Monday, December 2, 2013

सुदामामय हुए जब कृष्ण

सच्ची मित्रता का अनुपम उदाहरण कृष्ण-सुदामा की मित्रता है। अमीर-गरीब, जात-पात और ऊँच-नीच के भेदभाव से परे यह मित्रता दुनिया के सामने सदियों तक एक मिसाल बनी रहेगी। जिस प्रकार से कृष्ण-राधा से प्रेम को पाना अब तक नामुमकिन है। ठीक उसी तरह कृष्ण-सुदामा सी मित्रता को पाना मनुष्य मात्र के लिए नामुमकिन ही होगा। कृष्ण की रासलीला हो या मित्रता। यह किसी में एक आलौलिक आनंद है। जो पाने पर मनुष्य इस दुनिया से दूर आनंद के अतिरेक की एक अलग ही दुनिया में प्रवेश कर जाता है।
           ठकुराई कर अपनी प्रजा पर राज करने वाले मेरे ठाकुर जी का एक तंगहाल गरीब सुदामा से रिश्ता और वह भी इतना प्रगाढ़ की, कृष्ण सपत्नीक इस गरीब ब्राह्मण के पाद प्रक्षालन करे। वाकई में समझ से परे है। सच कहूँ तो मित्रता का यह रिश्ता भौतिकता की चकाचौंध से रहित आत्मा के गहरे तारों से जुड़ा रिश्ता था। जिसे सखा भाव की प्रेमिल भावनाओं के मजबूत तारों ने जोड़े रखा था। इस रिश्ता आपसी समझ और प्रेम की उस उच्च सीमा पर जा पहुँचा था। जहाँ शब्द मूक हो गए थे और भावनाएँ प्रधान।          
               कहते हैं जब प्रेम की प्रगाढ़ता बँधनों की दरकार से परे हो जाती है तो उससे उपजने वाला रिश्ता दुनिया के हर रिश्ते से बड़ा व मजबूत हो जाता है। ऐसे ही वक्त कहा जाता है कि दो लोगों में एक का दिल दूसरे के और दूसरे का दिल पहले के सीने में धड़क रहा है। दुनिया की भाषा में इसे पागलपन, बावलापन और फक्कड़पन भी कहते हैं परंतु इसमें भी जो आनंद है। वह आलौकिक आनंद है। कई बार पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका और मित्रता के रिश्ते में इस तरह का प्रेम व समझ का वह स्तर बिरले ही देखने को मिलता है। लेकिन  कृष्ण और सुदामा के बीच हमें आलौकिक प्रेम और घनिष्ठ मित्रता दोनों ही देखने को मिलती है। जिसके कई उदाहरण श्रीमद्भागवद्गीता के प्रसंगों में भी दिए गए हैं।
               
एक बार तो जब गरीब सुदामा अपनी पत्नी के समझाने पर आर्थिक मदद लेने हेतु कृष्ण से मिलने आएँ। तब सुदामा के बगैर बोले ही कृष्ण ने अपने मित्र के दिल का हाल जान लिया और राजा के सिंहासन पर बैठ ठकुराई करने वाला 'लाला' अपने गरीब मित्र सुदामा के आने का समाचार सुनकर सिंहासन से उठ दौड़ा-दौड़ा उनसे मिलने चला गया।
                प्रेम के वश जिस तरह कृष्ण ने सारथी अर्जुन का रथ हाका था। ठीक उसी तरह ‍सुदामा के आने पर भी कृष्ण ने ठकुराई भूल अपने मित्र को सिंहासन पर बैठाया और उनके चरणों को धोया। यहाँ मित्रता में प्रेम का अतिरेक इतना अधिक था कि ‍वर्षों बाद मित्र के आगमन की खुशी में कृष्ण की भावनाएँ उनके आँसूओं के रूप में बाहर निकलकर जल के रूप में सुदामा के पाद प्रक्षालन कर रही थी। मित्रता के इस अद्भुत दृश्य को स्मरण करके मुझे बारम्बार आनंद आता है।

देखी सुदामा की दीन दसा, करूना करिके करूनानिधि रोये। 
पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जलसों पग धोये।।    


काश कि ईश्वर ऐसी मित्रता सबको दें, जिस पर हमें या यूँ कहें कि दुनिया को गर्व हो सके। यदि ईश्वर हमें इतना भी न दे तो बस यह करें कि मित्रता को अपमानित व कलंकित होने से बचाएँ रखे। इसमें पवित्रता के भाव को सदैव जीवित रखे।

- गायत्री 

1 comment:

संजय जोशी "सजग " said...

निस्वार्थ मेत्री का अनुपम उधाहरण