काश-काश में ही लगा ली झूठी आस
आईने में अपनी ढ़लती उम्र को देख-देख रोना, सफेदी को डाई की कालिमा से भिगोना, तंग कपड़ों से तौबा करना और न चाहते हुए भी समय से पूर्व भगवान की भक्ति में खोना ... भला कौन चाहेगा? लेकिन ढ़लती उम्र के इस कड़वे सच को नकारना भी तो इतना आसान नहीं है। तभी तो न चाहते हुए भी हमारे मुँह से अनायास निकल ही जाता है कि काश मेरी उम्र 5-6 साल कम हो जाएँ। अतीत की मीठी यादों में खोएँ रहना, शाहरूख खान और कैटरीना को जीवनसाथी बनाने के सपने संजोना हम सभी को अच्छा लगता है। जिसका एकमात्र कारण वास्तविकता से परे काल्पनिक जगत में हिलोरे लेती हमारे सपनों की नैया है। जो आज वाकई में राम के भरोसे ही चल रही है। हमेशा जँवा दिखने की चाह और सब कुछ पा लेने की चाह कई बार हमसे वो काम भी करवा लेती है, जिसे करने में शायद हम ना नुकूर करते परंतु प्रेम की प्यास और जँवा दिखने की आस के आगे तो हम ‘मंजूर है मंजूर है ...’ की रट लगाकर हर काम करने को तैयार हो जाते हैं। मिला दें तो ‘प्रभु’ ना मिले तो ‘पत्थर’ : देखों जी, भगवान से हमारी डिमांड भी समय और वक्त देखकर बदलती रहती है। कँवारेपन में अच्छे खूबसूरत जीवनसाथी क...