Monday, January 13, 2014

कैसी हठ पर अड़े हो दोस्त?

इस बार तुम कैसी हठ पर अड़े हो दोस्त?
ईगो में तो तुम मुझसे भी बड़े हो दोस्त।
मन ही रोते हो बीते दिनों को याद कर
भीड़ देख क्यों मुस्कुरा पड़े हो दोस्त?
सबकुछ है साफ-साफ, सुलझा-सुलझा
फिर किस धुँध को साफ करने में तुम लगे हो दोस्त?
झूठ ही सही 'हार' मान लो हमारे लिए
क्यों 'जीत' के इंतजार में ही तुम खड़े हो दोस्त?
क्या त्योहारों पर औपचारिकताएँ ही होगी पूरी
क्या अब कभी पहले सी सहजता से तुम हमसे मिलोगे दोस्त?
- गायत्री 

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (31-03-2014) को "'बोलते शब्द'' (चर्चा मंच-1568) पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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नवसम्वतसर २०७१ की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Yashwant Yash said...

कल 04/जून /2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद !