Sunday, July 11, 2010

कराह उठी मानवता


कराह उठी मानवता
मौत के इन दंरिदों से

बू आती है दगाबाजी की
पड़ोसी के इन हथकंडों से।

हर बार बढ़ाया दोस्ती का हाथ
प्यार नहीं लाशे बनकर आई उपहार
बस अब खामोश बैठों देश के सत्ताधारों
अब वक्त है करदो शासन जनता के हवाले।

जेहाद का घूँट जिसे पिलाया जाता
भाई को भाई का दुश्मन बताया जाता
वो क्या जाने प्यार की भाषा
प्यार निभाना जिसे न आता?

मेरा देश जहाँ है शांति और अमन
दुश्मन नहीं सबके दोस्त है हम
जरा आँखे खोलों ऐ दगाबाज नौजवानों
अपने भटके कदमों को जरा सम्हालों।

जानों तुम उन माओ का दर्द
जिसने खोया है अपना लाल
सेज सजाएँ बैठी थी दुल्हन
पूछे अब पिया का हाल।

उन अनाथों के सपने खो गए
माँ-बाप जिनके इन धमाको में खो गए
ममता लुटाते सगे-संबंधी सारे
माँ-बाप की लाशों से लिपटकर रोते ये बेचारे।

आतंक का तांडव मचाकर
क्यों माँगता है तू मौत की भीख?
ऐ दरिंदे जरा सोच उन लोगों के बारे में
जो हो गए अब लाशों में तब्दील।

कब्रगाह बने है आज वो स्थान
जहाँ बसते थें कभी इंसान
काँपती है रूहे अब वहाँ जाने से
आती है दुर्गंध अब पड़ोसियों के लिबाज़ों से।

- गायत्री शर्मा

(मुंबई आतंकी हमलों के बाद 3 दिसंबर 2008 को मेरे व्यक्तिगत ब्लॉग aparajita.mywebdunia.com पर मैंने यह कविता पोस्ट की थी।)

आपको कैसी यह कविता लगी, आपके विचारों से मुझे अवश्य अवगत कराएँ।

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