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Showing posts with the label गायत्री शर्मा

नलखेड़ा स्थित मां बगलामुखी का मंदिर

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- डाॅ. गायत्री शर्मा भक्तों की संकटहरणी और ज्ञात-अज्ञात शत्रुओं का काल बनकर उन्हें मन, वचन और वाणी से वश में करने वाली पीताम्बरा माँ बगलामुखी के दर्शन कर मन प्रसन्न हो गया। दिव्य तेज वाला माँ पीताम्बरा का विग्रह दर्शन मात्र से ही भक्तों के कष्टों को हर लेता है।       यह माँ का चमत्कार ही है कि घर में अग्नि के संपर्क में आते ही हमारे नाक गला, मुँह और आंखों को जलाने वाली साबुत लाल मिर्च भी नलखेड़ा के इस पावन स्थल पर आकर अपनी प्रकृति को भूल जाती है व किसी को हानि पंहुचाए बगैर हवन कुंड में धू-धू कर राख बन शत्रुओं का काल बन जाती है। यहीं कारण है कि माँ पीताम्बरा के इस धाम में मनोकामनापूर्ति हेतु मिर्च का हवन किया जाता है।       देश के सुदूर कोनों से भक्तजन अपने कष्टों का निवारण पाने व शत्रु के भय व वार से अपनी रक्षा की चाह में मां बगलामुखी की शरण में आते हैं। यह मां की अपनी संतानों के प्रति ममता ही है कि लोग यहां खाली झोली लेकर आते हैं और मां की कृपा से प्रसन्न मन से अपनी झोलियां खुशियों से भरकर इस दरबार से वापस जाते है। पीले रंग के सुंदर मंदिर मे...

हर रंग है कविता के इस मंच पर ....

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-           गायत्री शर्मा   अक्सर आयोजन लोगों को मिलाते हैं लेकिन कई बार अच्छे लोगों के मिल जाने से ही बेहतर आयोजन हो जाया करते हैं। जब अच्छे लोग मिलते हैं तो जाहिर तौर पर बातें भी अच्छी ही होती है। हमारे इस मंच की खासियत ही अच्छे लोगों को मिलाना होती है। दिनांक 4 जनवरी 2015, रविवार को ‘हल्ला-गुल्ला साहित्यिक मंच’ के बैनर तले एक ऐसा ही अच्छा आयोजन हुआ। इस आयोजन का मुख्य आकर्षण थाइलैंड से हमारे बीच पधारी मालवी कोकिला ‘श्रीमती माया मालवेन्द्र बदेका’ जी थी , जिन्हें इस कार्यक्रम में ‘विशिष्ठ साहित्य सम्मान’ से सम्मानित कर हल्ला-गुल्ला साहित्य मंच ने स्वयं को गौरवान्वित महसूस किया।  हमेशा की तरह मंच के संस्थापक सदस्य संजय जोशी संजग, जुझार सिंह भाटी व अलक्षेन्द्र व्यास की जुगलबंदी ने इस आम आयोजन को भी खास लोगों की उपस्थिति के कारण ‘खास’ बना दिया। चलिए, अब मैं आपको बता ही देती हूँ कि आखिर क्यों यह आयोजन ‘आम’ से ‘खास’ था? सबसे पहले मैं यहाँ जिक्र करूँगी माया दीदी का। बड़ी ही सहज, सरल, हँसमुख व मिलनसार माया दीदी अमूमन कम बोल...

रक्तरंजित हुआ शिक्षा का मंदिर

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खिलौना बन गए खिलौनों से खेलने वाले -           -  गायत्री शर्मा यह ‘तालिबानी आतंक’ की पाठशाला ही है, जिसमें निर्ममतापूर्ण तरीके से जिहाद के चाकू से इंसानों की खालें उधेड़ी जाती है, मानवीय संवेदनाओं को कट्टरता की आग में पकाया जाता है, इंसानों को इंसानों का खून पिलाया जाता है और इस तरह कई अग्निपरिक्षाओं के बाद तैयार होता है इंसान के भेष में आतंक का वह ‘खुँखार जानवर’, जो दुनियाभर में विंध्वस का कारक बनता है। खूँखार आतंकियों द्वारा जानवरों की तरह स्कूली बच्चों के सिर काटने व उन्हें गोलियों से भूनने की पेशावर के आर्मी स्कूल की नृशंस घटना इंसानियत के चिथड़े उड़ाती हैवानियत का वह अति क्रूरतम रूप है, जिसकी जितनी आलोचना की जाएं वह कम है। यह घटना कट्टर आतंक के अट्टाहस के रूप में दुनिया के सभी देशों के लिए एक चेतावनी भी लेकर आई है कि यदि आप आंतक के खिलाफ आज न जागे तो हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिए जाओगे। आतंक की यह कैसी भाषा है, जिसमें जिंदगी बचाने वाले को ‘हैवान’ और जिंदगी छीनने वाले को ‘खुदा’ माना जाता है? बच्चों को स्कूल भेजने की वकालत करने वाली पा...

