुक्की-हुक्की क्यूँ लागी री है? नन्दराम थने बखे खावा-पिवा रो दे कि नी?’ भैं बोली – ‘बेन! खावा रो तो ऊ दें पण मह्ने घणी तरे लागे। असा में पाणी री कमी रा चालता ऊ मह्ने दनभर में एक ज बाल्टी पाणी दे। अब थे ज वताओं कि पाणी बगैर यो सरीर हुकेगा कि रेगा?’ मैं किदो तू हाची ज कई री हो भैं बेन। मैं से राम-राम करी ने वाट में मैं थोड़ी ओर आगे चाली तो म्हारी नजर हूकी पड़ीगी नदी पे पड़ी। विके देखी ने म्हारों माथो तो चकरई गियों। मैं नदी से कियो ‘नदी बेन, काल तक तो गाम रा लोक्का थारा में हपड़वा ने आता था। आज तू ऊजड़ कस्तर वई गी है? थारो हगरों पाणी कठे गियो? नदी बोली कई वतऊ रे बेन, सूरज देवता म्हारों आखों पाणी पी गया। अब तो पाणी रा वगर मैं अपणा आखरी दन गण री हूँ। कई नगे कद मरी जाऊँ।‘ मैं किदो – ‘नी रे बेन! हांज रा टेम थमी सुभ-सुभ बोलो। पाणी बाबा घणा चमत्कारी है। वी जद आवेगा तो सबरा हंडे थारों दुख भी कटी जावेगा, ने तू फेर से पैला हरकी उगलम-सुगलम पाणी से भरई जाएगा।‘
हाची कूँ तो पाणी बाबा रा आवा री वात तो मह्ने झूठी लागे पण अपणों ने लोगा रो मन हमजावा वस्ते कई तो केणो ज पड़े। कई रे पाणी बाबा! तू हूणे की नी हुणे। थारा मनुहार करवा वस्ते कोई लोक्का तो हवन करी रिया है ने कोई भेरू बाबा रा आगे ढ़ोल वजई रिया है। पण तू है कि बेरो ज वई गियो है। अब गाम रा छोर-छोरी भी मैदान में जईने पाणी बाबा आयो ... गीत गाता-गाता थाकी गिया है। झाड़का, ढांढ़ा-ढ़ोर, नदी ने मनक सब तरे मरी रिया है पण तू है कि हेकड़ी दिखई रियो है। अब अई जा ने सबने खुस करी जा। तू अब 15 दन में नी आयो तो मैं थने भाटा ती दई पाड़ूँगा फेर मत किजे कि मैं तो थारा गाम आई ज रियो थो। यो सब ढ़ोंग फितूर करवा री कई जरूरत थी।         

सूचना : मेरे इस लेख का प्रकाशन उज्जैन से प्रकाशित होने वाले सांध्य दैनिक समाचार-पत्र 'अक्षरवार्ता' के दिनांक 8 जुलाई 2014 के अंक में हुआ है। कृपया 'चरकली' ब्लॉग से कोई भी सामग्री प्रकाशित करते समय साभार देने के साथ ही मुझे इस संबंध में अवश्य सूचित करें। 


कल प्रेम आया था ...


कल रात स्वप्न में हुआ प्रेम से साक्षात्कार
वह बड़ा घबराया सा हैरान-परेशान था
प्रेम बोला - तू बता मैं क्या करूँ?
जमाने वाले मेरे पीछे पड़े हैं
प्रेम का नामोनिशां मिटाने पर अड़े है
ऐसे में बस तू ही मेरा प्यारा है
अब मुझे तेरा ही सहारा है।

संर्कीणता के सवालों में उलझाकर
कानून की हथकडि़याँ लगाकर
रिश्तों की बेडि़यों में बाँधकर
गतिबाधित कर देंगे मेरी
समाज के ठेकेदार
ऐसे में तू बता मेरी प्रिये
मैं कैसे करूँगा तुझे प्यार?

