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उलझे रिश्तों का मांझा सुलझातें स्वानंद

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वो बहती हवा सा है, जो अपने संग मुस्कुराहटों की शीतल फुहारों को लिए बहता है। वह उस उड़ती पतंग सा है, जिसकी कल्पनाओं की ऊँची उड़ान ज़मी से ऊँचे उठकर आसमां की बुलंदियों को छूने को ललायित है। जी हाँ, मैं बात कर रही हूँ मनमौजी, मिलनसार, ऊर्जावान, हरफनमौला कलाकार स्वानंद की, जो अपनी बहुमुखी प्रतिभा के बूते पर बॉलीवुड में इंदौर का नाम रोशन कर रहे हैं। गायन, लेखन, अभिनय और फिल्म निर्देशन से जुड़ा कला का यह साधक अपनी कलम से कल्पनाओं की ऊँची उड़ानें तो भरता है पर इन उड़ानों में भी उसका जुड़ाव ज़मी से जरूर रहता है। उनके शब्द भावों से अठखेलियाँ करते हुए कभी अपने बाबरें मन की कल्पनाओं से उलझे रिश्तों का मांझा सुलझाते हैं तो कभी रात को चाँद की सहेली बनाकर उससे अपना हाल-ए-दिल बँया करते नज़र आते है। शब्दों का बेहतर तालमेल और हर शब्द की लहज़े के साथ अदायगी तथा शब्दों के अर्थ की सार्थकता का खयाल रखना ही स्वानंद की खूबी है। तभी तो मुन्नी बदनाम, बद्तमीज़ दिल, शील की जवानी, अनारकली डिस्को चली, फेविकॉल से ... जैसे गीतों के बीच भी स्वानंद के गीत सामाजिक मर्यादाओं की दीवार के भीतर रहकर प्रेमियों के प्रेम...

मैं कहती, तू कर देता

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तेरा कहना और मेरा सुनना कभी एक सा नहीं होता गर होता एक सा, तो न मैं हँसती, न तू रोता पढ़ पाते मन के भाव जब तो इधर-उधर की बातों का बहाना न होता 'कहने को करना' सच बना पाता तू तो न तू बेवफा कहाता, न मैं पत्थरदिल होती दिल में खिल जाते प्रेम के मोगरे जब तब इत्र से बदन महकाने का कोई मतलब न होता मेरे इंतजार से पहले ही आ जाता गर तू तो मेरी खुशी का कोई ठिकाना न रहता तेरा कहना और मेरा सुनना कभी एक सा नहीं होता गर होता एक सा, तो न मैं हँसती, न तू रोता - गायत्री

संसद में नतमस्तक हुए मोदी

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कार्य जब पूजा बन जाएँ तो कार्यस्थल स्वत: ही मंदिर बन जाता है। लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाले संसद भवन में नरेंद्र मोदी का नतमस्तक होना विनम्रता के साथ ही कार्य के प्रति उनके समर्पण को भी व्यक्त करता है। यह वहीं संसद है, जिसकी गरिमा कभी जूतों से उछाली जाती हैं तो कभी कागज़ के टुकड़ों में जलाई जाती है। फिर भी लोकतंत्र का यह मंदिर अडिग खड़ा रहता है उस पुजारी की तलाश में, जो इसकी गरिमा का आदर करें और इसे सब्जीमंडी या कुश्ती का अखाड़ा बनाने से रौके। यह वहीं संसद है जहाँ मानवता, शिष्टता और विनम्रता का आए दिन मखौल उड़ाया जाता है। उसी संसद की सीढि़यों पर मोदी नतमस्तक हुआ जाता है। वाह रे मोदी! आपका साहस, सर्मपण और सेवा भाव वाकई में काबिलेतारीफ है। - गायत्री 

मेरे दिवा स्वप्न

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नैन झरोखें में बसे, मेरे दिवा स्वप्न कर ले आलिंगन मेरा, फिर मना जश्न अश्रुधार में भीगते- भागते, मेरे दिवा स्वप्न प्रेम नगर में ले चल मुझे, फिर मना जश्न नैन झरोखें में बसे मेरे दिवा स्वप्न पल-पल रूठते, मेरे दिवा स्वप्न नैनों से दिल में जा बस, फिर मना जश्न नैन झरोखें में बसे, मेरे दिवा स्वप्न स्वप्नदृष्टा बनाते मुझे, मेरे दिवा स्वप्न प्रेमस्वरूपा बना मुझे, फिर मना जश्न नैन झरोखें में बसे, मेरे दिवा स्वप्न - गायत्री 

तेरे साथ हर क्षण है सुखद

तेरा आना भी सुखद, तेरा जाना भी सुखद तेरा जीतना भी सुखद, तुझसे हारना और सुखद खुशी का हो या ग़म का, हर क्षण जिसमें तू साथ है वह क्षण है, सुखद, सुखद और भी सुखद । - गायत्री 

मेरे अंर्तमन की कलह

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मेरे अंर्तमन की कलह दिल और दिमाग के बीच चलती सतत जिरह नतीजों पर आकर फिर से भटक जाती है संघर्षों की मझधार में फँसी यह नाव हर बार गफलत के भँवर में जाकर उलझ जाती है। क्या बेऩतीज़ा रह जाएगी जिंदगी या प्रश्न सुलझ जाएँगे जीवन रहस्यों के? परत-दर-परत सुलझती जाएँगी उलझनें जीवन की मिल जाएँगे वफादार साथी जीवन पथ के किसी का मिलना और खोना अब कोई चलन न बन जाएँ जो आएँ जीवन में बस यहीं आकर ठहर जाएँ। -            - - गायत्री       

