अजनबी सी मुलाकात
हुई थी मुलाकात
पथ में
अचानक से आए
उस चौराहें पर
जहां विकल्प तो
तीन मौजूद थे
और चौथे पर
वो स्वयं
खड़े थे
जिंदगी की रफ्तार
के साथ
पास आते-आते
दूर जाने को तत्पर तत्क्षण
ये चौराहें की मुलाकात
दे गई क्षणिक सुकून
और सुदीर्घ इंतजार
संभवतः स्वतः से
पूछने वाला प्रश्न बन
कि कैसी थी वो मुलाकात?
जो यादों के कैनवास पर
एक जल्दबाजी की
आड़ी-तिरछी लकीर बन
रह गई वहीं
न वो किसी चित्र में
मुकम्मल हो पाई
और न हमसे
मिटाई गई
वो अधूरी लकीर
जो जिंदगी में रंग
भरते-भरते
बस लकीर बन
रह गई स्मृतियों में
एक अजनबी की तरह
हुई थी मुलाकात
- डाॅ गायत्री
photo courtesy : Shutterstock.com

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