Friday, July 25, 2014

कल आई थी बूँदे ...

 मैंने बूँदों को देखा था
रोशनी के साबुन से
नहाते हुए
हवा के तौलिये से
बदन सुखाते हुए
बूँदों का मादक यौवन
तब शबाब पर आता था
जब भौंर का सूरज
उन्हें मखमली रोशनी का
आईना दिखाता था
टिप-टिप की पायल पहनी बूँदे
कल आई थी मेरे बागीचे में
बिखर गई थी खुशियाँ चहुँओर
बूँदों की बारात के ठहरने पर  
पत्तों ने बूंदों के लिए
मखमली बिछौना सजाया
घास के तिनकों ने उन्हें 
अपने सिर माथे पर बैठाया   
पर बूँदे तो परदेशी थी
क्षणिक मिलन को आई थी
ठहरना उसे कहाँ आता था
कुछ पल के बाद
भूमि से आलिंगन कर
उसे तो भूमि के गर्भ में ही
समाना था
चंचल बूँदे टिप-टिप करती आई थी

और बहुत खामोशी से चली गई
छोड़ गई कुछ मीठी यादें
जो बरखा की झडि़यों संग
फिर ताजा हो जाती है
बूँदे हर बार
टिप-टिप कर आती है
और खामोशी से
दबे पाँव चली जाती है ..। 
   गायत्री शर्मा

नोट : मेरी इस कविता का प्रकाशन उज्जैन, मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र ‘अक्षरवार्ता’ व ‘खरी न्यूज डॉट कॉम’ पोर्टल के 24 जुलाई 2014, गुरूवार के अंक में हुआ है। कृपया इस ब्लॉग से किसी भी सामग्री का उपयोग या प्रकाशन करते समय मुझे सूचनार्थ मेल प्रेषित करना व साभार देना न भूलें। 
http://kharinews.com/news/literature-news/%E0%A4%95%E0%A4%B2-%E0%A4%86%E0%A4%88-%E0%A4%A5%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A5%82%E0%A4%81%E0%A4%A6%E0%A5%87/




5 comments:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज रविवार’ २७ जुलाई २०१४ की बुलेटिन -- कहाँ खो गया सुकून– ब्लॉग बुलेटिन -- में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार!

गायत्री शर्मा said...

मेरी कविता के प्रकाशन हेतु आपका बहुत-बहुत आभार सेंगर जी।

संजय भास्‍कर said...

बहुत खूबसूरत ब्लॉग मिल गया, ढूँढने निकले थे। अब तो आते जाते रहेंगे।

गायत्री शर्मा said...

कहते हैं ना ढूँढ़ने से खुदा मिल जाता है, ये ब्लॉग क्या चीज है। आपका इस ब्लॉग पर स्वागत है संजय जी। इस ब्लॉग पर आते-जाते रहिएँ। आपको बहुत कुछ अच्छा पढ़ने को मिलेगा।

संजय सिह said...

बूँद और जीवन एक समान है, अच्छी कविता के लिए धन्यवाद।