मेरे हीरो – मेरे दादू

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तेरी लाठी बना ले मुझे किस्सों की तरह यादों में बसा ले मुझे सदा चलूँ तेरे साथ मैं अपने पैरों की खड़ाऊँ बना ले मुझे   घुटने छूने को बेकरार ये कंधे तेरे बहुत ऊँचे कद को बताते हैं तेरे कांधों पर बैठकर देखे वो मेले मुझे आज़ भी बहुत याद आते हैं हरपल कँपकँपाते तेरे हाथ दुनियादारी की कैसी अजीब गणित सीखाते हैं तुझ संग मैं बुरा करूँ या भला तेरे हाथ सदा मुझे दुआएँ दिए जाते हैं झुर्रियों से सनी चमड़ी आज भी एक नई चमक से चमचमाती है यह तो मुझे मोटे चश्में में छुपे मेरे हीरों की   जवानी की याद दिलाती है दादी की यादों में मेरे दादा अक्सर खुली आँखों में खो जाते हैं तस्वीरों की धूल के साथ अब उनके सपने भी धुंधलाएँ जाते हैं। तब और अब का फर्क सदा हमें संभालने वाले दादू आज तुम क्यों लड़खड़ा गए? जिंदगी की कटु सच्चाई देख क्या तुम भी घबरा गए? तेरे पैर का हर एक छाला मेरे दिल को छलनी कर जाता है तेरी हर तकलीफ का दर्द दादू,   अक्सर मेरे चेहरे पर पढ़ा जाता है। मुझसे बगैर कुछ कहे कहीं गुम न हो जाना मुझे साथ लिए बगैर दा...

तुम कैसी हो ?

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मुट्ठी से फिसलती रेत सी चंचल कभी शांत जल सी गहन गंभीर तपती धूप में कराती हो तुम सुकून का अहसास लबों पर खामोशी आँखों से करती हो बातें अब समझने लगा हूँ मैं भी   इन ठगोरे नैनों की बानी   तुम्हारी अदाएँ इतनी प्यारी है अब बता भी दो प्रिये! तुम कैसी हो? - गायत्री  

क्या तू छलावा है?

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तू छलावा है या सच की आड में झूठ ज्यादा है हकीकत को झुठलाने का एक सच्चा सा लगता झूठा वादा है क्या सचमुच तू छलावा है? आँखे बंद करूँ तो सामने आ जाएँ खुली आँखों में दूर खड़ी मुस्कुराएँ तेरी कल्पनाओं में जिंदगी का मजा कुछ ओर ही आता है क्या सचमुच तू छलावा है? नींदे, यादें, सब कुछ तू ले गई जाते-जाते मीठी यादों का सहारा दे गई तेरी बातों को सोचकर तेरी तरह होंठ हिलाना मुझे बड़ा भाता है क्या सचमुच तू छलावा है? मेरी स्वप्न सुंदरी काश तू सामने होती कह देता मैं तुझे अपने दिल की बात हकीकत में तुझे अपना बना लेता फिर कहता कि तू छलावा नहीं मेरा साया है क्या सचमुच तू छलावा है? -           -  गायत्री 

रतलाम का मालवी दिवस, कवियों के साथ कवियों की बात

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कहते हैं जब मिठास मौखिक न्यौते में ही हो तो चिट्ठी-पत्री बगैर भी व्यक्ति मुकाम पर पहुँच जाता है। कुछ ऐसा ही न्यौता मुझे भी संजय जोशी जी द्वारा मालवी दिवस के कार्यक्रम का मिला। एक मौखिक निमंत्रण पर उसमें भी अपनत्व की मिठास, तो भला मैं क्यों न जाऊँ उस कार्यक्रम में? संजय जी के निमंत्रण पर 6 अप्रैल को मैं भी जा पहुँची इस कार्यक्रम के उसी पुराने ठिकाने यानि कि रतलाम के मेहँदीकुई बालाजी मंदिर परिसर के हॉल में।      पहले से सजी-सजाई कवियों की रेडिमेड महफिल में ‍मैं भी फिट होने के लिए तैयार थी। जिस तरह एक-एक बूँद से घड़ा भरता है। ठीक उसी तरह यह महफिल भी एक-एक आम कवि को खास बनाने के लिए दरवाजे की ओर टकटकी लगाएँ बैठी थी क्योंकि यहाँ देखों तो सबके सब कवि थे और मानों तो हर कवि एक श्रोता था। यह बात राज़ की बात है। जिसे आप अभी नहीं समझ पाओगे। हांलाकि महफिल को देखकर मेरे मन में बड़ा संशय था कि वहाँ मौजूद सभी विद्वतजनों की और खासकर संजय जी की अपेक्षाओं पर एक कवि के रूप में मैं खरा उतर पाऊँगी कि नहीं। लेकिन मन में विश्वास और हिम्मत जगाने के लिए मेरे भीतर की गायत्री स्वाभिमान से ल...