Monday, October 18, 2010

माँ ने देखा जलता हुआ रावण

इंदौर में दशहरे(रावण दहन) के अगले दिन 'बासी दशहरा' मिलने की परंपरा है। जिसमें 'पड़वा' की भाँति लोग एक-दूसरे के घर जाकर उन्हें सोना पत्ती (उस्तरा नामक पेड़ की पत्तियाँ) देकर दशहरे की बधाईयाँ देते हैं। चूँकि मैं रतलाम शहर से हूँ इसलिए इन इंदौरियों के कुछ त्योहारों से मैं भी थोड़ी बहुत अपरीचित हूँ। दशहरे की नहीं पर मेरे यहाँ भी माता की 'नवरात्रि' की धूम इंदौर के समान ही रहती है। यही कारण है कि यहाँ की नवरात्रि का मैंने भरपूर लुत्फ उठाया।

कल रात को ही मेरा इंदौर में रहने वाली अपनी मौसी के घर जाना हुआ। उनके घर तक पहुँचते-पहुँचते रास्ते में मेरी मुलाकात आकर्षक वेषभूषा में सजे कई रावणों से हुई। जो बड़ी ही प्रसन्नचित्त मुद्रा में पटाखों से लैस होकर दाँत और मुँह दिखाकर मुस्कुरा रहे थे। मैंने भी मन ही मन इन रावणों से यही कहा कि मुस्कुरा ले बेटा!आखिरकार कुछ देर बाद तो तुझे पटाखों से ही जलना है। तब तू रोएगा और तुझे जलाने वाले मुस्कुराएँगे।

तीन-चार जलते हुए रावणों का दीदार करने के बाद मैं पहुँची अपनी मौसी के घर। उनके घर के पड़ोस में ही गरबा पांडाल था। जहाँ दशहरे के दिन गरबों के पुरस्कार वितरण का कार्यक्रम चल रहा था। बालिकाओं को पुरस्कार वितरित करने के बाद वहाँ छोटी से लेकर बड़ी लड़कियों के अलग-ग्रुप में गरबे हुए। इन सभी के गरबे समाप्त होने के बाद कुछ महिलाओं के साथ मैंने भी राजस्थान के लोकनृत्य घूमर के गीतों पर नई-नई स्टेप्स के साथ गुजराती गरबे किए। रात्रि की करीब एक बजे तक हमने लगातार गरबे किए।

अलसुबह कॉलोनी में देवी माँ की प्रतिमा विसर्जन हेतु ले जाने के लिए लोडिंग रिक्शा मँगाया गया। ‍सुबह-सुबह बिस्तर से उठकर मुँह धोकर मैं भी वहाँ पहुँची और मैंने भी माँ शेरावाली के जयकारे लगाने के साथ देवी प्रतिमा पर मुट्ठी भर कुमकुम उड़ाकर माँ को बिदा किया। इतने सालों में आज पहली बार न जाने क्यों माँ को बिदा करते समय मुझे बहुत रोना आ रहा था और मैं जैसे-तैसे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण कर रही थी। उस वक्त मुझे लग रहा था मानों मेरा कोई अपना मुझसे बिछड़ रहा है। जिसे चाहकर भी मैं रोक नहीं पा रही हूँ। कुछ इस तरह माँ अपने मायके से ससुराल चली गई पर अपनी मीठी यादे मुझे दे गई।

आज के दिन कई स्थानों पर मैंने 'नवरा‍त्रि' हेतु माँ की विराजित प्रतिमा के दर्शन किए। रास्ते में कुछ प्रतिमाएँ तो ढोल-ढ़माकों के साथ विसर्जन हेतु ले जाई जा रही थी। वहीं कुछ गरबा-पांडालों में माँ थोड़े दिन और रूककर शरद पूर्णिमा के आने का इंतजार कर रही है क्योंकि उस दिन उनकी अपने माइके से बिदाई होनी है। मुझे तो यह सब देखकर ऐसा लगा जैसे कि कुछ स्थानों पर दशमी के दिन विसर्जन हेतु जाने से ना-नुकूर करने के पीछे माँ का मकसद संभवत: रावण दहन देखकर ही विसर्जन हेतु जाना होगा। आखिरकार बच्चों में रावण दहन देखने का अतना क्रेज है तो फिर माँ में क्रेज क्यों नहीं होगा?

लेकिन कुछ भी कहो माँ की नवरात्रि में नौ दिनों तक हर गली-मोहल्ले में जो रौनक थी। वह रौनक अब सन्नाटे में तब्दील हो गई है और इन दिनों हर किसी की तरह मैं भी लोगों से यही कह रही हूँ कि यार!नवरात्रि कब चली गई, मुझे तो पता ही नहीं चला।

- गायत्री शर्मा

1 comment:

सागर नाहर said...

एकदम जीवंत वर्णन लगा। बढ़िया पोस्ट।
राजस्थान में मेरे गाँव में भी एक विशाल पशु मेला भरता है और उसकी पूर्णाहूती होती है रावण दहन से।
बरसों से रावण दहन नहीं देखा, परन्तु आपकी पोस्ट ने बचपन का मेला और रावण दहन और बहुत से तीज-त्यौहार याद दिला दिये।
धन्यवाद गायत्रीजी।

वैसे एक खास बात शायद आपको पता ना हो पर हमारे यहाँ मेवाड़ में भी पुदकती सी चिड़िया को चरकली ही कहते हैं, और भाषा भी मेवाड़ी और माळवी बहुत मिलती जुलती है।