Tuesday, July 8, 2014

कल प्रेम आया था ...


कल रात स्वप्न में हुआ प्रेम से साक्षात्कार
वह बड़ा घबराया सा हैरान-परेशान था
प्रेम बोला - तू बता मैं क्या करूँ?
जमाने वाले मेरे पीछे पड़े हैं
प्रेम का नामोनिशां मिटाने पर अड़े है
ऐसे में बस तू ही मेरा प्यारा है
अब मुझे तेरा ही सहारा है।

संर्कीणता के सवालों में उलझाकर
कानून की हथकडि़याँ लगाकर
रिश्तों की बेडि़यों में बाँधकर
गतिबाधित कर देंगे मेरी
समाज के ठेकेदार
ऐसे में तू बता मेरी प्रिये
मैं कैसे करूँगा तुझे प्यार?

गर ना रहा मैं तो
ज़माना यह समझ जाएगा
कहेगा वह प्रेम डरपोक था
आज आया है कल चला जाएगा।

मेरा हश्र देख कोई भी न करेगा
प्रेमियों की वफा पर ऐतबार
फिर कोई प्रेमी न करेगा
शाहजहाँ-मुमताज़ और हीर-राँझा के
अमर प्रेम के उदाहरणों की बात।

मैंने कहा- प्रेम! संघर्ष ही तेरा जीवन है
तू बढ़ता चल, पीछे मुड़कर मत देख
मरने से तू क्यों घबराता है?
तेरे जीने की जिजिविषा तुझे
मौत के मुँह से भी खींच लाएँगी
तेरी हिम्मत के आगे तो
संर्कीणता की सौ बेडि़याँ भी
टूटकर बिखर जाएगी।

तेरी हिम्मत के आगे तो
संर्कीणता की सौ बेडि़याँ भी


टूटकर बिखर जाएगी।
-   गायत्री शर्मा

6 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन आज की बुलेटिन, रेल बजट की कुछ खास बातें - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

गायत्री शर्मा said...

आपका बहुत-बहुत आभार ब्लॉग बुलेटिन।

Mukesh Kumar Sinha said...

behtareen ........... sundar bhaw!!

गायत्री शर्मा said...

शुक्रिया मुकेश जी।

संजय भास्‍कर said...

प्रशंसनीय रचना - बधाई

आग्रह है-- हमारे ब्लॉग पर भी पधारे
शब्दों की मुस्कुराहट पर ...विषम परिस्थितियों में छाप छोड़ता लेखन

गायत्री शर्मा said...

प्रतिक्रिया हेतू शुक्रिया संजय जी। मैं जरूर आपके ब्लॉग पर आऊँगी।