गर ना रहा मैं तो
ज़माना यह समझ जाएगा
कहेगा वह प्रेम डरपोक था
आज आया है कल चला जाएगा।

मेरा हश्र देख कोई भी न करेगा
प्रेमियों की वफा पर ऐतबार
फिर कोई प्रेमी न करेगा
शाहजहाँ-मुमताज़ और हीर-राँझा के
अमर प्रेम के उदाहरणों की बात।

मैंने कहा- प्रेम! संघर्ष ही तेरा जीवन है
तू बढ़ता चल, पीछे मुड़कर मत देख
मरने से तू क्यों घबराता है?
तेरे जीने की जिजिविषा तुझे
मौत के मुँह से भी खींच लाएँगी
तेरी हिम्मत के आगे तो
संर्कीणता की सौ बेडि़याँ भी
टूटकर बिखर जाएगी।

तेरी हिम्मत के आगे तो
संर्कीणता की सौ बेडि़याँ भी


टूटकर बिखर जाएगी।
-   गायत्री शर्मा

जिम्मेदारी से जिरह करती लापरवाही


-          गायत्री शर्मा ‍
बच्चों की जिज्ञासु प्रवृत्ति कई बार उनसे वह काम करवा देती है, जिसके परिणामों से वे पूरी तरह से अनभिज्ञ होते हैं। यहीं वजह है कि गड्ढ़े को देखने की उत्सुकतावश उसके नजदीक गया बच्चा कभी बोरवेल के गड्ढ़े में गिर जाता है तो कभी पतंग पकड़ने के लालच में छत की मुंडेर से गिर जाता है। कभी वहीं अल्पायु बच्चा माता-पिता के अतिशय प्यार के चलते कार का स्टेयरिंग थाम दुर्घटनाओं को अंजाम देता है तो कभी अवयस्कता की उम्र में बलात्कार जैसे संगीन अपराध का दोषी पाया जाता है। याद रखिएँ बच्चे की सुरक्षा व सही परवरिश हर माँ-बाप की पहली जिम्मेदारी है, जिसमें हुई चूक से घटित हुए अपराधों के प्रथम दोषी माँ-बाप ही है। यह तो हुई अपरिपक्व मानसिकता व जिज्ञासा वश बच्चों से हुई गलतियों की बात लेकिन जब माँ-बाप की गलती व लापरवाही किसी बच्चे की मौत का सबब बने तो वह गलती किसी भी कीमत पर नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती है। भोपाल के न्यू मार्केट स्थित कपड़ा व्यवसायी दीपक जैन के ढ़ाई वर्षीय पुत्र अतिशय जैन की कार में दम घुटने से हुई मौत माँ-बाप की घोर लापरवाही का ताजा तरीन उदाहरण है।
कहते हैं रिश्तों में प्रमोशन जिम्मेदारियों के बढ़ने का संकेत होता है। संतान को जन्म देने के साथ ही माँ-बाप की जिम्मेदारियों में भी इज़ाफा होने लगता है। बच्चों के बड़े होने तक उनकी हर छोटी-बड़ी फरमाइशें पूरी करने के बहाने माँ-बाप भी अपने बचपन को जी लेते हैं। नन्हें की किलकारीयों पर ठहाके मारने वाले, उसकी हर तकलीफ पर आह भरने वाले, घोड़ा बन नन्हें को पीठ पर बैठाने वाले, वह माँ-बाप ही होते हैं, जो अपने नन्हों की जिद पर कभी घोड़ा बन जाते हैं ‍तो कभी सांता क्लॉज बन बच्चों को क्षणिक खुशियाँ उपहार में दे जाते हैं। हर दुआ में ईश्वर से अपनी जिंदगी के बदले संतान की खुशियों की चाह करने वाले माँ-बाप अपने ढ़ाई साल के बच्चे के प्रति कैसे इतने लापरवाह हो सकते हैं कि वह उसे कार में लॉक कर घंटों तक अकेला छोड़ जाएँ?