पेशावर में पाक रोया ....

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-           गायत्री शर्मा हर आँख नम है, हर सीना छलनी है मासूमों पर कहर बन बरपी यह कैसी दहशतगर्दी है? जिहाद की आग आज मासूमों को जला गई बुढ़ापें की लाठी अचानक बूढ़े अब्बू के कंधों पर ताबूत चढ़ा गई रक्तरंजित हुई मानवता हैवानियत दहशत बरपा गई नन्हों की किलकारियाँ आज मातम का सन्नाटा फैला गई कोसती है माँ, क्यों भेजा उसे स्कूल? भेज दिया तो ये आफत आ गई जिसके लिए की थी दुआएं पीर-फकीरों से आज मौत उन दुआओं को पीछे छोड़ आगे आ गई   माँ-बेटे का संवाद – अम्मी-अब्बू बुलाते हैं बेटा तुम्हें चल उठ, हम तेरी जिद पूरी कराते हैं जिस खिलौने के लिए रोता था तू रोज़ तुझे आज अब्बू वो खिलौना दिलाते हैं पर ये क्या, मेरा नन्हा तो खुद ही खूबसूरत खिलौना बन गया है? सुनो, खामोश है क्यों लब इसके,   क्या ये फटी आँखों से कुछ बोल रहा है?    आज न जाने क्यों भारी है छाती मेरी ममता के दूध अचानक आँचल भिगो रहा है आ बेटा, कुछ देर गोद में आकर सो जा मीठी थपकियों वाला पालना तेरी बाट जोह रह...

जागिएं और आवाज़ उठाइएं

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-           गायत्री शर्मा  जहाँ मौजूदा माहौल से छटपटाहट होती है वहीं परिवर्तन के कयास लगाए जाते हैं। मौन धारण करने से या हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से हमें कुछ हासिल नहीं होने वाला। जब तक हमें अपने अधिकारों की जानकारी, कर्तव्यों का भान और न्याय पाने की छटपटाहट नहीं होगी। तब तक इस देश की तस्वीर नहीं बदलेगी। आज ‘मानव अधिकार दिवस’ है। कानून द्वारा प्रदत्त मानव अधिकारों के प्रति जागरूक होने का दिन। आइएं आप और हम आज मिलकर शुरूआत करते हैं अपने अधिकारों को जानने की और ज़मीनी हकीकत में घटित हो रही मानव अधिकारों के हनन की कुछ घटनाओं से सबक लेने की।    आज हम अपने सफर की शुरूआत करते हैं सरकारी योजनाओं, धार्मिक चैनलों में चमकने वाले बाबाओं और कुछ भ्रष्ट बाबूओं से। यह मेरे देश की तस्वीर ही है जहाँ नक्सलवाद नौनिहालों के हाथों में किताबों की जगह बंदूके थमा रहा है, जहाँ नवजात शिशु कटीली झाडि़यों में मौत के तांडव का रूदन गीत गा रहा है, जहाँ सरकारी शिविरों में नसंबदी ऑपरेशन महिलाओं की जिंदगी की नस काट रहा है और मोतियाबिंद का ऑपरेश...

रहे सलामत मेरा सजना ...

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- गायत्री शर्मा प्रकृति ने विवाहिता के भावों को कुछ ऐसा बनाया है कि उसके हृदय के हर स्पंदन के साथ ‘अमर सुहाग’ की दुआएँ सुनाई पड़ती है। अपने लिए वह किसी से कुछ नहीं माँगती पर ‘उनके’ लिए वह सबसे सबकुछ माँग लेती है। धरती के पेड़-पौधे, देवी-देवताओं के साथ ही ‘करवाचौथ’ के दिन तो हजारों मील दूर आसमान में बैठे चाँद से भी वह अपने दांपत्य के चाँद के दीर्घायु होने की दुआएँ माँग लेती है। करवाचौथ वह शुभ दिन है, जब चाँद से दुआएँ माँगती तो पत्नी है पर उन दुआओं का फल मिलता पति को है। सुहाग की चीजों से सजती तो ‘सजनी’ है पर दमकता उसके ‘साजन’ का मुखड़ा है।        जिस स्त्री को पुरातन काल से हमारे समाज में नवरात्रि में ‘बेटी’ के रूप में, विवाह के समय ‘कन्या रत्न’ के रूप में, शुभ कार्यों में ‘शुभंकर’ के रूप में और तीज-त्योहारों पर ‘सुहागन’ के रूप में पूजा जाता रहा है। वहीं ‘देवी’ रूपी स्त्री अपने सुहाग के सुखमय जीवन को ‘सदा सुहागन रहने के’ शुभाशीष से भरने के लिए देवी-देवताओं को पूजने लगती है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि प्रेम व रिश्तों को निभाने के मामले में महिलाएँ पुर...

कर्फ्यू के सन्नाटें में पुलिस का गरबा

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- गायत्री शर्मा सांप्रदायिकता की दीवारों ने हमारे दिलों में ऐसी दरारे डाल दी है कि जब किसी हिंदू पर आक्रमण होता है तो बगैर सोचे-समझे हम मुस्लिमों पर ऊँगली उठाने लगते हैं और जब किसी मुस्लिम को कोई गोली मार देता है तो हम हिंदूओं पर लाठियाँ लेकर बरस पड़ते हैं। क्या आज धर्म की कट्टरता की हैवानियत हमारी इंसानियत पर इतनी हावी हो गई है कि हर दिन एक साथ रहने और घूमने वाले राम-रहीम दंगों और कर्फ्यू के समय एक-दूसरे को ही मारने पर उतारू हो जाते है? पिछले दिनों मध्यप्रदेश के रतलाम शहर में हुई गोलीबारी की घटना में भी कुछ ऐसा ही हुआ। मुस्लिम और हिंदू नेताओं पर एक ही दिन में दो अलग-अलग स्थानों पर हुए जानलेवा हमला के बाद हमेशा की तरह राजनीति के कीचड़ में पत्थर फेंककर तमाशा देखने वाले छुटपुट नेताओं की राजनीति दम पकड़ने लगी। जिसके चलते भाजपा ने कांग्रेस को आरोपों के कटघरे में खड़ा किया और कांग्रेस भाजपा को। ऐसे में मरण हुआ बेचारे आम-आदमी का, जो दंगा, कर्फ्यू और मारपीट की घटनाओं के कारण अपना रोजगार छोड़ घर की चारदीवारी में कैद होकर रह गया।        क्या होता है कानून की उन धाराओं क...

जय हो 'मोदी'

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- गायत्री  कल संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुनना और आज न्यूयार्क के मैडिसन स्केवयर गार्डन पर नरेंद्र मोदी का परिवार के किसी सदस्य की तरह अमेरिका के प्रवासी भारतीयों से मुखातिब होना दोनों ही आयोजन मोदी की मौजूदगी व उनके वक्तव्य की सकारात्मक ऊर्जा के कारण सदा-सदा के लिए यादगार बन गए। इन दोनों ही आयोजनों में मोदी का वक्तव्य मौके की नब्ज़ को भाँपकर चौका मारने के बेमिसाल उदाहरण थे। कल मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय से विश्व की सबसे बड़ी समस्या ‘आतंकवाद’ को खत्म करने हेतु दुनिया के सभी देशों के सम्मिलित सहयोग की बात कह जहाँ सभी देशों को एकजुट होने का संदेश दिया वहीं अपने वक्तव्य में मोदी ने बाहरी आक्रमणों के समय सैन्य शक्ति व बलिदान देने वाले छोटे-छोटे देशों की निर्णय में भूमिका को बढ़ावा देने की महत्वपूर्ण बात भी कही। भारतीयों की क्षमता व कौशल को विश्व के विकास में महत्वपूर्ण बताकर मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच से भारत की शक्ति का जयघोष दुनियाभर में कर दिया। कल के धमाकेदार भाषण के बाद आज मैडिसन स्केवयर...