लापरवाही की भी हद होती हैं। जब लापरवाही अपनी हदें लाँघ जाती है तब वह षडयंत्र या साजिश कहलाती है। अतिशय जैन की कार में दम घुटने से हुई मौत जहाँ एक ओर लापरवाही से हुई चूक लगती है तो वहीं दूसरी ओर जानबूझकर की गई गलती की ओर भी ईशारा करती है। बच्चे को कार में सोता छोड़कर दुकान के काम में लग जाने को एक बारगी हम दीपक जैन व उनके पिता कमल जैन की चूक भी मान लें पर क्या बच्चे के प्रति जवाबदेही में सबसे अधिक सजग रहने वाली घर की महिलाएँ भी इतनी लापरवाह हो सकती है कि वे भी अतिशय की सुध लेना भूल गई? अतिशय के साथ कार में बैठी उसकी दादी व माँ को ढ़ाई घंटे तक बच्चे की याद कैसे नहीं आई? आपकी जानकारी के लिए न्यू मार्केट भोपाल के खचाखच भीड़ से भरे बाजारों में प्रमुख है। जहाँ दिन भर लोगों की आवाजाही लगी रहती है। ऐसे में दोपहर के वक्त क्या किसी की भी नजर सड़क पर खड़ी कार में दम घुटने से बिलखते बच्चे पर नहीं पड़ी? यह बात आसानी से किसी के गले नहीं उतरती। बच्चे की मौत के बाद अस्पताल से पोस्टमार्टम कराएँ बगैर उसे ताबड़तोड़ दफना देना इस घटना के पीछे साजिश के कई सवाल खड़े करता है। जिनके जवाब के लिए फिलहाल हमें पुलिस की जाँच रिर्पोट का ही इंतजार करना पड़ेगा। नन्हें बच्चे की देखरेख में इतनी बड़ी चूक कोई सामान्य बात नहीं है। यदि चूक जानबूझकर की गई है तो इस चूक के दोषियों को जरूर सजा मिलनी चाहिएँ फिर चाहें वह बच्चे माँ-बाप ही क्यों न हो। जिससे कई अन्य गैरजिम्मेदार पालको को भी सबक मिले। याद रखिएँ बच्चे की सही परवरिश करना प्रत्येक माँ-बाप का सबसे बड़ा दायित्व है। यह दायित्व तब और बढ़ जाता है, जब बच्चा इतना छोटा हो कि वह अपनी सुरक्षा स्वयं न कर सके। कहते हैं बच्चों के संस्कारों की पाठशाला भी उसके माँ-बाप होते है और उसकी बुरी आद‍तों की पाठशाला भी माँ-बाप ही होते हैं खासकर तब जब बच्चा 5 साल से कम उम्र का हो। माता-पिता को चाहिएँ कि वह अपने बच्चों की प‍रवरिश व सुरक्षा पर पूरा ध्यान दें। देश के हर बच्चे को उसकी जिंदगी जीने का व खुश रहने का पूरा-पूरा अधिकार है। बच्चों से उनका बचपन न छीनें व उन्हें अच्छी परवरिश देकर एक जिम्मेदार माँ-बाप होने का परिचय दें।   
नोट : मेरे इस लेख का प्रकाशन राष्ट्रीय दैनिक 'कैनविज टाइम्स' के 8 जुलाई 2014 के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर व उज्जैन से प्रकाशित सांध्य दैनिक 'अक्षरवार्ता' के 6 जुलाई 2014 के अंक में हुआ है। कृपया मेरे ब्लॉग की किसी भी सामग्री का प्रयोग करने पर साभार अवश्य दें व इस संबंध में मुझे अवश्य अवगत कराएँ। 


Tuesday, July 1, 2014

एक आस, कुछ विश्वास .... बाकी डॉक्टर के प्रयास

(1 जुलाई डॉक्टर्स डे विशेष कविता)

-         
उसे देख जागती है
जीने की आस
वह डॉक्टर ही है
जो जगाता है धड़कने लौटाने की आस
अक्सर लड़ जाता है वह खुदा से
दवा और अनुभवों के हथियार थामें
तो कभी वक्त से खूनी जंग कर वह  
कुछ धड़कने उधार ले आता है
वह डॉक्टर ही है जो
मौत को भी मात दे जाता है


बुझते दिए में भी
उम्मीद की लौ जल जाती है
डॉक्टर के आगे हर दर्द की
जैसे छुट्टी ही हो जाती है
दर्द देकर दर्द पर विजय का हूनर  
डॉक्टर को ही आता है
मानवता के इन मसीहाओं का जीवन
सतत सेवा भाव में ही गुजर जाता है

नमन है हूनर के इन बाजीगरों को
जो जगाते है जीवन के स्वप्न
विश्वास की ऑक्सीजन पर
हौंसलों की हूनरमंदी से
बस एक मुस्कुराहट में
चुटकीभर उम्मीदों पर
कर देते हैं नामुमकिन को मुमकिन

प्रयासों की पुरजोर कोशिशों से
एक चुटकी उम्मीद के बदले
ला देते हैं छप्पर फाड़ खुशियाँ
दे देते हैं नवजीवन
नव उम्मीदें और नवदुनिया
नवस्वप्नों के दीदार को
नमन है मानवता के इन फरिश्तों को
नमन है मानवता के इन फरिश्तों को  ... 

-  गायत्री शर्मा
नोट : मेरी यह कविता उज्जैन से प्रकाशित समाचारपत्र सांध्य दैनिक अक्षरवार्ता के 1 जुलाई 2014, मंगलवार के अंक में पृष्ठ क्रमांक 9 पर भी प्रकाशित हुई है। जिसे आप www.askarwarta.com पर जाकर पढ़ सकते हैं। कृपया मेरे ब्लॉग पर प्रकाशित कोई भी सामग्री मेरी अनुमति के बगैर उपयोग या प्रकाशित न करें।