‘संजा’ के रूप में सजते हैं सपने

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कुँवारी लड़कियों की सखी ‘संजा’ -           गायत्री शर्मा संजा     श्राद्ध पक्ष में शाम होते ही गाँवों की गलियों में गूँजने लगते हैं संजा के गीत। कुँवारी कन्याओं की प्यारी सखी ‘संजा’, जब श्राद्ध पक्ष में उनके घर पधारती है तो कुँवारियों के चेहरे की रंगत और हँसी-ठिठौली का अंदाज ही बदल जाता है। सोलह दिन की संजा की सोलह आकृतियों में मानों कुँवारी लड़कियों के सपने भी दीवारों पर गोबर के चाँद-सूरज, फूल, बेल, सातिये, बंदनवार आदि अलग-अलग आकृतियों में सजने लगते हैं और अपने प्रियतम को पाने की ललक उनके गीतों के समधुर बोलों में तीव्र हो उठती है।   मालवाचंल की संजा यह स्त्रियों के एक-दूसरे से सुख-दुख को साझा करने की प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा ही है, जिसे कुँवारियाँ संजा बाई की उनकी सासु-ननद से हुई तीखी नोंकझोक के गीतों के माध्यम से एक-दूसरे से साझा करती है। इसे हम ग्रामीण संस्कृति में घुली मधुर संबंधों के प्रेम की मिठास ही कहेंगे, जिसके चलते दीवारों पर उकेरी जाने वाली संजा के प्रति भी युवतियों में सखी सा अपनत्व भाव दिख...

किशोर व वयस्क अपराधियों के लिए समान दण्ड

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-           गायत्री शर्मा अपराधियों के लिए खौंफ का पर्याय बनने वाला कानून ही आज सवालों के कटघरे में खड़ा हो गया है। यहाँ अपराधियों का वकील किशोरता की आड़ लेकर अपने मुवक्किल को बचाने के लिए अदालत में पेचीदा धाराओं और पुराने निर्णीत मामलों के पाँसे फेंकता है तो वहीं दूसरे कटघरे में खड़े बलात्कार व हत्या के शिकार लोगों के परिजन कानून के सामने गिड़गिड़ाकर दोषियों को कड़ी सजा देने की गुहार करते हैं। ऐसे अधिकांश मामलों में लचीली धाराओं के पेचीदा जालों में उलझा कानून असहायों की तरह मौन साध लेता है और किताबी अक्षरों को सर्वोपरि मान किशोर अपराधियों को सजा में राहत देकर स्वयं की बेबसी पर आँसू बहाता है। वाह रे मेरे देश के कानून! बलात्कार और हत्या जैसे संगीन मामलों में किशोरवयता के आधार पर दोषियों को कड़ी सजा से राहत देना कहाँ का न्याय है, जो समाज में कानून की सार्थकता का ही मखौल उड़ा रहा है? जब दोषियों ने कुकर्म करने में क्रूरता की सारी हदों को लाँघ दिया तो ऐसे में दोषियों को सजा देने में कानून को कड़ेपन से इंकार क्यों? शर्म आती है मुझे उन लोगों प...

हास्य का ‘हुल्लड़’ हो गया गुम

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-          गायत्री शर्मा  साहित्य जगत में हास्य-व्यंग्य का एक चमकता सितारा आज आसमान का सितारा बन बादलों की भृकुटी के बीच सज गया। काव्य मंचों पर ठहाकों की गुदगुदी बिखेरने वाला वह कवि हँसते-हँसते दुनिया को अलविदा कह गया। जाते-जाते छोड़ गया वह प्रकृति को खुशनुमा मौसम में हम सभी को हँसने-मुस्कुराने के लिए। व्यंग्य लेखन व प्रस्तुतिकरण के अपने अलहदा अंदाज से सुशील कुमार चड्ढ़ा ने व्यंग्य जगत में अपनी एक ऐसी पुख्ता पहचान बनाई थी, जिसके समकक्ष खड़े रहना किसी मामूली व्यंग्यकार के लिए एक दिवास्वप्न के समान ही था। सही पहचाना आपने, मैं बात कर रही हूँ साहित्य जगत में हास्य-व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर सुशील कुमार चड्ढ़ा की, जिसे काव्य के रसिक श्रोता ‘हुल्लड़ मुरादाबादी’ के नाम से जानते हैं। काव्य जगत में वर्षों से टिमटिमाता यह सितारा शनिवार शाम हमें अलविदा कह अकेले ही निकल पड़ा उस लंबे सुनसान सफर पर, जहाँ यह हँसाने वाला तो है पर उसकी कविताओं पर दाद देने वाले श्रोता काफी पीछे छूट गए है। कहते हैं जिस पर साक्षात् माँ सरस्वती की कृपा होती है उसके लिए को...